Wednesday, 11 December 2024

संसद नहीं चलने से विपक्ष नुकसान में रहता है


संसद का शीतकालीन सत्र 20 दिसंबर तक चलेगा। अब तक इसमें किसी भी दिन पूरे समय  एक भी सदन में कामकाज नहीं हुआ। सत्र के पहले लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक बुलाकर सत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए सहयोग मांगते हैं। जिसमें सभी दलों के नेता आश्वासन देते हैं कि वे जो भी कार्यसूची संसदीय कार्य मंत्रालय तैयार करता है उस पर बहस करेंगे। सरकार कुछ विधेयक भी हर सत्र मे पेश करती है। इन सबके अलावा देश और दुनिया में हो रही घटनाओं पर भी  चर्चा की जाती है। इस सत्र के पूर्व भी  सर्वदलीय बैठक में  सत्र के विधिवत संचालन  हेतु विभिन्न दलों  ने सहमति व्यक्त की थी। लेकिन  पहले दिन ही हमेशा की तरह हंगामा शुरू हो गया । पहला सप्ताह बेकार चले जाने के बाद लोकसभाध्यक्ष के साथ दोबारा हुई बैठक में सभी दलों के प्रतिनिधियों ने एक बार फिर सदन को बिना रुकावट के चलाने का वायदा किया किंतु कार्यवाही शुरू होते ही होहल्ले की वजह से सदन स्थगित किया जाता रहा।  विपक्ष कुछ मुद्दों को लेकर आक्रामक है। शुरुआत में  सत्ता पक्ष रक्षात्मक प्रतीत हुआ किंतु बाद में उसकी ओर से भी जवाबी हमला होने लगा। राहुल गाँधी के पास अदाणी नामक एकमात्र मुद्दा है जिससे विपक्ष की अनेक पार्टियां दूरी बनाये हुए हैं। इसी बीच महाराष्ट्र में हुई करारी हार को लेकर इंडिया गठबंधन में खींचातानी शुरू हो गई जब ममता बेनर्जी ने गठबंधन का नेतृत्व ग्रहण करने की पेशकश करते हुए राहुल गाँधी को निशाना बनाया। आश्चर्य तब हुआ जब उनके बयान को गठबंधन के अनेक बड़े नेताओं का समर्थन मिलने लगा। अदाणी का विरोध करने से भी अनेक विपक्षी पार्टियों ने इंकार कर दिया जिससे राहुल अकेले नजर आने लगे। इस सबसे भाजपा को हमलावर होने का अवसर मिल गया और उसकी तरफ से राहुल और उनकी माँ सोनिया गाँधी पर भारत विरोधी विदेशी संगठनों के साथ संगामित्ति का आरोप लगाया गया जिसके कारण सदन का वातावरण और तनावपूर्ण हो गया। उधर राज्यसभा में सभापति जगदीप धनखड़ के विरुद्ध अविश्वास पेश के जरिये विपक्ष सरकार पर दबाव बनाने का दाँव चल रहा है। स्मरणीय है उपराष्ट्रपति ही उच्च सदन के सभापति होते हैं। यद्यपि उस प्रस्ताव के पारित होने की संभावना न के बराबर है किंतु ऐसा करके विपक्ष अपने भीतर आने लगे बिखराव को रोकने का प्रयास करेगा। कुल मिलाकर जो लग रहा है उसके अनुसार ये  सत्र भी  हंगामे के बीच खत्म हो जाएगा। पिछले सत्र में सरकार ने जो वक्फ संशोधन विधेयक  जेपीसी के पास भेजा था उसकी रिपोर्ट इस सत्र में प्रतीक्षित थी किंतु सरकार ने उसे आगामी सत्र के लिए टाल दिया। अब वह एक देश एक चुनाव संबंधी विधेयक लाने जा रही है और उसे भी जेपीसी  गठित कर उसके जिम्मे कर दिया जाएगा। इन दोनों विषयों पर सत्ता पक्ष पूरे देश में विमर्श के जरिये जनता का समर्थन हासिल करने में लगा हुआ है। वक्फ द्वारा नई संपत्तियों पर दावा करने सम्बन्धी विवादों की खबरों के कारण उस विधेयक के पक्ष में जन समर्थन जुटाने में सरकार सफल लग रही है। ऐसी ही रणनीति एक देश एक चुनाव के बारे में भी  है। दुर्भाग्य से विपक्ष इसे  समझ नहीं पा रहा । फिलहाल संसद के दोनों सदनों में विपक्ष की अच्छी खासी संख्या है। ऐसे में उसे सदन के संचालन में ज्यादा रुचि लेना चाहिए। लेकिन राहुल गाँधी अपनी जिद पूरे विपक्ष पर लादकर खुद को आकर्षण का केंद्र बनाना चाहते हैं। वहीं  लोकसभा में  नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद  पूरे विपक्ष का विश्वास अर्जित करने में उनकी विफलता का लाभ उठाकर सत्ता पक्ष भी सदन को चलाने के प्रति अपेक्षित रुचि नहीं दिखाता। हालांकि हंगामे के बीच सरकार जरूरी विधायी कार्य पूरे करवा लेती है। ये भी देखने आया है कि सदन यदि  कुछ समय चलता भी है तो दोनों पक्षों के बीच आरोपों और प्रत्यारोपों में ही पूरा समय नष्ट हो जाता है। लोकतंत्र में  आस्था रखने वाले जिम्मेदार किस्म के लोग तो संसद की ये दशा देखकर दुखी होते हैं किंतु संसदीय प्रजातंत्र की रक्षा का दायित्व जिन सांसदों पर है उन्हें लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा की लेश मात्र भी फिक्र नहीं है। संसद का बहुमूल्य समय नष्ट करने के लिए सत्ता और विपक्ष दोनों एक दूसरे पर आरोप मढ़ते हैं किंतु कमोबेश दोनों ही इसके दोषी हैं। लेकिन विपक्ष के लिए संसद ही वह मंच है जिसके जरिये वह पूरे देश तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसलिए बजाय सरकार और सभापति पर आरोप लगाते रहने के विपक्ष को सदन सुचारु रूप से चलाने की पहल करना चाहिए क्योंकि इसी में उसका फायदा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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