उ.प्र के संभल शहर की जामा मस्ज़िद में अदालत के आदेश पर हो रहे सर्वेक्षण को रोकने मुस्लिम समुदाय द्वारा पत्थरबाजी के बाद पुलिस द्वारा आत्मरक्षार्थ किये गोली चालन में कुछ मुस्लिमों की मौत को कांग्रेस और सपा ने राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। नेताओं में संभल जाकर घड़ियाली आँसू बहाने की होड़ भी लगी। संसद में भी संभल कांड को उठाते हुए केंद्र और उ.प्र सरकार को मुस्लिम विरोधी साबित करने का दांव चला गया। लेकिन मस्ज़िद के पास कुछ ऐसे हिन्दू मंदिर मिल गए जिनको इस तरह से छिपा दिया गया कि किसी को वे नजर नहीं आयें। संभल के जिलाधिकारियों ने उनकी साफ - सफाई करवाकर पूजा शुरू करवाई। जो जानकारियां आ रही हैं उनके अनुसार उन मंदिरों के इलाके में कभी हिन्दू आबादी भी रहा करती थी किंतु सांप्रदायिक दंगों के बाद असुरक्षा के चलते उन्होंने अन्यत्र ठिकाने बना लिए और उन मंदिरों तक उनका आना - जाना बन्द हो गया। संभल के मुस्लिम सांसद सपा के हैं। उनके पिता भी लम्बे समय तक लोकसभा सदस्य रहे। जिस मंदिर को प्रशासन द्वारा खोजा गया वह सांसद निवास से बेहद करीब है किंतु बात - बात में धर्मनिरपेक्षता और गंगा - जमुनी संस्कृति की दुहाई देने वाले सांसद और और उनके मरहूम अब्बा ने कभी भी उस मंदिर के बारे में किसी को मालूम नहीं होने दिया। कहते हैं मस्ज़िद में बिजली चोरी रोकने गए दस्ते की कारवाई के दौरान मंदिर का पता चला। मुस्लिम तुष्टीकरण की दुकान चलाने वाले इस बात को प्रचारित करने में जुटे हैं कि उक्त मंदिर कई दशकों से हिंदुओं की अनदेखी के कारण उपेक्षित थे। लेकिन जैसा देखने में आया मंदिरों को चारों तरफ से अतिक्रमणों से घेरने के साथ ही उन पर मिट्टी डालकर पूरी तरह नजरों से दूर कर दिया गया। अपने धर्म स्थल के प्रति लापरवाह हो जाने के लिए संभल के हिन्दू भी कम दोषी नहीं हैं किंतु वहाँ के दिवंगत सांसद सहित अन्य प्रमुख मुस्लिमों का क्या ये फर्ज नहीं था कि वे हिंदुओं की आस्था के उस स्थान को घेरने के बजाय उसके मूल स्वरूप को बना रहने देते और खुद होकर उसके रखरखाव पर ध्यान देते। उल्लेखनीय है देश में सैकड़ों ऐसी दरगाह और मजारें हैं जहाँ हिन्दू बड़ी संख्या में न सिर्फ जाते अपितु उनकी देखरेख में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। मोहर्रम में सवारी रखने वाले हिंदुओं की भी बड़ी संख्या है किंतु इस सौजन्यता के प्रत्युत्तर में मुस्लिम समाज का रवैया बेहद निराशाजनक है। मुल्ला - मौलवी अपने समुदाय को इस हेतु प्रेरित करने के बजाय निरुत्साहित करते हैं। और यही समस्या की जड़ है। भारत धर्मनिरपेक्ष देश है जहाँ सभी को अपने धर्म का पालन करने की सुविधा है। मुसलमानों के अलावा भी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय हैं लेकिन उनका हिंदुओं के साथ उस तरह का विवाद नहीं होता जैसा मुस्लिमों के साथ आम है। संभल प्रकरण पर उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में पूछा कि वहाँ अब तक जितने दंगे हुए उनमें मारे गए सैकड़ों हिंदुओं के घावों पर मरहम लगाने कितने लोग गए ? संभल के बड़े उद्योगपति हिन्दू परिवार के कई सदस्यों की दंगों में हत्या के बाद बचे हुए लोग शहर छोड़कर जाने मजबूर हो गए। ऐसी स्थितियाँ देश के अनेक हिस्सों में निर्मित हुई । इससे ये सवाल उठ खड़ा होता है कि किसी इलाके के मुस्लिम बहुल होते ही वहाँ हिंदुओं के पलायन की परिस्थितियाँ क्यों बन जाती हैं जबकि हिन्दू बहुमत वाले क्षेत्र में मुस्लिम बेखौफ रहते हैं। दरअसल मुस्लिम समाज को मुख्य धारा से अलग करने में मुल्ला - मौलवियों का जितना हाथ है उतना ही वोट बैंक के सौदागर राजनेताओं का भी है। मुसलमान अपने आर्थिक और शैक्षणिक पिछ्डेपन का रोना तो रोते हैं किंतु उससे बाहर निकलने का साहस भी उनमें नहीं है। वरना संभल में हिन्दू मंदिरों को इस तरह से छिपाने का और क्या उद्देश्य हो सकता था? 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद मुस्लिम समुदाय में कानून तोड़ने के प्रति जरूरत से ज्यादा उत्साह आ गया है। संभल के बाद झाँसी में एन.आई.ए के दल को घेरकर मुसलमान मुफ्ती को छुड़ाने की घटना इसका उदाहरण है। हिंदुओं के धार्मिक जुलूसों पर पथराव की वारदातें भी बढ़ी हैं। लेकिन हिंदुओं की कट्टरता पर छाती पीटने वाले मुसलमानों की धर्मांधता पर आँखें मूँदकर संभल और झाँसी जैसी स्थिति पैदा करने में सहायक बनते हैं। दुर्भाग्य से मुस्लिम युवा भी कठमुल्लेपन के शिकंजे से बाहर आने तैयार नहीं दिखते। हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव परिणाम मुस्लिम समुदाय के लिए ये सबक है कि टकराव और अलगाव उनके लिए नुकसानदेह है। मुसलमान जब तक कुछ दलों के बंधुआ बने रहेंगे तब तक उनकी तरक्की की कोई संभावना नहीं है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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