Saturday, 31 January 2026

हामिद अंसारी की नजर में महमूद गजनवी विदेशी नहीं भारतीय था


पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक हालिया साक्षात्कार में महमूद गजनवी को विदेशी मानने से इंकार करते हुए उसे भारतीय लुटेरा बता दिया। इसके पहले भी वे अनेक विवादास्पद बयान देकर अपनी किरकिरी करवा चुके हैं। गाजीपुर (उ.प्र) के जिस प्रसिद्ध अंसारी परिवार से वे जुड़े हैं संयोगवश कुख्यात माफिया मुख्तार अंसारी भी उसी से था। हालांकि इस परिवार का इतिहास काफी समृद्ध रहा किंतु अब इसकी प्रतिष्ठा धूल - धूसरित हो चुकी है। मुख्तार के कारनामों ने तो खानदान के नाम पर कालिख पोती ही लेकिन देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठने  वाले हामिद अंसारी भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। सवाल ये है कि गजनवी को भारतीय लुटेरा बताने जैसा अपना शोध उन्होंने उपराष्ट्रपति रहते उजागर क्यों नहीं किया? विदेश सेवा में रहते हुए विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हामिद अंसारी को जब लगा कि अब उन्हें कोई सरकारी पद मिलने की संभावना नहीं बची तब उन्हें देश में मुसलमान असुरक्षित नजर आने लगे।    प्रसिद्ध पत्रकार प्रदीप सिंह का आरोप है कि अंसारी ने ईरान में भारत के दूत रहने के दौरान  वहां कार्यरत रॉ के एक अधिकारी की जानकारी ईरान की गुप्तचर एजेंसी सवाक को दे दी थी । उसके बाद उस अधिकारी का अपहरण कर लिया गया था किंतु उसे छुड़ाने के लिए अंसारी ने कोई प्रयास नहीं किया। 2017 में देश की गुप्तचर एजेंसी रॉ के अनेक पूर्व अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि हामिद  अंसारी के कार्यकाल की जांच कराई जावे। एक पाकिस्तानी  पत्रकार ने तो ये कहकर सनसनी मचा दी थी कि वह उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के आमंत्रण पर भारत आया और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई .एस.आई के लिये महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं। इस पर अपना पल्ला झाड़ते हुए अंसारी ने सफ़ाई दी कि विदेशी पत्रकारों को सरकार के कहने पर  आमंत्रित किया जाता था। इन सबसे ये स्पष्ट होता है कि उनको देश ने जो सम्मान दिया वे उसके पात्र नहीं थे। महमूद गजनवी को विदेशी नहीं मानने की उनकी सोच उनकी दूषित और  क्षुद्र मानसिकता का प्रमाण है। उनकी मानें तो गजनवी को राजनीतिक सुविधा के लिए विदेशी लुटेरा कहा जाता है। इतिहास साक्षी है कि भारत पर 17 बार हमला करने वाले गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को भी लूटा था। वह एक क्रूर व्यक्ति था जिसने सनातन धर्म के अनेक पवित्र स्थलों को ध्वस्त किया। अंसारी  उसे भारतीय लुटेरा बताकर क्या साबित करना चाहते हैं ये तो वही जानें किंतु गनीमत है उन्होंने  उसे लुटेरा तो माना।  दरअसल अंसारी की बातें उन वामपंथी इतिहासकारों की सोच से प्रभावित हैं जो अकबर को धर्मनिरपेक्ष मानते तथा औरंगजेब की शान में कसीदे पढ़ते है। अब देखना ये है कि राहुल गांधी , ममता बैनर्जी, अखिलेश यादव जैसे नेता महमूद गजनवी को भारतीय लुटेरा बताए जाने पर हामिद अंसारी की निंदा करते हैं या मुस्लिम तुष्टीकरण की खातिर उनकी हाँ में हाँ मिलाएंगे। असदुद्दीन ओवैसी की प्रतिक्रिया भी अपेक्षित है।  गौरतलब है कि अंसारी ने ये कहने से परहेज किया कि महमूद गजनवी धर्मांध मुसलमान था और उसने हिन्दू मंदिरों और जनता को ही निशाना बनाया। बड़ी बात नहीं भविष्य में वे महमूद गजनवी को धर्म निरपेक्ष और पृथ्वीराज चौहान को कट्टरपंथी बताने लग जाएं। आश्चर्य नहीं होगा यदि उनके भीतर छिपा इतिहासकार ये भी  बताने लगे कि महमूद गजनवी तो पर्यटक के रूप में आया था किंतु यहां  के लोगों ने उसे परेशान किया  जिसके कारण उसने लूटपाट की। देश के उपराष्ट्रपति रह चुके हामिद अंसारी द्वारा इस प्रकार की बयानबाजी इतिहास को झुठलाने के साथ ही विदेशी आक्रांताओं को निर्दोष साबित करने का घिनौना प्रयास है। वे कांग्रेस पार्टी के कृपापात्र रहे हैं। ऐसे में उससे ये अपेक्षा करना गलत नहीं है कि वह पूर्व उपराष्ट्रपति के इस विचार की निंदा करे। महमूद गजनवी को भारतीय लुटेरा कहकर भ्रम पैदा करने का प्रयास बेहद खतरनाक है। यदि इसका विरोध नहीं किया जाता तो वह दिन दूर नहीं जब चंगेज खां और नादिर शाह की तारीफ के पुल भी बांधे जाने लगेंगे।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 30 January 2026

पवार परिवार के प्रभुत्व पर खतरे के बादल


महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की हवाई दुघर्टना में हुई मौत के बाद ये सवाल एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है कि राज्य की राजनीति पर अचानक उत्पन्न इस परिस्थिति का क्या असर पड़ेगा। अजीत रिकॉर्ड 6 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 2024 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी एनसीपी को जबरदस्त सफलता मिली और 41 विधायकों के साथ वे कद्दावर नेता के तौर  पर उभरे। यह सफलता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण थी क्योंकि उन्होंने  चाचा शरद पवार से बगावत कर पार्टी पर कब्जा किया था। हालांकि अजीत का  उत्थान चाचा की छत्रछाया में ही हुआ किंतु  उत्तराधिकार संबंधी मतभेद के चलते दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई। अजीत के  मन में मुख्यमंत्री नहीं बन पाने के साथ ही ये मलाल भी था कि चाचा ने अपनी इकलौती बेटी सुप्रिया सुले को राजनीतिक वारिस बनाया जबकि वे शुरुआत से ही उनके दाहिने हाथ बने हुए थे । अजीत का चाचा से मतभेद केवल सियासी विरासत का था जिसके लिए वे परिवार की एकता तोड़ने में भी नहीं हिचकिचाए। दरअसल वृद्धावस्था और बीमारी के चलते शरद पवार पूरी तरह कमजोर हो चले थे जिससे उनकी राजनीतिक जमीन पर अजीत ने काफी कुछ कब्जा कर लिया था। हालांकि हाल ही में संपन्न स्थानीय निकायों के चुनावों में चाचा - भतीजे  दोबारा करीब आए और दोनों की पार्टियों के एकीकरण की चर्चाएं भी होने लगीं किंतु उसके पहले ही अजीत को मौत ले गई। जहां तक बात भाजपा से गठबंधन कर सत्ता हासिल कर एनसीपी तोड़ने की थी तो अजीत ने ये हुनर चाचा से ही सीखा था जिन्होंने अपने राजनीतिक गुरु बसंत दादा पाटिल की सरकार गिरवाकर मुख्यमंत्री पद कब्जाया था। सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा कर कांग्रेस तोड़कर एनसीपी बनाने वाले शरद पवार  अवसरवाद के जीते जागते प्रतीक हैं। इसीलिए कांग्रेस से बगावत के बाद उसके साथ सत्ता में भागीदारी करने में भी उन्हें संकोच नहीं हुआ। अजीत भी यही सब देखते हुए राजनीति के मैदान में आगे बढ़े थे । लिहाजा  अपने राजनीतिक गुरु और परिवार के मुखिया  को धोखा देने में उन्हें संकोच नहीं हुआ। भ्रष्टाचार के जरिए आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने का हुनर भी अजीत ने शरद पवार से ही सीखा था। ये भी कहा जाता है कि भाजपा की शरण में आने के पीछे उनका मकसद भ्रष्टाचार के आरोपों से अपने दामन पर लगे दागों को ही धोना था। इसीलिए उनके साथ आने  से भाजपा की छवि पर भी आंच आई थी ।  लेकिन उन सभी विवादों पर अचानक पर्दा पड़ गया। जीवन के आखिरी पड़ाव पर खड़े शरद पवार के पास अब न तो इतना समय है और न ही शक्ति कि वे  परिवार के प्रभुत्व को बारामती और उसके निकटवर्ती इलाकों में बनाए रख सकें। उनकी बेटी सुप्रिया भले ही लोकसभा सदस्य हों किंतु उनका अपना जनाधार न के बराबर है। ऐसे में अजीत की असमय मृत्यु ने पवार परिवार के प्रभाव के अंत की शुरुआत कर दी है। अजीत के दोनों बेटों पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते  उनकी ताजपोशी कठिन है। इसलिए उनकी पत्नी और राज्यसभा सदस्य सुनेत्रा को फडणवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाने की चर्चा है। हालांकि कुछ समय तक भले ही वे सहानुभूति हासिल करती रहें किन्तु पति की मौत के बाद उनके लिए पार्टी चलाते रहना कठिन है। यदि एनसीपी के दोनों धड़े मिल भी जाएं तब भी पवार परिवार के वे पुराने दिन  शायद ही लौट पाएंगे। इस शून्य को कौन भरेगा ये बड़ा सवाल है क्योंकि शरद पवार के सामने परिवार के दबदबे को बनाए रखने के साथ ही अपनी बेटी सुप्रिया के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने की चिंता भी है। ऐसे में वे भी भाजपा के निकट जाने का निर्णय ले सकते हैं क्योंकि अब सेकुलर राजनीति का झण्डा उठाने की क्षमता न उनमें बची और न ही परिवार में। वैसे भी परिवारवादी पार्टियों के साथ यही विडंबना जुड़ी होती है कि  उसका सबसे मजबूत स्तंभ कमजोर होने अथवा गिरने के बाद पूरा ढांचा धराशायी हो जाता है। राजनीतिक विश्लेषक अजीत की मृत्यु के बाद फडणवीस सरकार पर एकनाथ शिंदे का दबाव बढ़ जाने की आशंका जता रहे हैं लेकिन यदि सुनेत्रा उपमुख्यमंत्री बन गईं तब भाजपा देर सवेर उनकी पार्टी को भी अपने में मिलाने का प्रयास करेगी। कुल मिलाकर  पवार परिवार का राजनीतिक भविष्य अनिश्चितता में फंस गया है। शरद पवार के लिए ये स्थिति बेहद पीड़ादायक है क्योंकि भतीजे की बगावत के बाद भी परिवार की जो वजनदारी बनी हुई थी वह एक झटके में खत्म होने को आ गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 January 2026

यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच संधि से अमेरिकी प्रभुत्व को धक्का



गणतंत्र दिवस के दूसरे दिन यूरोपीय यूनियन के साथ हुई मुक्त व्यापार संधि एक ऐतिहासिक कदम है जिसने विश्व के व्यापार संतुलन को एक नई दिशा दे दी। 27 देशों का विकसित बाजार जहां भारत को मिलने जा रहा है वहीं यूरोप से आने वाली चीजें सस्ती होने से भारतीय उपभोक्ताओं सहित उद्योगों को भी लाभ होगा। इस बारे में अनेक वर्षों से बातचीत चल रही थी लेकिन नतीजे पर नहीं पहुंचने की वजह से  निर्णय लंबित रहा। शायद अभी भी वह निर्णायक बिंदु पर न आई होती लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने टैरिफ के नाम पर जिस गुंडागर्दी  का परिचय दिया उसके बाद से पूरी दुनिया में हड़कंप मचा हुआ है। दूसरे महायुद्ध के बाद से ही कुछ को छोड़कर ज्यादातर यूरोपीय देश अमेरिका पर निर्भर थे। सोवियत संघ के बिखरने के बाद तो यूरोप के जो साम्यवादी देश थे वे भी अपनी सुरक्षा के साथ ही आर्थिक मामलों में अमेरिका के प्रभाव में आने बाध्य हो गए। लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच शुरू हुई जंग के बाद अमेरिका का दोगला रवैया यूरोपीय देशों के लिए समस्या बन गया। जब तक जो बाइडेन राष्ट्रपति रहे तब तक तो फिर  भी ठीक था परंतु गत वर्ष ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिकी नीतियां तेजी से बदलने लगीं। स्थिति यहां तक आ गई कि ट्रम्प ने अपने यूरोपीय सहयोगियों को ये संकेत दे दिया कि वे अमेरिका के भरोसे न रहें क्योंकि आगे से वह उनको खैरात में कुछ नहीं देगा। यूक्रेन के साथ भी ट्रम्प ने जो धोखाधड़ी की उसकी वजह से अमेरिका की विश्वसनीयता मिट्टी में मिलती चली गई। यूरोपीय देशों पर टैरिफ बढ़ाने के अलावा उनको दिए जा रहे  सुरक्षा कवच के बदले भुगतान का दबाव बनाया जाने लगा। भले ही ब्रिटेन , फ्रांस और जर्मनी जैसे उन्नत देश अमेरिकी दबाव को एक सीमा तक सहन करने में सक्षम हों किंतु बाकी सबकी हालत ऐसी नहीं होने से घबराहट फैल गई। दरअसल यूक्रेन पर रूसी हमले का जब यूरोपीय देशों ने विरोध किया तब राष्ट्रपति पुतिन ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए  पड़ोसी देशों की जमीनों पर कब्जा जमाने का इरादा व्यक्त कर सनसनी फैला दी। हालांकि रूस खुद यूक्रेन के साथ उलझा होने से नए मोर्चे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा सका किंतु यूरोपीय देशों की चिंता तब और बढ़ गई जब अमेरिका दोगलेपन पर उतर आया। चूंकि चीन से भी यूरोपीय देश भयभीत रहते हैं ऐसे में उन्हें ऐसे किसी सहारे की जरूरत थी जिसका रूस और चीन दोनों के साथ संवाद कायम हो। और तब उन्हें भारत ही दिखाई दिया । इसका संकेत तब मिल गया जब इटली की प्रधानमंत्री ने भारत से अनुरोध किया कि वह अपने कूटनीतिक प्रभाव से उनके और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच संवाद स्थापित करवा दे। दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन में यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा अमेरिका के दबावों के प्रतिकार स्वरूप भारत के साथ होने  वाली मुक्त व्यापार संधि को मदर ऑफ ऑल ट्रीटी कहकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की दिशा बदलने का संकेत दे दिया था। अब  तक तो अमेरिका ने इस संधि को संभव नहीं होने दिया किंतु ट्रम्प के सनकीपन से त्रस्त यूरोप ने अंततः भारत  का दामन थामने का फैसला किया । इस संधि के प्रभाव में आते ही  यूरोप के लिए विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ने के दरवाजे खुल गए हैं। साथ ही भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में कमी आने से होने वाले नुकसान की भरपाई भी संभव हो गई। इस तरह 2 अरब जनसंख्या से जुड़ी इस संधि ने अमेरिकी प्रभुत्व के अंत की शुरुआत कर दी है। यूरोपीय देशों का भारत के साथ जुड़ाव होने में दोनों का लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गहरा विश्वास होने के साथ ही खुला सामाजिक वातावरण भी बड़ा कारण है। चीन और रूस दोनों में यूरोपीय देशों को उतनी व्यावसायिक संभावनाएं नहीं दिखीं जितनी भारत में हैं। लिहाजा यूरोपीय यूनियन ने 18 सालों से लटकी इस संधि को अंजाम तक पहुंचा दिया। इसका जमीनी असर तो कुछ दिनों बाद नजर आएगा किंतु इससे दोनों पक्षों ने  मिलकर ट्रम्प टैरिफ के गुब्बारे की हवा निकाल दी। अमेरिका पर इसका कितना असर होता है इसके लिए प्रतीक्षा करनी होगी किंतु ऊंचे टैरिफ से बढ़ी महंगाई से अमेरिकी जनता की बढ़ती नाराजगी से वहां ट्रम्प का विरोध भी बढ़ेगा। शायद यही वजह है कि ग्रीनलैंड पर हमले की उनकी योजना ठंडी पड़ने लगी है। हो सकता है अब अमेरिका भारत से भी व्यापार संधि कर ले किंतु यूरोपीय यूनियन के साथ हुई इस संधि ने अमेरिका को ये तो बता ही दिया कि दुनिया उसके बिना भी चल सकती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

Wednesday, 28 January 2026

शंकराचार्य पद का विवाद सनातन धर्म के लिए अशुभ संकेत


प्रयागराज के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पद पर नियुक्ति का विवाद नए सिरे से गहरा गया। स्नान करने से रोके जाने पर वे भड़क उठे ।  प्रशासन द्वारा व्यवस्था के नाम पर की गई कड़ाई उन्हें अपमानजनक लगी। राज्य सरकार ने उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांग लिया,  वहीं संत समाज भी उनके पक्ष - विपक्ष में बंट गया। अविमुक्तेश्वरानंद जी के अनुयायियों को भी मेला प्रशासन और उ.प्र  सरकार द्वारा उनके साथ किया गया व्यवहार नागवार गुजरा। सोशल मीडिया पर एक तरफ जहां उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त करने वाले सक्रिय नजर आए तो दूसरी तरफ़ स्वामी जी की बखिया उधेड़ने वालों की भी बड़ी संख्या सामने आई। सबसे बड़ी बात ये रही कि चारों शंकराचार्यों तक में अविमुक्तेश्वरानंद जी की शंकराचार्य पद पर हुई नियुक्ति को लेकर मतैक्य नहीं दिखा। ये बात भी बाहर निकलकर आई कि न्यायालयीन रोक के कारण अखाड़ा परिषद द्वारा उनका पट्टाभिषेक नहीं होने  से उनकी नियुक्ति की पुष्टि नहीं हो सकी। यहां तक भी बात ठीक थी किंतु फ़िर अविमुक्तेश्वरानंद जी की बारे में अन्य धर्माचार्यों द्वारा की गई आलोचनात्मक टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में उन्होंने जो कटाक्ष किए उनकी वजह से सनातन धर्म में अखंड आस्था रखने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को दुख हुआ। अविमुक्तेश्वरानंद जी के गुरु ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद जी दो पीठों के शंकराचार्य थे। उनकी नियुक्ति भी विवाद में  घिरी रही। और अंत में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद उन्हें मान्यता मिली। कहा जाता है वे अपनी वसीयत में बद्रिकाश्रम पीठ के लिए अविमुक्तेश्वरानंद जी और द्वारिकापुरी के लिए स्वामी सदानंद जी को उत्तराधिकारी बना गए थे ।  द्वारिकापुरी के शंकराचार्य पद को लेकर तो विवाद नहीं हुआ किंतु अविमुक्तेश्वरानंद जी की नियुक्ति पर आपत्तियां दर्ज की गईं। जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी ने भी इस नियुक्ति को गलत बता दिया जो  सबसे वरिष्ट हैं। चूंकि मामला न्यायालय के विचाराधीन है लिहाजा उसके वैधानिक पक्ष पर कुछ भी कहना उचित नहीं होगा किंतु ऐसे प्रकरण न्यायालय में जाने से सनातन धर्म का सम्मान कम होता है। शंकराचार्य का पद इस धर्म के अनुयायियों के लिए सर्वोच्च श्रद्धा का पात्र होता है। धर्म के बारे में उनके निर्देश अंतिम माने जाते हैं। आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों का उद्देश्य सनातन धर्म को संगठित और व्यवस्थित करना था। कालान्तर में अनेक उप पीठों का उदय हुआ और अब तो जगद्गुरु की उपाधि थोक के भाव बंटने  लगी है। महामंडलेश्वर की पदवी तो ऐसे - ऐसे लोगों को दी जा रही है जिनका सनातन परम्पराओं से कोई संबंध नहीं है। शंकराचार्यों का ये प्राथमिक दायित्व है कि वे सनातन से जुड़ी मर्यादाओं और नियमों के पालन  हेतु समाज की प्रेरित करें। ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि इन दिनों सनातन धर्म के विरुद्ध कुछ शक्तियां संगठित होकर दुष्प्रचार करने में जुटी हुई हैं। इसमें विदेशी हाथ होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के बेटे ने तो सनातन धर्म की  तुलना डेंगू और करोना से करते हुए उसे नष्ट करने की बात सार्वजनिक तौर पर कही जिसका समर्थन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी किया। ये दोनों क्रमशः तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार में मंत्री भी हैं। आजकल जातिवाद के नाम पर भी सनातन धर्म के भीतर दीवारें खड़ी करने का अभियान विभिन्न राजनेताओं द्वारा जारी है। ऐसे में जरूरी है कि चार पीठों के शंकराचार्यों के बीच परस्पर सहयोग , सामंजस्य और सम्मान का भाव हो। इनके अलावा जो उप पीठें हैं उनके बारे में भी स्थिति स्पष्ट होना चाहिए जिससे  लोगों के मन में व्याप्त भ्रम दूर हो।  थोक के भाव जो जगद्गुरु नियुक्त किए जा रहे हैं उनकी भूमिका भी स्पष्ट हो ताकि उन्हें अपेक्षित सम्मान प्राप्त हो सके। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन्हें सनातन धर्म का सर्वोच्च धर्माचार्य माना जाता हो उनकी नियुक्ति का मामला धार्मिक मंचों से बाहर निकलकर अदालत में जाए जहां  उनको अपनी सत्यता साबित करने के लिए शपथपत्र देना पड़े। अविमुक्तेश्वरानंद जी का ये कहना सही है कि शंकराचार्य कौन है , ये राष्ट्रपति तक तय नहीं कर सकते ।लेकिन सनातन धर्म के सर्वोच्च पद की नियुक्ति का फैसला सर्वोच्च न्यायालय से हो , ये भी अटपटा लगता है। ऐसे विवादों के चलते ही लोगों के  मन में ये अवधारणा गहराई तक फैल गई है कि जो धर्मगुरु अपने ही मतभेद नहीं सुलझा पा रहे वे समाज को एकजुट रहने की प्रेरणा किस अधिकार से देंगे?


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 26 January 2026

आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का प्रतीक है


     अभूतपूर्व वैश्विक उथल - पुथल के बीच भारत आज अपना 77 वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। स्वाधीनता तो 15 अगस्त 1947 को मिल गई थी किंतु सही मायने में 26 जनवरी 1950 को देश ब्रिटिश दासता से मुक्त हुआ जब भारत ने अपना संविधान लागू कर एक संप्रभु गणराज्य के तौर पर खुद को विश्व पटल पर स्थापित किया।
    आज राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष सुश्री उर्सुला वॉन डेर लेयेन की उपस्थिति ने पूरी दुनिया को संकेत दे दिया कि आज का भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए फैसले लेने में स्वतंत्र है। उल्लेखनीय है सुश्री लेयेन कल भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि हस्ताक्षरित करने वाली हैं जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स कहकर पूरी दुनिया में हलचल मचा दी। बीते दो दशक से इस संधि पर वार्ताओं का दौर चल रहा था। संभवतः कतिपय कूटनीतिक और आर्थिक मजबूरियों के कारण बात अटकी रही ।
   बीते एक साल में दबाव की कूटनीति के अंतर्गत अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत को घेरने का भी हरसंभव प्रयास किंतु उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी। ट्रम्प को लगता था कि टैरिफ नामक उनकी धौंस के आगे भारत घुटनाटेक हो जाएगा किंतु प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में अपनी स्वतंत्र नीति लागू करते हुए पूरी दुनिया में संभावनाएं ढूंढ़ी जिसका परिणाम अनेक देशों के बाद यूरोपीय यूनियन के साथ होने जा रही मुक्त व्यापार संधि है।
     गत वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के  अंतर्गत पाकिस्तान  स्थित आतंकवादियों के अड्डे तो तबाह किए ही उसके बेहद संवेदनशील ठिकानों पर भी सटीक निशाने साधे। उस युद्ध से ट्रम्प चिढ़ गए क्योंकि पाकिस्तान में छिपाकर रखे गए अमेरिकी परमाणु अस्त्रों के जखीरे के निकट तक भारतीय मिसाइलों ने धमाके कर डाले। उसी के बाद से अमेरिका पाकिस्तान के प्रति नर्म होकर भारत को दबाने में जुट गया। ट्रम्प ने युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटने का भरसक प्रयास किया किन्तु भारत ने जब उनके दावे की पुष्टि से इंकार किया तब उन्होंने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 50 फीसदी  टैरिफ लगाकर अपनी खीझ निकाली।

   लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि अपने हितों की रक्षा करने के लिए वह अपना रास्ता खुद चुन सकता है। इस नीति के कारण वैश्विक मंचों पर हमारी गणना एक ऐसे देश के तौर पर होने लगी जो अमेरिका  जैसी विश्व शक्ति के दबाव को भी ठुकराने का माद्दा रखता है। 
       इसीलिए आज का गणतंत्र दिवस कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे समय जब पूरी दुनिया अस्थिरता और अनिश्चितता से जूझ रही है तब भारत ने राजनीतिक स्थिरता के साथ ही आर्थिक और सामरिक क्षेत्र में जो दृढ़ता दिखाई उसकी वजह से वैश्विक समस्याओं को सुलझाने के लिए पूरा विश्व हमारी ओर निहार रहा है। जो यूरोप कभी अपनी नस्लीय श्रेष्ठता के अहंकार में डूबकर भारत को सपेरों और मदारियों का देश समझकर उसका मजाक उड़ाता था आज वही अमेरिकी आतंक से बचने भारत के पास आने मजबूर है। रूस , चीन , द. अफ्रीका , ऑस्ट्रेलिया , न्यूजीलैंड सहित लैटिन अमेरिकी देशों तक में भारत के साथ कूटनीतिक और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने का भाव जाग उठा है।

    लेकिन हमारे घर  में ही कुछ तबके हैं जो देश की बढ़ती शक्ति और महत्व को स्वीकार करने के बजाय लोगों का मनोबल गिराने के काम में जुटे हैं। निहित राजनीतिक स्वार्थों की खातिर ये वर्ग सेना के पराक्रम पर संदेह करने की हद तक जाने में भी संकोच नहीं करता। लोकतंत्र के भविष्य और चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो दुष्प्रचार किया  जाता है उसके पीछे जनता को  भड़काकर बांग्लादेश और नेपाल जैसी आग में भारत को  झुलसाने का षडयंत्र ही है। विदेशों में बैठी भारत विरोधी ताकतें इस षडयंत्र को बढ़ावा देने तत्पर रहती हैं। लेकिन जनता ने लगातार इसे विफल कर लोकतंत्र और संविधान द्वारा संचालित निर्वाचन प्रणाली में अपना विश्वास व्यक्त दोहराया है।
       बीते एक दशक में भारत ने हर क्षेत्र में ऊंची छलांगें लगाई हैं। इस कारण हर देशवासी का मन आत्मविश्वास से भरा हुआ है। कोरोना के बाद जब दुनिया भर की  बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हिल उठीं तब हमारी अर्थव्यवस्था मजबूती से आगे बढ़ते हुए पूरी दुनिया का हौसला बढ़ा रही है। आज का भारत आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का प्रतीक  है। हमारे अड़ोस - पड़ोस में जब अराजकता व्याप्त है तब जीवंत लोकतंत्र के कारण देश की छवि एक परिपक्व देश के तौर पर स्थापित हो चुकी है।

     हर्षोल्लास के इस अवसर पर हमें इस बात का भी आत्मावलोकन करना चाहिए कि देश को मजबूत बनाने में हमारी भूमिका क्या है क्योंकि गणतंत्र तभी सार्थक होता है जब उसमें प्रत्येक नागरिक का सकारात्मक योगदान हो।  यह राष्ट्रीय पर्व हमारे दायित्वबोध को जाग्रत करे इसी अपेक्षा और अनुरोध के साथ गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 January 2026

कालेधन की समस्या का इलाज आयकर ख़त्म करना ही है



मोदी सरकार के आगामी  बजट को लेकर अनुमानों का दौर जारी है। रविवार होने के बाद भी 1 फरवरी को ही बजट पेश होगा। सरकार महीनों पहले से इसकी तैयारी करती है । अर्थशास्त्रियों से  सुझाव लेने  के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार से  जुड़े संगठनों की अपेक्षाएं जानने का प्रयास भी किया जाता है।  कर्मचारी वर्ग और बैंकों  में जमा राशि के ब्याज पर निर्भर बुजुर्ग भी अपने दृष्टिकोण से बजट से उम्मीद लगाते हैं। वित्त मंत्री खुद भी बजट  को लोकप्रिय बनाने विभिन्न वर्गों से राय लेने  का प्रयास करते हैं। हालांकि शायद ही कभी सभी वर्ग संतुष्ट हुए हों। व्यवहारिक रूप से ये संभव भी नहीं होता। हालांकि गत वर्ष के बजट में आयकर की छूट 12 लाख तक  किए जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ क्योंकि इससे मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और व्यवसायी  वर्ग को बड़ी राहत मिली । ये कहना भी गलत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के पीछे इसी छूट का बड़ा योगदान रहा। कोरोना  के कारण अर्थव्यवस्था में आए ठहराव से देश उबर चुका है। विकास दर में लगातार  वृद्धि से उत्साहित होकर ही  सरकार ने जीएसटी की दरों में सुधार जैसा साहसिक निर्णय लिया। हालांकि इससे जीएसटी के मासिक संग्रह में कमी आई किंतु उसके बाद भी जीडीपी की रफ्तार यथावत होने से भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था  बनने के बाद तीसरे स्थान  की ओर अग्रसर है। फिलहाल केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी ही हमसे आगे हैं।  इन्हीं सब कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ नामक हमलों के सामने भारत नहीं झुका। हाल ही में स्विटजरलैंड के दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन के दौरान यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की जो घोषणा की उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास की पुष्टि हो गई। इस संधि को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है जिसने  ट्रम्प को भी चिंता में डाल दिया है । लेकिन  वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है उसके  कारण आर्थिक नीतियों में भी उसी अनुरूप परिवर्तन जरूरी है। हाल ही की घटनाओं के कारण भारत से विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा है। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने से भी आर्थिक अनिश्चितता व्याप्त है।  प्रतिवर्ष हजारों धनवान लोग भारत छोड़ विदेशों में बस रहे हैं जिसका कारण करों का बढ़ता बोझ और जटिलता है। इस विसंगति को रोकने के लिए  विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा समय - समय पर सुझाव दिया जाता रहा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही जीएसटी की केवल एक ही दर 5 फीसदी  की रखी जाए।  इस सलाह पर यदि  बजट में अमल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका पूरी दुनिया में बज उठेगा। उल्लेखनीय है बढ़ते करों के कारण ब्रिटेन से बड़ी संख्या में धनकुबेर दुबई जैसी जगह पर आकर बस रहे हैं।  सर्वेक्षण किया जाए तो भारत के भी हजारों लोगों द्वारा दुबई सहित  अन्य देशों में ठिकाना बनाने की बात सामने आ जाएगी। ये बात तो साधारण सोच रखने वाला भी जानता है कि करों की अधिक दरें कालेधन रूपी समानांतर अर्थव्यवस्था की जनक हैं। अर्थक्रांति नामक एक अध्ययन दल ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आयकर खत्म कर ट्रांजेक्शन टैक्स  लगाने का सुझाव सरकार के सामने रखा था जिसमें 100 रु. को ही सबसे बड़ा नोट रखने की बात थी। कहते हैं 2016 की नोटबंदी आंशिक तौर पर उसी से प्रेरित थी किंतु सरकार ने 500 और 2000 रु. के नोट जारी कर गलती कर दी। जल्द ही 2000 रु. का नोट कालेधन जमा करने का जरिया बन गया और इसीलिए उसे भी बंद किया गया। देश में जो भ्रष्टाचार है उसकी मुख्य जड़ आयकर के अलावा जीएसटी की अधिक दरें हैं । जीएसटी में तो और सुधार करने का आश्वासन सरकार ने दिया भी किंतु आयकर के बारे में क्रांतिकारी फैसला लेना प्रतीक्षित है। वैसे भी आयकर से मिलने वाला राजस्व इतना नहीं कि उसे बंद करने से अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। उल्टे काला धन मुख्यधारा में आ जाने से अर्थव्यवस्था में मजबूती और पारदर्शिता आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था सुधरी है किंतु कालेधन की समस्या यथावत है। ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि गत वर्ष 12 लाख तक की छूट देने से आगे बढ़कर आगामी बजट में आयकर संबंधी ऐसा कोई निर्णय लिया जाए जिससे कि देश का धन बाहर जाना बंद हो और कर चोरी की बजाय लोग ज्यादा से ज्यादा कमाने के प्रति उत्साहित हों।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


कालेधन की समस्या का इलाज आयकर ख़त्म करना ही है


मोदी सरकार के आगामी  बजट को लेकर अनुमानों का दौर जारी है। रविवार होने के बाद भी 1 फरवरी को ही बजट पेश होगा। सरकार महीनों पहले से इसकी तैयारी करती है । अर्थशास्त्रियों से  सुझाव लेने  के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार से  जुड़े संगठनों की अपेक्षाएं जानने का प्रयास भी किया जाता है।  कर्मचारी वर्ग और बैंकों  में जमा राशि के ब्याज पर निर्भर बुजुर्ग भी अपने दृष्टिकोण से बजट से उम्मीद लगाते हैं। वित्त मंत्री खुद भी बजट  को लोकप्रिय बनाने विभिन्न वर्गों से राय लेने  का प्रयास करते हैं। हालांकि शायद ही कभी सभी वर्ग संतुष्ट हुए हों। व्यवहारिक रूप से ये संभव भी नहीं होता। हालांकि गत वर्ष के बजट में आयकर की छूट 12 लाख तक  किए जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ क्योंकि इससे मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और व्यवसायी  वर्ग को बड़ी राहत मिली । ये कहना भी गलत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के पीछे इसी छूट का बड़ा योगदान रहा। कोरोना  के कारण अर्थव्यवस्था में आए ठहराव से देश उबर चुका है। विकास दर में लगातार  वृद्धि से उत्साहित होकर ही  सरकार ने जीएसटी की दरों में सुधार जैसा साहसिक निर्णय लिया। हालांकि इससे जीएसटी के मासिक संग्रह में कमी आई किंतु उसके बाद भी जीडीपी की रफ्तार यथावत होने से भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था  बनने के बाद तीसरे स्थान  की ओर अग्रसर है। फिलहाल केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी ही हमसे आगे हैं।  इन्हीं सब कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ नामक हमलों के सामने भारत नहीं झुका। हाल ही में स्विटजरलैंड के दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन के दौरान यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की जो घोषणा की उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास की पुष्टि हो गई। इस संधि को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है जिसने  ट्रम्प को भी चिंता में डाल दिया है । लेकिन  वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है उसके  कारण आर्थिक नीतियों में भी उसी अनुरूप परिवर्तन जरूरी है। हाल ही की घटनाओं के कारण भारत से विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा है। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने से भी आर्थिक अनिश्चितता व्याप्त है।  प्रतिवर्ष हजारों धनवान लोग भारत छोड़ विदेशों में बस रहे हैं जिसका कारण करों का बढ़ता बोझ और जटिलता है। इस विसंगति को रोकने के लिए  विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा समय - समय पर सुझाव दिया जाता रहा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही जीएसटी की केवल एक ही दर 5 फीसदी  की रखी जाए।  इस सलाह पर यदि  बजट में अमल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका पूरी दुनिया में बज उठेगा। उल्लेखनीय है बढ़ते करों के कारण ब्रिटेन से बड़ी संख्या में धनकुबेर दुबई जैसी जगह पर आकर बस रहे हैं।  सर्वेक्षण किया जाए तो भारत के भी हजारों लोगों द्वारा दुबई सहित  अन्य देशों में ठिकाना बनाने की बात सामने आ जाएगी। ये बात तो साधारण सोच रखने वाला भी जानता है कि करों की अधिक दरें कालेधन रूपी समानांतर अर्थव्यवस्था की जनक हैं। अर्थक्रांति नामक एक अध्ययन दल ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आयकर खत्म कर ट्रांजेक्शन टैक्स  लगाने का सुझाव सरकार के सामने रखा था जिसमें 100 रु. को ही सबसे बड़ा नोट रखने की बात थी। कहते हैं 2016 की नोटबंदी आंशिक तौर पर उसी से प्रेरित थी किंतु सरकार ने 500 और 2000 रु. के नोट जारी कर गलती कर दी। जल्द ही 2000 रु. का नोट कालेधन जमा करने का जरिया बन गया और इसीलिए उसे भी बंद किया गया। देश में जो भ्रष्टाचार है उसकी मुख्य जड़ आयकर के अलावा जीएसटी की अधिक दरें हैं । जीएसटी में तो और सुधार करने का आश्वासन सरकार ने दिया भी किंतु आयकर के बारे में क्रांतिकारी फैसला लेना प्रतीक्षित है। वैसे भी आयकर से मिलने वाला राजस्व इतना नहीं कि उसे बंद करने से अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। उल्टे काला धन मुख्यधारा में आ जाने से अर्थव्यवस्था में मजबूती और पारदर्शिता आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था सुधरी है किंतु कालेधन की समस्या यथावत है। ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि गत वर्ष 12 लाख तक की छूट देने से आगे बढ़कर आगामी बजट में आयकर संबंधी ऐसा कोई निर्णय लिया जाए जिससे कि देश का धन बाहर जाना बंद हो और कर चोरी की बजाय लोग ज्यादा से ज्यादा कमाने के प्रति उत्साहित हों।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 23 January 2026

यूरोपीय यूनियन - भारत व्यापार संधि की खबर से ट्रम्प ढीले पड़े


दावोस में विश्व आर्थिक फोरम की बैठक के पहले ग्रीनलैंड के मामले में यूरोपीय देशों से नाराज डोनाल्ड ट्रम्प की अकड़ कम हो गई। ग्रीनलैंड पर कब्जे की उनकी पेशकश का जिन यूरोपीय देशों ने विरोध किया  उन सभी पर 10 प्रतिशत टैरिफ थोपने के फैसले से भी वे पीछे हटते दिख रहे हैं। ट्रम्प के  अनुसार उन्होंने ग्रीनलैंड के भविष्य का खाका तैयार किया है इसलिए अब वे  हमला कर उस पर कब्जा नहीं करेंगे। उनके इस ऐलान के पहले ये लग रहा था कि ग्रीनलैंड के बारे में भी वे वेनेजुएला जैसा ही कुछ करेंगे। लेकिन दावोस पहुंचते ही  उनका निर्णय पूरी तरह उलट गया। ऐसे में वहां उपस्थित हर किसी के मन में ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि सैन्य शक्ति के बल पर ग्रीनलैंड को हड़पने की धमकी दे रहे ट्रम्प का नजरिया एकाएक कैसे बदल गया? विश्व राजनीति के जानकारों के लिए उनका इस तरह पलटी मार जाना चौंकाने वाला था। हालांकि बीते एक साल में उन्होंने जितनी बार कदम आगे बढ़ाकर पीछे खींचे उसे देखते हुए ग्रीनलैंड को लेकर उनके रवैये में आए बदलाव में नया कुछ भी नहीं है । और ये कहना भी मुश्किल है कि वे इस पर कितने समय तक कायम रहेंगे । लेकिन दूसरी तरफ देखें तो ट्रम्प की ऐंठ में कमी की एक वजह  दावोस में अनेक देशों के नेताओं द्वारा दिए गए भाषण भी थे जिनमें उनकी आलोचना करते हुए उसका समुचित उत्तर देने की हिम्मत दिखाई गई। फ्रांस के राष्ट्रपति ने तो ट्रम्प की हरकतों को गुंडागर्दी तक कह दिया। यूरोप के कुछ छोटे देशों के प्रतिनिधियों ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसलों पर जो तीखी प्रतिक्रिया दीं उनसे भी ट्रम्प चौकन्ने हो गए। उन्हें इस बात का अंदेशा हो गया कि ग्रीनलैंड पर हमलावर रुख से इस सम्मेलन में उन्हें यूरोपीय देशों का प्रखर विरोध झेलना पड़ सकता है। उस किरकिरी से बचने के लिए ही उन्होंने अपने रुख में नर्मी का प्रदर्शन किया। लेकिन एक बात जिसके कारण ट्रम्प की अकड़ में कमी दिखाई दी वह है यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा सम्मेलन के तुरंत बाद भारत जाकर मुक्त व्यापार संधि करने की घोषणा , जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स कहकर सनसनी मचा दी। उनके मुताबिक इस संधि से विश्व की बहुत बड़ी आबादी लाभान्वित होगी। इस ऐलान से ट्रम्प परेशान हो उठे क्योंकि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार संधि होने पर यूरोप और भारत दोनों उनके टैरिफ नामक अस्त्र से भयमुक्त हो जाएंगे और अमेरिका की साख और धाक दोनों को जबरदस्त धक्का पहुंचेगा। ट्रम्प इस बात को भांप गए कि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार संधि से दोनों  एक दूसरे के बाजार में आसानी से पहुंच बना सकेंगे। परिणामस्वरूप दोनों के पास निर्यात के लिए विशाल उपभोक्ता बाजार होगा। इस संधि के हो जाने से भारत अमेरिकी टैरिफ के दबाव से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा क्योंकि 27 देशों में उसके  लिए कारोबार के दरवाजे खुल जाएंगे। भारत और यूरोप की व्यापार भागीदारी अमेरिका की परेशानी की वजह बन सकती है और टैरिफ रूपी ट्रम्प की मनमानी चल नहीं पाएगी।  उल्लेखनीय है ग्रीनलैंड पर ट्रंप की धमकियों की वजह से यूरोपीय  यूनियन ने अमेरिका के साथ व्यापार संधि को अस्थायी तौर पर रोक दिया था । इसके  कारण अमेरिका को बड़ा नुकसान होने की आशंका बढ़ गई क्योंकि इस संधि से अमेरिकी निर्यातकों को यूरोप में जीरो टैरिफ पर  सामान बेचने का मौका मिलता।  इसके रुक जाने से अमेरिका में  महंगाई और बेरोगजारी बढ़ सकती है। वास्तविकता ये  है कि अमेरिका पहले से ही चीन के साथ व्यापार  विवाद में फंसा होने से यूरोप के साथ टकराव से बचना चाह रहा है। इन्हीं सब वजहों से ट्रम्प  ने ग्रीनलैंड पर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। ट्रम्प समझ चुके हैं कि टैरिफ की वजह से दुनिया भर के देश उनके खिलाफ खड़े हो रहे हैं। उन्हें ये अंदाज भी नहीं था कि जो यूरोपीय देश कल तक अमेरिका की दया पर निर्भर थे वे भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि जैसा साहस दिखाकर अमेरिका को ठेंगा दिखा देंगे। वे जानते हैं कि अमेरिका की समूची संपन्नता उसके व्यापार पर निर्भर है। इसलिए जब उनको लगा कि अमेरिका की रीढ़ पर प्रहार होने लगा तब उन्होंने ग्रीनलैंड पर लचीला रुख दिखाना शुरू कर दिया। हालांकि बीते एक वर्ष में उनकी कार्यशैली इतनी अविश्वनीय रही है कि उन पर सहसा विश्वास नहीं होता किंतु यूरोपीय यूनियन ने जो चतुराई दिखाई उससे ये कहावत चरितार्थ हो गई कि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 22 January 2026

अफसरशाही खराब कर रही म.प्र सरकार की छवि


म.प्र में भाजपा सरकार के पास  भारी - भरकम बहुमत है। पार्टी का संगठन भी बेहद मजबूत है। तीसरी  शक्ति न होने से कांग्रेस के साथ सीधा मुकाबला  है । लेकिन विपक्ष के  पास सक्षम नेतृत्व नहीं होने से वह सरकार की वैसी घेराबंदी नहीं कर पा रहा जैसी जनता अपेक्षा करती है। यही वजह है कि 2003 से मात्र 15 महीने छोड़कर भाजपा लगातार प्रदेश की सत्ता पर काबिज है। 2023 के चुनाव के पहले राजनीतिक विश्लेषक दावा कर रहे थे कि भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा किंतु तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना के  कारण वह बड़े बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। लेकिन पार्टी हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद  डॉ. मोहन यादव को सौंपकर सभी को चौंका दिया।  भाजपा ने अन्य राज्यों में भी इसी तरह नए चेहरों को सत्ता सौंपकर वैकल्पिक नेतृत्व विकसित करने की कार्ययोजना को आगे बढ़ाया। म.प्र में इसका सुपरिणाम कुछ महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में देखने मिला जब भाजपा ने प्रदेश की सभी 29 सीटों पर जीत हासिल कर कीर्तिमान स्थापित किया। उल्लेखनीय है 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा  छिंदवाड़ा में कमलनाथ के किले को नहीं ढहा सकी किंतु डॉ. यादव के नाम वह उपलब्धि भी दर्ज हो गई जब श्री नाथ के सांसद पुत्र नकुल नाथ भी हार गए। इस जीत से मुख्यमंत्री का कद आलाकमान की नजर में और ऊंचा हो गया। अन्य  राज्यों के चुनावों में उनको बतौर स्टार प्रचारक भेजा गया । धीरे - धीरे सत्ता पर उनकी पकड़ दिखने लगी। अपने पूर्ववर्ती शिवराज सिंह की शैली को अपनाते  हुए उन्होंने भी भोपाल स्थित सचिवालय  से सरकार चलाने की बजाय पूरे प्रदेश का भ्रमण करते हुए अपनी पहचान बनाने में सफलता हासिल की। लेकिन पिछले कुछ समय में ही ऐसी घटनाएं हो गईं जिनके चलते प्रदेश सरकार कठघरे में खड़े होने मजबूर हो गई। इनमें सर्वाधिक चर्चित रही इंदौर में दूषित पेयजल से हुईं मौतें जिनकी वजह से म.प्र देश भर में बदनाम हुआ। दूसरी जिस घटना से मोहन सरकार पर हमले हो रहे हैं वह है राजधानी भोपाल में नगर  निगम के कसाईखाने में अवैध रूप से बड़े पैमाने पर गायों का काटा जाना। जबकि नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। तीसरी बात मोहन सरकार के लिए मुसीबत खड़ी करने वाली है मंत्री विजय शाह द्वारा एक मुस्लिम महिला सैन्य अधिकारी के बारे में की गई टिप्पणी से उठा विवाद । सर्वोच्च न्यायालय ने श्री शाह के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश देकर मुख्यमंत्री को परेशानी में डाल दिया क्योंकि उनके द्वारा आदिवासी कार्ड खेले जाने की आशंका के कारण ही अब तक उन्हें बचाया जाता रहा । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रवैये के बाद मुख्यमंत्री कब तक उन्हें अभयदान देते रहेंगे ये बड़ा सवाल है। इंदौर में दूषित पेयजल से हुईं दर्जनों मौतों के साथ ही भोपाल में गायों को काटे जाने जैसी घटनाओं से जुड़ी जो जानकारियां आईं उनसे ये एहसास हो रहा है कि राजनीतिक नेतृत्व पर नौकरशाही भारी पड़ रही है। मुख्यमंत्री के विदेश में होने के दौरान मुख्य सचिव द्वारा  जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों की आभासी बैठक में भ्रष्टाचार को लेकर जो कुछ कहा गया वह इस आरोप की पुष्टि करने पर्याप्त है कि सरकार की अफसरशाही पर पकड़ ढीली पड़ रही है। इन्दौर में हुई मौतों के बाद महापौर ने साफ किया कि पाइप लाइन सुधार संबंधी टेंडर प्रक्रिया को अधिकारियों ने महीनों रोके रखा। भोपाल में भी महापौर  अधिकारियों पर लापरवाही का आरोप लगा रही हैं। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि इंदौर और भोपाल सहित प्रदेश के सभी बड़े शहरों में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर बैठे ज्यादातर अधिकारी  स्थानीय नेताओं के  अलावा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों तक को भाव नहीं देते। वैसे शिवराज सिंह के जमाने से ही नौकरशाही के जरिए सरकार चलाने की शैली विकसित हो चुकी थी जिसे डॉ. यादव भी जारी रखे हुए हैं। प्रदेश के अनेक प्राधिकरण, निगम , मंडल अफसरों द्वारा नियंत्रित हैं। भाजपा के नेता कई सालों से इनमें नियुक्ति का इंतजार करते थक गए। अनेक मर्तबा तो संभावित सूची तक प्रसारित हो गई किंतु हुआ कुछ नहीं। यहां तक कि जनसंपर्क विभाग की तमाम समितियों में भी पत्रकारों की जगह अफसरशाही को ही बिठा दिया गया है। शासन द्वारा दिए जाने वाले सम्मान और पुरस्कार भी ठंडे बस्ते में डाल दिए गए क्योंकि अधिकारी नहीं चाहते। मुख्यमंत्री पद पर दो वर्ष पूर्ण करने के बाद डॉ. यादव को चाहिए वे अफसरशाही पर लगाम कसें वरना इंदौर और भोपाल जैसे हादसे उनकी मेहनत पर पानी फेरते रहेंगे। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये नौकरशाह किसी के सगे नहीं होते। आज यदि डॉ. यादव और उनके मंत्री सत्ता में हैं तो अफसरशाही की बजाय उन कार्यकर्ताओं की बदौलत जो चुनाव  में अपना पसीना बहाकर पार्टी को जीत के रास्ते पर ले जाते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 21 January 2026

ट्रम्प की हरकतों के कारण यूरोप भी अमेरिकी प्रभुत्व से बाहर आ रहा


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह करने के बाद दुनिया के भूगोल को बदलने का पागलपन कर रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवाकर न्यूयॉर्क  की जेल में डालने के बाद ट्रम्प ने  ग्रीनलैंड पर जबरन कब्जा करने की धमकी दे डाली। जिन यूरोपीय देशों ने  इसके विरुद्ध आवाज उठाई उन पर ट्रम्प ने बढ़ा हुआ टैरिफ थोप दिया। उनकी ऊलजलूल हरकतों और बेहद गैरजिम्मेदाराना फैसलों की विश्वस्तर पर तीखी आलोचना हो रही है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने तो उसे गुंडागर्दी बता दिया। पश्चिमी यूरोप के अधिकांश देश दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से  नाटो संधि के अंतर्गत अमेरिका के संरक्षण में थे। लेकिन ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर  दावा ठोकने से स्थिति उल्टी हो गई । और अब तक अमेरिका के झण्डे तले खड़े रहने वाले तमाम यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य टुकड़ियां तैनात करने जैसा अभूतपूर्व कदम उठा लिया। डेनमार्क  ने जिन तीखे शब्दों में ट्रम्प की धमकियों का जवाब दिया उनसे लग गया कि अमेरिका का रुतबा ढलान पर है। स्विट्जरलैंड के दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक फोरम के सम्मेलन में अनेक देशों के नेताओं ने ट्रम्प की धौंस की आलोचना करते हुए अमेरिका की दादागिरी खत्म करने के लिए जो एकजुटता  दिखाई वह  एक नई वैश्विक व्यवस्था शुरू करने की शुरुआत है। यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष जर्मनी की उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने तो ये कहकर तहलका मचा दिया कि दावोस सम्मेलन के बाद वे भारत जा रही हैं जिसके साथ मुक्त व्यापार संधि की जाएगी जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स जैसा विशेषण देखकर अमेरिका को खुली चुनौती दे डाली।  गणतंत्र दिवस के अगले दिन भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच वैसी ही मुक्त व्यापार संधि होने जा रही है जैसी ब्रिटेन सहित अनेक देशों के साथ भारत कर चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति का ताजा पागलपन अमेरिका के नक्शे में ग्रीनलैंड के अलावा वेनेजुएला और कैनेडा को भी दर्शाने के रूप में सामने आया। अपने सोशल मीडिया हैंडल पर वे इन देशों को अमेरिकी ध्वज के तले दिखा रहे हैं। उनके इस कदम से समूचा यूरोप ही नहीं अपितु लैटिन अमेरिका के वे देश भी चिंतित  हैं जिन्हें ट्रम्प चाहे जब धमकाते रहे हैं। उनकी घटिया हरकतों को देखकर लगने लगा है कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है क्योंकि अमेरिका जैसे उन्नत देश के राष्ट्रपति से इतने निम्नस्तरीय व्यवहार की अपेक्षा किसी को नहीं थी। गत वर्ष उनके दोबारा निर्वाचित होने पर ये उम्मीद थी कि प्रथम कार्यकाल के अनुभव के आधार पर वे न सिर्फ अपने देश अपितु पूरी दुनिया की बेहतरी के लिए काम करते हुए रूस - यूक्रेन के अलावा इजरायल - हमास के बीच चली आ रही लंबी लड़ाई रुकवाने के लिए सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करेंगे। हालांकि इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम हो गया किंतु गाजा पर कब्जे की जो योजना ट्रम्प ने बनाई उसमें शांति स्थापित करने के बजाय उस क्षेत्र का व्यावसायिक दोहन करने का इरादा साफ झलकता है। भारत - पाकिस्तान के बीच हुए संक्षिप्त युद्ध को रुकवाने संबंधी उनके फर्जी दावों से  साबित हो गया कि उन्हें न अपनी गरिमा का ध्यान है न ही अमेरिका की प्रतिष्ठा का। नोबल शांति पुरस्कार के लिए जिस प्रकार उन्होंने लार टपकाई उससे उनकी छवि एक विदूषक की बन गई। इन सब वजहों से ट्रम्प दुनिया के सबसे विवादास्पद ही नहीं अपितु हास्यास्पद राष्ट्रध्यक्ष बन गए  हैं। दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक फोरम के सम्मेलन में  उन पर जो टिप्पणियां और कटाक्ष हुए उनसे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दुनिया अमेरिका की चौधराहट को और ज्यादा ढोने तैयार नहीं है। यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत आकर मदर ऑफ ऑल डील करने जैसी घोषणा यूरोप का अमेरिकी प्रभुत्व से निकलने का साफ संकेत है। कभी - कभी तो लगता है ट्रम्प के इस कार्यकाल में अमेरिका पूरी दुनिया के लिए अछूत होकर रह जाएगा। वैसे भी अब आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक तौर पर उसका एकछत्र दबदबा नहीं रहा। रूस , चीन  और भारत जैसे देश उसके प्रभुत्व को चुनौती देने में सक्षम हैं। और अब तो यूरोप ने भी उससे अपना पिंड छुड़ा रहा है। संभावनाओं के देश के रूप में प्रतिष्ठित अमेरिका को ट्रम्प की अधकचरी मानसिकता ने समस्याओं के देश में  परिवर्तित कर दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 20 January 2026

मुसलमानों को जागीर समझने वाली पार्टियों के लिए खतरे की घंटी


महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में भाजपा को मिली सफलता जहां चर्चा में है वहीं कांग्रेस , सपा ,शरद पवार और उद्धव ठाकरे के प्रति मुस्लिम मतदाताओं की अरुचि ने राज्य की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया है।  सबसे चौंकाने वाली बात रही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ए.आई.एम.आई.एम को मिली सफलता। हालांकि इसका प्रभाव पूरे राज्य में दिखाई नहीं दिया किंतु मुंबई में उसे राज ठाकरे की मनसे से अधिक सीटें मिलना साधारण बात नहीं है। औरंगाबाद , मालेगांव और भिवंडी में ओवैसी का जादू  चलने के अलावा अन्य  मुस्लिम बहुल इलाकों में भी ए.आई.एम.आई.एम के पार्षदों की  जीत मुस्लिम मतदाताओं के रुख में आ रहे बदलाव  का प्रमाण है। यद्यपि इसकी बानगी बिहार विधानसभा के पिछले दो चुनावों में मिल चुकी थी जहां मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में ओवैसी के उम्मीदवारों ने राजद और कांग्रेस का खेल बिगाड़ा। हालांकि ए.आई.एम.आई.एम ने उ.प्र और प. बंगाल में भी हाथ आजमाया किंतु वहां सफलता नहीं मिलने के बावजूद ओवैसी मुस्लिम समुदाय के बीच एक प्रभावशाली नेता के तौर पर पहचान बनाने में कामयाब हो गए। उन पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप भी लगता रहा है। इसका सीधा - सीधा कारण यही है कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार को मिलने वाले मत भाजपा विरोधी  पार्टियों का नुकसान करते हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि मुस्लिम समाज चुनावों के समय भावनाओं में बहने की बजाय रणनीतिक सोच के साथ मतदान करता है। अभी तक के चलन के मुताबिक मुसलमान एकजुट होकर ऐसे प्रत्याशी को समर्थन देते आए हैं जो भाजपा को हरा सके। एक जमाने में कांग्रेस उनकी एकमात्र पसंद हुआ करती थी किंतु 1990 से राजनीतिक परिदृश्य तेजी  से बदला और कांग्रेस कमजोर होने लगी तब मुस्लिम समाज ने ऐसे विकल्प तलाशे जो भाजपा को रोकने में सक्षम हों। लालू प्रसाद, मुलायम सिंह , मायावती और ममता बैनर्जी सहित अन्य क्षेत्रीय दलों को भी भाजपा विरोधी भावना के वशीभूत होकर मुस्लिमों का एकमुश्त समर्थन मिलता रहा। लेकिन बीते कुछ सालों में हैदराबाद से निकली ए.आई.एम.आई.एम नामक पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने मुसलमानों के बीच ये प्रचार करना शुरू किया कि वे जिन पार्टियों को अब तक समर्थन देते आए उन्होंने उनकी दशा सुधारने में कोई खास योगदान नहीं दिया। साथ ही इस बात को भी जोर - शोर से उठाया कि मुसलमान कब तक ऐसी पार्टियों के पिछलग्गू बने रहेंगे जो उन्हें बंधुआ मानती हैं। ओवैसी अपने भाषणों में अक्सर ये कहते सुने गए कि मुसलमानों को यदि राजनीति  की मुख्यधारा में आना है तो उनको अपना स्वतंत्र नेतृत्व विकसित करना होगा। जाहिर है वे उन्हें ए.आई.एम.आई.एम के झण्डे तले आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जो उनकी निजी पार्टी है। उनके पिता हैदराबाद की जिस सीट से लगातार लोकसभा पहुंचते रहे वह अब उनके कब्जे में है। उनके भाई तेलंगाना में विधायक हैं और बेहद भड़काऊ बयानों के लिए कुख्यात हैं। तेलंगाना के बाहर महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों को छोड़ ए.आई.एम.आई.एम का कोई प्रभाव नहीं था किन्तु बिहार में कुछ विधायकों के जीतने से ओवैसी को लगा कि वे हैदराबाद से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिम नेता बन सकते हैं। उनकी खासियत ये है कि वे इंग्लैंड से बैरिस्टर की उपाधि लेकर आए हैं। हैदराबाद में अनेक शिक्षण संस्थान और अस्पताल चलाते हैं। ये कहना गलत न होगा कि आज के परिदृश्य में वे  सबसे सुशिक्षित मुस्लिम नेता हैं। और इसीलिए वे मुस्लिम युवाओं को प्रभावित करने में सफल हो रहे हैं। महाराष्ट्र की ताजा सफलता के बाद ओवैसी प. बंगाल में भी हाथ आजमाए बिना नहीं रहेंगे जहां 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। ध्यान देने योग्य बात ये है कि मुसलमानों ने आजादी के आंदोलन के दौरान गांधीजी के नेतृत्व को तभी तक मान्य किया जब तक उन्हें जिन्ना के रूप में अपना नेता नहीं मिला। जिन्ना भी उच्च शिक्षित व्यक्ति थे। पाकिस्तान के निर्माण में  भी मुल्ला - मौलवियों से ज्यादा अलीगढ़ मुस्लिम वि. वि से जुड़े शिक्षाशास्त्रियों की भूमिका रही। ओवैसी भी उसी इतिहास को दोहराने का प्रयास कर रहे हैं। भले ही वे अलग देश जैसी बात न करते हों किंतु बाबरी ढांचे को शहीद बताकर उसे दोबारा खड़ा करने जैसी डींग हांककर  मुस्लिम समुदाय के बीच सूरमा बनने की कोशिश करने से नहीं चूकते। बिहार और महाराष्ट्र  से मिले संकेत  बता रहे हैं कि मुसलमानों में कांग्रेस ,राजद और समाजवादी पार्टी के अलावा उन पार्टियों के प्रति आकर्षण घटने लगा है जो मुस्लिम तुष्टीकरण में आगे रहीं । ये बदलाव यदि जोर पकड़ गया तब राष्ट्रीय राजनीति की दिशा ही बदल जाएगी। मुसलमानों को अपनी जागीर समझने वाले राजनीतिक दलों के लिए ये खतरे की घंटी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 19 January 2026

आगामी चुनावी मुकाबले तय करेंगे कांग्रेस का भविष्य


महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के  चुनावों  के बाद भाजपा का हौसला बुलंद है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद पार्टी जिस तेजी से उबरी वह उसके नेतृत्व और संगठन की कुशलता का प्रमाण है। बिहार की  जीत के बाद उसने बजाय बिना देर किए  प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल के लिए व्यूह रचना  शुरू कर दी। फिलहाल  असम में ही उसकी सरकार है। ताजा आकलन में वहां भाजपा की वापसी संभव है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की छवि भी  योगी आदित्यनाथ जैसी बन जाने से मतदाताओं का जो सामाजिक ध्रुवीकरण हुआ उससे भाजपा फायदे में है। वहीं प. बंगाल में ममता बैनर्जी के क़िले को ध्वस्त करने के उसके इरादे बेहद मजबूत हैं। 2021 में भी भाजपा जबरदस्त उत्साह में थी लेकिन ममता को नंदीग्राम  सीट पर हराने के बाद भी वह सत्ता से वंचित रही। यद्यपि  3 से बढ़कर 73 विधायकों तक पहुंचने से मुख्य विपक्षी दल बन गई।  कांग्रेस और वामदलों का पूरी तरह सफाया होने से ममता और भाजपा सीधे मुकाबले में हैं। इस बार भाजपा और भी आक्रामक है किंतु 2021 के बाद ममता भी शांत नहीं बैठीं।  2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत ही लचर रहा। इसीलिए कहा  जाता है कि बांग्लादेश की घटनाओं की प्रतिक्रियास्वरूप हिंदुत्व के उभार के बावजूद 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के  बल पर ममता वापसी करेंगी। फिर भी भाजपा ने प. बंगाल में खुद को एक विकल्प के तौर पर स्थापित कर लिया। जहां तक बात तमिलनाडु की है तो शहरों में तो लोग पार्टी को जानने लगे किंतु गांवों में  उसका प्रभाव नहीं है। इसीलिए वह गठबंधन करने में जुटी है ताकि सम्मानजनक स्थिति में आ सके। पुडुचेरी छोटा सा राज्य है जहां साझा सरकार में वह हिस्सेदार है। लेकिन वहां के समीकरणों के बारे में कुछ भी कहना कठिन है। रही बात केरल की तो रा.स्व.संघ की जड़ें मजबूत होने से भाजपा वहां तीसरी ताकत बन चुकी है। लोकसभा के एकमात्र सांसद  सुरेश  गोपी के  अलावा राज्यसभा सदस्य जॉर्ज कुरियन को केंद्र में मंत्री बनाकर पार्टी ने केरल में अपनी  उपस्थिति दर्ज की है।  जिसका प्रमाण राजधानी तिरुवनंतपुरम की नगरनिगम उसका महापौर बनना है।  राज्य में मुस्लिम वर्चस्व  से भयभीत ईसाई समुदाय भी भाजपा की ओर आकृष्ट हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ए. के. एंटोनी के बेटे अनिल एंटोनी के भाजपा में शामिल होने से इसके संकेत मिलने लगे थे। आगामी चुनाव में पार्टी को उम्मीद है कि वह विधानसभा में दहाई का आंकड़ा छू लेगी। इसके अलावा अनेक सीटों पर उसके द्वारा हासिल किए जाने वाले मत कांग्रेस और वामपंथी मोर्चे की हार - जीत को प्रभावित करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल का दौरे शुरू भी कर दिए हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की प्रमुख विरोधी कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को जारी नहीं रख पाई। उसके बाद जितने राज्यों में  विधानसभा चुनाव हुए  उनमें पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इंडिया गठबंधन में भी लोकसभा चुनाव के बाद बिखराव आया जिसकी शुरुआत हरियाणा से हुई। हालांकि महाराष्ट्र में  महा विकास आघाड़ी नामक गठबंधन में तमाम पार्टियों ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा किंतु लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराने में कामयाबी नहीं मिली जबकि भाजपा ने एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के साथ मिलकर ऐतिहासिक सफलता हासिल कर ली। इस चुनाव में भी कांग्रेस के  हाथ निराशा लगी। उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने एकला चलो की नीति अपनाई वहीं ममता बैनर्जी और अखिलेश यादव ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया।  यहां भी बाजी भाजपा ने मारी। जबकि कांग्रेस  दयनीय स्थिति से नहीं उबर सकी और लगातार तीसरी बार उसके खाते में शून्य आया। उसके बाद हुए बिहार चुनाव में राहुल गांधी वोट चोरी का ढोल पीटते हुए उतरे। लेकिन तेजस्वी यादव से गठबंधन के बाद भी  सामंजस्य नहीं बैठने से परिणाम निराशाजनक रहा। कांग्रेस खुद भी डूबी और लालू परिवार की राजनीति पर भी ग्रहण लग गया। महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय के हालिया चुनावों में भी कांग्रेस विपक्षी गठबंधन नहीं बना सकी। जिसका लाभ भाजपा को मिला। मुंबई इसका उदाहरण है। कुछ  महीनों बाद होने वाले मुकाबलों में कांग्रेस केवल असम और केरल में  ही दौड़ में है। प. बंगाल में वह पूरी तरह से हाशिए पर  है वहीं तमिलनाडु में  द्रमुक के साथ गठजोड़ नहीं हुआ तब उसके लिए  संकट खड़ा हो जाएगा। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस पूरी तरह लापरवाह हो गई। 99 सीटों पर मिली जीत के कारण उसने विपक्षी गठबंधन के सहयोगियों को उपेक्षित करना शुरू कर दिया । लेकिन जब अकेले लड़कर वह बुरी तरह हारने लगी तब विपक्षी दल भी उससे कतराने लगे हैं। ऐसे में यदि असम और केरल में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी तो फिर उसका ग्राफ और गिर जाएगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 17 January 2026

महाराष्ट्र में भाजपा ने पवार और ठाकरे परिवार का वर्चस्व तोड़ा


महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों के जो परिणाम आए हैं उनका संकेत तो कुछ  दिन पूर्व नगरपालिका चुनाव से ही मिल गया था जिनमें प्रदेश  के सभी अंचलों में भाजपा का बढ़ता प्रभाव दिखाई दिया।  गत दिवस  29 नगर निगमों में से 25 जीतकर पार्टी ने  साबित कर दिया कि वह राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है। चुनाव का सबसे बड़ा आकर्षण मुम्बई महानगरपालिका रही। लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत से दूर रखने में महाराष्ट्र की भी भूमिका थी। उसी आधार पर आशंका थी कि विधानसभा चुनाव में   भाजपा और एकनाथ शिंदे की महायुति सरकार महा विकास अघाड़ी  गठबंधन से पराजित हो जाएगी। लेकिन हुआ उल्टा और भाजपा के अकेले ही बहुमत के नजदीक पहुंचने से मुख्यमंत्री पद  एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस के हिस्से में आ गया। उसके पहले पार्टी हरियाणा में  जीतकर लोकसभा चुनाव में मिली निराशा से  उबर चुकी थी। महाराष्ट्र की सफलता ने हौसला और बुलंद किया जिसका प्रमाण दिल्ली और बिहार की शानदार जीत थीं।   केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में भाजपा का महापौर बनने से उसका आत्मविश्वास और प्रबल हो गया। लेकिन महाराष्ट्र का मुकाबला आसान नहीं था। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के मिलाप के बाद माना जा रहा था कि मराठी माणुस की भावना उभारकर वे  ठाकरे परिवार  की धाक वापस जमा सकेंगे किंतु अब  कहा जा सकता है कि  मुंबई में इस परिवार की चौधराहट खत्म हो गई । भले ही उद्धव और राज की पार्टियां 71 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष बनकर उभरीं किंतु तीन दशक से  ठाकरे परिवार की जीवन रेखा बनी रही मुंबई महानगरपालिका का हाथ से निकल जाना   निराशा बढ़ाने वाला है। राज की पार्टी को तो ओवैसी से भी कम सीटें मिलने से उनकी भद्द पिट गई। हालांकि उद्धव  गुट इस बात की खुशी मना रहा है कि उनको एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना को मिली 29 सीटों से  ज्यादा 65 पर जीत मिली लेकिन महानगरपालिका हाथ से निकल जाने के बाद  उद्धव के सामने सिवाय पछताने के और कुछ नहीं बचा, राज की राजनीति का भी ये पूर्णविराम है। देवेंद्र फडणवीस का चेहरा सामने रखकर भाजपा ने केवल  ठाकरे परिवार के प्रभुत्व को ही समाप्त नहीं किया बल्कि शरद पवार के गढ़  भी ढहा दिए। इस चुनाव में शरद पवार और अजीत पवार ने गठजोड़ किया था किंतु चाचा - भतीजे का  पुनर्मिलन भी मतदाताओं को रास नहीं आया। इस प्रकार इन चुनावों ने  ठाकरे और पवार परिवारों की चमक फीकी कर दी। नागपुर में भी भाजपा की आंधी चली। इस चुनाव का फलितार्थ ये है कि भाजपा का जनाधार केवल मुसलमानों को छोड़कर महाराष्ट्र  में समाज के सभी वर्गों में फैल चुका है। जहां तक बात कांग्रेस की है तो उसके हाथ भी कुछ नगर निगम लगी हैं परन्तु राज्य स्तर पर वह अपनी जमीन गंवाती लग रही है। उसके पास प्रभावशाली नेतृत्व का नितान्त अभाव है। दरअसल लोकसभा चुनाव में सफलता के बाद उसके प्रादेशिक नेता ग़र्राहट में आ गए। जिसकी वजह से इंडिया गठबंधन अस्तित्वहीन होकर रह गया। भले ही अनेक निगमों में कांग्रेस विपक्ष में हो किंतु उसकी दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। इन चुनावों के बाद उद्धव ठाकरे और शरद पवार का बचा - खुचा कुनबा भी बिखरने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा । कांग्रेस भी आने वाले दिनों में और कमजोर होगी क्योंकि मुस्लिमों के बीच ओवैसी का बढ़ता प्रभाव उसकी लुटिया डुबो रहा है। विधानसभा  के बाद स्थानीय निकायों में शानदार सफलता के बाद मुख्यमंत्री  फडणवीस का कद काफी ऊंचा हो गया है। उन्होंने भाजपा को ठाकरे परिवार के आभामंडल से  निकालकर उसकी स्वतंत्र हैसियत बनाने का वह कारनामा कर दिखाया जो स्व. प्रमोद महाजन जैसा तेज तर्रार नेता भी नहीं कर पाया था। उद्धव के सामने अब बची हुई पार्टी को सहेजना विकट समस्या होगी क्योंकि भविष्य अंधकारमय होने  से उसमें भगदड़ अवश्यंभावी है। शरद पवार जहां इतिहास बनने के कगार पर हैं वहीं अजीत पूरी  तरह भाजपा के रहमो करम पर हैं। कांग्रेस भी अपनी स्वनिर्मित समस्याओं में ही उलझी रहेगी। इन चुनावों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अन्य  राज्यों में होने वाले चुनावी मुकाबलों पर पड़ना तय है।  एक बात इन चुनावों से प्रमाणित हो गई कि अन्य राज्यों से आकर बसे लोगों के बीच अब भाजपा ही राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर स्वीकार्यता प्राप्त करती जा रही है। मुंबई में गुजरातियों के अलावा उत्तर भारतीय प्रदेशों के जो लोग रहते हैं उनका झुकाव तो भाजपा के प्रति दिखा ही लेकिन दक्षिण भारत के जो मतदाता मुंबईवासी हैं उन्होंने भी इस बार भाजपा की जीत में खासा योगदान दिया। कांग्रेस के लिए विचारणीय विषय ये भी है कि मतदाताओं ने वोट चोरी जैसे मुद्दों को भी एक बार फिर रद्दी की टोकरी में फेक दिया।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 15 January 2026

निर्यात में वृद्धि के आंकड़ों ने ट्रम्प टैरिफ की हवा निकाल दी




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को लगता था कि टैरिफ नामक ब्रह्मास्त्र चलाकर वे पूरी दुनिया को घुटनाटेक करवा लेंगे। अनेक देशों द्वारा उनकी धौंस के समक्ष समर्पण किए जाने से उनका हौसला बढ़ गया । जिसके बाद उन्होंने भारत पर 25 और 50 प्रतिशत टैरिफ थोपकर दबाव बढ़ाया। जब उसका भी असर नहीं हुआ तब हाल ही में 500 फीसदी टैरिफ का हौआ खड़ा कर भारत को रूस से तेल आयात करने से रोकने का प्रयास भी ट्रम्प ने किया जिसके लिए अमेरिकी संसद से प्रस्ताव भी पारित किया। टैरिफ सम्बन्धी हमले के बाद भारत का निर्यात कुछ समय के लिए गड़बड़ा गया क्योंकि अमेरिका ही हमारे लिए सबसे बड़ा बाजार रहा है। ट्रम्प का यही आरोप है कि सस्ते टैरिफ का लाभ उठाकर भारत तो अमेरिका में अपनी चीजें जमकर बेचता है परंतु वहां से उसका आयात तुलनात्मक तौर पर कम होने से अमेरिका को व्यापार घाटा होता है। ट्रम्प के टैरिफ रूपी दांव के बाद भारतीय रूपये का विनिमय मूल्य अमेरिकी डॉलर की तुलना में घटते हुए अपने निम्नतम स्तर पर आ गया। परिणामस्वरूप विदेशी निवेशकों ने भारत के बाजार से अपना धन निकालना शुरू किया। इस सबसे लगा कि भारत का आर्थिक ढांचा धराशायी होने को है। बढ़े हुए अमेरिकी टैरिफ का असर निर्यात और उत्पादन में गिरावट के तौर पर महसूस होने लगा। लेकिन भारतीय निवेशकों ने शेयर बाजार में जबर्दस्त निवेश करते हुए उद्योग - व्यवसाय को पूंजी के संकट से बचा लिया। हालांकि शेयर बाज़ार वैश्विक हालातों से प्रभावित होकर पहले जैसी छलांग तो नहीं लगा रहा परन्तु गिरावट भी इतनी नहीं कि चिंता में डूबा जाए। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने बड़ी ही चतुराई से अमेरिका से अलग बाजार खोजना शुरू किया। सबसे पहले ब्रिटेन से मुक्त व्यापार संधि हुई। और अब तो दुनिया भर के अनेक छोटे और बड़े देशों के साथ व्यापार समझौते हो रहे हैं। जर्मनी , इटली , फ्रांस , ऑट्रेलिया , न्यूजीलैंड और बेल्जियम जैसे संपन्न देशों के अलावा अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ भारत ने व्यापार संधियां कर अपने निर्यात का विकेंद्रीकरण कर लिया। इसी का सुपरिणाम उन आंकड़ों में परिलक्षित हो रहा है जिनके अनुसार मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत का निर्यात 850 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है जो ऐतिहासिक होगा। यही नहीं ऊंचे टैरिफ के बावजूद अप्रैल से दिसंबर 2025 तक भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में भी लगभग 10 फीसदी की वृद्धि हुई। रोचक बात ये है कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपये की विनिमय दर में गिरावट का सकारात्मक परिणाम निर्यातकों को हुए लाभ के रूप में देखने मिला। इसी सबके बल पर ट्रम्प के टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालने में भारत सक्षम हो सका। रूस से तेल सहित सैन्य सामग्री नहीं खरीदने का जो दबाव ट्रम्प ने बनाया उसे भी भारत ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जो हमारी ठोस आर्थिक स्थिति का संकेत है। टैरिफ युद्ध की शुरुआत में दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां भारत की वार्षिक विकास दर के अनुमानों को संशोधित कर 6 फीसदी से नीचे आने की भविष्यवाणी करने लगी थीं किंतु दिसम्बर खत्म होते तक उन्हें अपनी राय बदलनी पड़ी । भारतीय रिजर्व बैंक ने तो जीडीपी में 7.5 फीसदी से अधिक वृद्धि की उम्मीद जताई किंतु वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पैनी नजर रखने वाली एजेंसियों ने भी कम से कम 6.5 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया है। उल्लेखनीय है इनमें अमेरिका की क्रेडिट एजेंसियां भी हैं जहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बता चुके हैं जिसका समर्थन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी किया था। बहरहाल अब जबकि वित्तीय वर्ष समाप्त होने में महज ढाई माह शेष है तब न तो केंद्र सरकार घबराहट में है और न ही उद्योग व्यापार जगत में चिंता नजर आ रही है। दिसंबर के दौरान निर्यात में कुछ कमी आने से व्यापार घाटा बढ़ा जरूर किंतु पूरे वर्ष के संभावित आंकड़े पिछले साल से बेहतर होने की उम्मीद से ट्रम्प टैरिफ के कारण भारत का निर्यात चौपट होने की आशंका गलत साबित हो रही है । आपदा में अवसर का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारत वैकल्पिक बाजार खोजकर अमेरिकी दबाव से उबर गया। इसीलिए व्यापार संधि के लिए चल रही वार्ता में अमेरिका के दबावों के सामने हम झुके नहीं। ट्रम्प की बौखलाहट का एक बड़ा कारण ये भी है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

ईरान भी सीरिया की तरह टुकड़ों में बंटने के कगार पर


ईरान में अयातुल्ला ख़ामेनेई को सत्ता से हटाने के लिए चल रहे जनांदोलन को दबाने के हरसंभव प्रयासों के बावजूद विरोध रुकने का नाम नहीं ले रहा। सत्तारूढ़ इस्लामिक कट्टरपंथी पूरी तरह दमन पर उतारू हैं। खुलेआम गोलियां मारी जा रही हैं। ईश निंदा के आरोप में सार्वजनिक फांसी दिए जाने की खबर भी चर्चा में है।  ध्यान देने वाली बात ये है कि अमेरिका द्वारा खामेनेई को हटाने की योजना खटाई में पड़ती लग रही है। डोनाल्ड ट्रम्प को उम्मीद थी कि वे वेनेजुएला जैसा हस्तक्षेप ईरान में भी करने में सफल हो जाएंगे। उनके आशावाद का आधार वहां की जनता का इस्लामिक कट्टरता के विरुद्ध सड़कों पर उतर आना है। शुरुआत में  लगा कि उनकी सोच सही साबित होगी। ख़ामेनेई के  रूस पलायन करने की आशंका भी व्यक्त की जाने लगी। अमेरिका द्वारा सैन्य हस्तक्षेप के संकेत भी मिले। ईरान के पड़ोसी कुछ मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे पहले से ही हैं। लेकिन ईरान द्वारा इन अड्डों पर मिसाइलें दागने की धमकी के बाद उन देशों ने अमेरिका को जल्दबाजी करने से रोका । इसी के साथ अनेक मुस्लिम देश ईरान और ट्रम्प के बीच मध्यस्थता में जुट गए। इसके कारण खामेनेई को अवसर मिल गया और सेना की मदद से वे आंदोलन को कुचलने में जुट गए। अब तक हजारों लोगों के मारे जाने की ख़बर है। सैकड़ों लाशों को एक साथ दफनाए जाने की जानकारी भी मिल रही है। इसके  बाद भी  जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। पूरा देश जल रहा है। खामेनेई के चित्रों को युवतियों द्वारा जलाए जाने के वीडियो भी पूरी दुनिया ने देखे। इसके अलावा बुर्का और हिजाब उतारकर फेंकने का साहस दिखाना भी साधारण बात नहीं है। मुल्लाओं के विरोध में नारेबाजी भी जमकर हो रही है। लेकिन  डोनाल्ड ट्रम्प की धौंसबाजी ने ईरान के सत्ताधीशों को मुस्लिम कार्ड खेलने का अवसर दे दिया जिससे वे अरब देश भी साथ  आने लगे जिनकी ईरान से पटरी नहीं बैठती। यहां तक कि इजरायल तक ने अमेरिका को समझाइश दे डाली कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने के पहले संभावित परिणामों का आकलन कर लिया जाए ,वरना समूचे प. एशिया में युद्ध की चिंगारियां भड़क सकती हैं।इजरायल को ये डर भी है कि अमेरिका द्वारा ईरान में सैन्य बल का प्रयोग किए जाने के बाद उसके  पलटवार का सबसे बड़ा निशाना वही होगा। स्मरणीय है अमेरिका द्वारा परमाणु संयंत्रों पर हमला किए जाने के समय ईरान ने  इजरायल पर मिसाइलें छोड़कर काफी नुकसान पहुंचाया था। प्रधानमंत्री नेतन्याहू इतनी जल्दी दोबारा अपने देश को जंग में झोंकना नहीं चाह रहे। इसका लाभ उठाकर ईरान ने मुस्लिम देशों की गोलबंदी कर ली। खबर तो ये भी है कि रूस और चीन ने भी ईरान को सैन्य सहायता भेजकर उसका हौसला बुलंद किया है। हालांकि ईरान के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यदि ट्रम्प वाकई सैन्य कार्रवाई करते हैं तब ईरान उसका जवाब कैसे देगा इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। लेकिन अमेरिका ने  पैर पीछे खींचे तो फिर ईरान की  इस्लामिक सत्ता का दमनचक्र और तेज हो जाएगा । अभी तक के संकेतों के अनुसार प. एशिया के मुस्लिम देशों में भी इस बात का डर समा गया है कि ईरान में सफल होने के बाद उनके देश में भी इस्लामिक व्यवस्था के विरुद्ध जनता खड़ी हो जाएगी। यद्यपि सऊदी अरब जैसे इस्लाम के सबसे बड़े देश के नए शासक ने भी महिलाओं को काफी छूट दी है किंतु ज्यादातर देश अभी भी इस्लामिक कानूनों से बंधे हुए हैं। इसीलिए उनमें से कोई भी खामेनेई द्वारा चलाए जा रहे दमनचक्र के विरुद्ध मुंह नहीं खोल रहा। ऐसे में यदि  कट्टरपंथी सत्ता नहीं बदली तब  ईरान में  नरसंहार  की आशंका और भी बढ़ जाएगी जिसका परिणाम गृहयुद्ध भी  हो सकता है । दरअसल आंदोलनकारी ये समझ चुके हैं कि उनके पास आगे बढ़ने के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं हैं। कुल मिलाकर ईरान दो पाटों के बीच अब फंसकर रह गया है। खामेनेई की सत्ता पलटने के  बाद भी वहां राजनीतिक स्थिरता की  गारंटी नहीं है। 1979 में सत्ता से हटे शाह  के पुत्र यदि लौटे तब भी वे कितने सफल होंगे कहना मुश्किल है। बड़ी बात नहीं सीरिया की तरह ईरान भी टुकड़ों में बंट जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 14 January 2026

नई पीढ़ी के नेताओं को रास नहीं आएगी दिग्विजय की वापसी


म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक पुरानी तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर टिप्पणी की थी कि भाजपा और संघ जमीन में बैठे अपने कार्यकर्ता को भी प्रधानमंत्री बना देता है। उस चित्र में वरिष्ट भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के  सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बैठे दिखाई दे रहे थे। उस समय श्री मोदी जहां  संगठन का कार्य देखते थे। वहीं आडवाणी जी पार्टी के शीर्ष नेता थे। उस तस्वीर को प्रसारित कर श्री सिंह सुर्खियों में तो आ गए किंतु कांग्रेस के भीतर  सुगबुगाहट होने लगी। कांग्रेस महासमिति की बैठक के ठीक पहले किए गए उस धमाके को दबाव बनाने की कोशिश कहा गया। दरअसल श्री सिंह का राज्यसभा कार्यकाल अप्रैल माह में समाप्त होने वाला है और इस उम्र में चुनाव लड़कर लोकसभा में पहुंचना उनके बूते के बाहर है। 2019  और 2024 में  वे बुरी तरह हार भी चुके हैं। ऐसे में राज्यसभा में रहकर ही वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति बनाए रख सकते हैं। लेकिन उन्होंने श्री मोदी की तस्वीर प्रसारित कर अपने लिए गड्ढा खोद लिया। कहते हैं राहुल गांधी ने भी इस पर नाराजगी जताई । यद्यपि श्री सिंह ने बिना देर लगाए भाजपा और संघ से अपना वैचारिक विरोध व्यक्त कर दिया किंतु नुकसान हो चुका था। ऐसे में  राज्यसभा की सीट खाली कर म.प्र में  कांग्रेस को पुनः मजबूत लगाने संबंधी उनके बयान पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि बिना सांसद रहे दिल्ली में जमे रखना उनके लिए मुश्किल होता। फिलहाल वे पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी भी नहीं हैं। ये बात  सही है कि प्रदेश की राजनीति से वे अच्छी तरह वाकिफ हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव के पूर्व उन्होंने सपत्नीक जो पैदल नर्मदा परिक्रमा की थी उसका लाभ कांग्रेस को भी मिला और वह सरकार बनाने में सफल हो सकी। हालांकि मात्र 15 महीने बाद ही उनके और ज्योतिरादित्य सिंधिया  की राजनीतिक दुश्मनी से वह सरकार अल्पजीवी साबित हुई किंतु दिग्विजय दिल्ली में डटे रहे। गांधी परिवार के प्रति निष्ठा व्यक्त करने में भी वे कभी पीछे नहीं रहते। राहुल गांधी की पहली भारत जोड़ो यात्रा के आयोजन में उनकी प्रमुख भूमिका भी रही। हालांकि 2024 के बाद वे कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में हाशिए पर खिसकने लगे और अब जब वे खुद ही दिल्ली छोड़ घर लौटने  की बात कह रहे हैं तब ये कहना गलत नहीं होगा कि गांधी परिवार भी अब उन्हें अनुपयोगी मान बैठा है । वरना इतने अनुभवी नेता को आसानी से नहीं छोड़ता। अब सवाल ये है कि म.प्र में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए मैदान में उतरने की उनकी योजना पार्टी द्वारा तय की गई या वे अपनी भूमिका खुद तय कर बैठे। सही  बात ये है कि प्रदेश में कांग्रेस  की बागडोर जिन युवा हाथों में राहुल गांधी ने सौंपी वे दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को बर्दाश्त करने तैयार नहीं है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार को श्री सिंह की सक्रियता रास आएगी ये बीते दो वर्ष की स्थितियों को देखने पर तो नहीं लगता। सही बात ये है कि श्री नाथ और श्री सिंह येन केन प्रकारेण अपने बेटों को स्थापित करना चाह रहे हैं। श्री नाथ के पुत्र नकुल लोकसभा चुनाव हारकर पृष्ठभूमि में हैं। वहीं उनका आभामंडल भी फीका पड़ा है।  दिग्विजय सिंह के लिए जरूर उनके विधायक पुत्र जयवर्धन सिंह उम्मीद की किरण हैं। यद्यपि वे सरकार में मंत्री रहने के बाद भी प्रदेश स्तर पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में असफल रहे।  ऐसे में  उनके पिता प्रदेश में पूरा समय देकर राजनीति करने  के बाद भी नई पीढ़ी को प्रेरित और प्रभावित कर सकेंगे इसमें संदेह ही है।   जनसामान्य में भी श्री सिंह की वह नकारात्मक छवि बरकरार है जिसके कारण 2003 में कांग्रेस का ऐसा पराभव हुआ कि वह आज तक उठ नहीं पाई। दरअसल उनकी और श्री नाथ की जोड़ी ने पार्टी में क्षमतावान युवाओं को उठने नहीं दिया और अपने परिवार को ही बढ़ाने में लगे रहे। यदि 2023 में ये दोनों  श्री सिंधिया को मुख्यमंत्री बनवा देते  तब कांग्रेस सत्ता में बनी रहती और 2024 के लोकसभा चुनाव में  सभी सीटें न हारती। ये देखते हुए श्री सिंह द्वारा प्रदेश की राजनीति में उतरने की घोषणा से आम जनता तो छोड़ दें कांग्रेस में भी शायद ही कोई उत्साह नजर आए क्योंकि उसकी दुर्गति के लिए सबसे ज्यादा  जिम्मेदार वही हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 January 2026

ममता को केजरीवाल के हश्र से सबक लेना चाहिए


प. बंगाल में एक निजी प्रतिष्ठान आई - पैक के  कार्यालय और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के निवास पर ईडी के छापे के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया। आई - पैक तृणमूल कांग्रेस के चुनाव अभियान का प्रबंधन भी देखता है। पहले प्रख्यात चुनाव विशेषज्ञ प्रशांत किशोर इसके मुखिया थे किंतु चुनावी राजनीति में उतरने के कारण वे इससे अलग हो गए। हालांकि इसके वर्तमान प्रमुख  प्रतीक  का नाम प. बंगाल के कोयला तस्करी घोटाले से जुड़ा हुआ है किंतु राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के कुछ माह पहले ईडी के छापे को राजनीतिक प्रतिशोध का नाम दिया जा रहा है। छापे के दौरान राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का प्रतीक के निवास पर पहुंचकर उसके  फोन सहित एक फाइल उठाकर ले आने के बाद इस प्रकरण में नया मोड़ आ गया। सुश्री बैनर्जी का कहना है कि ईडी ने कोयला घोटाले के नाम पर उनकी चुनाव रणनीति से जुड़े दस्तावेज जप्त करने छापा मारा जबकि ईडी का कहना है कि उसकी  कार्रवाई संदर्भित घोटाले की जांच से ही जुड़ी हुई थी। ममता जो फाइल उठाकर लाईं उसके बारे में चर्चा है कि उसमें घोटाले का काला चिट्ठा समाया हुआ था। ऐसे  में एक मुख्यमंत्री का छापे के दौरान जाकर कोई दस्तावेज उठा लाना तमाम संदेहों को जन्म देता है। ईडी ने अदालतों में उनके इसके विरुद्ध शिकायत की है। लपेटे में प. बंगाल के डीजीपी सहित कुछ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी आ रहे हैं जिन  पर आरोप है कि वे केंद्रीय एजेंसी को उचित संरक्षण प्रदान करने के बजाय जरूरी दस्तावेज उठाकर ले गए।  छापे के समय  और औचित्य पर बेशक सवाल उठाए जा सकते हैं। ईडी के दुरुपयोग के बारे में सर्वोच्च न्यायालय भी टिप्पणी कर चुका है किंतु ममता ने इस मामले में जिस प्रकार का हस्तक्षेप किया उसके बाद उन पर उंगलियां उठना भी स्वाभाविक है। ये पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने केंद्रीय एजेंसी के काम में रुकावट पैदा की। कुछ साल पहले सीबीआई टीम के तत्कालीन डीजीपी से पूछताछ करने कोलकाता पहुंची तब ममता भी उनके यहां जा पहुंची और सीबीआई के कार्य में व्यवधान डाला। बाद में उन्होंने राज्य में केंद्रीय जांच टीम के घुसने पर ही रोक लगा दी।  वर्तमान विवाद अदालत  जा पहुंचा है जिसमें ईडी ने मुख्यमंत्री सहित राज्य के डीजीपी और अन्य अधिकारियों पर डकैती जैसे गंभीर आरोप लगाए वहीं राज्य सरकार  भी जवाब में  हमलावर है। ऐसे में  वैधानिक पहलू पर  तो टिप्पणी उचित नहीं होगी किंतु सुश्री बैनर्जी लगातार भ्रष्टाचार के प्रकरणों में जिस प्रकार उलझती जा रही हैं उससे  निजी छवि के साथ ही तृणमूल कांग्रेस के प्रति भी आम जनता में नाराजगी बढ़ रही है। लगातार तीन चुनाव जीतने से उनका आत्मविश्वास आसमान छू रहा है । इसी के चलते वे केंद्र सरकार से दो - दो हाथ करने तत्पर रहती हैं। हालांकि ऐसा करने वाली वे अकेली गैर भाजपाई मुख्यमंत्री नहीं हैं किंतु उनके तेवर सदैव औरों से ज्यादा उग्र रहते हैं। इसके पीछे शायद उनका ये सोचना है कि उन्हें चुनाव में हरा पाना असम्भव है। लेकिन उन्हें ये याद रखना चाहिए कि आम आदमी पार्टी सुप्रीमो और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी  विशाल बहुमत के कारण मदमस्त होकर केंद्र से टकराव का मौका तलाशा करते थे। भ्रष्टाचार के विरोध में जनांदोलन करने के बाद राजनीति में उनका उदय धूमकेतु की तरह हुआ किंतु सत्ता में आने के बाद वे और उनके साथी भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझकर अंततः जेल भी गए। लेकिन नैतिकता की कसमें खाने वाले केजरीवाल ने बजाय इस्तीफा देने के जेल से सरकार चलाने का उदाहरण पेश करते हुए सत्ता के प्रति अपनी लालसा जगजाहिर कर दी । लेकिन दिल्ली के मतदाताओं ने गत वर्ष हुए चुनाव में उनको सत्ता ही नहीं अपितु विधानसभा तक से बाहर कर दिया। अपार लोकप्रियता के कारण खुद को अपराजेय समझने की भूल अतीत में लालू प्रसाद यादव और मायावती भी कर चुकी हैं जिसकी सजा जनता ने उन्हें दे दी। इन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। ममता बैनर्जी को ये गुमान है कि 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के अलावा बंगाली अस्मिता के नाम पर वे चौथा चुनाव भी जीत जाएंगी किंतु ऐसा ही अति आत्मविश्वास बिहार में तेजस्वी यादव को था जो मुस्लिम - यादव गठजोड़ के बलबूते सत्ता हासिल करने का सपना देख रहे थे किंतु लालू परिवार पर भ्रष्टाचार की जो कालिख पुती है उसके कारण जनता ने उन्हें चारों खाने चित्त कर दिया। चुनाव के दौरान तेजस्वी भी सीधे मुंह बात नहीं करते थे। यद्यपि अभी से प.बंगाल के चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी होगी किंतु ममता को लालू और केजरीवाल के पतन से सीख लेनी चाहिए जिनकी लोकप्रियता भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण मिट्टी में मिल गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 January 2026

अमेरिका की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया ट्रम्प ने




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का इरादा जताने के बाद पूरे यूरोप में दहशत का माहौल है। दूसरे  महायुद्ध की समाप्ति के बाद  भले ही हिटलर  के नाजीवाद का खतरा समाप्त हो गया लेकिन सोवियत संघ रूपी महाशक्ति के कारण यूरोप के अनेक देशों में भय व्याप्त था। उन्हें लग रहा था कि सोवियत संघ देर - सवेर साम्यवादी क्रांति का माहौल उन यूरोपीय देशों  में भी बनाए बिना नहीं रहेगा जो राजतंत्र के साथ ही प्रजातांत्रिक व्यवस्था को अपनाए हुए थे। चूंकि विश्वयुद्ध की  समाप्ति में अमेरिका की निर्णायक भूमिका थी और वह प्रजातंत्र का प्रतीक कहलाता था लिहाजा सोवियत संघ के प्रभाव से जो यूरोपीय देश मुक्त बने  रहे उन्होंने अमेरिका को अपना अघोषित नेता स्वीकार किया जिसके चलते 1949 में नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) का गठन हुआ। हालांकि 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ नामक संगठन भी अस्तित्व में आ चुका था जिसका उद्देश्य दुनिया भर के देशों को एक मंच पर एकत्र कर विश्व में स्थायी शांति स्थापति करना था। इसका मुख्यालय भी अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में स्थापित किया गया। लेकिन इसके बाद भी दुनिया को खेमों में बंटने से नहीं रोका जा सका। और 1949 में नाटो और  1954 में सीटो अमेरिका की अगुआई में बना । वहीं पूर्वी यूरोप के साम्यवादी व्यवस्था वाले कुछ देशों ने सोवियत संघ के झंडे तले वारसा संधि की जो 1991 में सोवियत संघ के बिखराव पर अस्तित्वहीन हो गई। सीटो भी 1977 में समाप्त हो गया किंतु नाटो अब तक बना हुआ है। उक्त सभी संगठन दरअसल सामूहिक सुरक्षा की गारंटी स्वरूप थे। अर्थात किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर माना जाएगा और मुकाबले के लिए सभी एक साथ खड़े होंगे। शीतयुद्ध नामक कालखंड में नाटो आदि काफी प्रासंगिक रहे किंतु कालांतर में इनका महत्व कम होता गया। कुछ साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला तब उसका एक कारण यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता लेने की कोशिश भी थी। हालांकि वह कामयाब नहीं हो सकी। यद्यपि अमेरिका सहित नाटो सदस्यों ने उसे भरपूर सहायता दी। लेकिन जबसे ट्रम्प दोबारा सत्ता में आए तब से न  सिर्फ नाटो बल्कि राष्ट्र संघ के प्रति भी उनका उपेक्षा भाव सामने आने  लगा। हाल ही में उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन  के अलावा 24 संगठनों से अलग होकर राष्ट्र संघ को भी ठेंगा दिखा दिया। इसी के साथ ही नाटो को लेकर भी वे बेहद गैर जिम्मेदाराना टिप्पणियां करने लगे। यूक्रेन को ट्रम्प ने जो धोखा दिया उसकी वजह से उन यूरोपीय देशों में भय व्याप्त हो गया जो अमेरिका का  संरक्षण होने के कारण अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त थे। रूस द्वारा यूक्रेन के साथ ही कुछ और यूरोपीय देशों के इलाकों पर भी अपना दावा भी ठोककर उनकी चिंता बढ़ा दी। ऊपर  से ट्रम्प की नीतिगत अस्थिरता ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी। वेनेजुएला में ट्रम्प द्वारा की गई कार्रवाई से तो यूरोपीय देशों की क्षेत्रीय अखंडता पर कोई असर नहीं पड़ा इसलिए वे शांत रहे लेकिन ज्योंही ट्रम्प ने डेनमार्क आधिपत्य वाले ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की मंशा जताई त्यों ही समूचा यूरोप विचलित हो उठा । सबसे पहले डेनमार्क ने नाटो छोड़ने की धमकी दी। उसके बाद जर्मनी सहित अनेक देश खुलकर अमेरिका का विरोध  करने लगे। उनका मानना है कि यदि ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को कब्जाने की जिद पूरी की तो रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले को भी आधार मिल जाएगा। क्या होगा फ़िलहाल कहना कठिन है किंतु ट्रम्प अपने विरोधियों के प्रति सख्ती बरतें तो समझ में भी आता है लेकिन  अमेरिका  के मित्रों के साथ भी उनका रवैया यदि शत्रुतापूर्ण हो जाए तब फिर ये कहना गलत नहीं होगा कि वे किसी भी तरह से भरोसे के लायक नहीं हैं। बीते एक साल में अमेरिका को आर्थिक बदहाली के कगार पर ला खड़ा करने के अलावा उन्होंने उसकी साख और धाक दोनों मिट्टी में  मिला दी। यही कारण है कि महाशक्ति का रुतबा अमेरिका खोता जा रहा है। बीते एक वर्ष में ट्रम्प के निर्णय और नीतियों के अलावा उनका आचरण देखते हुए ये कहा जा सकता है कि वे अमेरिका के सबसे घटिया राष्ट्रपति साबित हो रहे हैं। बड़ी बात नहीं जिस तरह गोर्बाचोव ने सोवियत संघ को पतन के रास्ते पर धकेला वैसे ही ट्रम्प भी अमेरिका की बर्बादी का कारण बन जाएं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 



Saturday, 10 January 2026

मोदी की मौन कूटनीति से बौखलाहट में हैं ट्रम्प



अमेरिका द्वारा भारत पर 500 फीसदी टैरिफ थोपने संबंधी फैसले के बाद डोनाल्ड ट्रम्प उसे लागू करेंगे या दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश करते रहेंगे ये  सवाल  चर्चा में है। दरअसल ट्रम्प की मनोदशा उस तेज गेंदबाज जैसी है जो बाउंसर से बल्लेबाज के सिर को निशाना बनाते हुए उसे डराने की कोशिश करता है । यदि बल्लेबाज यदि तनिक भी लापरवाही करता है तब  तो गेंद उसके सिर को चोट पहुंचा देती है और यदि बल्ले पर ठीक से नहीं आई तब वह कैच कर लिया जाता है। जब हेलमेट का उपयोग नहीं होता था तब  अनेक बल्लेबाजों को बाउंसरों ने घायल किया। भारत के पूर्व कप्तान नारी कांट्रेक्टर के सिर में वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज  ग्रिफिथ के बाउंसर से गंभीर चोट लगी कि उनका खेल जीवन ही समाप्त हो गया। हेलमेट आने के बाद भी अनेक खिलाड़ी  बाउंसर  पर घायल होते रहे हैं। इसीलिए चतुर बल्लेबाज सामान्यतः  झुककर उसे सिर के ऊपर से जाने देते हैं । गेंदबाज फिर दूसरी और तीसरी बाउंसर भी फेंकता है। और बल्लेबाज उसे भी सिर झुकाकर छोड़ दे तब उसकी झल्लाहट बढ़ती है जिसकी वजह से उसकी  दशा और दिशा दोनों गड़बड़ा जाती हैं जिसका  लाभ उठाकर  बल्लेबाज गेंदों की पिटाई करता है। भारतीय क्रिकेट में सुनील गावस्कर , राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर  सफल हुए तो उसके पीछे उनका धैर्य ही था। राजनय या कूटनीति में भी बल्लेबाजी की उक्त तकनीक काम आती है जिसमें सामने वाले की तीखी बातों से उत्तेजित होकर जल्दबाजी में टिप्पणी से बचना ही बेहतर होता है।  उक्त संदर्भ भारत और अमेरिका के सम्बन्धों में  तनाव को लेकर प्रासंगिक हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प लगातार निरर्थक और निराधार टिप्पणियां करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उकसाने का दांव चल रहे हैं। अपेक्षा की जाती है कि वे उनका जवाब सार्वजनिक रूप से दें। लेकिन एक - दो को छोड़ श्री मोदी ने उनकी कटाक्ष युक्त टिप्पणियों को नजरंदाज कर दिया । सिलसिला ऑपरेशन सिंदूर से शुरू हुआ जब ट्रम्प ने युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटा। उसके बाद फिर भारत पर टैरिफ थोपने के फैसले के साथ ही वे श्री मोदी पर व्यंग्यबाण छोड़ते रहे। कैनेडा में आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन  से लौटते वक्त प्रधानमंत्री को वॉशिंगटन आने का न्यौता भी ट्रम्प ने दिया किंतु उन्होने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। तबसे वे दर्जनों ऐसी टिप्पणियां कर चुके हैं जिन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जरूरत श्री मोदी ने नहीं समझी। जानकारी तो यहां तक आई कि उनके फोन तक प्रधानमंत्री ने नहीं उठाए। जाहिर है इससे ट्रम्प की बौखलाहट और बढ़ी जिसका प्रमाण उनके  वाणिज्य मंत्री हावर्ड  लुटनिक ने ये कहकर दिया कि भारत के साथ व्यापार संधि का मसला इसलिए नहीं सुलझ रहा क्योंकि श्री मोदी ने  ट्रम्प से फोन पर  अनुरोध नहीं किया।  ट्रम्प द्वारा समय - समय पर की जाने वाली ऊल - जलूल टिप्पणियों का जवाब श्री मोदी की बजाय या तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर देते रहे या विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता। लुटनिक की टिप्पणी पर भी  प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि बीते कुछ महीनों में ट्रम्प और श्री मोदी के बीच कई बार फोन पर  चर्चा हो चुकी है।  इजरायल और हमास के बीच युद्ध रुकने पर प्रधानमंत्री ने ट्रम्प को फोन किया था। इसके अलावा यूक्रेन संकट पर भी दोनों में बातचीत हो चुकी है। लेकिन व्यापार संधि और टैरिफ घटाने के मुद्दे पर बेशक श्री मोदी ने उनसे अनुनय - विनय नहीं किया क्योंकि वे जिन शर्तों पर टैरिफ घटाने की बात कर रहे हैं वे भारतीय हितों के लिए नुकसानदेह हैं। इस मामले में भारत ने  जो दृढ़ता दिखाई उसके ट्रम्प का बौखलाना स्वाभाविक है । कई बार वे श्री मोदी को अपना मित्र और महान नेता भी कह चुके हैं। वहीं दूसरी ओर ये कहने से भी बाज नहीं आए कि वे मेरी नाराजगी जानते हैं और इसीलिए मुझे खुश करने में लगे हैं। दरअसल ट्रम्प के बयानों में इतना विरोधाभास है कि यदि श्री मोदी उनकी सभी बातों का जवाब देते तो इससे व्यर्थ के विवाद उत्पन्न होते। इसीलिए उन्होंने उनकी उपेक्षा की नीति अपनाकर  टिप्पणी का काम सरकार के प्रवक्ता पर छोड़ दिया। यद्यपि वह भी सरकार की ही आवाज होती है किंतु डोनाल्ड ट्रम्प से सीधे बात नहीं करने की प्रधानमंत्री की नीति ने ये साबित कर दिया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा को  लेकर अमेरिका जैसी महाशक्ति के दबाव को ठुकराने में सक्षम है। 25 से 50 और अब 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिका के निर्णय पर भारत की ठंडी प्रतिक्रिया से  स्पष्ट हो गया कि हमारी विदेश नीति अब पूरी तरह दबाव मुक्त है और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 9 January 2026

हिटलर जैसी मूर्खताएं कर रहे ट्रम्प


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ताकत के जोर पर वही गलतियां कर रहे हैं जो कभी जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने की थीं।  प्रथम विश्व युद्ध के बाद  थोपी गई संधि के कारण उसके मन में जर्मनी को विश्व का अग्रणी और शक्तिशाली देश बनाने की महत्वाकांक्षा उत्पन्न हुई। इसके लिए यदि वह सकारात्मक कदम उठाता तब शायद वह अपने देश की अधिक भलाई कर सकता था।  लेकिन उसने अपने देश का सम्मान बढ़ाने के लिए अन्य देशों का अपमान करने की नीति अपनाई। अकारण पड़ोसी मुल्कों पर हमला कर उन्हें कब्जाने की हिमाकत की जिसकी परिणिति द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में हुई । यदि वह रूस पर हमला नहीं करता और अपने देश की भौगोलिक सीमाओं का सीमित विस्तार कर रुक जाता तब वह एक प्रभावशाली विश्व नेता के तौर पर स्थापित हो सकता था। लेकिन उसने लड़ाई को चारों तरफ फैलाकर अपने दुश्मनों को एकजुट हो जाने का अवसर दे दिया।  इटली और जापान  ने भी उसके समर्थन में उतरकर अपनी  दुर्गति करवाई।  जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता के अहंकार में  दुनिया जीतने के उसके इरादे मिट्टी में मिल गए। हालांकि हिटलर की अनेक खूबियों का भी बखान होता है किंतु दूसरा विश्व युद्ध छेड़कर उनसे मानवता का जो नुकसान किया उसके कारण दुनिया उसे घृणा की नजर से देखती है। इसी संदर्भ में मौजूदा परिदृश्य पर नजर डालें तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतें दुनिया को तीसरे महायुद्ध की ओर धकेल रही हैं।  लेकिन सवाल ये है कि वे हिटलर की तरह अमेरिका की आर्थिक और सैन्य शक्ति का उपयोग कर समूचे विश्व को भयभीत करने पर क्यों आमादा हैं ? और इसका सीधा जवाब है अमेरिका की वर्तमान दुरावस्था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण देश बन गया। आर्थिक और सैन्य क्षेत्र के साथ ही ज्ञान - विज्ञान का ऐसा कोई आयाम नहीं है जिसमें उसने अपनी श्रेष्ठता का लोहा न मनवाया हो। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करने वाले इस देश ने पूरी दुनिया को प्रभावित भी किया और आकर्षित भी। लेकिन  चौधरी बनने की कोशिश में उसने अपनी शक्ति और संसाधनों का जो अपव्यय किया उसने उसकी संपन्नता रूपी घड़े के नीचे छेद कर दिया। परिणाम ये है कि दूसरों को खैरात बांटने वाला देश खुद बेतहाशा कर्ज में डूबा हुआ है। उसके अर्थतंत्र पर चीन जैसे जन्मजात शत्रु देश का शिकंजा कस चुका है। अमेरिका की श्रेष्ठता को पुनर्स्थापित करने का वायदा कर ट्रम्प दोबारा सत्ता तो पा गए लेकिन उनकी समझ में नहीं आ रहा कि देश को संकट से कैसे निकालें ? और इसी उलझन में वे बदहवासी में डूबते गए। टैरिफ लगाने की उनकी नीतियों की अमेरिका में ही आलोचना हो रही है क्योंकि आयात महंगा होने से महंगाई चरम पर है। अमेरिकी जनता में इसके कारण गुस्सा बढ़ रहा है। ज़रूरी चीजों की किल्लत हो रही है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि ट्रम्प के अस्थिर स्वभाव और नीतिगत दृढ़ता की कमी के चलते अमेरिका एक अविश्वसनीय देश बनकर रह गया है। गत वर्ष देश की बागडोर संभालने के बाद से ही उन्होंने जिस तरह के फैसले किए उनके कारण अमेरिका के परंपरागत दोस्तों तक के बीच में उनकी छवि एक अहंकारी और धोखेबाज राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर बन गई। अमेरिकी डॉलर की पूरी दुनिया में जो साख और धाक बीते 70 - 80 सालों से कायम थी उसे ट्रम्प ने बीते एक साल में बुरी तरह ध्वस्त कर दिया। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने के प्रमुख कारणों में डॉलर के वर्चस्व से मुक्त होने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा डॉलर बेचकर सोने - चांदी का भंडार बढ़ाना ही है। इस अप्रत्याशित आर्थिक उथल - पुथल के लिए ट्रम्प की मूर्खता भरी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। अपने टैरिफ रूपी अस्त्र के बेअसर होने के बाद अब वे उसे 500 फीसदी तक बढ़ाने की महामूर्खता कर रहे हैं जिससे अमेरिका की आंतरिक स्थिति और बिगड़ेगी। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को बलात उठवाने के बाद ग्रीनलैंड हथियाने की उनकी जिद से अमेरिका के दुश्मनों की संख्या ही बढ़ रही है। रूस,चीन, भारत , ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के विरुद्ध एक साथ मोर्चा खोलकर ट्रम्प वैसा ही आत्मघाती कदम उठा रहे हैं जो दूसरे महायुद्ध में हिटलर और जर्मनी की बर्बादी का कारण बना।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 8 January 2026

क्या पुतिन और जिनपिंग रोक पाएंगे ट्रम्प को


वैश्विक परिस्थितियों में जिस तरह से बदलाव आ रहे हैं उससे लगता है कि शक्ति संतुलन एकपक्षीय होता जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आचरण से तो लगता है वे जंगल राज लागू करना चाह रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक अपहृत कर अमेरिका उठा लाने के बाद अब ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की उनकी योजना है जो डेनमार्क का हिस्सा है। उनकी धमकी के बाद यूरोपीय देशों में हड़कंप की स्थिति है । डेनमार्क ने तो नाटो के टूटने की आशंका तक जता दी है। उधर अमेरिका ने गत दिवस एक रूसी जलपोत पर कब्जा कर लिया। अमेरिका का आरोप है वह  वेनेजुएला से तेल लेने जा रहा था। उल्लेखनीय है अमेरिका ने उसके तेल बेचने पर प्रतिबंध लगा रखा है। रूस ने इस कार्रवाई को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया है।  ट्रम्प द्वारा वेनेजुएला पर शिकंजा कसने से चीन को बड़ा झटका लगा है जो उसका सबसे बड़ा खरीददार था। और बजाय डॉलर के अपनी मुद्रा युआन में ही लेनदेन कर रहा था। अब जबकि वेनेजुएला के तेल व्यापार पर अमेरिका का आधिपत्य होने जा रहा है तब चीन के सामने बड़ा ऊर्जा संकट आना तय है। और यदि ट्रम्प ने वाकई ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया तब यूरोप के साथ ही रूस और चीन के लिए भी ये चिंता बढ़ाने वाला होगा। लेकिन ऐसा होने के बाद ट्रम्प किस मुंह से रूस को यूक्रेन की जमीन पर कब्जा करने से रोकेंगे ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका जिस तरह से दादागिरी कर रहा है उसे रोकने की हिम्मत फिलहाल न रूस दिखा पा रहा है और न ही चीन। यूरोप में भी फ्रांस ही है जो अमेरिका के दबाव का सामना करने का हौसला दिखा सकता है । ब्रिटेन और जर्मनी सहित अन्य यूरोपीय देशों ने तो वेनेजुएला में ट्रम्प की इशारे पर हुई कार्रवाई का समर्थन कर उसके  प्रति अपना झुकाव दिखा दिया। हालांकि जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार यूरोप के अनेक छोटे देशों में युद्ध की तैयारियां देखने मिल रही हैं। उन्हें आशंका है कि अमेरिका की विस्तारवादी नीतियों से रूस का हौसला भी बुलंद हुआ है। और वह भी अपने पड़ोसी देशों में दखल देने की सोच रहा है। राष्ट्रपति पुतिन पहले ही इतिहास का हवाला देते हुए पोलैंड सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों को रूस का हिस्सा बताकर भय का माहौल बना चुके हैं। इन सबसे चीन का भी उत्साह हिलोरें मार सकता है जो ताइवान पर  कब्जा करने के अवसर की तलाश में रहता है। यही नहीं जापान के आधिपत्य वाले कुछ द्वीपों पर भी उसकी नजर लंबे समय से है। कुल मिलाकर ट्रम्प ने  विश्व के भूगोल में बदलाव का खतरा उत्पन्न कर दिया है। वे कितने सफल होंगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु यदि उनकी सनक इसी तरह जारी रही तब दुनिया को लघु विश्व युद्ध झेलना पड़ सकता है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की बेतहाशा खरीद से ये आशंका मजबूत हो रही है। वेनेजुएला तो खैर,  अमेरिका का प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं था , परंतु बाकी देश भी ट्रम्प की दादागिरी को चुपचाप सहन कर लेंगे ये संभव नहीं लगता क्योंकि अमेरिका ने वेनेजुएला के बाद क्यूबा को भी सबक सिखाने की जो धमकी दी है उसके बाद चीन और रूस भी कुछ न कुछ कदम तो उठाएंगे ही । वैसे भी ज्यादातर लैटिन अमेरिकी देश परंपरागत रूप से अमेरिका के विरोधी रहे हैं।  उनका झुकाव एक  जमाने में सोवियत  संघ के प्रति था किंतु बीते एक दशक में चीन ने भी इस इलाके में अपना दखल बढ़ाकर अमेरिका के विरुद्ध मोर्चेबंदी की है। वेनेजुएला में ट्रम्प ने जो कुछ किया उसकी आशंका पहले  से होने के बाद भी सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा इसकी कल्पना किसी को नहीं थी।  यदि वे ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की हिमाकत करते हैं तब ये हिटलर द्वारा पोलैंड पर कब्जा करने जैसा ही है जिसे दूसरे विश्वयुद्ध की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। लेकिन तब और अब में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है। सोवियत संघ के बिखराव के बाद दो ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था खत्म होकर अमेरिका का दबदबा बढ़ गया । लेकिन बीते दो दशक में चीन भी अमेरिका के मुकाबले एक आर्थिक महाशक्ति तो बन गया किंतु उसका सैन्य ढांचा उसके जितना मजबूत नहीं होने से वह अपने आसपास ही रुतबा दिखा सकता है। वेनेजुएला में उसके सीधे आर्थिक हित जुड़े थे । वहीं रूस भी अप्रत्यक्ष ही सही उसके साथ रिश्ते बनाए हुए था। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर लगी हैं कि ट्रम्प की हिटलर नुमा चालों को रोकने के लिए पुतिन और जिनपिंग क्या करते हैं?


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 January 2026

केवल जल ही नहीं शुद्ध जल भी जरूरी


म.प्र की व्यावसायिक राजधानी इंदौर की पहचान देश के सबसे स्वच्छ शहर के तौर पर बन चुकी है। वहां के नगरीय प्रशासन के साथ ही जनता को भी इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि स्वच्छ शहर होने का गौरव बरकरार रखने के लिए उन्होंने बेहद जागरूकता दिखाई वरना स्वच्छता सर्वेक्षण में ऊंची पायदान पर रहने वाले अनेक नगर बाद में फिसड्डी हो गए। उस लिहाज से इंदौर की प्रशंसा करनी होगी जिसने शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर बने रहने का कारनामा कर दिखाया। लेकिन बीते कुछ दिनों से इंदौर पूरे देश में आलोचना का पात्र बना हुआ है। जिसका कारण वहां की एक बस्ती में प्रदूषित जल की आपूर्ति के चलते 20 लोगों  का जान गंवाना है। जिन सैकड़ों लोगों को प्रदूषित जल ने बीमार कर दिया उनमें से कुछ को लंबे समय तक इसका दंश भोगना पड़ेगा।  इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में इस मुद्दे पर हलचल मची है। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार नाले - नालियों से गुजरती और जगह - जगह फूटी हुई पाइप लाइनों के कारण लोग ऐसे पानी का उपयोग करने बाध्य हैं जो उन्हें स्थायी तौर पर रोगी बना सकता हैं। छोटे  बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने से उनके लिए प्रदूषित जल बेहद नुकसानदेह है। मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है जिसने पूरे प्रदेश की रिपोर्ट भी तलब की है। प्रदेश सरकार भी हरकत में आई है। इंदौर के नगरीय प्रशासन में तबादले और निलंबन के जरिए फेरबदल किए गए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में शुद्ध जल की आपूर्ति का इंतजाम भी किया जा रहा है। जो ताजा जानकारी आई उसके अनुसार जिस क्षेत्र में दूषित जल से मौत हुई वहां का भूजल भी उपयोग करने योग्य नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रदूषण नीचे तक जा पहुंचा है। हमारे देश में ऐसी घटनाएं होने के बाद समूची व्यवस्था मुस्तैदी का प्रदर्शन करती है। इसीलिए पूरे प्रदेश में शुद्ध जल बड़ा मुद्दा बन गया है।  उच्च न्यायालय की फटकार से अतिरिक्त सक्रियता दिखाई दे रही है। फूटी हुई पाइप लाइनों का सर्वेक्षण किए जाने के अलावा नाले - नालियों से निकलने वाले बड़े पाइपों की जांच भी चल रही है। हालांकि ये सब  चिर - परिचित कर्मकांड का हिस्सा है। यदि इंदौर में मौतें न हुई होतीं तब शासन और प्रशासन की नींद नहीं टूटती और उच्च न्यायालय भी इस समस्या के बारे में उदासीन ही रहता। ऐसा नहीं है कि प्रदूषित जल की आपूर्ति के बारे में स्थानीय प्रशासन में बैठे अधिकारी - कर्मचारी अनजान हों। नलों में गंदा पानी आना भी नई बात नहीं है। पाइप लाइनों के फूटे होने की खबरें भी यदा - कदा प्रकाशित होती रही हैं। इनके जरिए आने वाला जल अशुद्ध होने से नुकसानदेह है। इसीलिए लोग अपने घरों में वाटर फिल्टर के उपकरण लगाते हैं। पानी की बोतल का कारोबार कल्पना से कहीं अधिक बढ़ता जा रहा है। हालांकि उसकी शुद्धता भी संदिग्ध मानी जाती है। लेकिन हमारे दिमाग में ये बात गहराई तक बैठ गई है कि साधारण पानी पीने योग्य नहीं है। कुछ दशक पहले तक पानी की शुद्धता को लेकर उतनी चिंता नहीं थी  किंतु अब ये बड़ा मुद्दा बन चुका है। इसीलिए इंदौर की घटना की चर्चा पूरे देश में हो रही है।  विकास की मूलभूत जरूरतों में  बिजली , सड़क और पानी को शामिल किया गया है। 2003 में इन्हीं के कारण म.प्र से दिग्विजय सिंह को जनता ने सत्ता से उखाड़ फेंका था। उसके बाद से केवल 15 माह छोड़कर शेष समय में भाजपा का निर्बाध शासन चला आ रहा है। प्रदेश के सभी बड़े शहरों की नगर निगमों में भी ज्यादातर भाजपा ही काबिज रही है। ऐसे में प्रदेश सरकार के साथ इन स्थानीय निकायों का समन्वय बेहतर रहा होगा ये मानना गलत नहीं है। इसीलिए यदि विपक्ष इंदौर की घटना को लेकर भाजपा को घेर रहा है तो उसे अनुचित नहीं कहा जाएगा भले ही उसके पीछे राजनीतिक लाभ लेने की मंशा ही क्यों न हो। अब जबकि पूरे प्रदेश में जल आपूर्ति व्यवस्था में व्याप्त खामियां सार्वजनिक विमर्श का विषय बन चुकी हैं तब शासन - प्रशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर शुद्ध जल आपूर्ति की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल जल योजना के अंतर्गत हर घर में पानी पहुंचाने का जो संकल्प लिया वह तभी सार्थक होगा जब लोगों को मिलने वाला पानी पीने योग्य हो । अन्यथा स्वस्थ भारत मिशन की कल्पना अधूरी रह जाएगी। इसीलिए सरकार के कर्ता - धर्ताओं को केवल जल ही जीवन है से आगे बढ़कर शुद्ध जल ही जीवन है के बारे में सोचना चाहिए। इंदौर की घटना चेतावनी है। यदि इसे गंभीरता से नहीं लिया तो भविष्य में किसी भी शहर में और भी बड़ा हादसा हो सकता है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 January 2026

ईरान में कट्टर इस्लामिक सत्ता के पतन की आहट शुभ संकेत


इज़रायल और हमास की लड़ाई में गाजा ही बर्बाद नहीं हुआ बल्कि प. एशिया का शक्ति संतुलन भी पूरी तरह गड़बड़ा गया । इसका  कारण रूस का यूक्रेन के साथ  युद्ध में उलझ जाना है जिससे अरब जगत में अमेरिका को अपना वर्चस्व बढ़ाने का अवसर मिल गया। शुरूआत सीरिया में  बशर उल असद के शासन के विरुद्ध संघर्ष के सफल होने से हुई। रूस  की कृपा से असद की सत्ता कायम थी किंतु  पुतिन जब यूक्रेन में फंस गए तब उनके पास उसकी मदद करने की गुंजाइश कम होती गई। इसी का लाभ उठाकर दिसंबर 2024 में अमेरिका ने वहां न सिर्फ सत्ता बदलवा दी अपितु मुल्क को कई हिस्सों में बांटकर  कमजोर  कर दिया। असद पूरा कुनबा लेकर रूस भाग गए।  उल्लेखनीय है आज समूचा यूरोप जिन मुस्लिम शरणार्थियों के कारण खून के आंसू रो रहा है उनमें से ज्यादातर सीरिया में चले गृहयुद्ध के कारण ही वहां पहुंचे थे। सीरिया की गोलान पहाड़ी पर इज़रायल ने अपना कब्जा पक्का कर लिया । ईराक से सद्दाम हुसैन और लीबिया से कर्नल गद्दाफी को ठिकाने लगाकर अमेरिका ने अरब जगत में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली । लेकिन ईरान अभी भी उसके लिए चुनौती बना हुआ था। भले ही अमेरिका ने उसके तेल बेचने के साथ उससे  तेल खरीदने वालों पर प्रतिबंध लगा रखे हों लेकिन फिर भी ईरान ने अमेरिकी दबाव में आने से मना कर दिया। इससे बौखलाए अमेरिका ने उस पर परमाणु अस्त्र विकसित करने का आरोप लगाकर उसकी घेराबंदी तो कर दी किंतु उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया। लेकिन इसी बीच ईरान के कट्टरपंथी शासक अयातुल्ला खामेनेई ने गाजा  पर काबिज कट्टरपंथी संगठन हमास को भड़काकर इज़रायल पर  हमला करवा दिया । लेकिन उस लड़ाई में गाजा पूरी तरह तबाह हो गया।  हमास की कमर तो टूटी ही  लेबनान में सक्रिय आतंकवादी संगठन हिजबुल्लाह और यमन में बैठे हूती नामक इस्लामिक गुट पर भी बेतहाशा हमले कर इजरायल ने उनकी ताकत घटा दी। ईरान पर भी इजरायल ने मिसाइलें दागकर जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। उसके तमाम उच्च सैन्य अधिकारी मारे गए। यहां तक कि खोमेनेई भी मरते - मरते बचे। यद्यपि ईरान ने भी पलटवार किया जिससे इजरायल को कुछ नुकसान हुआ किंतु अमेरिका ने अपने अजेय लड़ाकू विमान भेजकर ईरान के परमाणु संयंत्रों  पर जबरदस्त हमला बोलकर उसे लड़ाई बंद करने मजबूर कर दिया। आज के हालात में गाजा पर हमास का वर्चस्व नाममात्र का  है। वहां अमेरिका ने  जो योजना बनाई उसके पूरा  होने पर वह उसका हिस्सा बनकर रह जाएगा। लेकिन जो सबसे बड़ी खबर प. एशिया से आ रही है वह है ईरान में खोमेनेई की सत्ता के खात्मे की शुरुआत। ताजा संकेतों के अनुसार वे भी  असद की तरह ही  कुनबे सहित रूस भागने की फिराक में हैं। ये स्थिति एकाएक उत्पन्न नहीं हुई।  1979 में शाह पहलवी की सत्ता को पलटकर देश में अयातुल्ला खोमैनी ने  इस्लामिक गणराज्य की स्थापना कर जिस कट्टरपंथी सामाजिक व्यवस्था को लागू किया उसके विरुद्ध कई सालों से युवाओं में रोष  दिखने लगा था। हिजाब के विरोध में एक युवती के विद्रोह ने पूरे ईरान में नई पीढ़ी को आंदोलित किया जिसके बाद खोमेनेई के विरुद्ध आक्रोश पनपने लगा और जिस शाह को 1979 में अपदस्थ कर खोमैनी सत्ता में आए थे उन्हीं के बेटे को वापस बुलाकर ईरान  को उसी खुलेपन की ओर ले जाने की मांग जोर पकड़ रही है जिसकी यादें आज भी देश के लोगों में हैं। ईरान की कट्टरपंथी इस्लामिक शासन व्यवस्था में सर्वोच्च सत्ता धर्मगुरु होने के नाते खोमेनेई के पास है। जिसने भी सुधार की आवाज उठाई भी उसे मौत की नींद सुला दिया गया। हिजाब के मामले में जरा सी लापरवाही की कड़ी सजा से महिलाओं विशेषतः युवतियों का गुस्सा आसमान छूने लगा था। हालांकि ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि खोमेनेई के विरुद्ध जनविद्रोह भड़काने में  अमेरिका की भूमिका होगी किंतु ये भी सच है कि अरब जगत में भी आधुनिकता के बीज प्रस्फुटित होने लगे हैं। सऊदी अरब जैसा कट्टर इस्लामिक देश तक अब महिलाओं को  आजादी देने के कदम उठा रहा है। दुबई , शारजाह और अबू धाबी में आई आर्थिक समृद्धि ने प. एशिया में बड़े  बदलाव की नींव रख दी है। यद्यपि अभी भी इस्लाम की आड़ में कट्टरता के हिमायती देश हैं लेकिन समय के साथ वे अलग ये थलग पड़ते जा रहे हैं। यदि ईरान में खोमेनेई सत्ता का पतन हुआ और उसकी जगह शाह के बेटे की ताजपोशी हुई तब यह न सिर्फ इस्लामिक जगत अपितु दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन पर बड़ा असर डालने वाला होगा। भले ही इससे ईरान में अमेरिकी और पश्चिमी हस्तक्षेप बढ़े किंतु भौगोलिक रूप से हमारे नजदीक एक कट्टर इस्लामी देश में यदि दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली सरकार आती है तो भारत के लिए वह सुखद स्थिति होगी।



- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 5 January 2026

ट्रम्प ने दुनिया को अराजकता के कुएं में धकेल दिया



 दूसरे विश्व युद्ध के बाद अनेक अवसर ऐसे आए जब अमेरिका ने किसी देश में घुसकर हस्तक्षेप किया। साठ के दशक में क्यूबा पर अमेरिकी हमले की आशंका में सोवियत संघ की जवाबी मोर्चेबंदी ने दो परमाणु शक्तियों के बीच टकराहट के आसार उत्पन्न कर दिए थे। उसके बाद वियतनाम और अफगानिस्तान में अमेरिका ने लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई किंतु उसे अपना डेरा समेटना पड़ा। लैटिन अमेरिका के देशों के साथ तो उसकी कभी नहीं पटी। क्यूबा के अलावा अन्य देशों पर भी उसकी कोप दृष्टि रही। मेक्सिको से आने वाले घुसपैठिए जहां समस्या बने हुए हैं वहीं कोलंबिया सहित लैटिन देशों से उसकी शिकायत नशीले पदार्थों के कारोबार को लेकर है। ब्राजील के ब्रिक्स नामक संगठन में शामिल होने से अमेरिका चिढ़ता है। पनामा के साथ पनामा नहर के स्वामित्व संबंधी उसका विवाद है। लेकिन जबसे डोनाल्ड ट्रम्प दोबारा सत्ता में आए तबसे पूरी दुनिया में थानेदारी दिखाने में जुटे हैं। पड़ोसी कैनेडा पर वे अमेरिका में शामिल होने का दबाव बनाते हैं वहीं ग्रीनलैंड पर कब्जे की इच्छा भी व्यक्त करते हैं। ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने उन्होंने अपने सबसे मजबूत विमान भेज दिए। वहीं मलबे का ढेर बन चुके गाजा पर उनकी नजर है। पाकिस्तान को उनका संरक्षण केवल इसलिए मिल रहा है जिससे बलूचिस्तान के बेशकीमती खनिजों पर कब्जा हो जाए। ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने सात लड़ाइयां रुकवाईं । लेकिन यूक्रेन और रूस की जंग को रुकवाने के लिए उन्होंने जो उपाय सुझाया उसमें रूस द्वारा कब्जाए इलाके छोड़ने के अलावा यूक्रेन को पूरी तरह निहत्था होने मजबूर करना है। इस सबका कारण है अमेरिका की कर्ज के बोझ से कराह रही अर्थव्यवस्था। दुनिया भर में सरकारों द्वारा सोने और चांदी की जबरदस्त खरीद का कारण डॉलर के वर्चस्व से मुक्त होने की तैयारी है। इससे भयभीत ट्रम्प ने टैरिफ रूपी हथियार का उपयोग कर दादागिरी को बनाए रखना चाहा जो चीन और भारत जैसे देशों के नहीं झुकने से अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सका। बौखलाहट में ट्रम्प ने वेनेजुएला नामक लैटिन अमेरिकी देश में घुसकर राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी को उठवाकर न्यूयॉर्क के जेल में बंद कर दिया । अमेरिका काफी समय से आरोप लगा रहा था कि वे नशीले पदार्थों को तस्करी के जरिए अमेरिका भेजने वालों को संरक्षण दे रहे हैं। ट्रम्प ने वेनेजुएला को कच्चा तेल बेचने से भी रोक रखा था जो उसकी आय का एकमात्र साधन है। मादुरो पर भी चुनाव में धांधली करने का वैसा ही आरोप मढ़ा जाता रहा जैसा बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना पर लगाकर वहां विद्रोह भड़काया गया। मादुरो पर ट्रम्प के आरोप जांच का विषय है किंतु जिस तरह से उनको बलात अमेरिका ले आया गया वह सवाल खड़े करने वाला है। सही बात ये है कि कच्चे तेल का अकूत भंडार होने के कारण संपन्नता के शिखर पर पहुंचने के बाद ये देश गलत नीतियों से कंगाली की स्थिति में जा पहुंचा। जितनी सरलता से अमेरिका मादुरो को उठा ले गया उससे ये बात सामने आ गई कि वे बिना प्रतिरोधक शक्ति के ही उस को चुनौती देने की मूर्खता कर बैठे। साम्यवादी होने के कारण उन्हें चीन से हथियार मिलते रहे किंतु उनका उपयोग करने का अवसर ही अमेरिका ने उसे नहीं दिया। इससे ये हकीकत भी उजागर हो गई कि चीन अपने अड़ोस - पड़ोस में भले ही रौब दिखाता फिरे किंतु हजारों मील दूर बैठे अपने समर्थक की मदद करना उसके बस में नहीं। रूस भी यूक्रेन में फंसे रहने से जुबानी प्रतिरोध से ज्यादा कुछ नहीं कर सका। वैसे भी यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए युद्ध छेड़ने के बाद वह भी अपराधबोध से भी ग्रसित है। वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद सत्ता का स्वरूप क्या होता है ये अनिश्चित है क्योंकि जिस उपराष्ट्रपति को कार्यकारी शासक बनाया गया उसने भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार कर दिया जिसके बाद ट्रम्प ने उन्हें भी धमकी दे डाली। इन सबसे हटकर एक बात स्पष्ट है कि अमेरिका द्वारा उठाया गया कदम वेनेजुएला के तेल भण्डार का दोहन कर अपनी खस्ता आर्थिक स्थिति सुधारना है। लेकिन अब ट्रम्प रूस द्वारा यूक्रेनी जमीन पर कब्जा करने को किस मुंह से गलत ठहराएंगे ? उनके इस फैसले ने चीन द्वारा ताइवान पर जबरन कब्जा करने का रास्ता भी साफ कर दिया है। उल्लेखनीय है पोलैंड और डेनमार्क सहित अनेक यूरोपीय देश इस आशंका में डूबे हैं कि कहीं रूस उनके साथ भी यूक्रेन जैसा सलूक न करे। कुल मिलाकर ट्रम्प ने वैश्विक व्यवस्था को अराजकता के कुएं में धकेलने का जो दुस्साहस किया वह बड़ी मछली द्वारा छोटी को निगलने के सिद्धांत को मान्यता प्रदान करेगा। ऐसे में यदि भारत पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर अपना कब्जा स्थापित कर ले तब उसे रोकने वाला कौन होगा ? ट्रम्प ने जो कुछ भी लिया उसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की उपयोगिता भी सवालों के घेरे में आ गई है। उन छोटे देशों का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है जिनके पास अपनी सुरक्षा के समुचित प्रबंध नहीं हैं। ऐसे में भारत द्वारा बीते एक दशक में अपने सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों की सार्थकता साबित होती जा रही है क्योंकि किसी भी देश को अपना अस्तित्व बचाने के लिए केवल आर्थिक विकास ही नहीं अपितु सामरिक शक्ति की भी ज़रूरत है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


Saturday, 3 January 2026

धार्मिक स्थलों का विकास अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहा




जब अयोध्या में राम मंदिर बनाने की बात चली तब एक वर्ग उसकी आलोचना करते हुए उस पैसे का उपयोग विद्यालय, शौचालय और ऐसे ही अन्य कार्यों पर खर्च करने की वकालत करने लगा। ऐसे लोगों को बीते दो - तीन दिनों में देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या देखकर अपनी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए। बीते साल के अंतिम और वर्ष 2026 के प्रथम दिवस देश के प्रमुख धर्मस्थलों पर श्रद्धालुओं का सैलाब बदलते भारत का चित्र है । वैसे तो 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला वर्ष ईसाइयत से जुड़ा हुआ है लेकिन इस दिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर , तिरुपति बालाजी, अयोध्या के राम लला, वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर , शिरडी के साईं मंदिर और उज्जैन के महाकाल परिसर में भी दर्शनार्थियों की भीड़ ने नया कीर्तिमान बना दिया। इसके अलावा पवित्र नदियों के तट पर भी उत्सव का माहौल देखने मिला। जगन्नाथ पुरी और कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक पर भी सामान्य दिनों से अधिक पर्यटक जुटे। इससे साबित हुआ कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में धार्मिक स्थल भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं । अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन हेतु औसतन 50 हजार से 1 लाख भक्तजन आते हैं । ये संख्या पर्वों पर लाखों का आंकड़ा पार कर जाती है। 2026 शुरू होने के पहले अयोध्या के सारे होटल , धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस आरक्षित चुके थे। लगभग यही स्थिति वाराणसी, उज्जैन, शिरडी, तिरुपति आदि की रही। काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल परिसर को विकसित करने के विरोध में भी खूब राजनीति हुई। लेकिन कार्य पूर्ण हो जाने पर पूरा विरोध ये देखकर शांत हो गया कि उनमें आने वालों की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि हुई और वह भी अन्य शहरों से। उल्लिखित सभी स्थलों में होटल और टैक्सी जैसे व्यवसाय के साथ ही पूजन सामग्री विक्रेताओं का भी कारोबार जमकर चलने लगा। यहाँ तक कि ऑटो रिक्शा वालो की कमाई भी बढ़ी। वाराणसी में साड़ियों के अलावा गलीचों के कारोबारी भी विश्वनाथ परिसर के विकास के बाद अपने व्यवसाय में वृद्धि से प्रसन्न हैं। उज्जैन में महाकाल परिसर इलाके में जिनके मकान हैं उनमें से बहुतों ने गेस्ट हाउस नुमा व्यवस्था कर आय का स्रोत पैदा कर लिया। एक मोटे अनुमान के अनुसार उज्जैन में फूल - माला बेचने वालों की संख्या में हजारों की वृद्धि हुई है। म.प्र में ही महाकाल के अलावा ओंकारेश्वर को भी नया स्वरूप दिये जाने के बाद वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यही सब देखकर केंद्र सरकार ने देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का विकास करने की योजना बनाई है जिनमें गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर भी है। वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर बेहद संकरे स्थान में होने से श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफ होती है। एक - दो बड़े हादसों के बाद उ.प्र सरकार ने उसके भी समुचित विकास का निर्णय किया है। भारत में धार्मिक आस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद नई पीढ़ी में धर्म के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है। लेकिन धर्मस्थलों पर पुराने जमाने की लचर व्यवस्थाओं की वजह से युवा वहाँ जाने से कतराते थे। लेकिन जिन - जिनको नया स्वरूप दिया गया उनमें युवा दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि विकास पर किये गए खर्च का औचित्य सिद्ध कर रही है। हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि धार्मिक यात्रा को पर्यटन का स्वरूप दिये जाने से धर्मस्थलों की पवित्रता और काफी हद तक मर्यादा नष्ट होती है। उत्तराखंड के चार धामों की सड़कें विकसित होने के बाद वहाँ तीर्थयात्रियों की संख्या साल दर साल बढती जाने से पर्यावरण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। लेकिन इन यात्राओं का पेशेवर तरीके से प्रबंध किया जाए तो उसका हल हो सकता है। जमीनी सच्चाई ये है कि सदियों पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को समय के साथ यदि दुरुस्त किया जाए तो धार्मिक स्थलों के जरिये रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास संभव है। भारत सरकार को चाहिए सभी राज्यों से प्रमुख धर्मस्थलों की सूची लेकर उनको विकसित करने की कार्य योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे मूल स्वरूप को छेड़े बिना वहाँ आने वालों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। हालिया अनुभव बताते हैं कि विकसित धार्मिक स्थलों पर दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि से अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला। अयोध्या से युवाओं का पलायन रुकना इसका प्रमाण है।घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी ये कदम सहायक साबित होगा इसमें दो मत नहीं हैं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 


Friday, 2 January 2026

कर्नाटक सरकार के सर्वे ने ईवीएम पर लगे आरोपों को नकारा


लोकसभा  में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि ईवीएम और मतदाता सूचियों में हेराफेरी के जरिए भाजपा चुनाव जीतती है।  ये बात अलग है कि चुनाव आयोग द्वारा हलफनामा देखकर आरोप लगाने की चुनौती उन्होंने  स्वीकार नहीं की। लेकिन वोट चोरी उनका प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। बिहार के चुनाव  को तो इसी पर केंद्रित करने की पूरी कोशिश उनकी तरफ से की गई किंतु मतदाताओं ने उनके सारे आरोपों को नजरअंदाज करते हुए कांग्रेस को दहाई के भीतर ही समेट दिया । वहीं तेजस्वी यादव को भी हाशिया दिखा दिया। कर्नाटक  में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर भी श्री गांधी ने आरोप लगाए थे। इसके अलावा कांग्रेस ईवीएम मशीनों के विरुद्ध भी जमकर हल्ला मचाती रही है। प्रियंका वाड्रा तो लगभग हर सभा में मतपत्रों से चुनाव करवाने की चुनौती भाजपा को देती हैं। पार्टी  के बाकी नेता भी इन दोनों की हां में हां मिलाते हुए वोट चोरी और ईवीएम का  विवाद खड़ा करते रहते हैं। राहुल ये बात भी दोहराते  हैं कि वोट चोरी न होती तब लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों तक भी नहीं पहुंचती।  लेकिन बिहार चुनाव के बाद अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे से कन्नी काटने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने भी खुलकर कहना शुरू कर दिया है कि बिहार में श्री गांधी ने जमीनी मुद्दों को उपेक्षित कर केवल वोट चोरी तक सिमटकर अपना और तेजस्वी दोनों का नुकसान कर लिया। मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (एस.आई.आर) का विरोध भी बेअसर साबित हुआ।  कांग्रेस ने इसके विरोध में भी देशव्यापी आंदोलन किया किंतु उसका कोई प्रभाव जनमानस पर नहीं पड़ा। लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में  विधानसभा चुनाव हुए उनमें जम्मू - कश्मीर और झारखंड छोड़कर हरियाणा तथा दिल्ली में पूर्ण रूपेण भाजपा जबकि महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की जीत हुई। चुनाव के बाद जम्मू - कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तो खुलकर स्वीकार  किया कि निष्पक्ष  चुनाव के कारण ही उनकी सत्ता में वापसी हुई। इसी तरह झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी वोट चोरी या ईवीएम सम्बन्धी शिकायत नहीं की। यहां तक तो बात ठीक थी किंतु कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार द्वारा करवाए गए ताजा सर्वेक्षण में 80 प्रतिशत से अधिक लोगों ने जो राय व्यक्त की उसके मुताबिक लोकसभा चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हुए और ईवीएम का उपयोग पूरी तरह सही है। यहां तक कि सिद्धारमैया सरकार द्वारा स्थानीय निकायों के चुनाव मतपत्रों से कराने के फैसले की भी सर्वेक्षण में आलोचना की गई है। 102 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया उक्त सर्वे राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्देशन में संपन्न हुआ जिसकी रिपोर्ट राज्य सरकार ने  ही सार्वजनिक की है। सर्वेक्षण में जिस बड़ी मात्रा में लोगों ने लोकसभा चुनावों की निष्पक्षता और ईवीएम के प्रति विश्वास जताया गया वह कांग्रेस विशेष रूप से श्री गांधी और श्रीमती वाड्रा के लिए बड़ा झटका कहा जा सकता है। यही नहीं ईवीएम के विरोध में झंडा उठाने वाले अन्य विपक्षी दलों के लिए भी ये सर्वे मुंह बंद करने वाला है। स्मरणीय है इसी साल प. बंगाल, असम , तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में कर्नाटक के सरकारी सर्वे ने ईवीएम को लेकर व्यक्त की जाने वाली शंकाओं को रद्दी की टोकरी में भी फेंक दिया है। हालांकि श्री गांधी इसके बावजूद भी अपनी रट लगाए रहेंगे। लेकिन इतने झटके खाने के बाद भी सच्चाई को स्वीकार करने तैयार नहीं हैं तो यही मानकर चलना होगा कि वे जनमानस को समझने में पूरी तरह विफल हैं। लोकतंत्र में चुनावी हार - जीत चलती रहती है। भाजपा आज भले सफलता के उच्चतम शिखर पर हो किंतु कभी वह भी लोकसभा में मात्र 2 सीटों पर सिमटकर रह गई थी। दरअसल कांग्रेस की समस्या ये है कि वह पराजय के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण कर अपनी गलतियां सुधारने के  बजाय उन्हें दोहराती जा रही है।  देखना ये है कि कर्नाटक की अपनी ही सरकार के सर्वेक्षण के बाद ईवीएम को लेकर राहुल  और प्रियंका क्या रवैया अपनाते हैं?


- रवीन्द्र वाजपेयी