Wednesday, 14 January 2026

नई पीढ़ी के नेताओं को रास नहीं आएगी दिग्विजय की वापसी


म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक पुरानी तस्वीर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर टिप्पणी की थी कि भाजपा और संघ जमीन में बैठे अपने कार्यकर्ता को भी प्रधानमंत्री बना देता है। उस चित्र में वरिष्ट भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के  सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बैठे दिखाई दे रहे थे। उस समय श्री मोदी जहां  संगठन का कार्य देखते थे। वहीं आडवाणी जी पार्टी के शीर्ष नेता थे। उस तस्वीर को प्रसारित कर श्री सिंह सुर्खियों में तो आ गए किंतु कांग्रेस के भीतर  सुगबुगाहट होने लगी। कांग्रेस महासमिति की बैठक के ठीक पहले किए गए उस धमाके को दबाव बनाने की कोशिश कहा गया। दरअसल श्री सिंह का राज्यसभा कार्यकाल अप्रैल माह में समाप्त होने वाला है और इस उम्र में चुनाव लड़कर लोकसभा में पहुंचना उनके बूते के बाहर है। 2019  और 2024 में  वे बुरी तरह हार भी चुके हैं। ऐसे में राज्यसभा में रहकर ही वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति बनाए रख सकते हैं। लेकिन उन्होंने श्री मोदी की तस्वीर प्रसारित कर अपने लिए गड्ढा खोद लिया। कहते हैं राहुल गांधी ने भी इस पर नाराजगी जताई । यद्यपि श्री सिंह ने बिना देर लगाए भाजपा और संघ से अपना वैचारिक विरोध व्यक्त कर दिया किंतु नुकसान हो चुका था। ऐसे में  राज्यसभा की सीट खाली कर म.प्र में  कांग्रेस को पुनः मजबूत लगाने संबंधी उनके बयान पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि बिना सांसद रहे दिल्ली में जमे रखना उनके लिए मुश्किल होता। फिलहाल वे पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी भी नहीं हैं। ये बात  सही है कि प्रदेश की राजनीति से वे अच्छी तरह वाकिफ हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव के पूर्व उन्होंने सपत्नीक जो पैदल नर्मदा परिक्रमा की थी उसका लाभ कांग्रेस को भी मिला और वह सरकार बनाने में सफल हो सकी। हालांकि मात्र 15 महीने बाद ही उनके और ज्योतिरादित्य सिंधिया  की राजनीतिक दुश्मनी से वह सरकार अल्पजीवी साबित हुई किंतु दिग्विजय दिल्ली में डटे रहे। गांधी परिवार के प्रति निष्ठा व्यक्त करने में भी वे कभी पीछे नहीं रहते। राहुल गांधी की पहली भारत जोड़ो यात्रा के आयोजन में उनकी प्रमुख भूमिका भी रही। हालांकि 2024 के बाद वे कांग्रेस की केंद्रीय राजनीति में हाशिए पर खिसकने लगे और अब जब वे खुद ही दिल्ली छोड़ घर लौटने  की बात कह रहे हैं तब ये कहना गलत नहीं होगा कि गांधी परिवार भी अब उन्हें अनुपयोगी मान बैठा है । वरना इतने अनुभवी नेता को आसानी से नहीं छोड़ता। अब सवाल ये है कि म.प्र में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए मैदान में उतरने की उनकी योजना पार्टी द्वारा तय की गई या वे अपनी भूमिका खुद तय कर बैठे। सही  बात ये है कि प्रदेश में कांग्रेस  की बागडोर जिन युवा हाथों में राहुल गांधी ने सौंपी वे दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को बर्दाश्त करने तैयार नहीं है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार को श्री सिंह की सक्रियता रास आएगी ये बीते दो वर्ष की स्थितियों को देखने पर तो नहीं लगता। सही बात ये है कि श्री नाथ और श्री सिंह येन केन प्रकारेण अपने बेटों को स्थापित करना चाह रहे हैं। श्री नाथ के पुत्र नकुल लोकसभा चुनाव हारकर पृष्ठभूमि में हैं। वहीं उनका आभामंडल भी फीका पड़ा है।  दिग्विजय सिंह के लिए जरूर उनके विधायक पुत्र जयवर्धन सिंह उम्मीद की किरण हैं। यद्यपि वे सरकार में मंत्री रहने के बाद भी प्रदेश स्तर पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में असफल रहे।  ऐसे में  उनके पिता प्रदेश में पूरा समय देकर राजनीति करने  के बाद भी नई पीढ़ी को प्रेरित और प्रभावित कर सकेंगे इसमें संदेह ही है।   जनसामान्य में भी श्री सिंह की वह नकारात्मक छवि बरकरार है जिसके कारण 2003 में कांग्रेस का ऐसा पराभव हुआ कि वह आज तक उठ नहीं पाई। दरअसल उनकी और श्री नाथ की जोड़ी ने पार्टी में क्षमतावान युवाओं को उठने नहीं दिया और अपने परिवार को ही बढ़ाने में लगे रहे। यदि 2023 में ये दोनों  श्री सिंधिया को मुख्यमंत्री बनवा देते  तब कांग्रेस सत्ता में बनी रहती और 2024 के लोकसभा चुनाव में  सभी सीटें न हारती। ये देखते हुए श्री सिंह द्वारा प्रदेश की राजनीति में उतरने की घोषणा से आम जनता तो छोड़ दें कांग्रेस में भी शायद ही कोई उत्साह नजर आए क्योंकि उसकी दुर्गति के लिए सबसे ज्यादा  जिम्मेदार वही हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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