Saturday, 24 January 2026

कालेधन की समस्या का इलाज आयकर ख़त्म करना ही है



मोदी सरकार के आगामी  बजट को लेकर अनुमानों का दौर जारी है। रविवार होने के बाद भी 1 फरवरी को ही बजट पेश होगा। सरकार महीनों पहले से इसकी तैयारी करती है । अर्थशास्त्रियों से  सुझाव लेने  के अतिरिक्त उद्योग-व्यापार से  जुड़े संगठनों की अपेक्षाएं जानने का प्रयास भी किया जाता है।  कर्मचारी वर्ग और बैंकों  में जमा राशि के ब्याज पर निर्भर बुजुर्ग भी अपने दृष्टिकोण से बजट से उम्मीद लगाते हैं। वित्त मंत्री खुद भी बजट  को लोकप्रिय बनाने विभिन्न वर्गों से राय लेने  का प्रयास करते हैं। हालांकि शायद ही कभी सभी वर्ग संतुष्ट हुए हों। व्यवहारिक रूप से ये संभव भी नहीं होता। हालांकि गत वर्ष के बजट में आयकर की छूट 12 लाख तक  किए जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ क्योंकि इससे मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा और व्यवसायी  वर्ग को बड़ी राहत मिली । ये कहना भी गलत नहीं है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली सफलता के पीछे इसी छूट का बड़ा योगदान रहा। कोरोना  के कारण अर्थव्यवस्था में आए ठहराव से देश उबर चुका है। विकास दर में लगातार  वृद्धि से उत्साहित होकर ही  सरकार ने जीएसटी की दरों में सुधार जैसा साहसिक निर्णय लिया। हालांकि इससे जीएसटी के मासिक संग्रह में कमी आई किंतु उसके बाद भी जीडीपी की रफ्तार यथावत होने से भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी  अर्थव्यवस्था  बनने के बाद तीसरे स्थान  की ओर अग्रसर है। फिलहाल केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी ही हमसे आगे हैं।  इन्हीं सब कारणों से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ नामक हमलों के सामने भारत नहीं झुका। हाल ही में स्विटजरलैंड के दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन के दौरान यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा भारत के साथ मुक्त व्यापार संधि करने की जो घोषणा की उससे भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते वैश्विक विश्वास की पुष्टि हो गई। इस संधि को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है जिसने  ट्रम्प को भी चिंता में डाल दिया है । लेकिन  वैश्विक परिदृश्य जिस तेजी से बदल रहा है उसके  कारण आर्थिक नीतियों में भी उसी अनुरूप परिवर्तन जरूरी है। हाल ही की घटनाओं के कारण भारत से विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा है। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने से भी आर्थिक अनिश्चितता व्याप्त है।  प्रतिवर्ष हजारों धनवान लोग भारत छोड़ विदेशों में बस रहे हैं जिसका कारण करों का बढ़ता बोझ और जटिलता है। इस विसंगति को रोकने के लिए  विभिन्न आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा समय - समय पर सुझाव दिया जाता रहा कि आयकर को पूरी तरह समाप्त करने के साथ ही जीएसटी की केवल एक ही दर 5 फीसदी  की रखी जाए।  इस सलाह पर यदि  बजट में अमल कर लिया जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था का डंका पूरी दुनिया में बज उठेगा। उल्लेखनीय है बढ़ते करों के कारण ब्रिटेन से बड़ी संख्या में धनकुबेर दुबई जैसी जगह पर आकर बस रहे हैं।  सर्वेक्षण किया जाए तो भारत के भी हजारों लोगों द्वारा दुबई सहित  अन्य देशों में ठिकाना बनाने की बात सामने आ जाएगी। ये बात तो साधारण सोच रखने वाला भी जानता है कि करों की अधिक दरें कालेधन रूपी समानांतर अर्थव्यवस्था की जनक हैं। अर्थक्रांति नामक एक अध्ययन दल ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में आयकर खत्म कर ट्रांजेक्शन टैक्स  लगाने का सुझाव सरकार के सामने रखा था जिसमें 100 रु. को ही सबसे बड़ा नोट रखने की बात थी। कहते हैं 2016 की नोटबंदी आंशिक तौर पर उसी से प्रेरित थी किंतु सरकार ने 500 और 2000 रु. के नोट जारी कर गलती कर दी। जल्द ही 2000 रु. का नोट कालेधन जमा करने का जरिया बन गया और इसीलिए उसे भी बंद किया गया। देश में जो भ्रष्टाचार है उसकी मुख्य जड़ आयकर के अलावा जीएसटी की अधिक दरें हैं । जीएसटी में तो और सुधार करने का आश्वासन सरकार ने दिया भी किंतु आयकर के बारे में क्रांतिकारी फैसला लेना प्रतीक्षित है। वैसे भी आयकर से मिलने वाला राजस्व इतना नहीं कि उसे बंद करने से अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। उल्टे काला धन मुख्यधारा में आ जाने से अर्थव्यवस्था में मजबूती और पारदर्शिता आ जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी वजह से अर्थव्यवस्था सुधरी है किंतु कालेधन की समस्या यथावत है। ऐसे में अपेक्षा की जा सकती है कि गत वर्ष 12 लाख तक की छूट देने से आगे बढ़कर आगामी बजट में आयकर संबंधी ऐसा कोई निर्णय लिया जाए जिससे कि देश का धन बाहर जाना बंद हो और कर चोरी की बजाय लोग ज्यादा से ज्यादा कमाने के प्रति उत्साहित हों।


- रवीन्द्र वाजपेयी 


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