Friday, 30 January 2026

पवार परिवार के प्रभुत्व पर खतरे के बादल


महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की हवाई दुघर्टना में हुई मौत के बाद ये सवाल एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है कि राज्य की राजनीति पर अचानक उत्पन्न इस परिस्थिति का क्या असर पड़ेगा। अजीत रिकॉर्ड 6 बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 2024 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी एनसीपी को जबरदस्त सफलता मिली और 41 विधायकों के साथ वे कद्दावर नेता के तौर  पर उभरे। यह सफलता इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण थी क्योंकि उन्होंने  चाचा शरद पवार से बगावत कर पार्टी पर कब्जा किया था। हालांकि अजीत का  उत्थान चाचा की छत्रछाया में ही हुआ किंतु  उत्तराधिकार संबंधी मतभेद के चलते दोनों के बीच दूरी बढ़ती गई। अजीत के  मन में मुख्यमंत्री नहीं बन पाने के साथ ही ये मलाल भी था कि चाचा ने अपनी इकलौती बेटी सुप्रिया सुले को राजनीतिक वारिस बनाया जबकि वे शुरुआत से ही उनके दाहिने हाथ बने हुए थे । अजीत का चाचा से मतभेद केवल सियासी विरासत का था जिसके लिए वे परिवार की एकता तोड़ने में भी नहीं हिचकिचाए। दरअसल वृद्धावस्था और बीमारी के चलते शरद पवार पूरी तरह कमजोर हो चले थे जिससे उनकी राजनीतिक जमीन पर अजीत ने काफी कुछ कब्जा कर लिया था। हालांकि हाल ही में संपन्न स्थानीय निकायों के चुनावों में चाचा - भतीजे  दोबारा करीब आए और दोनों की पार्टियों के एकीकरण की चर्चाएं भी होने लगीं किंतु उसके पहले ही अजीत को मौत ले गई। जहां तक बात भाजपा से गठबंधन कर सत्ता हासिल कर एनसीपी तोड़ने की थी तो अजीत ने ये हुनर चाचा से ही सीखा था जिन्होंने अपने राजनीतिक गुरु बसंत दादा पाटिल की सरकार गिरवाकर मुख्यमंत्री पद कब्जाया था। सोनिया गांधी के विदेशी मूल का विवाद खड़ा कर कांग्रेस तोड़कर एनसीपी बनाने वाले शरद पवार  अवसरवाद के जीते जागते प्रतीक हैं। इसीलिए कांग्रेस से बगावत के बाद उसके साथ सत्ता में भागीदारी करने में भी उन्हें संकोच नहीं हुआ। अजीत भी यही सब देखते हुए राजनीति के मैदान में आगे बढ़े थे । लिहाजा  अपने राजनीतिक गुरु और परिवार के मुखिया  को धोखा देने में उन्हें संकोच नहीं हुआ। भ्रष्टाचार के जरिए आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने का हुनर भी अजीत ने शरद पवार से ही सीखा था। ये भी कहा जाता है कि भाजपा की शरण में आने के पीछे उनका मकसद भ्रष्टाचार के आरोपों से अपने दामन पर लगे दागों को ही धोना था। इसीलिए उनके साथ आने  से भाजपा की छवि पर भी आंच आई थी ।  लेकिन उन सभी विवादों पर अचानक पर्दा पड़ गया। जीवन के आखिरी पड़ाव पर खड़े शरद पवार के पास अब न तो इतना समय है और न ही शक्ति कि वे  परिवार के प्रभुत्व को बारामती और उसके निकटवर्ती इलाकों में बनाए रख सकें। उनकी बेटी सुप्रिया भले ही लोकसभा सदस्य हों किंतु उनका अपना जनाधार न के बराबर है। ऐसे में अजीत की असमय मृत्यु ने पवार परिवार के प्रभाव के अंत की शुरुआत कर दी है। अजीत के दोनों बेटों पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते  उनकी ताजपोशी कठिन है। इसलिए उनकी पत्नी और राज्यसभा सदस्य सुनेत्रा को फडणवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाने की चर्चा है। हालांकि कुछ समय तक भले ही वे सहानुभूति हासिल करती रहें किन्तु पति की मौत के बाद उनके लिए पार्टी चलाते रहना कठिन है। यदि एनसीपी के दोनों धड़े मिल भी जाएं तब भी पवार परिवार के वे पुराने दिन  शायद ही लौट पाएंगे। इस शून्य को कौन भरेगा ये बड़ा सवाल है क्योंकि शरद पवार के सामने परिवार के दबदबे को बनाए रखने के साथ ही अपनी बेटी सुप्रिया के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने की चिंता भी है। ऐसे में वे भी भाजपा के निकट जाने का निर्णय ले सकते हैं क्योंकि अब सेकुलर राजनीति का झण्डा उठाने की क्षमता न उनमें बची और न ही परिवार में। वैसे भी परिवारवादी पार्टियों के साथ यही विडंबना जुड़ी होती है कि  उसका सबसे मजबूत स्तंभ कमजोर होने अथवा गिरने के बाद पूरा ढांचा धराशायी हो जाता है। राजनीतिक विश्लेषक अजीत की मृत्यु के बाद फडणवीस सरकार पर एकनाथ शिंदे का दबाव बढ़ जाने की आशंका जता रहे हैं लेकिन यदि सुनेत्रा उपमुख्यमंत्री बन गईं तब भाजपा देर सवेर उनकी पार्टी को भी अपने में मिलाने का प्रयास करेगी। कुल मिलाकर  पवार परिवार का राजनीतिक भविष्य अनिश्चितता में फंस गया है। शरद पवार के लिए ये स्थिति बेहद पीड़ादायक है क्योंकि भतीजे की बगावत के बाद भी परिवार की जो वजनदारी बनी हुई थी वह एक झटके में खत्म होने को आ गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी

No comments:

Post a Comment