लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि ईवीएम और मतदाता सूचियों में हेराफेरी के जरिए भाजपा चुनाव जीतती है। ये बात अलग है कि चुनाव आयोग द्वारा हलफनामा देखकर आरोप लगाने की चुनौती उन्होंने स्वीकार नहीं की। लेकिन वोट चोरी उनका प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। बिहार के चुनाव को तो इसी पर केंद्रित करने की पूरी कोशिश उनकी तरफ से की गई किंतु मतदाताओं ने उनके सारे आरोपों को नजरअंदाज करते हुए कांग्रेस को दहाई के भीतर ही समेट दिया । वहीं तेजस्वी यादव को भी हाशिया दिखा दिया। कर्नाटक में मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर भी श्री गांधी ने आरोप लगाए थे। इसके अलावा कांग्रेस ईवीएम मशीनों के विरुद्ध भी जमकर हल्ला मचाती रही है। प्रियंका वाड्रा तो लगभग हर सभा में मतपत्रों से चुनाव करवाने की चुनौती भाजपा को देती हैं। पार्टी के बाकी नेता भी इन दोनों की हां में हां मिलाते हुए वोट चोरी और ईवीएम का विवाद खड़ा करते रहते हैं। राहुल ये बात भी दोहराते हैं कि वोट चोरी न होती तब लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों तक भी नहीं पहुंचती। लेकिन बिहार चुनाव के बाद अन्य विपक्षी दल इस मुद्दे से कन्नी काटने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने भी खुलकर कहना शुरू कर दिया है कि बिहार में श्री गांधी ने जमीनी मुद्दों को उपेक्षित कर केवल वोट चोरी तक सिमटकर अपना और तेजस्वी दोनों का नुकसान कर लिया। मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (एस.आई.आर) का विरोध भी बेअसर साबित हुआ। कांग्रेस ने इसके विरोध में भी देशव्यापी आंदोलन किया किंतु उसका कोई प्रभाव जनमानस पर नहीं पड़ा। लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें जम्मू - कश्मीर और झारखंड छोड़कर हरियाणा तथा दिल्ली में पूर्ण रूपेण भाजपा जबकि महाराष्ट्र और बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की जीत हुई। चुनाव के बाद जम्मू - कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने तो खुलकर स्वीकार किया कि निष्पक्ष चुनाव के कारण ही उनकी सत्ता में वापसी हुई। इसी तरह झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी वोट चोरी या ईवीएम सम्बन्धी शिकायत नहीं की। यहां तक तो बात ठीक थी किंतु कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार द्वारा करवाए गए ताजा सर्वेक्षण में 80 प्रतिशत से अधिक लोगों ने जो राय व्यक्त की उसके मुताबिक लोकसभा चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हुए और ईवीएम का उपयोग पूरी तरह सही है। यहां तक कि सिद्धारमैया सरकार द्वारा स्थानीय निकायों के चुनाव मतपत्रों से कराने के फैसले की भी सर्वेक्षण में आलोचना की गई है। 102 विधानसभा क्षेत्रों में किया गया उक्त सर्वे राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के निर्देशन में संपन्न हुआ जिसकी रिपोर्ट राज्य सरकार ने ही सार्वजनिक की है। सर्वेक्षण में जिस बड़ी मात्रा में लोगों ने लोकसभा चुनावों की निष्पक्षता और ईवीएम के प्रति विश्वास जताया गया वह कांग्रेस विशेष रूप से श्री गांधी और श्रीमती वाड्रा के लिए बड़ा झटका कहा जा सकता है। यही नहीं ईवीएम के विरोध में झंडा उठाने वाले अन्य विपक्षी दलों के लिए भी ये सर्वे मुंह बंद करने वाला है। स्मरणीय है इसी साल प. बंगाल, असम , तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में कर्नाटक के सरकारी सर्वे ने ईवीएम को लेकर व्यक्त की जाने वाली शंकाओं को रद्दी की टोकरी में भी फेंक दिया है। हालांकि श्री गांधी इसके बावजूद भी अपनी रट लगाए रहेंगे। लेकिन इतने झटके खाने के बाद भी सच्चाई को स्वीकार करने तैयार नहीं हैं तो यही मानकर चलना होगा कि वे जनमानस को समझने में पूरी तरह विफल हैं। लोकतंत्र में चुनावी हार - जीत चलती रहती है। भाजपा आज भले सफलता के उच्चतम शिखर पर हो किंतु कभी वह भी लोकसभा में मात्र 2 सीटों पर सिमटकर रह गई थी। दरअसल कांग्रेस की समस्या ये है कि वह पराजय के कारणों का ईमानदारी से विश्लेषण कर अपनी गलतियां सुधारने के बजाय उन्हें दोहराती जा रही है। देखना ये है कि कर्नाटक की अपनी ही सरकार के सर्वेक्षण के बाद ईवीएम को लेकर राहुल और प्रियंका क्या रवैया अपनाते हैं?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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