Friday, 9 January 2026

हिटलर जैसी मूर्खताएं कर रहे ट्रम्प


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ताकत के जोर पर वही गलतियां कर रहे हैं जो कभी जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने की थीं।  प्रथम विश्व युद्ध के बाद  थोपी गई संधि के कारण उसके मन में जर्मनी को विश्व का अग्रणी और शक्तिशाली देश बनाने की महत्वाकांक्षा उत्पन्न हुई। इसके लिए यदि वह सकारात्मक कदम उठाता तब शायद वह अपने देश की अधिक भलाई कर सकता था।  लेकिन उसने अपने देश का सम्मान बढ़ाने के लिए अन्य देशों का अपमान करने की नीति अपनाई। अकारण पड़ोसी मुल्कों पर हमला कर उन्हें कब्जाने की हिमाकत की जिसकी परिणिति द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में हुई । यदि वह रूस पर हमला नहीं करता और अपने देश की भौगोलिक सीमाओं का सीमित विस्तार कर रुक जाता तब वह एक प्रभावशाली विश्व नेता के तौर पर स्थापित हो सकता था। लेकिन उसने लड़ाई को चारों तरफ फैलाकर अपने दुश्मनों को एकजुट हो जाने का अवसर दे दिया।  इटली और जापान  ने भी उसके समर्थन में उतरकर अपनी  दुर्गति करवाई।  जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता के अहंकार में  दुनिया जीतने के उसके इरादे मिट्टी में मिल गए। हालांकि हिटलर की अनेक खूबियों का भी बखान होता है किंतु दूसरा विश्व युद्ध छेड़कर उनसे मानवता का जो नुकसान किया उसके कारण दुनिया उसे घृणा की नजर से देखती है। इसी संदर्भ में मौजूदा परिदृश्य पर नजर डालें तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की हरकतें दुनिया को तीसरे महायुद्ध की ओर धकेल रही हैं।  लेकिन सवाल ये है कि वे हिटलर की तरह अमेरिका की आर्थिक और सैन्य शक्ति का उपयोग कर समूचे विश्व को भयभीत करने पर क्यों आमादा हैं ? और इसका सीधा जवाब है अमेरिका की वर्तमान दुरावस्था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण देश बन गया। आर्थिक और सैन्य क्षेत्र के साथ ही ज्ञान - विज्ञान का ऐसा कोई आयाम नहीं है जिसमें उसने अपनी श्रेष्ठता का लोहा न मनवाया हो। इसीलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करने वाले इस देश ने पूरी दुनिया को प्रभावित भी किया और आकर्षित भी। लेकिन  चौधरी बनने की कोशिश में उसने अपनी शक्ति और संसाधनों का जो अपव्यय किया उसने उसकी संपन्नता रूपी घड़े के नीचे छेद कर दिया। परिणाम ये है कि दूसरों को खैरात बांटने वाला देश खुद बेतहाशा कर्ज में डूबा हुआ है। उसके अर्थतंत्र पर चीन जैसे जन्मजात शत्रु देश का शिकंजा कस चुका है। अमेरिका की श्रेष्ठता को पुनर्स्थापित करने का वायदा कर ट्रम्प दोबारा सत्ता तो पा गए लेकिन उनकी समझ में नहीं आ रहा कि देश को संकट से कैसे निकालें ? और इसी उलझन में वे बदहवासी में डूबते गए। टैरिफ लगाने की उनकी नीतियों की अमेरिका में ही आलोचना हो रही है क्योंकि आयात महंगा होने से महंगाई चरम पर है। अमेरिकी जनता में इसके कारण गुस्सा बढ़ रहा है। ज़रूरी चीजों की किल्लत हो रही है। सबसे बड़ी बात ये हुई कि ट्रम्प के अस्थिर स्वभाव और नीतिगत दृढ़ता की कमी के चलते अमेरिका एक अविश्वसनीय देश बनकर रह गया है। गत वर्ष देश की बागडोर संभालने के बाद से ही उन्होंने जिस तरह के फैसले किए उनके कारण अमेरिका के परंपरागत दोस्तों तक के बीच में उनकी छवि एक अहंकारी और धोखेबाज राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर बन गई। अमेरिकी डॉलर की पूरी दुनिया में जो साख और धाक बीते 70 - 80 सालों से कायम थी उसे ट्रम्प ने बीते एक साल में बुरी तरह ध्वस्त कर दिया। सोने और चांदी की कीमतों के आसमान छूने के प्रमुख कारणों में डॉलर के वर्चस्व से मुक्त होने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा डॉलर बेचकर सोने - चांदी का भंडार बढ़ाना ही है। इस अप्रत्याशित आर्थिक उथल - पुथल के लिए ट्रम्प की मूर्खता भरी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। अपने टैरिफ रूपी अस्त्र के बेअसर होने के बाद अब वे उसे 500 फीसदी तक बढ़ाने की महामूर्खता कर रहे हैं जिससे अमेरिका की आंतरिक स्थिति और बिगड़ेगी। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को बलात उठवाने के बाद ग्रीनलैंड हथियाने की उनकी जिद से अमेरिका के दुश्मनों की संख्या ही बढ़ रही है। रूस,चीन, भारत , ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के विरुद्ध एक साथ मोर्चा खोलकर ट्रम्प वैसा ही आत्मघाती कदम उठा रहे हैं जो दूसरे महायुद्ध में हिटलर और जर्मनी की बर्बादी का कारण बना।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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