Wednesday, 7 January 2026

केवल जल ही नहीं शुद्ध जल भी जरूरी


म.प्र की व्यावसायिक राजधानी इंदौर की पहचान देश के सबसे स्वच्छ शहर के तौर पर बन चुकी है। वहां के नगरीय प्रशासन के साथ ही जनता को भी इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि स्वच्छ शहर होने का गौरव बरकरार रखने के लिए उन्होंने बेहद जागरूकता दिखाई वरना स्वच्छता सर्वेक्षण में ऊंची पायदान पर रहने वाले अनेक नगर बाद में फिसड्डी हो गए। उस लिहाज से इंदौर की प्रशंसा करनी होगी जिसने शिखर पर पहुंचने के बाद उस पर बने रहने का कारनामा कर दिखाया। लेकिन बीते कुछ दिनों से इंदौर पूरे देश में आलोचना का पात्र बना हुआ है। जिसका कारण वहां की एक बस्ती में प्रदूषित जल की आपूर्ति के चलते 20 लोगों  का जान गंवाना है। जिन सैकड़ों लोगों को प्रदूषित जल ने बीमार कर दिया उनमें से कुछ को लंबे समय तक इसका दंश भोगना पड़ेगा।  इस घटना के बाद पूरे प्रदेश में इस मुद्दे पर हलचल मची है। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार नाले - नालियों से गुजरती और जगह - जगह फूटी हुई पाइप लाइनों के कारण लोग ऐसे पानी का उपयोग करने बाध्य हैं जो उन्हें स्थायी तौर पर रोगी बना सकता हैं। छोटे  बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने से उनके लिए प्रदूषित जल बेहद नुकसानदेह है। मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया है जिसने पूरे प्रदेश की रिपोर्ट भी तलब की है। प्रदेश सरकार भी हरकत में आई है। इंदौर के नगरीय प्रशासन में तबादले और निलंबन के जरिए फेरबदल किए गए हैं। प्रभावित क्षेत्रों में शुद्ध जल की आपूर्ति का इंतजाम भी किया जा रहा है। जो ताजा जानकारी आई उसके अनुसार जिस क्षेत्र में दूषित जल से मौत हुई वहां का भूजल भी उपयोग करने योग्य नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रदूषण नीचे तक जा पहुंचा है। हमारे देश में ऐसी घटनाएं होने के बाद समूची व्यवस्था मुस्तैदी का प्रदर्शन करती है। इसीलिए पूरे प्रदेश में शुद्ध जल बड़ा मुद्दा बन गया है।  उच्च न्यायालय की फटकार से अतिरिक्त सक्रियता दिखाई दे रही है। फूटी हुई पाइप लाइनों का सर्वेक्षण किए जाने के अलावा नाले - नालियों से निकलने वाले बड़े पाइपों की जांच भी चल रही है। हालांकि ये सब  चिर - परिचित कर्मकांड का हिस्सा है। यदि इंदौर में मौतें न हुई होतीं तब शासन और प्रशासन की नींद नहीं टूटती और उच्च न्यायालय भी इस समस्या के बारे में उदासीन ही रहता। ऐसा नहीं है कि प्रदूषित जल की आपूर्ति के बारे में स्थानीय प्रशासन में बैठे अधिकारी - कर्मचारी अनजान हों। नलों में गंदा पानी आना भी नई बात नहीं है। पाइप लाइनों के फूटे होने की खबरें भी यदा - कदा प्रकाशित होती रही हैं। इनके जरिए आने वाला जल अशुद्ध होने से नुकसानदेह है। इसीलिए लोग अपने घरों में वाटर फिल्टर के उपकरण लगाते हैं। पानी की बोतल का कारोबार कल्पना से कहीं अधिक बढ़ता जा रहा है। हालांकि उसकी शुद्धता भी संदिग्ध मानी जाती है। लेकिन हमारे दिमाग में ये बात गहराई तक बैठ गई है कि साधारण पानी पीने योग्य नहीं है। कुछ दशक पहले तक पानी की शुद्धता को लेकर उतनी चिंता नहीं थी  किंतु अब ये बड़ा मुद्दा बन चुका है। इसीलिए इंदौर की घटना की चर्चा पूरे देश में हो रही है।  विकास की मूलभूत जरूरतों में  बिजली , सड़क और पानी को शामिल किया गया है। 2003 में इन्हीं के कारण म.प्र से दिग्विजय सिंह को जनता ने सत्ता से उखाड़ फेंका था। उसके बाद से केवल 15 माह छोड़कर शेष समय में भाजपा का निर्बाध शासन चला आ रहा है। प्रदेश के सभी बड़े शहरों की नगर निगमों में भी ज्यादातर भाजपा ही काबिज रही है। ऐसे में प्रदेश सरकार के साथ इन स्थानीय निकायों का समन्वय बेहतर रहा होगा ये मानना गलत नहीं है। इसीलिए यदि विपक्ष इंदौर की घटना को लेकर भाजपा को घेर रहा है तो उसे अनुचित नहीं कहा जाएगा भले ही उसके पीछे राजनीतिक लाभ लेने की मंशा ही क्यों न हो। अब जबकि पूरे प्रदेश में जल आपूर्ति व्यवस्था में व्याप्त खामियां सार्वजनिक विमर्श का विषय बन चुकी हैं तब शासन - प्रशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर शुद्ध जल आपूर्ति की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल जल योजना के अंतर्गत हर घर में पानी पहुंचाने का जो संकल्प लिया वह तभी सार्थक होगा जब लोगों को मिलने वाला पानी पीने योग्य हो । अन्यथा स्वस्थ भारत मिशन की कल्पना अधूरी रह जाएगी। इसीलिए सरकार के कर्ता - धर्ताओं को केवल जल ही जीवन है से आगे बढ़कर शुद्ध जल ही जीवन है के बारे में सोचना चाहिए। इंदौर की घटना चेतावनी है। यदि इसे गंभीरता से नहीं लिया तो भविष्य में किसी भी शहर में और भी बड़ा हादसा हो सकता है ।


- रवीन्द्र वाजपेयी

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