Thursday, 22 January 2026

अफसरशाही खराब कर रही म.प्र सरकार की छवि


म.प्र में भाजपा सरकार के पास  भारी - भरकम बहुमत है। पार्टी का संगठन भी बेहद मजबूत है। तीसरी  शक्ति न होने से कांग्रेस के साथ सीधा मुकाबला  है । लेकिन विपक्ष के  पास सक्षम नेतृत्व नहीं होने से वह सरकार की वैसी घेराबंदी नहीं कर पा रहा जैसी जनता अपेक्षा करती है। यही वजह है कि 2003 से मात्र 15 महीने छोड़कर भाजपा लगातार प्रदेश की सत्ता पर काबिज है। 2023 के चुनाव के पहले राजनीतिक विश्लेषक दावा कर रहे थे कि भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा किंतु तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना के  कारण वह बड़े बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। लेकिन पार्टी हाईकमान ने मुख्यमंत्री पद  डॉ. मोहन यादव को सौंपकर सभी को चौंका दिया।  भाजपा ने अन्य राज्यों में भी इसी तरह नए चेहरों को सत्ता सौंपकर वैकल्पिक नेतृत्व विकसित करने की कार्ययोजना को आगे बढ़ाया। म.प्र में इसका सुपरिणाम कुछ महीने बाद हुए लोकसभा चुनाव में देखने मिला जब भाजपा ने प्रदेश की सभी 29 सीटों पर जीत हासिल कर कीर्तिमान स्थापित किया। उल्लेखनीय है 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा  छिंदवाड़ा में कमलनाथ के किले को नहीं ढहा सकी किंतु डॉ. यादव के नाम वह उपलब्धि भी दर्ज हो गई जब श्री नाथ के सांसद पुत्र नकुल नाथ भी हार गए। इस जीत से मुख्यमंत्री का कद आलाकमान की नजर में और ऊंचा हो गया। अन्य  राज्यों के चुनावों में उनको बतौर स्टार प्रचारक भेजा गया । धीरे - धीरे सत्ता पर उनकी पकड़ दिखने लगी। अपने पूर्ववर्ती शिवराज सिंह की शैली को अपनाते  हुए उन्होंने भी भोपाल स्थित सचिवालय  से सरकार चलाने की बजाय पूरे प्रदेश का भ्रमण करते हुए अपनी पहचान बनाने में सफलता हासिल की। लेकिन पिछले कुछ समय में ही ऐसी घटनाएं हो गईं जिनके चलते प्रदेश सरकार कठघरे में खड़े होने मजबूर हो गई। इनमें सर्वाधिक चर्चित रही इंदौर में दूषित पेयजल से हुईं मौतें जिनकी वजह से म.प्र देश भर में बदनाम हुआ। दूसरी जिस घटना से मोहन सरकार पर हमले हो रहे हैं वह है राजधानी भोपाल में नगर  निगम के कसाईखाने में अवैध रूप से बड़े पैमाने पर गायों का काटा जाना। जबकि नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। तीसरी बात मोहन सरकार के लिए मुसीबत खड़ी करने वाली है मंत्री विजय शाह द्वारा एक मुस्लिम महिला सैन्य अधिकारी के बारे में की गई टिप्पणी से उठा विवाद । सर्वोच्च न्यायालय ने श्री शाह के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश देकर मुख्यमंत्री को परेशानी में डाल दिया क्योंकि उनके द्वारा आदिवासी कार्ड खेले जाने की आशंका के कारण ही अब तक उन्हें बचाया जाता रहा । लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सख्त रवैये के बाद मुख्यमंत्री कब तक उन्हें अभयदान देते रहेंगे ये बड़ा सवाल है। इंदौर में दूषित पेयजल से हुईं दर्जनों मौतों के साथ ही भोपाल में गायों को काटे जाने जैसी घटनाओं से जुड़ी जो जानकारियां आईं उनसे ये एहसास हो रहा है कि राजनीतिक नेतृत्व पर नौकरशाही भारी पड़ रही है। मुख्यमंत्री के विदेश में होने के दौरान मुख्य सचिव द्वारा  जिला स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों की आभासी बैठक में भ्रष्टाचार को लेकर जो कुछ कहा गया वह इस आरोप की पुष्टि करने पर्याप्त है कि सरकार की अफसरशाही पर पकड़ ढीली पड़ रही है। इन्दौर में हुई मौतों के बाद महापौर ने साफ किया कि पाइप लाइन सुधार संबंधी टेंडर प्रक्रिया को अधिकारियों ने महीनों रोके रखा। भोपाल में भी महापौर  अधिकारियों पर लापरवाही का आरोप लगा रही हैं। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि इंदौर और भोपाल सहित प्रदेश के सभी बड़े शहरों में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर बैठे ज्यादातर अधिकारी  स्थानीय नेताओं के  अलावा निर्वाचित जनप्रतिनिधियों तक को भाव नहीं देते। वैसे शिवराज सिंह के जमाने से ही नौकरशाही के जरिए सरकार चलाने की शैली विकसित हो चुकी थी जिसे डॉ. यादव भी जारी रखे हुए हैं। प्रदेश के अनेक प्राधिकरण, निगम , मंडल अफसरों द्वारा नियंत्रित हैं। भाजपा के नेता कई सालों से इनमें नियुक्ति का इंतजार करते थक गए। अनेक मर्तबा तो संभावित सूची तक प्रसारित हो गई किंतु हुआ कुछ नहीं। यहां तक कि जनसंपर्क विभाग की तमाम समितियों में भी पत्रकारों की जगह अफसरशाही को ही बिठा दिया गया है। शासन द्वारा दिए जाने वाले सम्मान और पुरस्कार भी ठंडे बस्ते में डाल दिए गए क्योंकि अधिकारी नहीं चाहते। मुख्यमंत्री पद पर दो वर्ष पूर्ण करने के बाद डॉ. यादव को चाहिए वे अफसरशाही पर लगाम कसें वरना इंदौर और भोपाल जैसे हादसे उनकी मेहनत पर पानी फेरते रहेंगे। उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये नौकरशाह किसी के सगे नहीं होते। आज यदि डॉ. यादव और उनके मंत्री सत्ता में हैं तो अफसरशाही की बजाय उन कार्यकर्ताओं की बदौलत जो चुनाव  में अपना पसीना बहाकर पार्टी को जीत के रास्ते पर ले जाते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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