अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह करने के बाद दुनिया के भूगोल को बदलने का पागलपन कर रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवाकर न्यूयॉर्क की जेल में डालने के बाद ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर जबरन कब्जा करने की धमकी दे डाली। जिन यूरोपीय देशों ने इसके विरुद्ध आवाज उठाई उन पर ट्रम्प ने बढ़ा हुआ टैरिफ थोप दिया। उनकी ऊलजलूल हरकतों और बेहद गैरजिम्मेदाराना फैसलों की विश्वस्तर पर तीखी आलोचना हो रही है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने तो उसे गुंडागर्दी बता दिया। पश्चिमी यूरोप के अधिकांश देश दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से नाटो संधि के अंतर्गत अमेरिका के संरक्षण में थे। लेकिन ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर दावा ठोकने से स्थिति उल्टी हो गई । और अब तक अमेरिका के झण्डे तले खड़े रहने वाले तमाम यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य टुकड़ियां तैनात करने जैसा अभूतपूर्व कदम उठा लिया। डेनमार्क ने जिन तीखे शब्दों में ट्रम्प की धमकियों का जवाब दिया उनसे लग गया कि अमेरिका का रुतबा ढलान पर है। स्विट्जरलैंड के दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक फोरम के सम्मेलन में अनेक देशों के नेताओं ने ट्रम्प की धौंस की आलोचना करते हुए अमेरिका की दादागिरी खत्म करने के लिए जो एकजुटता दिखाई वह एक नई वैश्विक व्यवस्था शुरू करने की शुरुआत है। यूरोपियन यूनियन की अध्यक्ष जर्मनी की उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने तो ये कहकर तहलका मचा दिया कि दावोस सम्मेलन के बाद वे भारत जा रही हैं जिसके साथ मुक्त व्यापार संधि की जाएगी जिसे उन्होंने मदर ऑफ ऑल डील्स जैसा विशेषण देखकर अमेरिका को खुली चुनौती दे डाली। गणतंत्र दिवस के अगले दिन भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच वैसी ही मुक्त व्यापार संधि होने जा रही है जैसी ब्रिटेन सहित अनेक देशों के साथ भारत कर चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति का ताजा पागलपन अमेरिका के नक्शे में ग्रीनलैंड के अलावा वेनेजुएला और कैनेडा को भी दर्शाने के रूप में सामने आया। अपने सोशल मीडिया हैंडल पर वे इन देशों को अमेरिकी ध्वज के तले दिखा रहे हैं। उनके इस कदम से समूचा यूरोप ही नहीं अपितु लैटिन अमेरिका के वे देश भी चिंतित हैं जिन्हें ट्रम्प चाहे जब धमकाते रहे हैं। उनकी घटिया हरकतों को देखकर लगने लगा है कि उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है क्योंकि अमेरिका जैसे उन्नत देश के राष्ट्रपति से इतने निम्नस्तरीय व्यवहार की अपेक्षा किसी को नहीं थी। गत वर्ष उनके दोबारा निर्वाचित होने पर ये उम्मीद थी कि प्रथम कार्यकाल के अनुभव के आधार पर वे न सिर्फ अपने देश अपितु पूरी दुनिया की बेहतरी के लिए काम करते हुए रूस - यूक्रेन के अलावा इजरायल - हमास के बीच चली आ रही लंबी लड़ाई रुकवाने के लिए सकारात्मक भूमिका का निर्वहन करेंगे। हालांकि इजरायल और हमास के बीच युद्धविराम हो गया किंतु गाजा पर कब्जे की जो योजना ट्रम्प ने बनाई उसमें शांति स्थापित करने के बजाय उस क्षेत्र का व्यावसायिक दोहन करने का इरादा साफ झलकता है। भारत - पाकिस्तान के बीच हुए संक्षिप्त युद्ध को रुकवाने संबंधी उनके फर्जी दावों से साबित हो गया कि उन्हें न अपनी गरिमा का ध्यान है न ही अमेरिका की प्रतिष्ठा का। नोबल शांति पुरस्कार के लिए जिस प्रकार उन्होंने लार टपकाई उससे उनकी छवि एक विदूषक की बन गई। इन सब वजहों से ट्रम्प दुनिया के सबसे विवादास्पद ही नहीं अपितु हास्यास्पद राष्ट्रध्यक्ष बन गए हैं। दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक फोरम के सम्मेलन में उन पर जो टिप्पणियां और कटाक्ष हुए उनसे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दुनिया अमेरिका की चौधराहट को और ज्यादा ढोने तैयार नहीं है। यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत आकर मदर ऑफ ऑल डील करने जैसी घोषणा यूरोप का अमेरिकी प्रभुत्व से निकलने का साफ संकेत है। कभी - कभी तो लगता है ट्रम्प के इस कार्यकाल में अमेरिका पूरी दुनिया के लिए अछूत होकर रह जाएगा। वैसे भी अब आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक तौर पर उसका एकछत्र दबदबा नहीं रहा। रूस , चीन और भारत जैसे देश उसके प्रभुत्व को चुनौती देने में सक्षम हैं। और अब तो यूरोप ने भी उससे अपना पिंड छुड़ा रहा है। संभावनाओं के देश के रूप में प्रतिष्ठित अमेरिका को ट्रम्प की अधकचरी मानसिकता ने समस्याओं के देश में परिवर्तित कर दिया।
- रवीन्द्र वाजपेयी
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