Monday, 12 January 2026

अमेरिका की विश्वसनीयता को खतरे में डाल दिया ट्रम्प ने




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने का इरादा जताने के बाद पूरे यूरोप में दहशत का माहौल है। दूसरे  महायुद्ध की समाप्ति के बाद  भले ही हिटलर  के नाजीवाद का खतरा समाप्त हो गया लेकिन सोवियत संघ रूपी महाशक्ति के कारण यूरोप के अनेक देशों में भय व्याप्त था। उन्हें लग रहा था कि सोवियत संघ देर - सवेर साम्यवादी क्रांति का माहौल उन यूरोपीय देशों  में भी बनाए बिना नहीं रहेगा जो राजतंत्र के साथ ही प्रजातांत्रिक व्यवस्था को अपनाए हुए थे। चूंकि विश्वयुद्ध की  समाप्ति में अमेरिका की निर्णायक भूमिका थी और वह प्रजातंत्र का प्रतीक कहलाता था लिहाजा सोवियत संघ के प्रभाव से जो यूरोपीय देश मुक्त बने  रहे उन्होंने अमेरिका को अपना अघोषित नेता स्वीकार किया जिसके चलते 1949 में नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) का गठन हुआ। हालांकि 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ नामक संगठन भी अस्तित्व में आ चुका था जिसका उद्देश्य दुनिया भर के देशों को एक मंच पर एकत्र कर विश्व में स्थायी शांति स्थापति करना था। इसका मुख्यालय भी अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में स्थापित किया गया। लेकिन इसके बाद भी दुनिया को खेमों में बंटने से नहीं रोका जा सका। और 1949 में नाटो और  1954 में सीटो अमेरिका की अगुआई में बना । वहीं पूर्वी यूरोप के साम्यवादी व्यवस्था वाले कुछ देशों ने सोवियत संघ के झंडे तले वारसा संधि की जो 1991 में सोवियत संघ के बिखराव पर अस्तित्वहीन हो गई। सीटो भी 1977 में समाप्त हो गया किंतु नाटो अब तक बना हुआ है। उक्त सभी संगठन दरअसल सामूहिक सुरक्षा की गारंटी स्वरूप थे। अर्थात किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर माना जाएगा और मुकाबले के लिए सभी एक साथ खड़े होंगे। शीतयुद्ध नामक कालखंड में नाटो आदि काफी प्रासंगिक रहे किंतु कालांतर में इनका महत्व कम होता गया। कुछ साल पहले जब रूस ने यूक्रेन पर हमला तब उसका एक कारण यूक्रेन द्वारा नाटो की सदस्यता लेने की कोशिश भी थी। हालांकि वह कामयाब नहीं हो सकी। यद्यपि अमेरिका सहित नाटो सदस्यों ने उसे भरपूर सहायता दी। लेकिन जबसे ट्रम्प दोबारा सत्ता में आए तब से न  सिर्फ नाटो बल्कि राष्ट्र संघ के प्रति भी उनका उपेक्षा भाव सामने आने  लगा। हाल ही में उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन  के अलावा 24 संगठनों से अलग होकर राष्ट्र संघ को भी ठेंगा दिखा दिया। इसी के साथ ही नाटो को लेकर भी वे बेहद गैर जिम्मेदाराना टिप्पणियां करने लगे। यूक्रेन को ट्रम्प ने जो धोखा दिया उसकी वजह से उन यूरोपीय देशों में भय व्याप्त हो गया जो अमेरिका का  संरक्षण होने के कारण अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त थे। रूस द्वारा यूक्रेन के साथ ही कुछ और यूरोपीय देशों के इलाकों पर भी अपना दावा भी ठोककर उनकी चिंता बढ़ा दी। ऊपर  से ट्रम्प की नीतिगत अस्थिरता ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी। वेनेजुएला में ट्रम्प द्वारा की गई कार्रवाई से तो यूरोपीय देशों की क्षेत्रीय अखंडता पर कोई असर नहीं पड़ा इसलिए वे शांत रहे लेकिन ज्योंही ट्रम्प ने डेनमार्क आधिपत्य वाले ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की मंशा जताई त्यों ही समूचा यूरोप विचलित हो उठा । सबसे पहले डेनमार्क ने नाटो छोड़ने की धमकी दी। उसके बाद जर्मनी सहित अनेक देश खुलकर अमेरिका का विरोध  करने लगे। उनका मानना है कि यदि ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को कब्जाने की जिद पूरी की तो रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले को भी आधार मिल जाएगा। क्या होगा फ़िलहाल कहना कठिन है किंतु ट्रम्प अपने विरोधियों के प्रति सख्ती बरतें तो समझ में भी आता है लेकिन  अमेरिका  के मित्रों के साथ भी उनका रवैया यदि शत्रुतापूर्ण हो जाए तब फिर ये कहना गलत नहीं होगा कि वे किसी भी तरह से भरोसे के लायक नहीं हैं। बीते एक साल में अमेरिका को आर्थिक बदहाली के कगार पर ला खड़ा करने के अलावा उन्होंने उसकी साख और धाक दोनों मिट्टी में  मिला दी। यही कारण है कि महाशक्ति का रुतबा अमेरिका खोता जा रहा है। बीते एक वर्ष में ट्रम्प के निर्णय और नीतियों के अलावा उनका आचरण देखते हुए ये कहा जा सकता है कि वे अमेरिका के सबसे घटिया राष्ट्रपति साबित हो रहे हैं। बड़ी बात नहीं जिस तरह गोर्बाचोव ने सोवियत संघ को पतन के रास्ते पर धकेला वैसे ही ट्रम्प भी अमेरिका की बर्बादी का कारण बन जाएं।

- रवीन्द्र वाजपेयी 



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