Monday, 1 September 2025

मोदी, पुतिन और जिनपिंग तय करेंगे विश्व राजनीति की नई दिशा


चीन में चल रहे शंघाई सहयोग संगठन (एस. सी.ओ) के सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा  रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर सबसे ज्यादा निगाहें टिकी हुई हैं। चीन तो चूंकि मेजबान है इसलिए  शी जिनपिंग तो केंद्र बिंदु हैं ही। एससीओ  दस देशों का एक यूरेशियाई राजनीतिक , आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संगठन है। इसकी स्थापना 2001 में चीन, रूस , कजाकिस्तान , किर्गिस्तान , ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान द्वारा की गई थी। जून 2017 में भारत और पाकिस्तान के साथ इसका विस्तार आठ देशों तक हो गया।बाद में ईरान और बेलारूस भी शामिल हो गये।  इन सबकी आबादी , जमीन और आर्थिक संसाधनों को मिलाने पर दुनिया की बड़ी शक्ति बन जाती है। मौजूदा वैश्विक हालात में इसका महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिन तीन प्रमुख देशों को अपना सबसे बड़ा शत्रु मान लिया उनके राष्ट्रप्रमुख सर्वश्री नरेंद्र मोदी, व्लाडीमीर पुतिन और शी जिनपिंग इसमें मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। यद्यपि एससीओ का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत  करना है। लेकिन ट्रम्प के सनकीपन से जो परिस्थितियाँ पैदा हो गईं उनकी वजह से रूस, चीन और भारत के नेताओं की उपस्थिति के कारण सम्मेलन में  विषय सूची से हटकर भी बहुत कुछ ऐसा होगा जो अमेरिका के लिए परेशानी का कारण बनेगा। हालांकि श्री मोदी की कल जिनपिंग से जो आपसी बातचीत हुई उसे दोनों देशों के बीच सीमा विवाद के निपटारे के अलावा व्यापार एवं आवागमन को सुलभ बनाने से जुड़ा प्रचारित किया गया किंतु ट्रम्प के टैरिफ हमले के शिकार दोनों बड़े देशों के शीर्ष नेताओं की अंतरंग वार्ता में टैरिफ संकट पर विमर्श न हुआ हो ये मानना नादानी होगी। इसी तरह आज पुतिन के साथ मोदी जी की बातचीत में यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध को रोकने तक सीमित न रहकर अमेरिका द्वारा रूस के साथ ही भारत पर बनाये जा रहे दबाव पर भी विचारों का आदान - प्रदान हुआ  होगा। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने वाले अमेरिका ने भारत और चीन पर रूसी कच्चा तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाया। लेकिन दोनों ने उसे अनसुना कर दिया तब दूसरी बार जीतकर आये डोनॉल्ड ट्रम्प ने दोनों पर टैरिफ रूपी मिसाइलें दाग दीं। ट्रम्प का खुल्लमखुल्ला कहना है कि रूस को भारत और चीन को बेचे गए  कच्चे तेल से जो राशि मिलती है उसी के बल पर वह लंबी लड़ाई लड़ने का साहस जुटा सका। इस प्रकार रूस से व्यापारिक रिश्ते रखने के कारण भारत और चीन पर अमेरिकी टैरिफ का भार आया। ऐसे में तीनों देशों के शीर्ष नेताओं की एससीओ सम्मेलन में उपस्थिति को महज कूटनीतिक औपचरिकताओं और फोटो सेशन में बांधना उचित नहीं है। वैसे भी कूटनीति में जो दिखाया जाता है उससे अधिक छिपा लिया जाता है। और फिर मोदी, पुतिन तथा जिनपिंग तीनों बेहद अनुभवी और दिग्गज राजनेता हैं जिनकी विश्व राजनीति पर गहरी पकड़ है। हालांकि चीन और भारत के बीच अविश्वास की मौजूदगी से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन वर्तमान हालात में दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त वाला सिद्धांत दोनों को नजदीक आने मजबूर कर रहा है। पुतिन की मौजूदगी में तीनों देशों की जुगलबन्दी किसी नये वैश्विक गठजोड़ को जन्म दे सकता है। स्मरणीय है चीन आने से पूर्व श्री मोदी ने जापान का दौरा किया जो अमेरिका के बेहद करीब होने के बावजूद ट्रम्प के टैरिफ हमले से त्रस्त होकर दूरी बनाने की हिम्मत जुटा सका। जिसकी बानगी के तौर पर उसने अमेरिकी चावल खरीदने के ट्रम्प के दबाव को ठुकराने का साहस दिखा दिया । यद्यपि एससीओ सम्मेलन से भारत - चीन के बीच का सीमा विवाद सुलझ जायेगा और जिनपिंग पाकिस्तान की पीठ से हाथ उठा लेंगे ये सोचना बेमानी है किंतु सम्मेलन में प्रधानमंत्री श्री मोदी की पहले जिनपिंग और आज पुतिन से जो बातचीत हुई उससे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जरूर चिंतित होंगे क्योंकि जिस वैश्विक वातावरण में रूस, चीन और भारत के राष्ट्रप्रमुख एक ही जगह  जमा हैं  वहाँ कोई न कोई बड़ी  रणनीति अमेरिका की दादागिरी खत्म करने  जरूर तैयार होगी। इस बारे में गौरतलब है कि मोदी  , पुतिन और जिनपिंग तीनों अपनी दृढ़ता के लिए जाने जाते हैं। इसलिए ट्रम्प के हरसंभव प्रयास के बाद भी अभी तक तीनों ने झुकने से मना कर दिया है। इसे देखते हुए एससीओ का यह सम्मेलन विश्व राजनीति को नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 30 August 2025

टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालेंगे एशियाई देश


कूटनीति में सही समय का चयन बेहद महत्वपूर्ण होता है। उस दृष्टि से शंघाई सहयोग परिषद की बैठक में चीन जाने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जापान दौरा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ रूपी आतंकवाद के विरुद्ध एक बड़े दांव के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि बीते 11 वर्ष में उन्होंने जापान की अनेक यात्राएं कीं किंतु यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब पूरी दुनिया में ट्रम्प के पागलपन के कारण उथलपुथल मची हुई है। उल्लेखनीय है राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रवाद का मुद्दा जोर - शोर से उठाया था। दरअसल बीते कुछ सालों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ने के अलावा बेरोजगारी की वजह से युवाओं में नाराजगी  है। अप्रवासियों की बढ़ती संख्या के कारण संसाधनों पर भी उनका कब्जा होते जाने से भी अमेरिकी समाज में चिंता व्याप्त थी। बड़ी - बड़ी कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय मूल के लोग आसीन हो गए। वित्तीय संस्थानों में चीनी पूंजी हावी होने लगी। ट्रम्प ने अमेरिकी जनमानस के मन में व्याप्त असंतोष को भांपकर भावनात्मक माहौल बनाया जिसने उनको दोबारा राष्ट्रपति तो बना दिया किंतु उनके पास अमेरिका के सामने मंडराती समस्याओं का कोई प्रभावी उपाय नहीं था और इसीलिये उन्होंने टैरिफ को अपनी कूटनीति का जरिया बनाते हुए जनता को फुसलाने का दांव चला किंतु अमेरिका के तमाम दिग्गज अर्थशास्त्रियों के अलावा विश्व  स्तरीय रेटिंग एजेंसीज ने भी ट्रम्प द्वारा मनमर्जी से थोपे जा रहे टैरिफ को देश के लिए आत्मघाती बताकर उसकी आलोचना की। यहाँ तक कि अमेरिकी अदालतों तक ने टैरिफ लगाने के उनके कृत्य को संविधान के विरुद्ध माना। लेकिन ट्रम्प के दिमाग में ये बात बैठ चुकी है कि अपने इस दाँव से वे पूरी दुनिया को घुटनाटेक करवा लेंगे। दरअसल सोवियत संघ के विखंडन के बाद दुनिया एक ध्रुवीय हो गई थी। विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से अमेरिका ही विश्व की आर्थिक दिशा तय करने लगा था किंतु बीते एक दशक में वैश्विक परिदृश्य में बड़ा बदलाव हुआ। चीन के साथ ही भारत और ब्राज़ील जैसे देश आर्थिक प्रगति के रास्ते पर  तेज गति से आगे बढ़े। उधर दक्षिण अफ्रीका ने भी उपनिवेशवाद की यादों से निकलकर अपनी ताकत दिखाई। अमेरिका के लिए ये चुनौती से कम नहीं था। लेकिन बजाय सामंजस्य बिठाने के ट्रम्प रिंग मास्टर की तरह हंटर फटकारने पर आमादा हो गए। इस बदहवासी में उन्होंने न दोस्त देखा न दुश्मन। जिस यूरोप के साथ अमेरिका के रिश्ते बेहद मधुर रहे उनसे भी ट्रम्प ने पंगा ले लिया। लेकिन जापान जैसे देश से सम्बन्ध बिगाड़ने की उनकी नीति समझ से परे है क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका के हाथों बर्बाद हुए इस देश की विदेश नीति बीते 80 सालों से तो अमेरिका परस्त ही रही। टैरिफ रूपी आतंकवाद ने जब जापान पर भी वार किया तब उसने भी अमेरिकी प्रभुत्व से बाहर निकलने का साहस दिखाया। गत दिवस श्री मोदी और जापान के प्रधानमंत्री की मुलाकात के बाद ये घोषणा हुई कि जापान आगे से भारत में किये जाने वाला निवेश अमेरिकी डॉलर की बजाय अपनी मुद्रा येन में करेगा। श्री मोदी ने जापान की तकनीक और भारतीय कौशल के समन्वय का जो उल्लेख किया वह ट्रम्प को एशिया का जवाब है। वहीं से उन्होंने चीन और भारत को मिलकर इस वैश्विक संकट से निपटने का जो आह्वान किया वह भी कूटनीतिक कुशलता ही कही जायेगी। दक्षिण एशिया के जिन छोटे देशों ने बीते कुछ दशकों में आर्थिक प्रगति की वे भी  टैरिफ के विरुद्ध किसी मंच की तलाश में हैं, ऐसे में यदि जापान भी भारत और चीन के साथ खड़ा हो जाए तब एशिया अकेला  ही  ट्रम्प की दादागिरी का मुकाबला करने में सक्षम हो जाएगा। अमेरिका के समक्ष सबसे बड़ा संकट आने वाला है अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर को आधार मुद्रा मानने के प्रति बढ़ता विरोध। रूस, चीन, भारत, ब्राज़ील और द. अफ्रीका के साथ जापान भी डॉलर की चौधराहट से इंकार करने लगा तब ट्रम्प का टैरिफ रूपी तीर लौटकर उन्हीं को आहत करेगा। चीन के बाद भारत और अब जापान ने भी अमेरिका के विरुद्ध आगे आने की जो हिम्मत दिखाई वह ट्रम्प के टैरिफ रूपी गुब्बारे की हवा निकालने में सफल  साबित होगी ये सोचना गलत नहीं है। जापान की देखासीखी अमेरिका के पिछलग्गू अन्य देश भी ट्रम्प के विरुद्ध मुखर होंगे ये उम्मीद की जा सकती है। श्री मोदी की जापान यात्रा उस दृष्टि से बहुत ही सामयिक और सार्थक है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 August 2025

ऐसी ही सर्वसम्मति क्रीमी लेयर मामले में भी दिखाई जाए



सत्ता और विपक्ष जनता से जुड़े किसी मुद्दे पर एकमत होकर विवादों को दूर करने साथ आयें  , इससे अच्छा और क्या हो सकता है? गत दिवस म.प्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर एक सर्वदलीय बैठक भोपाल स्थित मुख्यमंत्री निवास में हुई जिसमें  ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने पर  पर सभी दलों के नेताओं ने सहमति जताई। इसके बाद तय हुआ कि इसमें आ रहीं कानूनी अड़चनों को दूर करने के लिए विचाराधीन याचिकाओं से जुड़े अधिवक्ताओं को भी एक साथ बिठाकर इस बात के लिए राजी किया जाए कि अदालत में सभी एक स्वर में बोलें जिससे कि फैसला जल्द हो सके। निश्चित रूप से ये स्वागतयोग्य पहल है जिसके लिए मुख्यमंत्री सहित सभी विपक्षी नेता प्रशंसा के पात्र हैं। उल्लेखनीय है कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते हुए ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने संबंधी अध्यादेश जारी किया गया था किंतु उसको अदालत में चुनौतियाँ दी गईं और बात उच्च न्यायालय के बाद बात सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंची। और फिर वह सरकार भी अल्पजीवी रही जिससे  शिवराज सिंह चौहान की सत्ता में वापसी हो गई। अदालतों की कारवाई अपनी शैली में चलती आ रही है। पक्ष - विपक्ष में दलीलें दी गईं। श्रेय लूटने की राजनीति  भी ऐसे मामलों में होना स्वाभाविक है। छोटी पार्टियों का तो दायरा म.प्र में बेहद सीमित है इसलिए मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होता है। 27 फीसदी ओबीसी  आरक्षण भी इन्हीं दोनों के बीच फुटबाल बना रहा। आरोप - प्रत्यारोप भी खूब हुए। नेताओं द्वारा एक - दूसरे को ओबीसी विरोधी कहे जाने पर मानहानि के दावे भी उच्च न्यायालय से होते  हुए सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचे। शीर्ष अदालत द्वारा न जाने कितनी बार सरकार को आड़े हाथों लिया गया। हलफनामे दिये भी गए और वापस लेने की नौबत भी आई। प्रदेश सरकार के सामने दिक्कत ये रही कि आरक्षण के अलावा अन्य जो मुद्दे उछलते गए उनसे भी उसे निपटना पड़ा। इस विवाद के न सुलझने से हजारों शासकीय कर्मचारियों और अधिकारियों पर प्रभाव पड़ा। भर्ती और पदोन्नति दोनों में रुकावट आई। बहरहाल, मुख्यमंत्री द्वारा उठाये गए सार्थक कदम के बाद अब ये उम्मीद बढ़ गई है कि 27 प्रतिशत  ओबीसी आरक्षण में जो कानूनी रुकावट आ रही थी वह जल्द दूर हो सकेगी। डाॅ. यादव स्वयं भी ओबीसी वर्ग से ही आते हैं इसलिए उनका इस विवाद को सुलझाने आगे आना स्वाभाविक ही है किंतु उन्होंने विपक्ष को साथ बिठाकर जिस तरह से सर्वसम्मति बनाई वह उनके राजनीतिक कौशल और व्यवहारिक कार्यशैली का परिचायक है। लेकिन इसी से जुड़ा एक और मुद्दा है जिस पर सभी पार्टियों के नेताओं को एक साथ आकर विमर्श करते हुए रचनात्मक हल निकालना चाहिए ।  वरना आने वाले समय में यह आरक्षण से लाभान्वित जातियों में अंतर्कलह उत्पन्न करने का कारण बने बिना नहीं रहेगा। और वह है क्रीमी लेयर में आ चुके आरक्षित लोगों की संतानों को आरक्षण के दायरे से बाहर करना। क्रीमी लेयर के बारे में सर्वोच्च न्यायालय तक टिप्पणी कर चुका है किंतु जिन राजनीतिक नेताओं और नौकरशाहों की दो पीढ़ियां आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक दृष्टि से सुदृढ़ स्थिति में आ चुकी हैं वे भी अपने बेटे - बेटियों को आरक्षण रूपी रक्षा कवच से वंचित करने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं होते। हालाँकि अब इन्हीं की जातियों के भीतर से ये आवाज उठने लगी है कि जिन परिवारों ने आरक्षण का लाभ लेकर उच्च वर्गीय हैसियत अर्जित कर ली उन्हें खुद होकर अपनी संतानों द्वारा उसके लाभ लेने से मना करना चाहिए। लेकिन आरक्षित वर्ग के किसी भी राजनीतिक नेता अथवा नौकरशाह ने क्रीमी लेयर के लिए  आरक्षण खत्म करने में रुचि नहीं दिखाई। उल्टे अब  ओबीसी के लिए 27 की बजाय 52 प्रतिशत आरक्षण की माँग  छेड़कर नये विवाद को जन्म देने का खेल शुरू किया जा रहा है। कल भी ये मांग मुख्यमंत्री के सामने उठाई गई। जिन नेताओं ने ओबीसी आरक्षण के लिए संघर्ष किया उनमें से ज्यादातर संपन्नता के शिखर पर हैं। कुछ के बेटे - बेटी विदेश जाकर पढ़ाई कर रहे हैं जिसमें कुछ भी गलत नहीं है किंतु उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना उस सामाजिक न्याय की अवधारणा के विरुद्ध है जिसके लिए वह शुरु किया गया। राजनीति की अपनी सीमाएं हैं। इसीलिए नेतागण वोट बैंक के मजड़जाल से बाहर नहीं निकल पाते। लेकिन आरक्षित वर्ग में जो लोग  विकास की सीढ़ियों पर चढ़ चुके उन्हें अपने ही समाज के उस तबके को ऊपर लाने के लिए त्याग करना चाहिए जो अभी भी अपने उत्थान से वंचित है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 August 2025

ट्रम्प के घमंड का जवाब है भारत की स्वतंत्र विदेश नीति



बात सिर्फ रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने तक सीमित होती तब सोचा भी जा सकता था क्योंकि हर देश को अपने व्यापारिक हितों के मद्देनजर अपनी नीति बनाने का अधिकार है । लेकिन उसके लिए राजी नहीं होने पर डोनाल्ड ट्रम्प ने  50 फीसदी का जो टैरिफ भारत पर थोपा उसके पीछे केवल रूस से तेल खरीदी नहीं है। अन्यथा यूरोप के अन्य देश भी तो आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ  व्यापार कर रहे हैं। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने तो इसकी जानकारी खुले आम देते हुए ट्रम्प के फैसले को औचित्यहीन बताया। साथ ही ये खुलासा भी किया कि भारत से ज्यादा तो रूसी तेल की खरीददारी चीन  करता है। अमेरिका के भीतर भी ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए अनाप - शनाप टैरिफ की सार्थकता पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कूटनीतिक माध्यमों से बातचीत जारी है किंतु 27 अगस्त से 50 फीसदी टैरिफ लागू करने का आदेश निकालकर ट्रम्प  अमेरिका का हाथ ऊपर रखने की रणनीति अपना रहे हैं। चूंकि अब तक भारत ने उनकी बेहूदी टिप्पणियों का जवाब देने की जरूरत नहीं समझी इसलिए वे और भन्नाए हुए हैं। जर्मनी के एक अखबार की मानें तो उन्होंने  चार बार फोन किये गए किंतु नरेंद्र मोदी ने बात नहीं की। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत पर दबाव डालकर युद्धविराम करवाने के उनके दावे का भी श्री जयशंकर ने स्पष्ट रूप से खंडन किया किंतु वे अभी भी झूठे बयान दे रहे हैं। इन सबसे लगता है ट्रम्प झूठ का पुलिंदा हैं  और अहंकार में पूरी तरह डूब चुके हैं। उनका टैरिफ दांव अमेरिका के सरकारी खजाने को भरने में तो फिलहाल सफल दिखाई दे रहा है किंतु  अमेरिका द्वारा आयात किये जाने वाले भारतीय सामान की कीमतों में आई उछाल से वहाँ मंहगाई भी बढ़ गई जिससे आम उपभोक्ता नाराज हैं। भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात की जाने वाली वस्तुओं का उपयोग भारतीय मूल के अप्रवासियों के अलावा अमेरिका में बसे  एशियाई देशों के लोगों द्वारा भी किया जाता है। कुछ चीजें तो अमेरिकी जनता को भी बेहद पसंद हैं। ऐसे में ट्रम्प  जिस भारतीय अर्थव्यवस्था को मृत बता चुके हैं उसमें तो जीएसटी की दरों में कमी के अलावा आम जनता के उपयोग की वस्तुओं पर टैक्स कम कर सरकार महंगाई घटाने जैसे कदम उठा रही है वहीं अपनी अमीरी पर ऐंठने वाले अमेरिका में  जनता पर मूल्य वृद्धि का बोझ महज इसलिए लादा जा रहा है क्यों कि भारत ने ट्रम्प के दबाव के समक्ष झुकने से इंकार कर दिया। प्रधानमंत्री श्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच दोस्ताना रिश्ते कूटनीतिक औपचरिकताओं से ऊपर उठ चुके थे। लेकिन दोबारा चुने जाने के बाद  ट्रम्प जिस तरह से  पाकिस्तान के करीब आने लगे वह निश्चित रूप से रहस्यमय है। भारत पर रूस से सम्बन्ध खत्म करने के लिए दबाव बना रहे ट्रम्प उस पाकिस्तान को गोद में बिठाने पर आमादा हैं जो चीन के चरणों में लोटपोट है। रूस के साथ भारत से ज्यादा मजबूत व्यापारिक रिश्ते चीन के हैं। लेकिन उसके बाद भी ट्रम्प चीन को छूने में घबराते हैं। ये  सब देखने के बाद ही लगता है कि ट्रम्प के मन में कुछ और पक रहा है। ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सैन्य बलों के शानदार प्रदर्शन और सामरिक क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता अमेरिका के लिए चिंता का कारण बन गई है। ब्रिक्स जैसे संगठन में भारत की वजनदार उपस्थिति से भी अमेरिका डरा हुआ है। इसीलिए वह टैरिफ रूपी अस्त्र छोड़कर भारत को ब्लैकमेल कर अपनी कुछ शर्तें मनवाना चाहता है। मोदी सरकार ने विदेश नीति को  विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय हितों पर केंद्रित कर बजाय किसी का पिछलग्गू बनने के  स्वतंत्र बना दिया। इसका लाभ ये हुआ कि फ्रांस, इजराइल, ब्रिटेन के राष्ट्राध्यक्ष श्री मोदी से फोन पर बात करने में नहीं डरते। चीन के विदेश मंत्री की हालिया नई दिल्ली यात्रा और प्रधानमंत्री की इसी सप्ताह होने वाली चीन यात्रा काफी कुछ कह रही है। अलास्का से लौटकर रूसी राष्ट्रपति पुतिन का श्री मोदी द्वारा फोन पर लंबी बातचीत भारत के कूटनीतिक महत्व का प्रमाण है। इससे भी बड़ी बात ये हुई कि यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने श्री मोदी से बात कर भारत आने की मंशा  जताई। जाहिर है ट्रम्प ये सब पचा नहीं पा रहे। टैरिफ  बढ़े हुए दो दिन होने के बाद भी भारत द्वारा दिखाई जा रही बेफिक्री अमेरिका के घमण्ड का जवाब है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 27 August 2025

पहाड़ों से छेड़छाड़ नहीं रुकी तो तबाही सुनिश्चित



पहाड़ों की चोटी तक पहुंचने की इच्छा पर्वतारोहियों के अलावा रोमांच प्रेमी पर्यटकों में भी देखी जाती है। अनेक धार्मिक स्थल पहाड़ों में स्थित होने से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। गर्मियों में  पहाड़ों पर बसे हिल स्टेशनों में मैदानी इलाकों के  सैलानियों की भीड़ उमड़ती है। प्रकृति प्रेमियों , साहित्यकारों , कलाकारों और छायाकारों में भी पहाड़ों का आकर्षण है। कोलाहल रहित पहाड़ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होते हैं। एक समय था जब  ऋषि - मुनि वहाँ तपस्या करते थे। जड़ी - बूटियों के खजाने भी उनमें भरे थे। हिमालय से सदा नीरा बड़ी - बड़ी नदियां निकलती  हैं। श्रीनगर में मुगल बादशाहों द्वारा विकसित उद्यान पर्यटकों से भरे रहते हैं। लद्दाख और अरुणाचल  के भव्य बौद्ध मठ भी पर्वतों के धार्मिक महत्व को साबित करते हैं। ब्रिटिश राज में  हिल स्टेशन के रूप में पर्वतीय क्षेत्रों का विकास होने पर  सड़कें और रेल मार्ग भी बने। शिमला तो अंग्रेजों की  ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। हालांकि आजादी के बाद भी  तीर्थस्थलों के अलावा अन्य पर्वतीय स्थानों का विकास हुआ।  बीते कुछ दशकों में मध्यमवर्गीय पर्यटक बढ़ने से इनमें बेतहाशा भीड़ होने लगी है।  सड़कों और पुलों आदि के निर्माण हेतु वृक्षों की कटाई और पहाड़ों की छटाई भी व्यापक तौर पर की गई । उत्तराखंड में टिहरी बांध जैसी परियोजना भी बनी । पनबिजली संयंत्रों के लिए नदियों के बहाव को मोड़न सुरंगें बनाई गईं। इन सबका दुष्परिणाम धीरे - धीरे आने लगा । भूस्खलन , भूकंप , ग्लेशियरों का सिकुड़ना आदि लक्षणों के जरिए प्रकृति ने चेतावनी देना जारी रखा किंतु विवेकहीन विकास और आमोद - प्रमोद हेतु  किए जाने वाले पर्यटन ने उन संकेतों को उपेक्षित किया । यही कारण है कि  उत्तराखंड , हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के जिन क्षेत्रों में मानवीय आवाजाही ज्यादा होती  है वहां पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया । पर्वतों  को क्षति पहुंचाए जाने से उनकी आधारभूत संरचना को हुए नुकसान की वजह से  प्राकृतिक आपदाएं जल्दी - जल्दी आने लगी हैं।  समूचे हिमालय क्षेत्र में भूस्खलन, बादल फटने और ग्लेशियरों के टूटने  से आये सैलाब की ताजा घटनाओं के लिए पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक संरचना से  छेड़छाड़ ही जिम्मेदार  है । जहां कुछ दिनों के भीतर ही सैकड़ों लोग जान गंवा बैठे और अनेक मानवीय बस्तियाँ क्षण भर में जल प्रलय का शिकार होकर अस्तित्वहीन हो गईं। यद्यपि  अति वृष्टि को भी इसका कारण माना जा रहा है। लेकिन सही बात ये है कि पहाड़ों को भीतर से कमजोर कर दिए जाने के कारण ही  वे अति वृष्टि अथवा भूकंप के मामूली झटके झेलने में असमर्थ होते जा रहे हैं। ये देखते हुए हिमालय पर्वत श्रंखला  के विभिन्न क्षेत्रों में आये संकट को तात्कालिक कारणों से जोड़ना सच्चाई से मुँह चुराने जैसा होगा   उत्तराखंड में चार धाम यात्रा मार्ग में  जिस तरह रुकावट आ रही हैं वे इस बात को इंगित करती हैं कि पहाड़ पर मानवीय गतिविधियों को कम किया जाना चाहिए। वाहनों की आवाजाही  के लिए बनाई गई  बारहमासी सड़कें भी भूस्खलन के कारण बार - बार अवरुद्ध हो जाती हैं। इन्हें बनाने में भले ही कितनी  भी तकनीकी कुशलता दिखाई गई किंतु ये भूल जाना निरी मूर्खता है कि प्रकृति को बांधकर रखा जा सकता है। कुछ वर्ष पहले अमरनाथ में अचानक  जल सैलाब आया था। केदारनाथ की त्रासदी के घाव तो अब तक  ताजा हैं। दुख इस बात का है कि हर दुर्घटना के बाद प्रकृति और पर्यावरण  सुरक्षा की बातें तो  होती हैं लेकिन जो सुधार होना चाहिए उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता । सही बात तो ये है कि पहाड़ों को भी शांति के साथ आराम चाहिए। हम अपने आनंद के लिए  गैर जिम्मेदाराना आचरण से उन्हें दुखी कर आते हैं। इसी कारण उनकी सहनशक्ति जवाब देने लगी है। कभी - कभी तो लगता है कोरोना काल के दौरान देश भर में लगाए गए लॉक डाउन की तरह साल में कुछ समय तक वहां  आवाजाही पर नियंत्रण लगाया जावे। उत्तराखंड में स्थित तीर्थस्थलों के साथ हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के पर्यटन स्थलों में भी  तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की संख्या सीमित करना जरूरी  है।  लद्दाख में बीते कुछ दशकों के भीतर जिस तरह से  पर्यटकों की भीड़ उमड़ने लगी है। लेह से आगे नुब्रा घाटी जैसे इलाकों तक सैलानी जाने लगे हैं उसकी वजह से वहां के जिम्मेदार लोग चिंतित हैं। उत्तराखंड की स्थिति तो ये है कि पहाड़ों के बदलते मौसम और बिगड़ते मिजाज  के चलते बड़ी संख्या में गांव खाली होते जा रहे हैं। स्थिति और न बिगड़े इस हेतु गंभीर चिंतन आवश्यक है। बेहतर हो बिना समय गंवाए  पहाड़ों के क्रोध को शांत करने का उपाय तलाश लिया जाए वरना भविष्य में होने वाली तबाही की कल्पना ही भयभीत कर देती है।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 26 August 2025

कांग्रेस की बची - खुची जड़ें खोदने में जुटे दिग्विजय और कमलनाथ


म.प्र में कांग्रेस लंबे समय बाद 2018 में सत्ता में लौटी थी। 2003 में दिग्विजय सिंह के 10 वर्षीय शासन को भाजपा ने उखाड़ फेंका। बिजली, सड़क और पानी जैसे मूलभूत मुद्दों के साथ ही उमाश्री भारती के तेजस्वी व्यक्तित्व को आगे कर भाजपा ने ऐतिहासिक विजय अर्जित की। यद्यपि कानूनी पेच के कारण उमाश्री को जल्द ही गद्दी छोड़नी पड़ी । उनकी जगह आये बाबूलाल गौर भी मुख्यमंत्री  ज्यादा समय नहीं रह सके और  भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान को सरकार की बागडोर सौंप दी। जल्दी - जल्दी मुख्यमंत्री बदलने के कारण  सरकार के स्थायित्व पर भी शंका व्यक्त की जाने लगी किंतु श्री चौहान 2008 और 13 के चुनावों में भाजपा को बहुमत दिलवाने में सफल रहे। 2018 का चुनाव भी उनके नेतृत्व में ही लड़ा गया जिसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों स्पष्ट बहुमत से थोड़ा पीछे रह गए। कांग्रेस के पास 8 विधायक अधिक होने से  उसे सरकार  बनाने का अवसर मिला। सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों ने अपना समर्थन देकर उसे स्पष्ट बहुमत की देहलीज पार करवा दी। इस चुनाव में  प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कमलनाथ और चुनाव संयोजक की भूमिका में ज्योतिरदित्य सिंधिया ने शिवराज सिंह  को कड़ी चुनौती दी। वहीं दिग्विजय सिंह चुनाव के पहले सपत्नीक पैदल नर्मदा यात्रा कर कांग्रेस के लिए जमीन तैयार कर चुके थे। इन तीनों के बीच सामंजस्य  काम कर गया। वरना दिग्विजय सिंह और कमलनाथ को एक साथ माना जाता था जो मिलकर श्री सिंधिया को प्रदेश की राजनीति में जमने ही नहीं देते थे। लेकिन राहुल गाँधी  की निकटता के कारण जब उन्हें चुनाव का संयोजक बनाया गया तो ये माना जाने लगा कि उनके स्वर्गीय पिता माधवराव सिंधिया की मुख्यमंत्री बनने की अधूरी रही इच्छा शायद बेटा पूरी कर देगा। लेकिन दिग्विजय और कमलनाथ के चक्रव्यूह ने  घेराबंदी करते हुए उन्हें सत्ता से वंचित कर दिया। इसके बाद ये संभावना थी  कि  ज्योतिरदित्य को  प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संगठन की बागडोर सौंप दी जायेगी किंतु श्री नाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद भी  प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने राजी नहीं हुए। चूंकि कुछ महीनों बाद 2019 का लोकसभा चुनाव होना था इसलिए  पार्टी आलाकमान ने भी यथास्थिति बनाये रखना उचित समझा। लेकिन लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य गुना सीट पर हार गए। कांग्रेस को एकमात्र सीट मिली छिंदवाड़ा की जहाँ कमलनाथ ने अपने पुत्र नकुल नाथ को जितवा लिया। इस हार से श्री सिंधिया को जबरदस्त धक्का लगा। उससे उबरने के लिए वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने की कोशिश में जुटे किंतु कमलनाथ ने उनकी राह में बाधा बनते रहे। 2020 में राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव होने वाले थे । उम्मीद थी कि कांग्रेस उन्हें उच्च सदन में भेजकर सांसद बने रहने का मौका देगी किंतु दिग्विजय सिंह  और कमलनाथ की जुगलबंदी से वे आशंकित हो उठे और अपने 22 समर्थक विधायकों  से इस्तीफा दिलवाकर सरकार गिरवा दी। जिससे नाटकीय परिस्थितियों में शिवराज सिंह फिर मुख्यमंत्री बन बैठे। भाजपा ने श्री सिंधिया को न सिर्फ राज्यसभा में भेजा अपितु मोदी सरकार में मंत्री भी बना दिया। उनके समर्थक विधायकों को भी मंत्री बनाकर उपकृत किया गया। कोरोना काल में राजनीति वैसे भी ठंडी रही। लेकिन 2023 के विधानसभा और 24 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। छिंदवाड़ा  में श्री नाथ के बेटे तक हार गए। अंततः कमलनाथ से प्रदेश अध्यक्ष पद छीनकर युवा हाथों में सौंप दिया गया। हाल ही में  नये जिलाध्यक्षों की नियुक्ति भी हो गई। इसी दौरान अचानक कमलनाथ सरकार गिरने को लेकर दिग्विजय सिंह द्वारा की गई टिप्पणी पर कांग्रेस की आंतरिक राजनीति गर्माने लगी। दिग्विजय सिंह ने संकेतों में ये कह दिया कि कमलनाथ द्वारा श्री सिंधिया की उपेक्षा से वे क्षुब्ध होकर पार्टी छोड़ गए । उन्होंने किसी उद्योगपति के यहाँ उन दोनों के बीच सुलह की कोशिश होने का भी खुलासा किया। साथ ही ज्योतिरादित्य  के साथ हुए वायदे से मुकरने की बात भी उजागर कर डाली। इस पर कमलनाथ ने जवाबी तीर छोड़ते हुए कह दिया कि श्री सिंधिया की नाराजगी का कारण वह अवधारणा थी कि सरकार दिग्विजय चला रहे हैं। दो वरिष्ट नेताओं द्वारा दिये विरोधाभासी बयानों से पार्टी की गुटबाजी और अंतर्कलह एक बार फिर सामने आ गई है। दरअसल दिग्विजय और कमलनाथ दोनों की राजनीति अस्ताचल की ओर है किंतु वे अपने बेटे को स्थापित करने के लिए हाथ - पाँव मार रहे हैं । लेकिन ऐसे समय जब प्रदेश में कांग्रेस बेहद बुरे दौर से गुजर रही हो तब दोनों बुजुर्ग नेताओं द्वारा गड़े मुर्दे उखाड़े जाने से पार्टी के युवा तबके में भारी नाराजगी है। बड़ी मुश्किल से तो म.प्र में कांग्रेस को इन दोनों के शिकंजे से मुक्ति मिली किंतु  ये पार्टी की बची - खुची जड़ें खोदने में जुटे हैं। लेकिन उनके झगड़े में जिस उद्योगपति का जिक्र दिग्विजय सिंह ने किया  उसका नाम भी उन्हें सामने लाना चाहिए। वरना ये आशंका और मजबूत होगी कि वह उद्योगपति कहीं उनमें से तो नहीं जिन्हें श्री गाँधी सुबह - शाम गरियाया करते हैं।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 25 August 2025

ट्रम्प जो गड्ढा खोद रहे हैं उसी में उनका गिरना तय


 
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पूरी तरह से भारत विरोधी रुख अख्तियार कर लिया है। जिन सर्जिया गोर को भारत में अपना  राजदूत नियुक्त किया गया वे राजनयिक अनुभव शून्य हैं। भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश में राजनयिक अनुभव शून्य राजदूत भेजना  दर्शाता है कि ट्रम्प का व्यवहार बेहद उपेक्षापूर्ण है। भारत  ने भी  जैसे को तैसा की नीति अपना ली है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्रम्प से बात नहीं की। और कैनेडा की यात्रा के बाद उनके आमंत्रण पर वॉशिंगटन जाने में भी असमर्थता व्यक्त कर दी।  ट्रम्प को ये तौहीन बर्दाश्त नहीं हुई और उसके बाद उनका रवैया शत्रुतापूर्ण होने लगा। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध रोक पाने में असफलता हाथ लगने से उनका हौसला पस्त है। रूस और चीन दोनों  जिस तरह खुलकर भारत के पक्ष में खड़े हो गए उससे भी वे भन्नाये हुए हैं। उनको  उम्मीद थी कि  50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की उनकी धमकी के बाद भारत  हाथ जोड़कर गिड़गिड़ायेगा और रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना  बंद कर  देगा। लेकिन मोदी सरकार ने ट्रम्प के दबाव को पूरी तरह नजरंदाज करते हुए रूस से तेल के साथ ही रक्षा सामग्री के नये सौदे कर डाले। अमेरिका का भारत के इस व्यवहार से परेशान होना स्वाभविक था। बीते कुछ दिनों में वैश्विक परिस्थितियाँ जिस तरह बदलीं उनसे ट्रम्प की वजनदारी में गिरावट आई। ये कहना गलत न होगा कि अमेरिका के कमजोर माने गए राष्ट्रपतियों की भी इतनी जगहंसाई नहीं हुई जितनी ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ही करवा ली। इसका सबसे बड़ा कारण उनका भारत जैसे भरोसेमंद देश के साथ किया गया घटिया व्यवहार है। पाकिस्तान सरीखे धोखेबाज को जिसने न्यूयॉर्क में 9/11 की आतँकवादी घटना के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को छिपाकर रखा, गोद में बिठाने की जो हिमाकत ट्रम्प ने की उसके बाद उनके प्रति भारत का कठोर होना स्वाभाविक ही है। प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने परिपक्व कूटनीति का परिचय देते हुए ट्रम्प की बेहूदी टिप्पणियों और धमकियों की उपेक्षा करते हुए ठोस रणनीति बनाते हुए विभिन्न देशों के साथ व्यापार के दरवाजे खोल दिये। सबसे बड़ी बात ये देखने मिली कि रूस और चीन ने भी भारत को अपने बाजार उपलब्ध करवाने की पेशकश कर दी। यही वजह है कि 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने के दो दिन पहले देश में कोई घबराहट नहीं है। इसका  प्रमाण आज सप्ताह के पहले दिन शेयर बाजार के उछाल मारने से मिला। भारत के तमाम उद्योगपतियों ने भी जिस हिम्मत के साथ  अमेरिकी दबाव में नहीं आने की नीति का समर्थन करते हुए निर्यात से होने वाले नुकसान की चिंता को हवा में उड़ा दिया वह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब प्रतिकूल हालातों में मजबूती से खड़े रहने की क्षमता अर्जित कर चुका है। ऐसी स्थितियों में जनता का समर्थन  सरकार के लिए बेहद जरूरी होता है। उस दृष्टि से भारत के आम नागरिक ने भी अपने  बुलंद हौसलों का परिचय देकर पूरी दुनिया को ये संदेश दे दिया कि केवल युद्ध ही नहीं वरन देश की प्रतिष्ठा पर आये किसी भी संकट का सामना करने पूरा देश एकजुट है। 50 फीसदी टैरिफ लागू होने में मात्र दो दिन शेष हैं। लेकिन न सरकार चिंतित है और न ही उद्योग - व्यापार जगत में लेश मात्र भी घबराहट दिख रही है। आपदा में अवसर उत्पन्न करने का जो आह्वान कोविड काल में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने किया वह इस संकट के दौरान भी पूरी तरह फलीभूत होता प्रतीत हो रहा है। ट्रम्प के मूर्खतापूर्ण फैसलों से  दुनिया भर में अस्थिरता फैल गई है।  विश्व व्यापार संगठन के तहत हुए समझौते रद्दी की टोकरी में फेंककर ट्रम्प ने जो दुस्साहस किया वह उन्हीं के गले की फांस बन गया है। यूरोप के बड़े - बड़े देशों को घुटनाटेक करवाने के बाद ट्रम्प का दिमाग सातवें आसमान पर था किंतु भारत ने उनकी ऐंठ की कोई परवाह नहीं की और अमेरिका के साथ रक्षा और उड्डयन के तमाम बड़े सौदे ठंडे बस्ते में डालकर दिखला दिया कि उसका काम अमेरिका के बिना भी चल सकता है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि ट्रम्प अपनी हरकतों से बाज आ जाएंगे। सर्वशक्तिमान होने का जो दंभ उनमें भरा है उसके कारण बौखलाहट में वे और भी ऊलजलूल  हरकतें करते रहेंगे। लेकिन भारत ने जिस धैर्य और रणनीतिक चातुर्य का परिचय अब तक दिया वही आगे भी जारी रखना चाहिए क्योंकि ट्रम्प दूसरों के लिए जो गड्ढा खोद रहे हैं उसमें उनका गिरना तय है। अमेरिका में ही उनके विरुद्ध माहौल तैयार होने लगा है। बड़ी बात नहीं वे अपना कार्यकाल भी पूरा न कर पाएं।


-रवीन्द्र वाजपेयी