जब अयोध्या में राम मंदिर बनाने की बात चली तब एक वर्ग उसकी आलोचना करते हुए उस पैसे का उपयोग विद्यालय, शौचालय और ऐसे ही अन्य कार्यों पर खर्च करने की वकालत करने लगा। ऐसे लोगों को बीते दो - तीन दिनों में देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या देखकर अपनी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए। बीते साल के अंतिम और वर्ष 2026 के प्रथम दिवस देश के प्रमुख धर्मस्थलों पर श्रद्धालुओं का सैलाब बदलते भारत का चित्र है । वैसे तो 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला वर्ष ईसाइयत से जुड़ा हुआ है लेकिन इस दिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर , तिरुपति बालाजी, अयोध्या के राम लला, वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर , शिरडी के साईं मंदिर और उज्जैन के महाकाल परिसर में भी दर्शनार्थियों की भीड़ ने नया कीर्तिमान बना दिया। इसके अलावा पवित्र नदियों के तट पर भी उत्सव का माहौल देखने मिला। जगन्नाथ पुरी और कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक पर भी सामान्य दिनों से अधिक पर्यटक जुटे। इससे साबित हुआ कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में धार्मिक स्थल भी महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं । अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन हेतु औसतन 50 हजार से 1 लाख भक्तजन आते हैं । ये संख्या पर्वों पर लाखों का आंकड़ा पार कर जाती है। 2026 शुरू होने के पहले अयोध्या के सारे होटल , धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस आरक्षित चुके थे। लगभग यही स्थिति वाराणसी, उज्जैन, शिरडी, तिरुपति आदि की रही। काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल परिसर को विकसित करने के विरोध में भी खूब राजनीति हुई। लेकिन कार्य पूर्ण हो जाने पर पूरा विरोध ये देखकर शांत हो गया कि उनमें आने वालों की संख्या में अकल्पनीय वृद्धि हुई और वह भी अन्य शहरों से। उल्लिखित सभी स्थलों में होटल और टैक्सी जैसे व्यवसाय के साथ ही पूजन सामग्री विक्रेताओं का भी कारोबार जमकर चलने लगा। यहाँ तक कि ऑटो रिक्शा वालो की कमाई भी बढ़ी। वाराणसी में साड़ियों के अलावा गलीचों के कारोबारी भी विश्वनाथ परिसर के विकास के बाद अपने व्यवसाय में वृद्धि से प्रसन्न हैं। उज्जैन में महाकाल परिसर इलाके में जिनके मकान हैं उनमें से बहुतों ने गेस्ट हाउस नुमा व्यवस्था कर आय का स्रोत पैदा कर लिया। एक मोटे अनुमान के अनुसार उज्जैन में फूल - माला बेचने वालों की संख्या में हजारों की वृद्धि हुई है। म.प्र में ही महाकाल के अलावा ओंकारेश्वर को भी नया स्वरूप दिये जाने के बाद वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यही सब देखकर केंद्र सरकार ने देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का विकास करने की योजना बनाई है जिनमें गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर भी है। वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर बेहद संकरे स्थान में होने से श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफ होती है। एक - दो बड़े हादसों के बाद उ.प्र सरकार ने उसके भी समुचित विकास का निर्णय किया है। भारत में धार्मिक आस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद नई पीढ़ी में धर्म के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है। लेकिन धर्मस्थलों पर पुराने जमाने की लचर व्यवस्थाओं की वजह से युवा वहाँ जाने से कतराते थे। लेकिन जिन - जिनको नया स्वरूप दिया गया उनमें युवा दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि विकास पर किये गए खर्च का औचित्य सिद्ध कर रही है। हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि धार्मिक यात्रा को पर्यटन का स्वरूप दिये जाने से धर्मस्थलों की पवित्रता और काफी हद तक मर्यादा नष्ट होती है। उत्तराखंड के चार धामों की सड़कें विकसित होने के बाद वहाँ तीर्थयात्रियों की संख्या साल दर साल बढती जाने से पर्यावरण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। लेकिन इन यात्राओं का पेशेवर तरीके से प्रबंध किया जाए तो उसका हल हो सकता है। जमीनी सच्चाई ये है कि सदियों पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को समय के साथ यदि दुरुस्त किया जाए तो धार्मिक स्थलों के जरिये रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास संभव है। भारत सरकार को चाहिए सभी राज्यों से प्रमुख धर्मस्थलों की सूची लेकर उनको विकसित करने की कार्य योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे मूल स्वरूप को छेड़े बिना वहाँ आने वालों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। हालिया अनुभव बताते हैं कि विकसित धार्मिक स्थलों पर दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि से अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला। अयोध्या से युवाओं का पलायन रुकना इसका प्रमाण है।घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी ये कदम सहायक साबित होगा इसमें दो मत नहीं हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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