किसी की मृत्यु पर दलगत राजनीति से जुड़े मतभेदों का उठना शोभा नहीं देता। दुर्भाग्य से हमारे देश की राजनीति में वह मर्यादा टूटने से सौजन्यता, सद्भावना और संवेदनशीलता जैसे शब्द अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। यही वजह है कि शोक के अवसर पर भी राजनीतिक नफे - नुकसान का बही खाता खोल दिया जाता है। दिवंगत हस्ती की चिता सुलगने के पहले ही नफरत की आग भड़कने लगती है। इसके लिये किसी एक व्यक्ति या दल को कसूरवार ठहराना तो अन्याय होगा क्योंकि निष्पक्ष आकलन करें तो समूची राजनीतिक बिरादरी इसके लिए जिम्मेदार है। हाँ, किसी का दोष अधिक और किसी का कम हो सकता है। ताजा संदर्भ पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार राजघाट परिसर में करने की बजाय निगम बोध घाट में किये जाने से उत्पन्न विवाद है। अंत्येष्टि की पूर्व रात्रि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर दाह संस्कार राजघाट में किये जाने का अनुरोध किया ताकि उनका स्मारक भी वहीं बन सके। इस पर सरकार ने सूचित किया कि स्मारक हेतु स्थान आवंटन में समय लगेगा । साथ ही आश्वासन भी दिया गया कि शीघ्र ही इसकी प्रक्रिया पूर्ण कर न्यास गठित करने के बाद उनका भव्य स्मारक बनवाया जाएगा। लेकिन कांग्रेस इससे संतुष्ट नहीं हुई। इसके बाद अंत्येष्टि में बदइंतजामी की शिकायतें की गईं। जवाब में भाजपा ने भी कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया। और तो और उनके पार्थिव शरीर को लोगों के दर्शनार्थ कांग्रेस मुख्यालय तक में नहीं रखने दिया। आरोप तो ये भी है कि डाॅ. सिंह उनकी अंत्येष्टि में जाने के इच्छुक थे किंतु उनको रोक दिया गया। इस सबके बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी का एक बयान चर्चा में है जिसमें उन्होंने अपने पिता की मृत्यु के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर श्रद्धांजलि न दिये जाने की आलोचना की थी। डाॅ. सिंह के अंतिम संस्कार संबंधी विवाद में आम आदमी पार्टी भी कूद पड़ी और दिल्ली विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सिखों के अपमान का मुद्दा छेड़ दिया। इन सब विवादों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो ये बात सामने आये बिना नहीं रहेगी कि राजनीतिक पार्टियां किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु का राजनीतिकरण करने में भी संकोच नहीं करतीं। कांग्रेस की ओर से इस बात का प्रचार किया गया कि राहुल गाँधी डाॅ. सिंह की मृत्यु पर उनके परिजनों के साथ रहे और उनके पार्थिव शरीर को कंधा भी दिया। अब भाजपा ने कटाक्ष किया है कि गत दिवस उनकी अस्थियाँ यमुना में प्रवाहित किये जाने के समय न तो श्री गाँधी तथा उनके परिवार का कोई सदस्य उपस्थित था और न ही अन्य कोई कांग्रेस जन । आज खबर आ गई कि केंद्र सरकार ने डाॅ. सिंह के स्मारक हेतु स्थान चयन हेतु कारवाई प्रारंभ कर दी है और जल्द ही उसके लिए न्यास का गठन कर दिया जाएगा। इतनी जल्दी हरकत में आने के पीछे भी राजनीति है क्योंकि भाजपा भी दिल्ली विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए किसी सिख नेता की मौत पर राजनीतिक विद्वेष के आरोप से बचना चाह रही है। इन विवादों के साथ ही राजधानी दिल्ली में दिवंगत राष्ट्रीय नेताओं के स्मारक हेतु स्थान की उपलब्धता का मुद्दा गर्माने लगा है। ये जानकारी भी आई है कि डाॅ. सिंह के प्रधानमंत्री काल में ही राजघाट परिसर में नया स्मारक बनाने पर रोक लगाई गई थी। धीरे - धीरे और भी बातें सामने आयेंगी किंतु सवाल ये है कि जिन नेताओं के स्मारक दिल्ली में बने हैं उन पर उन्हीं की पार्टी के लोग कितनी बार जाते हैं ? महात्मा गाँधी की समाधि भी सरकारी कर्मकांड का अनिवार्य हिस्सा है। यदि इन स्मारकों के रखरखाव का जिम्मा उस पार्टी को दे दिया जाए जिसके लिए वे जीवन पर भर खपते रहे तब उनकी कैसी दुर्गति होगी इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। ये सब देखते हुए ऐसे मामलों में कोई स्थायी नीति बनना जरूरी है। देश के लिए योगदान देने वाली विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से भावी पीढ़ी को अवगत करवाने के लिए उनसे जुड़ी स्मृतियाँ अक्षुण्ण रखना आवश्यक है किंतु कई एकड़ जमीन घेरकर ईंट - पत्थरों से बने बेजान स्मारक इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। इसी तरह जिन बंगलों में वे रहे उनको स्मारक बनाने की परिपाटी भी लोकतांत्रिक समाज में अटपटी लगती है। बेहतर हो उन विभूतियों की स्मृति को सम्मान के साथ सुरक्षित रखते हुए कुछ ऐसा किया जाए जिससे उनके प्रति श्रद्धा का भाव किसी दल विशेष तक सीमित न रहकर पूरे समाज में कायम रहे। आश्चर्य है जो नेतागण भगवान राम के मंदिर निर्माण को फिजूलखर्ची बताकर उतनी राशि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने की वकालत करते हैं वे ऐसे स्मारकों पर होने वाले खर्च पर खामोश हो जाते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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