Tuesday, 13 January 2026

ममता को केजरीवाल के हश्र से सबक लेना चाहिए


प. बंगाल में एक निजी प्रतिष्ठान आई - पैक के  कार्यालय और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के निवास पर ईडी के छापे के बाद राजनीतिक माहौल गर्मा गया। आई - पैक तृणमूल कांग्रेस के चुनाव अभियान का प्रबंधन भी देखता है। पहले प्रख्यात चुनाव विशेषज्ञ प्रशांत किशोर इसके मुखिया थे किंतु चुनावी राजनीति में उतरने के कारण वे इससे अलग हो गए। हालांकि इसके वर्तमान प्रमुख  प्रतीक  का नाम प. बंगाल के कोयला तस्करी घोटाले से जुड़ा हुआ है किंतु राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव के कुछ माह पहले ईडी के छापे को राजनीतिक प्रतिशोध का नाम दिया जा रहा है। छापे के दौरान राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी का प्रतीक के निवास पर पहुंचकर उसके  फोन सहित एक फाइल उठाकर ले आने के बाद इस प्रकरण में नया मोड़ आ गया। सुश्री बैनर्जी का कहना है कि ईडी ने कोयला घोटाले के नाम पर उनकी चुनाव रणनीति से जुड़े दस्तावेज जप्त करने छापा मारा जबकि ईडी का कहना है कि उसकी  कार्रवाई संदर्भित घोटाले की जांच से ही जुड़ी हुई थी। ममता जो फाइल उठाकर लाईं उसके बारे में चर्चा है कि उसमें घोटाले का काला चिट्ठा समाया हुआ था। ऐसे  में एक मुख्यमंत्री का छापे के दौरान जाकर कोई दस्तावेज उठा लाना तमाम संदेहों को जन्म देता है। ईडी ने अदालतों में उनके इसके विरुद्ध शिकायत की है। लपेटे में प. बंगाल के डीजीपी सहित कुछ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी आ रहे हैं जिन  पर आरोप है कि वे केंद्रीय एजेंसी को उचित संरक्षण प्रदान करने के बजाय जरूरी दस्तावेज उठाकर ले गए।  छापे के समय  और औचित्य पर बेशक सवाल उठाए जा सकते हैं। ईडी के दुरुपयोग के बारे में सर्वोच्च न्यायालय भी टिप्पणी कर चुका है किंतु ममता ने इस मामले में जिस प्रकार का हस्तक्षेप किया उसके बाद उन पर उंगलियां उठना भी स्वाभाविक है। ये पहला अवसर नहीं है जब उन्होंने केंद्रीय एजेंसी के काम में रुकावट पैदा की। कुछ साल पहले सीबीआई टीम के तत्कालीन डीजीपी से पूछताछ करने कोलकाता पहुंची तब ममता भी उनके यहां जा पहुंची और सीबीआई के कार्य में व्यवधान डाला। बाद में उन्होंने राज्य में केंद्रीय जांच टीम के घुसने पर ही रोक लगा दी।  वर्तमान विवाद अदालत  जा पहुंचा है जिसमें ईडी ने मुख्यमंत्री सहित राज्य के डीजीपी और अन्य अधिकारियों पर डकैती जैसे गंभीर आरोप लगाए वहीं राज्य सरकार  भी जवाब में  हमलावर है। ऐसे में  वैधानिक पहलू पर  तो टिप्पणी उचित नहीं होगी किंतु सुश्री बैनर्जी लगातार भ्रष्टाचार के प्रकरणों में जिस प्रकार उलझती जा रही हैं उससे  निजी छवि के साथ ही तृणमूल कांग्रेस के प्रति भी आम जनता में नाराजगी बढ़ रही है। लगातार तीन चुनाव जीतने से उनका आत्मविश्वास आसमान छू रहा है । इसी के चलते वे केंद्र सरकार से दो - दो हाथ करने तत्पर रहती हैं। हालांकि ऐसा करने वाली वे अकेली गैर भाजपाई मुख्यमंत्री नहीं हैं किंतु उनके तेवर सदैव औरों से ज्यादा उग्र रहते हैं। इसके पीछे शायद उनका ये सोचना है कि उन्हें चुनाव में हरा पाना असम्भव है। लेकिन उन्हें ये याद रखना चाहिए कि आम आदमी पार्टी सुप्रीमो और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी  विशाल बहुमत के कारण मदमस्त होकर केंद्र से टकराव का मौका तलाशा करते थे। भ्रष्टाचार के विरोध में जनांदोलन करने के बाद राजनीति में उनका उदय धूमकेतु की तरह हुआ किंतु सत्ता में आने के बाद वे और उनके साथी भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझकर अंततः जेल भी गए। लेकिन नैतिकता की कसमें खाने वाले केजरीवाल ने बजाय इस्तीफा देने के जेल से सरकार चलाने का उदाहरण पेश करते हुए सत्ता के प्रति अपनी लालसा जगजाहिर कर दी । लेकिन दिल्ली के मतदाताओं ने गत वर्ष हुए चुनाव में उनको सत्ता ही नहीं अपितु विधानसभा तक से बाहर कर दिया। अपार लोकप्रियता के कारण खुद को अपराजेय समझने की भूल अतीत में लालू प्रसाद यादव और मायावती भी कर चुकी हैं जिसकी सजा जनता ने उन्हें दे दी। इन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। ममता बैनर्जी को ये गुमान है कि 30 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं के अलावा बंगाली अस्मिता के नाम पर वे चौथा चुनाव भी जीत जाएंगी किंतु ऐसा ही अति आत्मविश्वास बिहार में तेजस्वी यादव को था जो मुस्लिम - यादव गठजोड़ के बलबूते सत्ता हासिल करने का सपना देख रहे थे किंतु लालू परिवार पर भ्रष्टाचार की जो कालिख पुती है उसके कारण जनता ने उन्हें चारों खाने चित्त कर दिया। चुनाव के दौरान तेजस्वी भी सीधे मुंह बात नहीं करते थे। यद्यपि अभी से प.बंगाल के चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करना तो जल्दबाजी होगी किंतु ममता को लालू और केजरीवाल के पतन से सीख लेनी चाहिए जिनकी लोकप्रियता भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण मिट्टी में मिल गई।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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