Thursday, 29 January 2026

यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच संधि से अमेरिकी प्रभुत्व को धक्का



गणतंत्र दिवस के दूसरे दिन यूरोपीय यूनियन के साथ हुई मुक्त व्यापार संधि एक ऐतिहासिक कदम है जिसने विश्व के व्यापार संतुलन को एक नई दिशा दे दी। 27 देशों का विकसित बाजार जहां भारत को मिलने जा रहा है वहीं यूरोप से आने वाली चीजें सस्ती होने से भारतीय उपभोक्ताओं सहित उद्योगों को भी लाभ होगा। इस बारे में अनेक वर्षों से बातचीत चल रही थी लेकिन नतीजे पर नहीं पहुंचने की वजह से  निर्णय लंबित रहा। शायद अभी भी वह निर्णायक बिंदु पर न आई होती लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने टैरिफ के नाम पर जिस गुंडागर्दी  का परिचय दिया उसके बाद से पूरी दुनिया में हड़कंप मचा हुआ है। दूसरे महायुद्ध के बाद से ही कुछ को छोड़कर ज्यादातर यूरोपीय देश अमेरिका पर निर्भर थे। सोवियत संघ के बिखरने के बाद तो यूरोप के जो साम्यवादी देश थे वे भी अपनी सुरक्षा के साथ ही आर्थिक मामलों में अमेरिका के प्रभाव में आने बाध्य हो गए। लेकिन रूस और यूक्रेन के बीच शुरू हुई जंग के बाद अमेरिका का दोगला रवैया यूरोपीय देशों के लिए समस्या बन गया। जब तक जो बाइडेन राष्ट्रपति रहे तब तक तो फिर  भी ठीक था परंतु गत वर्ष ट्रम्प के सत्ता संभालते ही अमेरिकी नीतियां तेजी से बदलने लगीं। स्थिति यहां तक आ गई कि ट्रम्प ने अपने यूरोपीय सहयोगियों को ये संकेत दे दिया कि वे अमेरिका के भरोसे न रहें क्योंकि आगे से वह उनको खैरात में कुछ नहीं देगा। यूक्रेन के साथ भी ट्रम्प ने जो धोखाधड़ी की उसकी वजह से अमेरिका की विश्वसनीयता मिट्टी में मिलती चली गई। यूरोपीय देशों पर टैरिफ बढ़ाने के अलावा उनको दिए जा रहे  सुरक्षा कवच के बदले भुगतान का दबाव बनाया जाने लगा। भले ही ब्रिटेन , फ्रांस और जर्मनी जैसे उन्नत देश अमेरिकी दबाव को एक सीमा तक सहन करने में सक्षम हों किंतु बाकी सबकी हालत ऐसी नहीं होने से घबराहट फैल गई। दरअसल यूक्रेन पर रूसी हमले का जब यूरोपीय देशों ने विरोध किया तब राष्ट्रपति पुतिन ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए  पड़ोसी देशों की जमीनों पर कब्जा जमाने का इरादा व्यक्त कर सनसनी फैला दी। हालांकि रूस खुद यूक्रेन के साथ उलझा होने से नए मोर्चे खोलने की हिम्मत नहीं जुटा सका किंतु यूरोपीय देशों की चिंता तब और बढ़ गई जब अमेरिका दोगलेपन पर उतर आया। चूंकि चीन से भी यूरोपीय देश भयभीत रहते हैं ऐसे में उन्हें ऐसे किसी सहारे की जरूरत थी जिसका रूस और चीन दोनों के साथ संवाद कायम हो। और तब उन्हें भारत ही दिखाई दिया । इसका संकेत तब मिल गया जब इटली की प्रधानमंत्री ने भारत से अनुरोध किया कि वह अपने कूटनीतिक प्रभाव से उनके और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच संवाद स्थापित करवा दे। दावोस में हुए विश्व आर्थिक सम्मेलन में यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष द्वारा अमेरिका के दबावों के प्रतिकार स्वरूप भारत के साथ होने  वाली मुक्त व्यापार संधि को मदर ऑफ ऑल ट्रीटी कहकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की दिशा बदलने का संकेत दे दिया था। अब  तक तो अमेरिका ने इस संधि को संभव नहीं होने दिया किंतु ट्रम्प के सनकीपन से त्रस्त यूरोप ने अंततः भारत  का दामन थामने का फैसला किया । इस संधि के प्रभाव में आते ही  यूरोप के लिए विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ जुड़ने के दरवाजे खुल गए हैं। साथ ही भारत द्वारा अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात में कमी आने से होने वाले नुकसान की भरपाई भी संभव हो गई। इस तरह 2 अरब जनसंख्या से जुड़ी इस संधि ने अमेरिकी प्रभुत्व के अंत की शुरुआत कर दी है। यूरोपीय देशों का भारत के साथ जुड़ाव होने में दोनों का लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गहरा विश्वास होने के साथ ही खुला सामाजिक वातावरण भी बड़ा कारण है। चीन और रूस दोनों में यूरोपीय देशों को उतनी व्यावसायिक संभावनाएं नहीं दिखीं जितनी भारत में हैं। लिहाजा यूरोपीय यूनियन ने 18 सालों से लटकी इस संधि को अंजाम तक पहुंचा दिया। इसका जमीनी असर तो कुछ दिनों बाद नजर आएगा किंतु इससे दोनों पक्षों ने  मिलकर ट्रम्प टैरिफ के गुब्बारे की हवा निकाल दी। अमेरिका पर इसका कितना असर होता है इसके लिए प्रतीक्षा करनी होगी किंतु ऊंचे टैरिफ से बढ़ी महंगाई से अमेरिकी जनता की बढ़ती नाराजगी से वहां ट्रम्प का विरोध भी बढ़ेगा। शायद यही वजह है कि ग्रीनलैंड पर हमले की उनकी योजना ठंडी पड़ने लगी है। हो सकता है अब अमेरिका भारत से भी व्यापार संधि कर ले किंतु यूरोपीय यूनियन के साथ हुई इस संधि ने अमेरिका को ये तो बता ही दिया कि दुनिया उसके बिना भी चल सकती है।


- रवीन्द्र वाजपेयी 

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