Saturday, 28 December 2024

मनमोहन को लाने वाले राव साहब को भी भुलाया नहीं जा सकता


परसों रात जैसे ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन की  खबर आई उनके बारे में जो विचार सुनने और पढ़ने मिले उनमें अधिकतर उनकी प्रशंसा से भरे हुए थे। यद्यपि किसी दिवंगत व्यक्ति की आलोचना से लोग बचते हैं। लेकिन घोर विरोधी भी जब तारीफों के पुल बांधे तो फिर ये बात माननी होती है कि दुनिया से गए व्यक्ति  ने अपनी ज़िंदगी में कुछ अच्छे कार्य करने के अलावा किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया होगा। स्व. डाॅ. सिंह  बतौर नौकरशाह ऐसे पदों पर रहे जिनमें नीतियों को बनाने और लागू करने का काम था इसलिए उनका आम जनता से प्रत्यक्ष संपर्क नहीं था। लेकिन उनके पास  देश - विदेश में कार्य करने का व्यापक अनुभव था। दूसरी तरफ  स्व. पी. वी. नरसिम्हा राव हालांकि पूरी तरह राजनेता थे किंतु वे भी काफी अध्ययनशील थे। उन्हें भी राज्य और केन्द्र सरकार में काम का पर्याप्त अनुभव हो चुका था। प्रधानमंत्री बनने के पहले तक किसी ने उनको कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से असहमत होते हुए नहीं सुना था। जब वे प्रधानमंत्री बने उस समय गाँधी परिवार राजनीतिक तौर पर काफी कमजोर था।  सोनिया गाँधी को राजनीति में रुचि थी नहीं और राहुल - प्रियंका की उम्र भी इतनी नहीं थी कि राजनीतिक विरासत संभाल पाते। ऐसे में आर्थिक नीतियों को पं. नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवादी मॉडल के बजाय दुनिया के बदलते वातावरण के अनुरूप ढालने का अवसर तो था किंतु कांग्रेस में ऐसा कोई शख्स नहीं था जो उनकी सोच को अमल में ला सके।  प्रणव मुखर्जी जैसे अनुभवी व्यक्ति को वरिष्ट होने से  निर्देशित करना कठिन था। दूसरे थे पी. चिदंबरम किन्तु उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ भी आगे जाकर खतरा हो सकती थीं। लिहाजा राव साहब ने डाॅ. सिंह जैसे नौकरशाह को चुना जो सरकार के आदेश का पालन करने का अभ्यस्थ होता है। स्मरणीय है योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहते उनके एक प्रस्तुतीकरण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने योजना आयोग को जोकरों का समूह कह दिया था। बताते हैं डाॅ. सिंह उससे क्षुब्ध होकर त्यागपत्र देने का मन बना बैठे थे किंतु एक निकटस्थ   के समझाने पर अपमान सहकर भी शान्त रहे। उनकी वह बात राव साहब को याद रही। प्रणव दा और श्री चिदंबरम को कांग्रेस की परंपरागत आर्थिक नीतियों को पूरी तरह उलट- पुलट करने के लिए राजी करना मुश्किल होता। ये सब सोचकर ही स्व. राव ने डाॅ. सिंह को वित्त मंत्री बनाकर पर्याप्त छूट देते हुए आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया का शुभारंभ किया जिससे पहली बार कांग्रेस नेहरू - गाँधी प्रभाव से मुक्त नजर  आई। डाॅ. सिंह चूंकि विशुद्ध नौकरशाह थे इसलिए उन्होंने पेशेवर कार्यशैली अपनाते हुए अर्थव्यवस्था को वैश्विक माहौल के अनुरूप ढालने का दुस्साहस किया। वरना उसके पूर्व तक  सरकार की आर्थिक नीतियाँ समाजवाद और साम्यवाद का मिश्रण थीं तथा  शासन के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था पसंद की जाती थी। ऐसे में राव साहब और मनमोहन की जोड़ी को खुलकर खेलने का अवसर मिला । नेहरू युग में  सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया। इंदिरा जी ने उस नीति को और सख्त किया। बैंक, बीमा, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण जैसे कदम उठाये गए। ये भी  कहा जाने लगा कि भारत की आर्थिक नीतियां साम्यवाद से प्रभावित हो चली थीं।  इंदिरा जी पूरी तरह सोवियत संघ के साथ जुड़ चुकी थीं। उनके सलाहकारों में साम्यवादी मानसिकता के लोग भरे थे।  राव साहब के सामने ये चुनौती थी कि वे अपनी सरकार को उस  ढर्रे से कैसे निकालें ? और इस काम में उनको साथ मिला डाॅ. मनमोहन सिंह का जो राजनीतिक हसरतों से परे केवल अपने काम  से ही वास्ता रखते थे ।  और सिवाय प्रधानमंत्री के उनकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं थी। परसों रात से डाॅ. सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का बखान जोर - शोर से हो रहा है। सोनिया जी ने उन्हें मार्गदर्शक और राहुल ने  अपना गुरु कहकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की किंतु उनकी पीठ पर यदि राव साहब का हाथ न होता तब ये देश उदारीकरण की बजाय राष्ट्रीयकरण के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पाता। उस दृष्टि से राव साहब और मनमोहन सिंह जी को उन साहसियों के रूप में याद किया जाना चाहिए जिन्होंने देश को नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों से मुक्ति दिलवाकर उसमें नया आत्मविश्वास भरा। डाॅ. सिंह को तो गाँधी परिवार ने उपकृत किया जिसके वे सुपात्र थे किंतु राव साहब को मरने के बाद भी अपमानित करने का काम हुआ। उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय तक नहीं लाने दिया गया और परिजनों को उनका अंतिम संस्कार दिल्ली की बजाय हैदराबाद में करने बाध्य किया गया। ये बात इसलिए इसलिए प्रासंगिक हो उठी क्योंकि कल रात कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार से डाॅ. सिंह के अन्येष्टि स्थल पर ही उनका स्मारक बनाने की मांग कर डाली। ऐसी कोई मांग राव साहब के लिए कभी हुई हो ये शायद ही कोई बता सकेगा। आखिर वे भी तो पूर्व प्रधानमंत्री थे जिन्होंने डाॅ. मनमोहन सिंह की प्रतिभा को पहिचान दिलाई।


 - रवीन्द्र वाजपेयी

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