Friday, 6 December 2024

बैंकों द्वारा शुल्कों के रूप में लूट पर लगाम लगाए रिजर्व बैंक

किंग आधुनिक अर्थव्यवस्था की जान है। इसके बिना लेन - देन की कल्पना नहीं की जा सकती। पहले बैंकों का काम केवल जमा राशि पर ब्याज देना और व्यवसायिक ऋणों पर ब्याज वसूलना होता था किंतु 1969 में श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा राष्ट्रीयकरण किये जाने के बाद से उनकी भूमिका बदल गई और वे  सामाजिक दायित्वों से भी जुड़ गए । इसमें दो मत नहीं है कि  उस कदम से बैंकों और आम जनता के बीच की दूरी कम हुई। गरीबों के लिए अनुदान प्राप्त ऋण व्यवस्था निश्चित तौर पर क्रांतिकारी सोच थी। इसके अलावा छोटे - छोटे कस्बों तक में बैंक की शाखाएं खोली गईं। यद्यपि इन योजनाओं के कारण बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार के बीज भी अंकुरित होने लगे। लेकिन कोई भी सरकार इस बारे में कदम पीछे खींचने का साहस नहीं कर सकी और इस तरह राष्ट्रीयकृत बैंक सरकारी नीतियों को लागू करने के माध्यम बनते चले गए। इसके बाद जब पी. वी. नरसिम्हा राव की सत्ता आई और डाॅ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बनाये गए तब देश में आर्थिक सुधारों की जो बयार बही उसने बैंकिंग क्षेत्र की तस्वीर बदलकर रख दी। राष्ट्रीयकरण की अवधारणा को किनारे रखते हुए निजी क्षेत्र के बैंकों को लाइसेंस दिये जाने लगे। इसका प्रभाव ऋण वितरण में सरलता के रूप में सामने आया। बैंक और बाजार एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करने में जुट गए। निजी आवश्यकताओं के लिए ऋण की उपलब्धता ने उपभोक्तावाद को जन्म  दिया। लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि व्यवसायिक ऋणों के अलावा वाहन, गृह निर्माण, शिक्षा आदि के लिए भी ऋण सुलभता से मिलने से समाज के मध्यमवर्ग का जीवन स्तर  भी उठने लगा। 10 साल पहले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही गरीबों के जनधन खाते खोलने की योजना शुरू हुई तब उसे व्यर्थ की उठापटक माना गया क्योंकि बिना एक भी रुपया जमा किये खाता खोलने का औचित्य समझ से परे था । लेकिन जल्द ही जनधन खातों का उद्देश्य स्पष्ट हो गया क्योंकि सरकारी योजनाओं से गरीबों को मिलने वाली आर्थिक सहायता इन खातों में जमा की जाने लगी। डायरेक्ट ट्रांसफर नामक इस प्रणाली ने भ्रष्टाचार को रोकने का चमत्कारिक काम किया। कोरोना काल में ये तरीका बेहद कारगर साबित हुआ। इसमें दो मत नहीं है कि आज भारत का बैंकिंग ढांचा वैश्विक प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़ा हुआ है और ये भी कि अब वह शहरों और कस्बों से निकलकर ग्रामीण अंचलों तक फैल चुका है। सबसे बड़ी बात हुई तकनीक का उपयोग करते हुए बैंकिंग को आसान बनाने का। एटीएम से शुरू होकर बात नेट बैंकिंग तक आ चुकी है। लेकिन इसकी आड़ में बैंकों ने ग्राहकों पर विभिन्न सेवाओं के लिए जो शुल्क थोपना शुरू किया वह अनुचित और असहनीय है। आज ही रिजर्व बैंक ने घोषणा की कि 6.5  फीसदी ब्याज दर जारी रहेगी। इससे ऋणों का  भुगतान करने वालों को मासिक किश्त में वृद्धि नहीं होगी। उद्योग - व्यवसाय भी इससे राहत अनुभव करेंगे। जिसका तत्काल प्रभाव शेयर बाजार में आई उछाल से मिल गया। हालांकि कुछ अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों का अनुमान था कि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी करेगा किंतु उसने उसे यथावत ही रखा। लेकिन देश के केन्द्रीय बैंक को ये भी देखना चाहिए कि बैंकों का मुनाफा जिस मात्रा में बढ़ता जा रहा है उसके मद्देनजर उन्हें सेवा एवं अन्य कार्यों हेतु लिए जाने वाले शुल्कों में यथोचित कमी करनी चाहिए। निजी क्षेत्र के बैंक यदि ग्राहकों से अनाप - शनाप शुल्क वसूलते हैं तो बात इसलिए समझ में आती है क्योंकि उनका उद्देश्य किसी भी तरह से लाभ बटोरना है किंतु सरकारी बैंक मुनाफा बढ़ाने के फेर में ग्राहकों पर जबरन का भार बढ़ाएं उसका औचित्य किसी भी दृष्टि  से सिद्ध नहीं किया जा सकता। ये बात गले से नहीं उतरती कि एक तरफ तो सरकार आम आदमी की बेहतरी के लिए बैंकों को माध्यम बना रही है किंतु वे ग्राहकों के साथ निजी सूदखोरों की तरह पेश आते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि संसद और उसके बाहर जनता के हितों  का ढोल पीटने वाले राजनीतिक नेता भी बैंकों द्वारा थोपे जाने वाले जबरिया शुल्कों के बारे में कुछ नहीं बोलते। इसी तरह उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन भी  उदासीन हैं। सरकार बैंकों में जो निजी डायरेक्टर नियुक्त करती है उनका दायित्व बैंक के साथ ही ग्राहकों के हितों का संरक्षण भी है किंतु वे उन्हें मिलने वाली सुविधाओं के वजन से दबे रहते हैं। ये सब देखते हुए बैंकों द्वारा लगाए जाने वाले शुल्कों के विरुद्ध भी आंदोलन होना चाहिए। अन्यथा ग्राहकों से की जाने वाली लूट बढ़ती ही जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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