Thursday, 15 January 2026

ईरान भी सीरिया की तरह टुकड़ों में बंटने के कगार पर


ईरान में अयातुल्ला ख़ामेनेई को सत्ता से हटाने के लिए चल रहे जनांदोलन को दबाने के हरसंभव प्रयासों के बावजूद विरोध रुकने का नाम नहीं ले रहा। सत्तारूढ़ इस्लामिक कट्टरपंथी पूरी तरह दमन पर उतारू हैं। खुलेआम गोलियां मारी जा रही हैं। ईश निंदा के आरोप में सार्वजनिक फांसी दिए जाने की खबर भी चर्चा में है।  ध्यान देने वाली बात ये है कि अमेरिका द्वारा खामेनेई को हटाने की योजना खटाई में पड़ती लग रही है। डोनाल्ड ट्रम्प को उम्मीद थी कि वे वेनेजुएला जैसा हस्तक्षेप ईरान में भी करने में सफल हो जाएंगे। उनके आशावाद का आधार वहां की जनता का इस्लामिक कट्टरता के विरुद्ध सड़कों पर उतर आना है। शुरुआत में  लगा कि उनकी सोच सही साबित होगी। ख़ामेनेई के  रूस पलायन करने की आशंका भी व्यक्त की जाने लगी। अमेरिका द्वारा सैन्य हस्तक्षेप के संकेत भी मिले। ईरान के पड़ोसी कुछ मुस्लिम देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे पहले से ही हैं। लेकिन ईरान द्वारा इन अड्डों पर मिसाइलें दागने की धमकी के बाद उन देशों ने अमेरिका को जल्दबाजी करने से रोका । इसी के साथ अनेक मुस्लिम देश ईरान और ट्रम्प के बीच मध्यस्थता में जुट गए। इसके कारण खामेनेई को अवसर मिल गया और सेना की मदद से वे आंदोलन को कुचलने में जुट गए। अब तक हजारों लोगों के मारे जाने की ख़बर है। सैकड़ों लाशों को एक साथ दफनाए जाने की जानकारी भी मिल रही है। इसके  बाद भी  जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है। पूरा देश जल रहा है। खामेनेई के चित्रों को युवतियों द्वारा जलाए जाने के वीडियो भी पूरी दुनिया ने देखे। इसके अलावा बुर्का और हिजाब उतारकर फेंकने का साहस दिखाना भी साधारण बात नहीं है। मुल्लाओं के विरोध में नारेबाजी भी जमकर हो रही है। लेकिन  डोनाल्ड ट्रम्प की धौंसबाजी ने ईरान के सत्ताधीशों को मुस्लिम कार्ड खेलने का अवसर दे दिया जिससे वे अरब देश भी साथ  आने लगे जिनकी ईरान से पटरी नहीं बैठती। यहां तक कि इजरायल तक ने अमेरिका को समझाइश दे डाली कि ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने के पहले संभावित परिणामों का आकलन कर लिया जाए ,वरना समूचे प. एशिया में युद्ध की चिंगारियां भड़क सकती हैं।इजरायल को ये डर भी है कि अमेरिका द्वारा ईरान में सैन्य बल का प्रयोग किए जाने के बाद उसके  पलटवार का सबसे बड़ा निशाना वही होगा। स्मरणीय है अमेरिका द्वारा परमाणु संयंत्रों पर हमला किए जाने के समय ईरान ने  इजरायल पर मिसाइलें छोड़कर काफी नुकसान पहुंचाया था। प्रधानमंत्री नेतन्याहू इतनी जल्दी दोबारा अपने देश को जंग में झोंकना नहीं चाह रहे। इसका लाभ उठाकर ईरान ने मुस्लिम देशों की गोलबंदी कर ली। खबर तो ये भी है कि रूस और चीन ने भी ईरान को सैन्य सहायता भेजकर उसका हौसला बुलंद किया है। हालांकि ईरान के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यदि ट्रम्प वाकई सैन्य कार्रवाई करते हैं तब ईरान उसका जवाब कैसे देगा इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं। लेकिन अमेरिका ने  पैर पीछे खींचे तो फिर ईरान की  इस्लामिक सत्ता का दमनचक्र और तेज हो जाएगा । अभी तक के संकेतों के अनुसार प. एशिया के मुस्लिम देशों में भी इस बात का डर समा गया है कि ईरान में सफल होने के बाद उनके देश में भी इस्लामिक व्यवस्था के विरुद्ध जनता खड़ी हो जाएगी। यद्यपि सऊदी अरब जैसे इस्लाम के सबसे बड़े देश के नए शासक ने भी महिलाओं को काफी छूट दी है किंतु ज्यादातर देश अभी भी इस्लामिक कानूनों से बंधे हुए हैं। इसीलिए उनमें से कोई भी खामेनेई द्वारा चलाए जा रहे दमनचक्र के विरुद्ध मुंह नहीं खोल रहा। ऐसे में यदि  कट्टरपंथी सत्ता नहीं बदली तब  ईरान में  नरसंहार  की आशंका और भी बढ़ जाएगी जिसका परिणाम गृहयुद्ध भी  हो सकता है । दरअसल आंदोलनकारी ये समझ चुके हैं कि उनके पास आगे बढ़ने के सिवाय दूसरा विकल्प नहीं हैं। कुल मिलाकर ईरान दो पाटों के बीच अब फंसकर रह गया है। खामेनेई की सत्ता पलटने के  बाद भी वहां राजनीतिक स्थिरता की  गारंटी नहीं है। 1979 में सत्ता से हटे शाह  के पुत्र यदि लौटे तब भी वे कितने सफल होंगे कहना मुश्किल है। बड़ी बात नहीं सीरिया की तरह ईरान भी टुकड़ों में बंट जाए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

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