Thursday, 15 January 2026

निर्यात में वृद्धि के आंकड़ों ने ट्रम्प टैरिफ की हवा निकाल दी




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को लगता था कि टैरिफ नामक ब्रह्मास्त्र चलाकर वे पूरी दुनिया को घुटनाटेक करवा लेंगे। अनेक देशों द्वारा उनकी धौंस के समक्ष समर्पण किए जाने से उनका हौसला बढ़ गया । जिसके बाद उन्होंने भारत पर 25 और 50 प्रतिशत टैरिफ थोपकर दबाव बढ़ाया। जब उसका भी असर नहीं हुआ तब हाल ही में 500 फीसदी टैरिफ का हौआ खड़ा कर भारत को रूस से तेल आयात करने से रोकने का प्रयास भी ट्रम्प ने किया जिसके लिए अमेरिकी संसद से प्रस्ताव भी पारित किया। टैरिफ सम्बन्धी हमले के बाद भारत का निर्यात कुछ समय के लिए गड़बड़ा गया क्योंकि अमेरिका ही हमारे लिए सबसे बड़ा बाजार रहा है। ट्रम्प का यही आरोप है कि सस्ते टैरिफ का लाभ उठाकर भारत तो अमेरिका में अपनी चीजें जमकर बेचता है परंतु वहां से उसका आयात तुलनात्मक तौर पर कम होने से अमेरिका को व्यापार घाटा होता है। ट्रम्प के टैरिफ रूपी दांव के बाद भारतीय रूपये का विनिमय मूल्य अमेरिकी डॉलर की तुलना में घटते हुए अपने निम्नतम स्तर पर आ गया। परिणामस्वरूप विदेशी निवेशकों ने भारत के बाजार से अपना धन निकालना शुरू किया। इस सबसे लगा कि भारत का आर्थिक ढांचा धराशायी होने को है। बढ़े हुए अमेरिकी टैरिफ का असर निर्यात और उत्पादन में गिरावट के तौर पर महसूस होने लगा। लेकिन भारतीय निवेशकों ने शेयर बाजार में जबर्दस्त निवेश करते हुए उद्योग - व्यवसाय को पूंजी के संकट से बचा लिया। हालांकि शेयर बाज़ार वैश्विक हालातों से प्रभावित होकर पहले जैसी छलांग तो नहीं लगा रहा परन्तु गिरावट भी इतनी नहीं कि चिंता में डूबा जाए। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने बड़ी ही चतुराई से अमेरिका से अलग बाजार खोजना शुरू किया। सबसे पहले ब्रिटेन से मुक्त व्यापार संधि हुई। और अब तो दुनिया भर के अनेक छोटे और बड़े देशों के साथ व्यापार समझौते हो रहे हैं। जर्मनी , इटली , फ्रांस , ऑट्रेलिया , न्यूजीलैंड और बेल्जियम जैसे संपन्न देशों के अलावा अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों के साथ भारत ने व्यापार संधियां कर अपने निर्यात का विकेंद्रीकरण कर लिया। इसी का सुपरिणाम उन आंकड़ों में परिलक्षित हो रहा है जिनके अनुसार मौजूदा वित्तीय वर्ष में भारत का निर्यात 850 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है जो ऐतिहासिक होगा। यही नहीं ऊंचे टैरिफ के बावजूद अप्रैल से दिसंबर 2025 तक भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में भी लगभग 10 फीसदी की वृद्धि हुई। रोचक बात ये है कि डॉलर के मुकाबले भारतीय रूपये की विनिमय दर में गिरावट का सकारात्मक परिणाम निर्यातकों को हुए लाभ के रूप में देखने मिला। इसी सबके बल पर ट्रम्प के टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालने में भारत सक्षम हो सका। रूस से तेल सहित सैन्य सामग्री नहीं खरीदने का जो दबाव ट्रम्प ने बनाया उसे भी भारत ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जो हमारी ठोस आर्थिक स्थिति का संकेत है। टैरिफ युद्ध की शुरुआत में दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां भारत की वार्षिक विकास दर के अनुमानों को संशोधित कर 6 फीसदी से नीचे आने की भविष्यवाणी करने लगी थीं किंतु दिसम्बर खत्म होते तक उन्हें अपनी राय बदलनी पड़ी । भारतीय रिजर्व बैंक ने तो जीडीपी में 7.5 फीसदी से अधिक वृद्धि की उम्मीद जताई किंतु वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पैनी नजर रखने वाली एजेंसियों ने भी कम से कम 6.5 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान लगाया है। उल्लेखनीय है इनमें अमेरिका की क्रेडिट एजेंसियां भी हैं जहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बता चुके हैं जिसका समर्थन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी किया था। बहरहाल अब जबकि वित्तीय वर्ष समाप्त होने में महज ढाई माह शेष है तब न तो केंद्र सरकार घबराहट में है और न ही उद्योग व्यापार जगत में चिंता नजर आ रही है। दिसंबर के दौरान निर्यात में कुछ कमी आने से व्यापार घाटा बढ़ा जरूर किंतु पूरे वर्ष के संभावित आंकड़े पिछले साल से बेहतर होने की उम्मीद से ट्रम्प टैरिफ के कारण भारत का निर्यात चौपट होने की आशंका गलत साबित हो रही है । आपदा में अवसर का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भारत वैकल्पिक बाजार खोजकर अमेरिकी दबाव से उबर गया। इसीलिए व्यापार संधि के लिए चल रही वार्ता में अमेरिका के दबावों के सामने हम झुके नहीं। ट्रम्प की बौखलाहट का एक बड़ा कारण ये भी है।

- रवीन्द्र वाजपेयी 

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