महाराष्ट्र में नगर निगम चुनावों के जो परिणाम आए हैं उनका संकेत तो कुछ दिन पूर्व नगरपालिका चुनाव से ही मिल गया था जिनमें प्रदेश के सभी अंचलों में भाजपा का बढ़ता प्रभाव दिखाई दिया। गत दिवस 29 नगर निगमों में से 25 जीतकर पार्टी ने साबित कर दिया कि वह राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति है। चुनाव का सबसे बड़ा आकर्षण मुम्बई महानगरपालिका रही। लोकसभा चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत से दूर रखने में महाराष्ट्र की भी भूमिका थी। उसी आधार पर आशंका थी कि विधानसभा चुनाव में भाजपा और एकनाथ शिंदे की महायुति सरकार महा विकास अघाड़ी गठबंधन से पराजित हो जाएगी। लेकिन हुआ उल्टा और भाजपा के अकेले ही बहुमत के नजदीक पहुंचने से मुख्यमंत्री पद एक बार फिर देवेंद्र फडणवीस के हिस्से में आ गया। उसके पहले पार्टी हरियाणा में जीतकर लोकसभा चुनाव में मिली निराशा से उबर चुकी थी। महाराष्ट्र की सफलता ने हौसला और बुलंद किया जिसका प्रमाण दिल्ली और बिहार की शानदार जीत थीं। केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में भाजपा का महापौर बनने से उसका आत्मविश्वास और प्रबल हो गया। लेकिन महाराष्ट्र का मुकाबला आसान नहीं था। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के मिलाप के बाद माना जा रहा था कि मराठी माणुस की भावना उभारकर वे ठाकरे परिवार की धाक वापस जमा सकेंगे किंतु अब कहा जा सकता है कि मुंबई में इस परिवार की चौधराहट खत्म हो गई । भले ही उद्धव और राज की पार्टियां 71 सीटें जीतकर मजबूत विपक्ष बनकर उभरीं किंतु तीन दशक से ठाकरे परिवार की जीवन रेखा बनी रही मुंबई महानगरपालिका का हाथ से निकल जाना निराशा बढ़ाने वाला है। राज की पार्टी को तो ओवैसी से भी कम सीटें मिलने से उनकी भद्द पिट गई। हालांकि उद्धव गुट इस बात की खुशी मना रहा है कि उनको एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना को मिली 29 सीटों से ज्यादा 65 पर जीत मिली लेकिन महानगरपालिका हाथ से निकल जाने के बाद उद्धव के सामने सिवाय पछताने के और कुछ नहीं बचा, राज की राजनीति का भी ये पूर्णविराम है। देवेंद्र फडणवीस का चेहरा सामने रखकर भाजपा ने केवल ठाकरे परिवार के प्रभुत्व को ही समाप्त नहीं किया बल्कि शरद पवार के गढ़ भी ढहा दिए। इस चुनाव में शरद पवार और अजीत पवार ने गठजोड़ किया था किंतु चाचा - भतीजे का पुनर्मिलन भी मतदाताओं को रास नहीं आया। इस प्रकार इन चुनावों ने ठाकरे और पवार परिवारों की चमक फीकी कर दी। नागपुर में भी भाजपा की आंधी चली। इस चुनाव का फलितार्थ ये है कि भाजपा का जनाधार केवल मुसलमानों को छोड़कर महाराष्ट्र में समाज के सभी वर्गों में फैल चुका है। जहां तक बात कांग्रेस की है तो उसके हाथ भी कुछ नगर निगम लगी हैं परन्तु राज्य स्तर पर वह अपनी जमीन गंवाती लग रही है। उसके पास प्रभावशाली नेतृत्व का नितान्त अभाव है। दरअसल लोकसभा चुनाव में सफलता के बाद उसके प्रादेशिक नेता ग़र्राहट में आ गए। जिसकी वजह से इंडिया गठबंधन अस्तित्वहीन होकर रह गया। भले ही अनेक निगमों में कांग्रेस विपक्ष में हो किंतु उसकी दशा और दिशा दोनों बिगड़ चुकी हैं। इन चुनावों के बाद उद्धव ठाकरे और शरद पवार का बचा - खुचा कुनबा भी बिखरने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा । कांग्रेस भी आने वाले दिनों में और कमजोर होगी क्योंकि मुस्लिमों के बीच ओवैसी का बढ़ता प्रभाव उसकी लुटिया डुबो रहा है। विधानसभा के बाद स्थानीय निकायों में शानदार सफलता के बाद मुख्यमंत्री फडणवीस का कद काफी ऊंचा हो गया है। उन्होंने भाजपा को ठाकरे परिवार के आभामंडल से निकालकर उसकी स्वतंत्र हैसियत बनाने का वह कारनामा कर दिखाया जो स्व. प्रमोद महाजन जैसा तेज तर्रार नेता भी नहीं कर पाया था। उद्धव के सामने अब बची हुई पार्टी को सहेजना विकट समस्या होगी क्योंकि भविष्य अंधकारमय होने से उसमें भगदड़ अवश्यंभावी है। शरद पवार जहां इतिहास बनने के कगार पर हैं वहीं अजीत पूरी तरह भाजपा के रहमो करम पर हैं। कांग्रेस भी अपनी स्वनिर्मित समस्याओं में ही उलझी रहेगी। इन चुनावों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अन्य राज्यों में होने वाले चुनावी मुकाबलों पर पड़ना तय है। एक बात इन चुनावों से प्रमाणित हो गई कि अन्य राज्यों से आकर बसे लोगों के बीच अब भाजपा ही राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर स्वीकार्यता प्राप्त करती जा रही है। मुंबई में गुजरातियों के अलावा उत्तर भारतीय प्रदेशों के जो लोग रहते हैं उनका झुकाव तो भाजपा के प्रति दिखा ही लेकिन दक्षिण भारत के जो मतदाता मुंबईवासी हैं उन्होंने भी इस बार भाजपा की जीत में खासा योगदान दिया। कांग्रेस के लिए विचारणीय विषय ये भी है कि मतदाताओं ने वोट चोरी जैसे मुद्दों को भी एक बार फिर रद्दी की टोकरी में फेक दिया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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