अमेरिका द्वारा भारत पर 500 फीसदी टैरिफ थोपने संबंधी फैसले के बाद डोनाल्ड ट्रम्प उसे लागू करेंगे या दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश करते रहेंगे ये सवाल चर्चा में है। दरअसल ट्रम्प की मनोदशा उस तेज गेंदबाज जैसी है जो बाउंसर से बल्लेबाज के सिर को निशाना बनाते हुए उसे डराने की कोशिश करता है । यदि बल्लेबाज यदि तनिक भी लापरवाही करता है तब तो गेंद उसके सिर को चोट पहुंचा देती है और यदि बल्ले पर ठीक से नहीं आई तब वह कैच कर लिया जाता है। जब हेलमेट का उपयोग नहीं होता था तब अनेक बल्लेबाजों को बाउंसरों ने घायल किया। भारत के पूर्व कप्तान नारी कांट्रेक्टर के सिर में वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज ग्रिफिथ के बाउंसर से गंभीर चोट लगी कि उनका खेल जीवन ही समाप्त हो गया। हेलमेट आने के बाद भी अनेक खिलाड़ी बाउंसर पर घायल होते रहे हैं। इसीलिए चतुर बल्लेबाज सामान्यतः झुककर उसे सिर के ऊपर से जाने देते हैं । गेंदबाज फिर दूसरी और तीसरी बाउंसर भी फेंकता है। और बल्लेबाज उसे भी सिर झुकाकर छोड़ दे तब उसकी झल्लाहट बढ़ती है जिसकी वजह से उसकी दशा और दिशा दोनों गड़बड़ा जाती हैं जिसका लाभ उठाकर बल्लेबाज गेंदों की पिटाई करता है। भारतीय क्रिकेट में सुनील गावस्कर , राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर सफल हुए तो उसके पीछे उनका धैर्य ही था। राजनय या कूटनीति में भी बल्लेबाजी की उक्त तकनीक काम आती है जिसमें सामने वाले की तीखी बातों से उत्तेजित होकर जल्दबाजी में टिप्पणी से बचना ही बेहतर होता है। उक्त संदर्भ भारत और अमेरिका के सम्बन्धों में तनाव को लेकर प्रासंगिक हैं। राष्ट्रपति ट्रम्प लगातार निरर्थक और निराधार टिप्पणियां करते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उकसाने का दांव चल रहे हैं। अपेक्षा की जाती है कि वे उनका जवाब सार्वजनिक रूप से दें। लेकिन एक - दो को छोड़ श्री मोदी ने उनकी कटाक्ष युक्त टिप्पणियों को नजरंदाज कर दिया । सिलसिला ऑपरेशन सिंदूर से शुरू हुआ जब ट्रम्प ने युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटा। उसके बाद फिर भारत पर टैरिफ थोपने के फैसले के साथ ही वे श्री मोदी पर व्यंग्यबाण छोड़ते रहे। कैनेडा में आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन से लौटते वक्त प्रधानमंत्री को वॉशिंगटन आने का न्यौता भी ट्रम्प ने दिया किंतु उन्होने अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। तबसे वे दर्जनों ऐसी टिप्पणियां कर चुके हैं जिन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जरूरत श्री मोदी ने नहीं समझी। जानकारी तो यहां तक आई कि उनके फोन तक प्रधानमंत्री ने नहीं उठाए। जाहिर है इससे ट्रम्प की बौखलाहट और बढ़ी जिसका प्रमाण उनके वाणिज्य मंत्री हावर्ड लुटनिक ने ये कहकर दिया कि भारत के साथ व्यापार संधि का मसला इसलिए नहीं सुलझ रहा क्योंकि श्री मोदी ने ट्रम्प से फोन पर अनुरोध नहीं किया। ट्रम्प द्वारा समय - समय पर की जाने वाली ऊल - जलूल टिप्पणियों का जवाब श्री मोदी की बजाय या तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर देते रहे या विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता। लुटनिक की टिप्पणी पर भी प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि बीते कुछ महीनों में ट्रम्प और श्री मोदी के बीच कई बार फोन पर चर्चा हो चुकी है। इजरायल और हमास के बीच युद्ध रुकने पर प्रधानमंत्री ने ट्रम्प को फोन किया था। इसके अलावा यूक्रेन संकट पर भी दोनों में बातचीत हो चुकी है। लेकिन व्यापार संधि और टैरिफ घटाने के मुद्दे पर बेशक श्री मोदी ने उनसे अनुनय - विनय नहीं किया क्योंकि वे जिन शर्तों पर टैरिफ घटाने की बात कर रहे हैं वे भारतीय हितों के लिए नुकसानदेह हैं। इस मामले में भारत ने जो दृढ़ता दिखाई उसके ट्रम्प का बौखलाना स्वाभाविक है । कई बार वे श्री मोदी को अपना मित्र और महान नेता भी कह चुके हैं। वहीं दूसरी ओर ये कहने से भी बाज नहीं आए कि वे मेरी नाराजगी जानते हैं और इसीलिए मुझे खुश करने में लगे हैं। दरअसल ट्रम्प के बयानों में इतना विरोधाभास है कि यदि श्री मोदी उनकी सभी बातों का जवाब देते तो इससे व्यर्थ के विवाद उत्पन्न होते। इसीलिए उन्होंने उनकी उपेक्षा की नीति अपनाकर टिप्पणी का काम सरकार के प्रवक्ता पर छोड़ दिया। यद्यपि वह भी सरकार की ही आवाज होती है किंतु डोनाल्ड ट्रम्प से सीधे बात नहीं करने की प्रधानमंत्री की नीति ने ये साबित कर दिया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा को लेकर अमेरिका जैसी महाशक्ति के दबाव को ठुकराने में सक्षम है। 25 से 50 और अब 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने के अमेरिका के निर्णय पर भारत की ठंडी प्रतिक्रिया से स्पष्ट हो गया कि हमारी विदेश नीति अब पूरी तरह दबाव मुक्त है और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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