इज़रायल और हमास की लड़ाई में गाजा ही बर्बाद नहीं हुआ बल्कि प. एशिया का शक्ति संतुलन भी पूरी तरह गड़बड़ा गया । इसका कारण रूस का यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझ जाना है जिससे अरब जगत में अमेरिका को अपना वर्चस्व बढ़ाने का अवसर मिल गया। शुरूआत सीरिया में बशर उल असद के शासन के विरुद्ध संघर्ष के सफल होने से हुई। रूस की कृपा से असद की सत्ता कायम थी किंतु पुतिन जब यूक्रेन में फंस गए तब उनके पास उसकी मदद करने की गुंजाइश कम होती गई। इसी का लाभ उठाकर दिसंबर 2024 में अमेरिका ने वहां न सिर्फ सत्ता बदलवा दी अपितु मुल्क को कई हिस्सों में बांटकर कमजोर कर दिया। असद पूरा कुनबा लेकर रूस भाग गए। उल्लेखनीय है आज समूचा यूरोप जिन मुस्लिम शरणार्थियों के कारण खून के आंसू रो रहा है उनमें से ज्यादातर सीरिया में चले गृहयुद्ध के कारण ही वहां पहुंचे थे। सीरिया की गोलान पहाड़ी पर इज़रायल ने अपना कब्जा पक्का कर लिया । ईराक से सद्दाम हुसैन और लीबिया से कर्नल गद्दाफी को ठिकाने लगाकर अमेरिका ने अरब जगत में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली । लेकिन ईरान अभी भी उसके लिए चुनौती बना हुआ था। भले ही अमेरिका ने उसके तेल बेचने के साथ उससे तेल खरीदने वालों पर प्रतिबंध लगा रखे हों लेकिन फिर भी ईरान ने अमेरिकी दबाव में आने से मना कर दिया। इससे बौखलाए अमेरिका ने उस पर परमाणु अस्त्र विकसित करने का आरोप लगाकर उसकी घेराबंदी तो कर दी किंतु उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया। लेकिन इसी बीच ईरान के कट्टरपंथी शासक अयातुल्ला खामेनेई ने गाजा पर काबिज कट्टरपंथी संगठन हमास को भड़काकर इज़रायल पर हमला करवा दिया । लेकिन उस लड़ाई में गाजा पूरी तरह तबाह हो गया। हमास की कमर तो टूटी ही लेबनान में सक्रिय आतंकवादी संगठन हिजबुल्लाह और यमन में बैठे हूती नामक इस्लामिक गुट पर भी बेतहाशा हमले कर इजरायल ने उनकी ताकत घटा दी। ईरान पर भी इजरायल ने मिसाइलें दागकर जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। उसके तमाम उच्च सैन्य अधिकारी मारे गए। यहां तक कि खोमेनेई भी मरते - मरते बचे। यद्यपि ईरान ने भी पलटवार किया जिससे इजरायल को कुछ नुकसान हुआ किंतु अमेरिका ने अपने अजेय लड़ाकू विमान भेजकर ईरान के परमाणु संयंत्रों पर जबरदस्त हमला बोलकर उसे लड़ाई बंद करने मजबूर कर दिया। आज के हालात में गाजा पर हमास का वर्चस्व नाममात्र का है। वहां अमेरिका ने जो योजना बनाई उसके पूरा होने पर वह उसका हिस्सा बनकर रह जाएगा। लेकिन जो सबसे बड़ी खबर प. एशिया से आ रही है वह है ईरान में खोमेनेई की सत्ता के खात्मे की शुरुआत। ताजा संकेतों के अनुसार वे भी असद की तरह ही कुनबे सहित रूस भागने की फिराक में हैं। ये स्थिति एकाएक उत्पन्न नहीं हुई। 1979 में शाह पहलवी की सत्ता को पलटकर देश में अयातुल्ला खोमैनी ने इस्लामिक गणराज्य की स्थापना कर जिस कट्टरपंथी सामाजिक व्यवस्था को लागू किया उसके विरुद्ध कई सालों से युवाओं में रोष दिखने लगा था। हिजाब के विरोध में एक युवती के विद्रोह ने पूरे ईरान में नई पीढ़ी को आंदोलित किया जिसके बाद खोमेनेई के विरुद्ध आक्रोश पनपने लगा और जिस शाह को 1979 में अपदस्थ कर खोमैनी सत्ता में आए थे उन्हीं के बेटे को वापस बुलाकर ईरान को उसी खुलेपन की ओर ले जाने की मांग जोर पकड़ रही है जिसकी यादें आज भी देश के लोगों में हैं। ईरान की कट्टरपंथी इस्लामिक शासन व्यवस्था में सर्वोच्च सत्ता धर्मगुरु होने के नाते खोमेनेई के पास है। जिसने भी सुधार की आवाज उठाई भी उसे मौत की नींद सुला दिया गया। हिजाब के मामले में जरा सी लापरवाही की कड़ी सजा से महिलाओं विशेषतः युवतियों का गुस्सा आसमान छूने लगा था। हालांकि ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि खोमेनेई के विरुद्ध जनविद्रोह भड़काने में अमेरिका की भूमिका होगी किंतु ये भी सच है कि अरब जगत में भी आधुनिकता के बीज प्रस्फुटित होने लगे हैं। सऊदी अरब जैसा कट्टर इस्लामिक देश तक अब महिलाओं को आजादी देने के कदम उठा रहा है। दुबई , शारजाह और अबू धाबी में आई आर्थिक समृद्धि ने प. एशिया में बड़े बदलाव की नींव रख दी है। यद्यपि अभी भी इस्लाम की आड़ में कट्टरता के हिमायती देश हैं लेकिन समय के साथ वे अलग ये थलग पड़ते जा रहे हैं। यदि ईरान में खोमेनेई सत्ता का पतन हुआ और उसकी जगह शाह के बेटे की ताजपोशी हुई तब यह न सिर्फ इस्लामिक जगत अपितु दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन पर बड़ा असर डालने वाला होगा। भले ही इससे ईरान में अमेरिकी और पश्चिमी हस्तक्षेप बढ़े किंतु भौगोलिक रूप से हमारे नजदीक एक कट्टर इस्लामी देश में यदि दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली सरकार आती है तो भारत के लिए वह सुखद स्थिति होगी।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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