Monday, 5 January 2026

ट्रम्प ने दुनिया को अराजकता के कुएं में धकेल दिया



 दूसरे विश्व युद्ध के बाद अनेक अवसर ऐसे आए जब अमेरिका ने किसी देश में घुसकर हस्तक्षेप किया। साठ के दशक में क्यूबा पर अमेरिकी हमले की आशंका में सोवियत संघ की जवाबी मोर्चेबंदी ने दो परमाणु शक्तियों के बीच टकराहट के आसार उत्पन्न कर दिए थे। उसके बाद वियतनाम और अफगानिस्तान में अमेरिका ने लंबे समय तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई किंतु उसे अपना डेरा समेटना पड़ा। लैटिन अमेरिका के देशों के साथ तो उसकी कभी नहीं पटी। क्यूबा के अलावा अन्य देशों पर भी उसकी कोप दृष्टि रही। मेक्सिको से आने वाले घुसपैठिए जहां समस्या बने हुए हैं वहीं कोलंबिया सहित लैटिन देशों से उसकी शिकायत नशीले पदार्थों के कारोबार को लेकर है। ब्राजील के ब्रिक्स नामक संगठन में शामिल होने से अमेरिका चिढ़ता है। पनामा के साथ पनामा नहर के स्वामित्व संबंधी उसका विवाद है। लेकिन जबसे डोनाल्ड ट्रम्प दोबारा सत्ता में आए तबसे पूरी दुनिया में थानेदारी दिखाने में जुटे हैं। पड़ोसी कैनेडा पर वे अमेरिका में शामिल होने का दबाव बनाते हैं वहीं ग्रीनलैंड पर कब्जे की इच्छा भी व्यक्त करते हैं। ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने उन्होंने अपने सबसे मजबूत विमान भेज दिए। वहीं मलबे का ढेर बन चुके गाजा पर उनकी नजर है। पाकिस्तान को उनका संरक्षण केवल इसलिए मिल रहा है जिससे बलूचिस्तान के बेशकीमती खनिजों पर कब्जा हो जाए। ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने सात लड़ाइयां रुकवाईं । लेकिन यूक्रेन और रूस की जंग को रुकवाने के लिए उन्होंने जो उपाय सुझाया उसमें रूस द्वारा कब्जाए इलाके छोड़ने के अलावा यूक्रेन को पूरी तरह निहत्था होने मजबूर करना है। इस सबका कारण है अमेरिका की कर्ज के बोझ से कराह रही अर्थव्यवस्था। दुनिया भर में सरकारों द्वारा सोने और चांदी की जबरदस्त खरीद का कारण डॉलर के वर्चस्व से मुक्त होने की तैयारी है। इससे भयभीत ट्रम्प ने टैरिफ रूपी हथियार का उपयोग कर दादागिरी को बनाए रखना चाहा जो चीन और भारत जैसे देशों के नहीं झुकने से अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सका। बौखलाहट में ट्रम्प ने वेनेजुएला नामक लैटिन अमेरिकी देश में घुसकर राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी को उठवाकर न्यूयॉर्क के जेल में बंद कर दिया । अमेरिका काफी समय से आरोप लगा रहा था कि वे नशीले पदार्थों को तस्करी के जरिए अमेरिका भेजने वालों को संरक्षण दे रहे हैं। ट्रम्प ने वेनेजुएला को कच्चा तेल बेचने से भी रोक रखा था जो उसकी आय का एकमात्र साधन है। मादुरो पर भी चुनाव में धांधली करने का वैसा ही आरोप मढ़ा जाता रहा जैसा बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना पर लगाकर वहां विद्रोह भड़काया गया। मादुरो पर ट्रम्प के आरोप जांच का विषय है किंतु जिस तरह से उनको बलात अमेरिका ले आया गया वह सवाल खड़े करने वाला है। सही बात ये है कि कच्चे तेल का अकूत भंडार होने के कारण संपन्नता के शिखर पर पहुंचने के बाद ये देश गलत नीतियों से कंगाली की स्थिति में जा पहुंचा। जितनी सरलता से अमेरिका मादुरो को उठा ले गया उससे ये बात सामने आ गई कि वे बिना प्रतिरोधक शक्ति के ही उस को चुनौती देने की मूर्खता कर बैठे। साम्यवादी होने के कारण उन्हें चीन से हथियार मिलते रहे किंतु उनका उपयोग करने का अवसर ही अमेरिका ने उसे नहीं दिया। इससे ये हकीकत भी उजागर हो गई कि चीन अपने अड़ोस - पड़ोस में भले ही रौब दिखाता फिरे किंतु हजारों मील दूर बैठे अपने समर्थक की मदद करना उसके बस में नहीं। रूस भी यूक्रेन में फंसे रहने से जुबानी प्रतिरोध से ज्यादा कुछ नहीं कर सका। वैसे भी यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए युद्ध छेड़ने के बाद वह भी अपराधबोध से भी ग्रसित है। वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई के बाद सत्ता का स्वरूप क्या होता है ये अनिश्चित है क्योंकि जिस उपराष्ट्रपति को कार्यकारी शासक बनाया गया उसने भी अमेरिकी दबाव के सामने झुकने से इंकार कर दिया जिसके बाद ट्रम्प ने उन्हें भी धमकी दे डाली। इन सबसे हटकर एक बात स्पष्ट है कि अमेरिका द्वारा उठाया गया कदम वेनेजुएला के तेल भण्डार का दोहन कर अपनी खस्ता आर्थिक स्थिति सुधारना है। लेकिन अब ट्रम्प रूस द्वारा यूक्रेनी जमीन पर कब्जा करने को किस मुंह से गलत ठहराएंगे ? उनके इस फैसले ने चीन द्वारा ताइवान पर जबरन कब्जा करने का रास्ता भी साफ कर दिया है। उल्लेखनीय है पोलैंड और डेनमार्क सहित अनेक यूरोपीय देश इस आशंका में डूबे हैं कि कहीं रूस उनके साथ भी यूक्रेन जैसा सलूक न करे। कुल मिलाकर ट्रम्प ने वैश्विक व्यवस्था को अराजकता के कुएं में धकेलने का जो दुस्साहस किया वह बड़ी मछली द्वारा छोटी को निगलने के सिद्धांत को मान्यता प्रदान करेगा। ऐसे में यदि भारत पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर अपना कब्जा स्थापित कर ले तब उसे रोकने वाला कौन होगा ? ट्रम्प ने जो कुछ भी लिया उसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की उपयोगिता भी सवालों के घेरे में आ गई है। उन छोटे देशों का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है जिनके पास अपनी सुरक्षा के समुचित प्रबंध नहीं हैं। ऐसे में भारत द्वारा बीते एक दशक में अपने सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों की सार्थकता साबित होती जा रही है क्योंकि किसी भी देश को अपना अस्तित्व बचाने के लिए केवल आर्थिक विकास ही नहीं अपितु सामरिक शक्ति की भी ज़रूरत है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


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