दावोस में विश्व आर्थिक फोरम की बैठक के पहले ग्रीनलैंड के मामले में यूरोपीय देशों से नाराज डोनाल्ड ट्रम्प की अकड़ कम हो गई। ग्रीनलैंड पर कब्जे की उनकी पेशकश का जिन यूरोपीय देशों ने विरोध किया उन सभी पर 10 प्रतिशत टैरिफ थोपने के फैसले से भी वे पीछे हटते दिख रहे हैं। ट्रम्प के अनुसार उन्होंने ग्रीनलैंड के भविष्य का खाका तैयार किया है इसलिए अब वे हमला कर उस पर कब्जा नहीं करेंगे। उनके इस ऐलान के पहले ये लग रहा था कि ग्रीनलैंड के बारे में भी वे वेनेजुएला जैसा ही कुछ करेंगे। लेकिन दावोस पहुंचते ही उनका निर्णय पूरी तरह उलट गया। ऐसे में वहां उपस्थित हर किसी के मन में ये सवाल उठ खड़ा हुआ कि सैन्य शक्ति के बल पर ग्रीनलैंड को हड़पने की धमकी दे रहे ट्रम्प का नजरिया एकाएक कैसे बदल गया? विश्व राजनीति के जानकारों के लिए उनका इस तरह पलटी मार जाना चौंकाने वाला था। हालांकि बीते एक साल में उन्होंने जितनी बार कदम आगे बढ़ाकर पीछे खींचे उसे देखते हुए ग्रीनलैंड को लेकर उनके रवैये में आए बदलाव में नया कुछ भी नहीं है । और ये कहना भी मुश्किल है कि वे इस पर कितने समय तक कायम रहेंगे । लेकिन दूसरी तरफ देखें तो ट्रम्प की ऐंठ में कमी की एक वजह दावोस में अनेक देशों के नेताओं द्वारा दिए गए भाषण भी थे जिनमें उनकी आलोचना करते हुए उसका समुचित उत्तर देने की हिम्मत दिखाई गई। फ्रांस के राष्ट्रपति ने तो ट्रम्प की हरकतों को गुंडागर्दी तक कह दिया। यूरोप के कुछ छोटे देशों के प्रतिनिधियों ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसलों पर जो तीखी प्रतिक्रिया दीं उनसे भी ट्रम्प चौकन्ने हो गए। उन्हें इस बात का अंदेशा हो गया कि ग्रीनलैंड पर हमलावर रुख से इस सम्मेलन में उन्हें यूरोपीय देशों का प्रखर विरोध झेलना पड़ सकता है। उस किरकिरी से बचने के लिए ही उन्होंने अपने रुख में नर्मी का प्रदर्शन किया। लेकिन एक बात जिसके कारण ट्रम्प की अकड़ में कमी दिखाई दी वह है यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा सम्मेलन के तुरंत बाद भारत जाकर मुक्त व्यापार संधि करने की घोषणा , जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स कहकर सनसनी मचा दी। उनके मुताबिक इस संधि से विश्व की बहुत बड़ी आबादी लाभान्वित होगी। इस ऐलान से ट्रम्प परेशान हो उठे क्योंकि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार संधि होने पर यूरोप और भारत दोनों उनके टैरिफ नामक अस्त्र से भयमुक्त हो जाएंगे और अमेरिका की साख और धाक दोनों को जबरदस्त धक्का पहुंचेगा। ट्रम्प इस बात को भांप गए कि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार संधि से दोनों एक दूसरे के बाजार में आसानी से पहुंच बना सकेंगे। परिणामस्वरूप दोनों के पास निर्यात के लिए विशाल उपभोक्ता बाजार होगा। इस संधि के हो जाने से भारत अमेरिकी टैरिफ के दबाव से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा क्योंकि 27 देशों में उसके लिए कारोबार के दरवाजे खुल जाएंगे। भारत और यूरोप की व्यापार भागीदारी अमेरिका की परेशानी की वजह बन सकती है और टैरिफ रूपी ट्रम्प की मनमानी चल नहीं पाएगी। उल्लेखनीय है ग्रीनलैंड पर ट्रंप की धमकियों की वजह से यूरोपीय यूनियन ने अमेरिका के साथ व्यापार संधि को अस्थायी तौर पर रोक दिया था । इसके कारण अमेरिका को बड़ा नुकसान होने की आशंका बढ़ गई क्योंकि इस संधि से अमेरिकी निर्यातकों को यूरोप में जीरो टैरिफ पर सामान बेचने का मौका मिलता। इसके रुक जाने से अमेरिका में महंगाई और बेरोगजारी बढ़ सकती है। वास्तविकता ये है कि अमेरिका पहले से ही चीन के साथ व्यापार विवाद में फंसा होने से यूरोप के साथ टकराव से बचना चाह रहा है। इन्हीं सब वजहों से ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। ट्रम्प समझ चुके हैं कि टैरिफ की वजह से दुनिया भर के देश उनके खिलाफ खड़े हो रहे हैं। उन्हें ये अंदाज भी नहीं था कि जो यूरोपीय देश कल तक अमेरिका की दया पर निर्भर थे वे भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि जैसा साहस दिखाकर अमेरिका को ठेंगा दिखा देंगे। वे जानते हैं कि अमेरिका की समूची संपन्नता उसके व्यापार पर निर्भर है। इसलिए जब उनको लगा कि अमेरिका की रीढ़ पर प्रहार होने लगा तब उन्होंने ग्रीनलैंड पर लचीला रुख दिखाना शुरू कर दिया। हालांकि बीते एक वर्ष में उनकी कार्यशैली इतनी अविश्वनीय रही है कि उन पर सहसा विश्वास नहीं होता किंतु यूरोपीय यूनियन ने जो चतुराई दिखाई उससे ये कहावत चरितार्थ हो गई कि दुनिया झुकती है झुकाने वाला चाहिए।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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