Thursday, 26 December 2024

बांग्लादेश की आर्थिक नाकेबंदी करना जरूरी


बांग्लादेश में मुस्लिम धर्मांधता अपने चरम पर है। शेख हसीना का तख्ता पलट किए जाने के बाद  बनी अंतरिम सरकार ने ग़ैर मुस्लिमों पर अत्याचार की छूट दे रखी है।  सबसे ज्यादा दमन हिंदुओं का किया जा रहा है। उनके अलावा जैन और ईसाई समुदाय को भी  प्रताड़ित किये जाने की खबरें लगातार आ रही हैं। ताजा घटना क्रिसमस पर ईसाइयों के घर जलाने की है। बांग्लादेश की काम चलाऊ सरकार  अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का आश्वासन तो देती रहती है किंतु मुस्लिम समुदाय की गुंडागर्दी को  पूरी तरह संरक्षण दिया जा रहा है। हिंदुओं पर जिस तरह का अमानुषिक अत्याचार नई सत्ता आने के बाद शुरू हुए उसके अनेक वीडियो पूरी दुनिया में प्रसारित हो चुके हैं। लूटपाट, आगजनी आम हो गई है। लेकिन महिलाओं के साथ जिस तरह का राक्षसी व्यवहार देखने में आया वह इस्लामिक कट्टरता का सबसे घृणित चेहरा है। दुख की बात ये है कि भारत के मुस्लिम मुल्ला - मौलवी इस हैवानियत के विरुद्ध जुबान खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। मुस्लिम देशों के जो संगठन कश्मीर घाटी में अल्पसंख्यकों पर कथित जुल्मों पर गला फाड़ते हैं वे भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे अत्याचार पर मौन धारण किये हुए हैं। इस बारे में सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि बांग्लादेश की नई सरकार उस पाकिस्तान से गलबहियां करने में जुटी है जिसके जुल्मों से त्रस्त होकर इस देश का निर्माण हुआ जिसमें भारत का बड़ा योगदान  है। बांग्लादेश की सत्ता में बैठे लोगों के साथ ही जनता भी इस सच्चाई को झुठला नहीं सकती कि पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों का आत्मसमर्पण भारतीय सेना के युद्ध कौशल का नतीजा था वरना  ये इलाका आज भी पश्चिमी पाकिस्तान का गुलाम बना रहकर अत्याचार का ज़हर पीने को मजबूर रहता। 1971 में अस्तित्व में आने के कुछ सालों तक तो इस नये देश का व्यवहार  भारत के प्रति काफी सौजन्यता पूर्ण रहा किंतु देश के संस्थापक शेख मुजीब की हत्या के बाद उत्पन्न स्थितियों में रिश्ते खराब होते गए। शेख हसीना के कार्यकाल को उस दृष्टि से काफी अच्छा कहा जायेगा जब राजनयिक के साथ ही व्यावसायिक संबंध भी काफी अच्छे रहे। लेकिन बीते कुछ महीने कई सालों पर भारी पड़ गए। दरअसल बांग्लादेश के नये सत्ताधीश भारत से  केवल इस बात पर नाराज नहीं हैं कि उसने शेख़ हसीना को पनाह दे रखी है, बल्कि इसकी असली वजह उसका मुस्लिम कट्टरपंथी होना है। ये बात पूरी तरह सही है कि इस देश में हिंदुओं सहित अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के साथ भेदभाव  शुरू से ही होता आया है। लेकिन सबसे बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग हिंदुओं का है और पाकिस्तान का निर्माण भी हिंदुओं से नफरत के आधार पर हुआ था। इसलिए उससे अलग होने के बाद भी बांग्लादेश में हिन्दू विरोध की भावना को पुनः जोर पकड़ने में ज्यादा समय नहीं लगा।  इस तथ्य को भी ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान के निर्माण की मुहिम बंगाल से ही हुई थी। आजादी मिलने के समय  बंगाल में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं का जो कत्ले आम हुआ वह भी सर्वविदित है। वर्तमान में बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर लगता है विभाजन के समय से उत्पन्न नफरत आज भी बांग्लादेश के मुसलमानों में विद्यमान है। लेकिन क्रिसमस के दिन ईसाई समुदाय पर गुस्सा उतारकर वहाँ के मुस्लिम गुंडों ने दिखा दिया कि इस देश में मानवता पूरी तरह खत्म हो चुकी है। भारत के लिए ये चिंता का विषय है क्योंकि वहाँ हिंदुओं पर किये जा रहे जुल्मों के पीछे भारत के प्रति दुर्भावना ही है। अब तक भारत ने जो धैर्य दिखाया वह कूटनीतिक तौर पर सही है क्योंकि किसी देश के अंदरूनी मामले में सीधे हस्तक्षेप करना सही नहीं होता। शेख हसीना को लेकर भी हमारे सामने व्यवहारिक और कूटनीतिक मुश्किलें हैं । भारत ने उन्हें अब तक औपचारिक रूप से शरण भी नहीं दी । उधर बांग्लादेश उन्हें वापस करने की मांग कर चुका है। वहाँ रह रहे हिंदुओं की सुरक्षा भी नाजुक मुद्दा है। यद्यपि भारत ने अघोषित तौर पर बांग्लादेश को दी जाने बहुत सी चीजों की आपूर्ति कम करते हुए दबाव बनाया है किंतु अब समय आ गया है जब इस देश पर दबाव और बढ़ाया जाए। इसका सबसे अच्छा तरीका है आर्थिक नाकेबन्दी की जाए। कुछ वर्षों पहले नेपाल ने भी जब सीमा विवाद पैदा कर भारत विरोधी रुख दिखाया तब इसी कदम से उसकी ऐंठ कम हुई थी। उसके बाद मालदीव में आई चीन समर्थक सरकार ने भी भारत को आँखें दिखाना शुरू किया तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक सांकेतिक कदम ने ही उसके पर्यटन उद्योग की कमर तोड़ दी जिससे घबराकर वहाँ के नये शासक दौड़े - दौड़े दिल्ली आये और रिश्ते सुधारने की दुहाई देने लगे। बांग्लादेश का मसला हालांकि ज्यादा पेचीदा है किंतु उसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि भारत के जरा से प्रतिरोध के सामने टिक नहीं सकेगा। अगले महीने की 20 तारीख को अमेरिका में बांग्लादेश की नई सरकार को संरक्षण देने वाले राष्ट्रपति अलग हो जाएंगे और भारत समर्थक डोनाल्ड ट्रम्प व्हाइट हाउस में पहुंचेंगे। संभवतः भारत उसी की प्रतीक्षा कर रहा है। लेकिन उसके पहले किसी बड़े कदम की तैयारी कर लेनी चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment