महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावों के बाद भाजपा का हौसला बुलंद है। लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद पार्टी जिस तेजी से उबरी वह उसके नेतृत्व और संगठन की कुशलता का प्रमाण है। बिहार की जीत के बाद उसने बजाय बिना देर किए प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल के लिए व्यूह रचना शुरू कर दी। फिलहाल असम में ही उसकी सरकार है। ताजा आकलन में वहां भाजपा की वापसी संभव है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की छवि भी योगी आदित्यनाथ जैसी बन जाने से मतदाताओं का जो सामाजिक ध्रुवीकरण हुआ उससे भाजपा फायदे में है। वहीं प. बंगाल में ममता बैनर्जी के क़िले को ध्वस्त करने के उसके इरादे बेहद मजबूत हैं। 2021 में भी भाजपा जबरदस्त उत्साह में थी लेकिन ममता को नंदीग्राम सीट पर हराने के बाद भी वह सत्ता से वंचित रही। यद्यपि 3 से बढ़कर 73 विधायकों तक पहुंचने से मुख्य विपक्षी दल बन गई। कांग्रेस और वामदलों का पूरी तरह सफाया होने से ममता और भाजपा सीधे मुकाबले में हैं। इस बार भाजपा और भी आक्रामक है किंतु 2021 के बाद ममता भी शांत नहीं बैठीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बहुत ही लचर रहा। इसीलिए कहा जाता है कि बांग्लादेश की घटनाओं की प्रतिक्रियास्वरूप हिंदुत्व के उभार के बावजूद 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के बल पर ममता वापसी करेंगी। फिर भी भाजपा ने प. बंगाल में खुद को एक विकल्प के तौर पर स्थापित कर लिया। जहां तक बात तमिलनाडु की है तो शहरों में तो लोग पार्टी को जानने लगे किंतु गांवों में उसका प्रभाव नहीं है। इसीलिए वह गठबंधन करने में जुटी है ताकि सम्मानजनक स्थिति में आ सके। पुडुचेरी छोटा सा राज्य है जहां साझा सरकार में वह हिस्सेदार है। लेकिन वहां के समीकरणों के बारे में कुछ भी कहना कठिन है। रही बात केरल की तो रा.स्व.संघ की जड़ें मजबूत होने से भाजपा वहां तीसरी ताकत बन चुकी है। लोकसभा के एकमात्र सांसद सुरेश गोपी के अलावा राज्यसभा सदस्य जॉर्ज कुरियन को केंद्र में मंत्री बनाकर पार्टी ने केरल में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। जिसका प्रमाण राजधानी तिरुवनंतपुरम की नगरनिगम उसका महापौर बनना है। राज्य में मुस्लिम वर्चस्व से भयभीत ईसाई समुदाय भी भाजपा की ओर आकृष्ट हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री ए. के. एंटोनी के बेटे अनिल एंटोनी के भाजपा में शामिल होने से इसके संकेत मिलने लगे थे। आगामी चुनाव में पार्टी को उम्मीद है कि वह विधानसभा में दहाई का आंकड़ा छू लेगी। इसके अलावा अनेक सीटों पर उसके द्वारा हासिल किए जाने वाले मत कांग्रेस और वामपंथी मोर्चे की हार - जीत को प्रभावित करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प. बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल का दौरे शुरू भी कर दिए हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की प्रमुख विरोधी कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को जारी नहीं रख पाई। उसके बाद जितने राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए उनमें पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इंडिया गठबंधन में भी लोकसभा चुनाव के बाद बिखराव आया जिसकी शुरुआत हरियाणा से हुई। हालांकि महाराष्ट्र में महा विकास आघाड़ी नामक गठबंधन में तमाम पार्टियों ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा किंतु लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराने में कामयाबी नहीं मिली जबकि भाजपा ने एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के साथ मिलकर ऐतिहासिक सफलता हासिल कर ली। इस चुनाव में भी कांग्रेस के हाथ निराशा लगी। उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने एकला चलो की नीति अपनाई वहीं ममता बैनर्जी और अखिलेश यादव ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया। यहां भी बाजी भाजपा ने मारी। जबकि कांग्रेस दयनीय स्थिति से नहीं उबर सकी और लगातार तीसरी बार उसके खाते में शून्य आया। उसके बाद हुए बिहार चुनाव में राहुल गांधी वोट चोरी का ढोल पीटते हुए उतरे। लेकिन तेजस्वी यादव से गठबंधन के बाद भी सामंजस्य नहीं बैठने से परिणाम निराशाजनक रहा। कांग्रेस खुद भी डूबी और लालू परिवार की राजनीति पर भी ग्रहण लग गया। महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय के हालिया चुनावों में भी कांग्रेस विपक्षी गठबंधन नहीं बना सकी। जिसका लाभ भाजपा को मिला। मुंबई इसका उदाहरण है। कुछ महीनों बाद होने वाले मुकाबलों में कांग्रेस केवल असम और केरल में ही दौड़ में है। प. बंगाल में वह पूरी तरह से हाशिए पर है वहीं तमिलनाडु में द्रमुक के साथ गठजोड़ नहीं हुआ तब उसके लिए संकट खड़ा हो जाएगा। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस पूरी तरह लापरवाह हो गई। 99 सीटों पर मिली जीत के कारण उसने विपक्षी गठबंधन के सहयोगियों को उपेक्षित करना शुरू कर दिया । लेकिन जब अकेले लड़कर वह बुरी तरह हारने लगी तब विपक्षी दल भी उससे कतराने लगे हैं। ऐसे में यदि असम और केरल में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी तो फिर उसका ग्राफ और गिर जाएगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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