वैश्विक परिस्थितियों में जिस तरह से बदलाव आ रहे हैं उससे लगता है कि शक्ति संतुलन एकपक्षीय होता जा रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आचरण से तो लगता है वे जंगल राज लागू करना चाह रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक अपहृत कर अमेरिका उठा लाने के बाद अब ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की उनकी योजना है जो डेनमार्क का हिस्सा है। उनकी धमकी के बाद यूरोपीय देशों में हड़कंप की स्थिति है । डेनमार्क ने तो नाटो के टूटने की आशंका तक जता दी है। उधर अमेरिका ने गत दिवस एक रूसी जलपोत पर कब्जा कर लिया। अमेरिका का आरोप है वह वेनेजुएला से तेल लेने जा रहा था। उल्लेखनीय है अमेरिका ने उसके तेल बेचने पर प्रतिबंध लगा रखा है। रूस ने इस कार्रवाई को अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया है। ट्रम्प द्वारा वेनेजुएला पर शिकंजा कसने से चीन को बड़ा झटका लगा है जो उसका सबसे बड़ा खरीददार था। और बजाय डॉलर के अपनी मुद्रा युआन में ही लेनदेन कर रहा था। अब जबकि वेनेजुएला के तेल व्यापार पर अमेरिका का आधिपत्य होने जा रहा है तब चीन के सामने बड़ा ऊर्जा संकट आना तय है। और यदि ट्रम्प ने वाकई ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया तब यूरोप के साथ ही रूस और चीन के लिए भी ये चिंता बढ़ाने वाला होगा। लेकिन ऐसा होने के बाद ट्रम्प किस मुंह से रूस को यूक्रेन की जमीन पर कब्जा करने से रोकेंगे ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका जिस तरह से दादागिरी कर रहा है उसे रोकने की हिम्मत फिलहाल न रूस दिखा पा रहा है और न ही चीन। यूरोप में भी फ्रांस ही है जो अमेरिका के दबाव का सामना करने का हौसला दिखा सकता है । ब्रिटेन और जर्मनी सहित अन्य यूरोपीय देशों ने तो वेनेजुएला में ट्रम्प की इशारे पर हुई कार्रवाई का समर्थन कर उसके प्रति अपना झुकाव दिखा दिया। हालांकि जैसे संकेत मिल रहे हैं उनके अनुसार यूरोप के अनेक छोटे देशों में युद्ध की तैयारियां देखने मिल रही हैं। उन्हें आशंका है कि अमेरिका की विस्तारवादी नीतियों से रूस का हौसला भी बुलंद हुआ है। और वह भी अपने पड़ोसी देशों में दखल देने की सोच रहा है। राष्ट्रपति पुतिन पहले ही इतिहास का हवाला देते हुए पोलैंड सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों को रूस का हिस्सा बताकर भय का माहौल बना चुके हैं। इन सबसे चीन का भी उत्साह हिलोरें मार सकता है जो ताइवान पर कब्जा करने के अवसर की तलाश में रहता है। यही नहीं जापान के आधिपत्य वाले कुछ द्वीपों पर भी उसकी नजर लंबे समय से है। कुल मिलाकर ट्रम्प ने विश्व के भूगोल में बदलाव का खतरा उत्पन्न कर दिया है। वे कितने सफल होंगे ये तो भविष्य ही बताएगा किंतु यदि उनकी सनक इसी तरह जारी रही तब दुनिया को लघु विश्व युद्ध झेलना पड़ सकता है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की बेतहाशा खरीद से ये आशंका मजबूत हो रही है। वेनेजुएला तो खैर, अमेरिका का प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं था , परंतु बाकी देश भी ट्रम्प की दादागिरी को चुपचाप सहन कर लेंगे ये संभव नहीं लगता क्योंकि अमेरिका ने वेनेजुएला के बाद क्यूबा को भी सबक सिखाने की जो धमकी दी है उसके बाद चीन और रूस भी कुछ न कुछ कदम तो उठाएंगे ही । वैसे भी ज्यादातर लैटिन अमेरिकी देश परंपरागत रूप से अमेरिका के विरोधी रहे हैं। उनका झुकाव एक जमाने में सोवियत संघ के प्रति था किंतु बीते एक दशक में चीन ने भी इस इलाके में अपना दखल बढ़ाकर अमेरिका के विरुद्ध मोर्चेबंदी की है। वेनेजुएला में ट्रम्प ने जो कुछ किया उसकी आशंका पहले से होने के बाद भी सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा इसकी कल्पना किसी को नहीं थी। यदि वे ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की हिमाकत करते हैं तब ये हिटलर द्वारा पोलैंड पर कब्जा करने जैसा ही है जिसे दूसरे विश्वयुद्ध की औपचारिक शुरुआत माना जाता है। लेकिन तब और अब में बहुत बड़ा बदलाव आ चुका है। सोवियत संघ के बिखराव के बाद दो ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था खत्म होकर अमेरिका का दबदबा बढ़ गया । लेकिन बीते दो दशक में चीन भी अमेरिका के मुकाबले एक आर्थिक महाशक्ति तो बन गया किंतु उसका सैन्य ढांचा उसके जितना मजबूत नहीं होने से वह अपने आसपास ही रुतबा दिखा सकता है। वेनेजुएला में उसके सीधे आर्थिक हित जुड़े थे । वहीं रूस भी अप्रत्यक्ष ही सही उसके साथ रिश्ते बनाए हुए था। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर लगी हैं कि ट्रम्प की हिटलर नुमा चालों को रोकने के लिए पुतिन और जिनपिंग क्या करते हैं?
- रवीन्द्र वाजपेयी
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