Wednesday, 28 January 2026

शंकराचार्य पद का विवाद सनातन धर्म के लिए अशुभ संकेत


प्रयागराज के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पद पर नियुक्ति का विवाद नए सिरे से गहरा गया। स्नान करने से रोके जाने पर वे भड़क उठे ।  प्रशासन द्वारा व्यवस्था के नाम पर की गई कड़ाई उन्हें अपमानजनक लगी। राज्य सरकार ने उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांग लिया,  वहीं संत समाज भी उनके पक्ष - विपक्ष में बंट गया। अविमुक्तेश्वरानंद जी के अनुयायियों को भी मेला प्रशासन और उ.प्र  सरकार द्वारा उनके साथ किया गया व्यवहार नागवार गुजरा। सोशल मीडिया पर एक तरफ जहां उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त करने वाले सक्रिय नजर आए तो दूसरी तरफ़ स्वामी जी की बखिया उधेड़ने वालों की भी बड़ी संख्या सामने आई। सबसे बड़ी बात ये रही कि चारों शंकराचार्यों तक में अविमुक्तेश्वरानंद जी की शंकराचार्य पद पर हुई नियुक्ति को लेकर मतैक्य नहीं दिखा। ये बात भी बाहर निकलकर आई कि न्यायालयीन रोक के कारण अखाड़ा परिषद द्वारा उनका पट्टाभिषेक नहीं होने  से उनकी नियुक्ति की पुष्टि नहीं हो सकी। यहां तक भी बात ठीक थी किंतु फ़िर अविमुक्तेश्वरानंद जी की बारे में अन्य धर्माचार्यों द्वारा की गई आलोचनात्मक टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में उन्होंने जो कटाक्ष किए उनकी वजह से सनातन धर्म में अखंड आस्था रखने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं को दुख हुआ। अविमुक्तेश्वरानंद जी के गुरु ब्रह्मलीन स्वामी स्वरूपानंद जी दो पीठों के शंकराचार्य थे। उनकी नियुक्ति भी विवाद में  घिरी रही। और अंत में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद उन्हें मान्यता मिली। कहा जाता है वे अपनी वसीयत में बद्रिकाश्रम पीठ के लिए अविमुक्तेश्वरानंद जी और द्वारिकापुरी के लिए स्वामी सदानंद जी को उत्तराधिकारी बना गए थे ।  द्वारिकापुरी के शंकराचार्य पद को लेकर तो विवाद नहीं हुआ किंतु अविमुक्तेश्वरानंद जी की नियुक्ति पर आपत्तियां दर्ज की गईं। जगन्नाथ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद जी ने भी इस नियुक्ति को गलत बता दिया जो  सबसे वरिष्ट हैं। चूंकि मामला न्यायालय के विचाराधीन है लिहाजा उसके वैधानिक पक्ष पर कुछ भी कहना उचित नहीं होगा किंतु ऐसे प्रकरण न्यायालय में जाने से सनातन धर्म का सम्मान कम होता है। शंकराचार्य का पद इस धर्म के अनुयायियों के लिए सर्वोच्च श्रद्धा का पात्र होता है। धर्म के बारे में उनके निर्देश अंतिम माने जाते हैं। आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों का उद्देश्य सनातन धर्म को संगठित और व्यवस्थित करना था। कालान्तर में अनेक उप पीठों का उदय हुआ और अब तो जगद्गुरु की उपाधि थोक के भाव बंटने  लगी है। महामंडलेश्वर की पदवी तो ऐसे - ऐसे लोगों को दी जा रही है जिनका सनातन परम्पराओं से कोई संबंध नहीं है। शंकराचार्यों का ये प्राथमिक दायित्व है कि वे सनातन से जुड़ी मर्यादाओं और नियमों के पालन  हेतु समाज की प्रेरित करें। ऐसा इसलिए आवश्यक है क्योंकि इन दिनों सनातन धर्म के विरुद्ध कुछ शक्तियां संगठित होकर दुष्प्रचार करने में जुटी हुई हैं। इसमें विदेशी हाथ होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के बेटे ने तो सनातन धर्म की  तुलना डेंगू और करोना से करते हुए उसे नष्ट करने की बात सार्वजनिक तौर पर कही जिसका समर्थन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे ने भी किया। ये दोनों क्रमशः तमिलनाडु और कर्नाटक सरकार में मंत्री भी हैं। आजकल जातिवाद के नाम पर भी सनातन धर्म के भीतर दीवारें खड़ी करने का अभियान विभिन्न राजनेताओं द्वारा जारी है। ऐसे में जरूरी है कि चार पीठों के शंकराचार्यों के बीच परस्पर सहयोग , सामंजस्य और सम्मान का भाव हो। इनके अलावा जो उप पीठें हैं उनके बारे में भी स्थिति स्पष्ट होना चाहिए जिससे  लोगों के मन में व्याप्त भ्रम दूर हो।  थोक के भाव जो जगद्गुरु नियुक्त किए जा रहे हैं उनकी भूमिका भी स्पष्ट हो ताकि उन्हें अपेक्षित सम्मान प्राप्त हो सके। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन्हें सनातन धर्म का सर्वोच्च धर्माचार्य माना जाता हो उनकी नियुक्ति का मामला धार्मिक मंचों से बाहर निकलकर अदालत में जाए जहां  उनको अपनी सत्यता साबित करने के लिए शपथपत्र देना पड़े। अविमुक्तेश्वरानंद जी का ये कहना सही है कि शंकराचार्य कौन है , ये राष्ट्रपति तक तय नहीं कर सकते ।लेकिन सनातन धर्म के सर्वोच्च पद की नियुक्ति का फैसला सर्वोच्च न्यायालय से हो , ये भी अटपटा लगता है। ऐसे विवादों के चलते ही लोगों के  मन में ये अवधारणा गहराई तक फैल गई है कि जो धर्मगुरु अपने ही मतभेद नहीं सुलझा पा रहे वे समाज को एकजुट रहने की प्रेरणा किस अधिकार से देंगे?


- रवीन्द्र वाजपेयी

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