Tuesday, 20 January 2026

मुसलमानों को जागीर समझने वाली पार्टियों के लिए खतरे की घंटी


महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में भाजपा को मिली सफलता जहां चर्चा में है वहीं कांग्रेस , सपा ,शरद पवार और उद्धव ठाकरे के प्रति मुस्लिम मतदाताओं की अरुचि ने राज्य की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया है।  सबसे चौंकाने वाली बात रही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ए.आई.एम.आई.एम को मिली सफलता। हालांकि इसका प्रभाव पूरे राज्य में दिखाई नहीं दिया किंतु मुंबई में उसे राज ठाकरे की मनसे से अधिक सीटें मिलना साधारण बात नहीं है। औरंगाबाद , मालेगांव और भिवंडी में ओवैसी का जादू  चलने के अलावा अन्य  मुस्लिम बहुल इलाकों में भी ए.आई.एम.आई.एम के पार्षदों की  जीत मुस्लिम मतदाताओं के रुख में आ रहे बदलाव  का प्रमाण है। यद्यपि इसकी बानगी बिहार विधानसभा के पिछले दो चुनावों में मिल चुकी थी जहां मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में ओवैसी के उम्मीदवारों ने राजद और कांग्रेस का खेल बिगाड़ा। हालांकि ए.आई.एम.आई.एम ने उ.प्र और प. बंगाल में भी हाथ आजमाया किंतु वहां सफलता नहीं मिलने के बावजूद ओवैसी मुस्लिम समुदाय के बीच एक प्रभावशाली नेता के तौर पर पहचान बनाने में कामयाब हो गए। उन पर भाजपा की बी टीम होने का आरोप भी लगता रहा है। इसका सीधा - सीधा कारण यही है कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार को मिलने वाले मत भाजपा विरोधी  पार्टियों का नुकसान करते हैं। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि मुस्लिम समाज चुनावों के समय भावनाओं में बहने की बजाय रणनीतिक सोच के साथ मतदान करता है। अभी तक के चलन के मुताबिक मुसलमान एकजुट होकर ऐसे प्रत्याशी को समर्थन देते आए हैं जो भाजपा को हरा सके। एक जमाने में कांग्रेस उनकी एकमात्र पसंद हुआ करती थी किंतु 1990 से राजनीतिक परिदृश्य तेजी  से बदला और कांग्रेस कमजोर होने लगी तब मुस्लिम समाज ने ऐसे विकल्प तलाशे जो भाजपा को रोकने में सक्षम हों। लालू प्रसाद, मुलायम सिंह , मायावती और ममता बैनर्जी सहित अन्य क्षेत्रीय दलों को भी भाजपा विरोधी भावना के वशीभूत होकर मुस्लिमों का एकमुश्त समर्थन मिलता रहा। लेकिन बीते कुछ सालों में हैदराबाद से निकली ए.आई.एम.आई.एम नामक पार्टी के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने मुसलमानों के बीच ये प्रचार करना शुरू किया कि वे जिन पार्टियों को अब तक समर्थन देते आए उन्होंने उनकी दशा सुधारने में कोई खास योगदान नहीं दिया। साथ ही इस बात को भी जोर - शोर से उठाया कि मुसलमान कब तक ऐसी पार्टियों के पिछलग्गू बने रहेंगे जो उन्हें बंधुआ मानती हैं। ओवैसी अपने भाषणों में अक्सर ये कहते सुने गए कि मुसलमानों को यदि राजनीति  की मुख्यधारा में आना है तो उनको अपना स्वतंत्र नेतृत्व विकसित करना होगा। जाहिर है वे उन्हें ए.आई.एम.आई.एम के झण्डे तले आने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जो उनकी निजी पार्टी है। उनके पिता हैदराबाद की जिस सीट से लगातार लोकसभा पहुंचते रहे वह अब उनके कब्जे में है। उनके भाई तेलंगाना में विधायक हैं और बेहद भड़काऊ बयानों के लिए कुख्यात हैं। तेलंगाना के बाहर महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों को छोड़ ए.आई.एम.आई.एम का कोई प्रभाव नहीं था किन्तु बिहार में कुछ विधायकों के जीतने से ओवैसी को लगा कि वे हैदराबाद से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर के मुस्लिम नेता बन सकते हैं। उनकी खासियत ये है कि वे इंग्लैंड से बैरिस्टर की उपाधि लेकर आए हैं। हैदराबाद में अनेक शिक्षण संस्थान और अस्पताल चलाते हैं। ये कहना गलत न होगा कि आज के परिदृश्य में वे  सबसे सुशिक्षित मुस्लिम नेता हैं। और इसीलिए वे मुस्लिम युवाओं को प्रभावित करने में सफल हो रहे हैं। महाराष्ट्र की ताजा सफलता के बाद ओवैसी प. बंगाल में भी हाथ आजमाए बिना नहीं रहेंगे जहां 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। ध्यान देने योग्य बात ये है कि मुसलमानों ने आजादी के आंदोलन के दौरान गांधीजी के नेतृत्व को तभी तक मान्य किया जब तक उन्हें जिन्ना के रूप में अपना नेता नहीं मिला। जिन्ना भी उच्च शिक्षित व्यक्ति थे। पाकिस्तान के निर्माण में  भी मुल्ला - मौलवियों से ज्यादा अलीगढ़ मुस्लिम वि. वि से जुड़े शिक्षाशास्त्रियों की भूमिका रही। ओवैसी भी उसी इतिहास को दोहराने का प्रयास कर रहे हैं। भले ही वे अलग देश जैसी बात न करते हों किंतु बाबरी ढांचे को शहीद बताकर उसे दोबारा खड़ा करने जैसी डींग हांककर  मुस्लिम समुदाय के बीच सूरमा बनने की कोशिश करने से नहीं चूकते। बिहार और महाराष्ट्र  से मिले संकेत  बता रहे हैं कि मुसलमानों में कांग्रेस ,राजद और समाजवादी पार्टी के अलावा उन पार्टियों के प्रति आकर्षण घटने लगा है जो मुस्लिम तुष्टीकरण में आगे रहीं । ये बदलाव यदि जोर पकड़ गया तब राष्ट्रीय राजनीति की दिशा ही बदल जाएगी। मुसलमानों को अपनी जागीर समझने वाले राजनीतिक दलों के लिए ये खतरे की घंटी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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