Saturday, 14 December 2024

संविधान का सबसे ज्यादा अपमान तो संसद में होता है


संविधान पर संसद में चल रही बहस के दौरान पक्ष विपक्ष से जो भाषण गत दिवस हुए उनमें ज्यादातर  आरोप - प्रत्यारोप ही सुनने मिले। सत्ता में बैठे लोग कांग्रेस पर संविधान की धज्जियां उड़ाने की तोहमत लगाते रहे वहीं विपक्ष ने मौजूदा सरकार की संविधान में आस्था पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि वह उसकी मूल भावना को नष्ट करने पर आमादा है। लोकसभा चुनाव में संविधान को मुद्दा बनाते हुए विपक्ष ने जो आरोप लगाए थे कमोबेश उनको ही दोहराया गया। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष ने भी ये कहते हुए बचाव किया कि आपातकाल  लगाने और संविधान में मनमाफिक संशोधन करने वाली कांग्रेस के पास उसकी रक्षा करने की बात कहने का नैतिक अधिकार नहीं है। जातिगत जनगणना और मतपत्रों से चुनाव करवाने जैसे मुद्दे भी विपक्ष ने उठाये।  आज  प्रधानमंत्री बहस का उत्तर देंगे और उसके बाद संविधान पर चर्चा रूपी कर्मकांड की इतिश्री हो जाएगी। हमेशा की तरह ये बहस भी संसद की कार्यवाही में दर्ज होकर ऐसा इतिहास बन जाएगी जिसे राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी तो क्या खुद सांसद भी पढ़ने में रुचि नहीं लेंगे। संविधान लोकतंत्र की आत्मा होती है जो शासक और नागरिकों को उनके अधिकारों की जानकारी के अलावा कर्तव्यों का भी बोध करवाता है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि हमारे देश में अधिकारों के प्रति तो जरूरत से ज्यादा ही जागरूकता है किंतु जहाँ जिम्मेदार होने की आवश्यकता होती है वहाँ वे लोग भी बेपरवाह नजर आते हैं जो संविधान की शपथ लेकर लोकतंत्र की रक्षा करने का वचन देते हैं। जो सांसद संविधान को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं वे ही जब सदन को चलने नहीं देते तब वह संविधान का सबसे बड़ा अपमान होता है । जिस संसद ने संविधान बनाया और जिसके पास उसमें परिवर्तन या संशोधन का अधिकार है जब उसी के भीतर संविधान प्रदत्त संसदीय प्रक्रिया बाधित की जाती है तब वह संविधान का सबसे बड़ा अनादर है।  संसदीय लोकतंत्र में परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। आजादी के बाद के  20 - 25 वर्षों तक तो संसद में अच्छी परंपराएं बनीं  और उनका पालन भी ईमानदारी से हुआ। लेकिन धीरे - धीरे संसद की गरिमा के साथ जो खिलवाड़ शुरू हुआ वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। संसद के इस सत्र में जो सांसद संविधान की शान में कसीदे पढ़ते देखे गये वे ही सदन को नहीं चलने देने में आगे - आगे रहे। सोचने वाली बात ये है कि संसद की बैठकें आखिर होती किसलिए हैं ?   सत्र की शुरुआत में ही लोकसभाध्यक्ष सर्वदलीय बैठक आमंत्रित कर सत्ता और विपक्ष दोनों के विचार जान लेते हैं जिससे सदन सुचारु रूप से संचालित हो किंतु  सत्र शुरू होते ही हंगामा देखने मिलता है। विपक्ष के एक - दो नेता मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग वाली कहावत चरितार्थ करते हुए समूची प्रक्रिया पर हावी हो जाते हैं। मुट्ठी भर सांसद  गर्भगृह में आकर जनता के धन से चलने वाली कार्यवाही को रोके रहते हैं और  पूरा का पूरा दिन होहल्ले की बलि चढ़ जाता है। सदन में कुछ देर आने मात्र से सांसद हजारों रुपये के भत्ते के  हकदार बन जाते हैं। आज तक एक भी सांसद ऐसा नहीं हुआ जिसने सदन नहीं चलने पर अपना दैनिक बैठक भत्ता लेने से इंकार किया हो। ये कहने में कुछ भी अनुचित नहीं है कि बिना काम किये भरपूर पारिश्रमिक लेने की जो परिपाटी हमारे सांसदों द्वारा  स्थापित कर दी गई  अब वही जनता में भी देखने मिलती है। संविधान सभा में शामिल विभूतियों ने जो संविधान हमें सौंपा उसके प्रति आज के सांसदों में ही जब आदर भाव नहीं है तब आम जनता से उनके द्वारा उसकी अपेक्षा करने  का कोई औचित्य नहीं रह जाता। यही कारण है कि देश भर में कानून की धज्जियां उड़ाने का दुस्साहस तेजी से होने लगा है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करने में लोग नहीं हिचकिचाते। आज लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी भी संविधान पर चल रही चर्चा में भाग ले रहे हैं किंतु उनके पास इस बात का क्या जवाब है कि इस सत्र का अधिकांश समय अडाणी मुद्दे पर बहस की बेतुकी मांग को लेकर नष्ट करने के बाद वे किस मुँह से संविधान की रक्षा पर बोलेंगे?  सवाल सत्ता पक्ष से भी कम नहीं हैं लेकिन विपक्ष के  लिए तो संसद सबसे सशक्त माध्यम होता है अपनी बात रखने का। ऐसे में सदन को बाधित कर वह अपने संवैधानिक दायित्व से ही मुँह चुराता है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें निःसंदेह बहुत गहरी हैं किंतु संसद और सांसदों  के प्रति जनता के मन में सम्मान क्यों घटता जा रहा है इस पर भी सांसदों को विचार करना चाहिए । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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