Friday, 31 May 2024

नतीजा कुछ भी हो किंतु विपक्ष ने मुकाबला जोरदार किया


1 जून को लोकसभा चुनाव के मतदान की प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी। 4 जून की दोपहर तक ये भी निश्चित हो जायेगा कि अगली सरकार किसकी होगी। चुनाव शुरू होने के पहले लग रहा  था कि  विपक्ष नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सामने टिक नहीं सकेगा। 22 जनवरी को अयोध्या में राम मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा के समय देश का जो माहौल था उसके बाद बड़े - बड़े राजनीतिक विश्लेषक भी आश्वस्त हो चले थे कि मुकाबला इकतरफा होगा। प्रधानमंत्री द्वारा 400 पार का जो नारा दिया वह उसी माहौल का परिणाम था। लेकिन धीमी शुरुआत के बाद विपक्ष ने गति पकड़ी और राष्ट्रवाद, हिंदुत्व तथा राम मन्दिर जैसे मुद्दों के जवाब में चुनाव को बेरोजगारी और महंगाई जैसी उन समस्याओं पर केंद्रित करने का प्रयास किया जो आम आदमी की ज़िंदगी से नजदीकी से जुड़ी हुई हैं। इसी के साथ  भाजपा को स्थानीय मुद्दों पर घेरने की रणनीति बनाई। इंडिया गठबंधन में काँग्रेस ही सही मायने में राष्ट्रीय पार्टी है। कहने को तो यह दर्जा आम आदमी पार्टी को भी हासिल है किंतु उसका फैलाव बेहद सीमित है। लेकिन गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय पार्टियों की दादागिरी के समक्ष काँग्रेस ने बिना ऐंठ दिखाये जिस तरह से समर्पण किया उसकी वजह से भाजपा को अनेक  राज्यों में उन क्षेत्रीय छ्त्रपों से जूझना पड़ा जो क्षेत्रीय या जातीय भावनाओं का प्रतिनिधित्व काँग्रेस से बेहतर करते हैं। इसी तरह जिन राज्यों में काँग्रेस सीधा मुकाबला करने की स्थिति में रही वहाँ गठबंधन के अन्य घटक लड़ाई से दूर हो गए। यद्यपि प. बंगाल और केरल अपवाद रहे  जहाँ क्रमशः ममता बैनर्जी और वाम दलों ने काँग्रेस को साथ रखने से मना कर दिया। लेकिन वे गठबंधन में बने रहने की बात भी दोहराते रहे। इस समीकरण से भाजपा की आसान दिख रही जीत कड़े संघर्ष में  बदलने का एहसास होने लगा। उ.प्र को छोड़कर भाजपा के प्रभाव वाले किसी भी  प्रदेश में चूंकि प्रादेशिक नेतृत्व पहले जैसा सशक्त नहीं रहा लिहाजा पूरा दारोमदार प्रधानमंत्री श्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह पर आकर टिक गया। इस कारण विपक्ष को हावी होने का अवसर मिला। रही - सही कसर पूरी कर दी पहले चरण के कम मतदान ने जिसका विश्लेषण मोदी लहर के कमजोर पड़ने के तौर पर किया जाने लगा। हालांकि जब अगले चरणों में भी यह चलन जारी रहा तब उक्त धारणा बदली किंतु ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि साधन संपन्नता के बावजूद भाजपा की आक्रामकता तुलनात्मक तौर पर विपक्ष से कम रही। पार्टी के जिस आई.टी सेल ने बीते कुछ सालों में जबरदस्त छवि बना रखी थी वह भी इस चुनाव में उतना असरकारी नहीं दिखा। सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थक 400 पार का नारा दोहराते तो नजर आये किंतु यू ट्यूब में भाजपा को घेरने का जो कार्य कतिपय पत्रकारों ने किया वह विपक्ष को मुकाबले में दिखाने में सफल रहा। इस मोर्चे पर भी भाजपा कमजोर नजर आई। हालांकि प्रशांत किशोर ने अंतिम दौर में आयेगा तो मोदी ही की अवधारणा को बल प्रदान किया किंतु उनको भाजपा समर्थक प्रचारित करते हुए  गलत साबित किया जाने लगा। भाजपा की दिक्कत ये रही कि वह श्री किशोर द्वारा दिये गए आंकड़े  को स्वीकार नहीं कर सकती थी क्योंकि वे उसकी सीटें बढ़ने और सरकार लौटने को तो स्वीकार कर रहे थे  किंतु 370 और 400 पार के दावे को अतिरंजित मानते थे। जवाब में डाॅ. योगेंद्र यादव ने भी एक आकलन जारी कर भ्रम फैलाने का दांव चला जिसमें भाजपा को बहुमत से दूर बताया गया। कुल मिलाकर विपक्ष ने अपनी मोर्चेबन्दी से भाजपा को काफी छकाया । यही वजह रही कि शुरुआती मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के बाद बीच - बीच में वह खुद उसके प्रभाव में आई। यद्यपि ये कहना तो जल्दबाजी होगी कि भाजपा सत्ता गंवाने जा रही है क्योंकि दबी जुबान ही सही डाॅ. यादव ने भी उसे 250 से कम सीटें नहीं दीं वहीं काँग्रेस को 100 सीटें मिलने की बात कोई नहीं कह रहा। विपक्ष द्वारा बनाये गए माहौल में कितनी दम रही उसका काफी कुछ जायजा तो 1 जून की शाम को एग्जिट पोल के नतीजे दे देंगे । लेकिन एक बात तो स्वीकार करना ही होगी कि उसने बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर भाजपा को रक्षात्मक होने बाध्य कर दिया। चूंकि विपक्ष के पास खोने के लिए कुछ था भी नहीं इसलिए उसने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। दरअसल काँग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को ये समझ में आ चुका है कि मोदी सरकार की वापसी होने पर उनका भविष्य अंधकारमय हो जायेगा। जहाँ तक बात भाजपा की है तो अभी भी संभावना उसकी जीत की है लेकिन तीसरी बार सत्ता में आने के बाद श्री मोदी को बेरोजगारी और महंगाई की समस्या को हल करने के लिए ठोस उपाय करना होंगे क्योंकि भले ही बोले न किंतु उसका परंपरागत समर्थक मध्यम वर्ग भी इन मुद्दों पर नाखुश है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 May 2024

इस चुनाव में मिले खट्टे - मीठे अनुभवों से सबक लेना देश हित के लिए जरूरी




लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का प्रचार आज शाम बंद हो जाएगा। 1 जून को मतदान और 4 जून को परिणाम आ जाएंगे। सबकी निगाहें अंतिम चरण के मतदान के पश्चात आने वाले एग्जिट पोल पर लगी हुई हैं जो नतीजों की झलक देते हैं। इनकी प्रामाणिकता को लेकर बहस होती रही है क्योंकि अनेक प्रतिष्ठित एजेंसियों द्वारा किये गए एग्जिट पोल गलत भी साबित हो चुके हैं। बावजूद उसके चुनाव पूर्व सर्वेक्षण की तरह से ही एग्जिट पोल भी चुनाव प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। टीवी चैनलों के अलावा विभिन्न राजनीतिक दल भी प्रत्येक चरण के बाद एग्जिट पोल करवाते हैं ताकि अगले चरण हेतु रणनीति में जरूरी बदलाव कर सकें। इस बार सात चरणों में हुए चुनाव पर भी सवाल उठे हैं। 19 अप्रैल को शुरू हुए मतदान की प्रक्रिया  1 जून तक चलना थका देने वाला रहा। दो - तीन चरणों के बाद मुद्दों का दोहराव होने से मतदाता भी ऊबने लगा और नेताओं के पास भी कहने को कुछ नहीं बचा तो निरर्थक बातें कही जाने लगीं। तेज गर्मी के कारण मतदान का प्रतिशत कम रहने से राजनीतिक पार्टियों के अलावा चुनाव विश्लेषक भी हैरान रहे। चुनाव आयोग द्वारा मतदान बढ़ाने किये गए तमाम प्रयास बेअसर साबित हुए। इससे किसे लाभ हुआ किसे नुकसान ये तो परिणाम बतायेंगे लेकिन इतने महंगे  और  ताबड़तोड़ प्रचार के बाद  मतदाताओं का बड़ा वर्ग  अपने अधिकार का उपयोग करने के प्रति अनिच्छुक क्यों रहा यह अध्ययन और शोध का विषय है क्योंकि जीवंत लोकतंत्र में मतदाता की  हिस्सेदारी प्रभावशाली होना जरूरी है। यदि गर्मी ही कम मतदान का असली कारण है तब चुनाव के लिए ऐसा समय चुना जाना चाहिए जो मतदान बढ़ाने में सहायक हो। इससे भी बड़ी बात ये है कि अधिकतम चार चरणों में मतदान की प्रक्रिया संपन्न कारवाई जाए। इस चुनाव में मतदाता का मन जानने की कोशिश करने वाले परेशान हो उठे क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले चुनाव पर स्थानीय मुद्दे हावी होते दिखे। इस चुनाव की खास बात रही राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव को जाति केन्द्रित बना देना। धर्म का उपयोग भी जमकर हुआ किंतु जाति उस पर भारी पड़ती दिखी। प्रत्याशी की योग्यता और छवि भी उसके आगे कमतर प्रतीत हुई। उदाहरण के लिए सुशिक्षित और शरीफ उम्मीदवार की जाति के मतदाता किसी अल्प शिक्षित या खराब छवि वाले उम्मीदवार के मुकाबले कम हैं तो उसकी जीत खतरे में मानी जाती है। इस मामले में सभी दल एक ही थैली के चट्टे - बट्टे कहे जा सकते हैं। छोटे - छोटे जातीय समूहों के नेताओं के सामने राष्ट्रीय पार्टियां जिस तरह झुकती हैं वह जाति के वर्चस्व का खुला प्रमाण है। इसका दुष्परिणाम सामाजिक विघटन के रूप में देखने मिल रहा है। जातिगत विद्वेष पहले से ज्यादा होना देश के लिए बड़ा खतरा है। लेकिन राजनीति चलाने वालों को चूंकि चुनाव से आगे सोचने की फुरसत नहीं है इसलिए जाति के नाम पर ज़हर फैलाने की होड़ मची हुई है। वोटों के नये - नये ठेकेदार पैदा होते जा रहे हैं। यहाँ तक कि पढ़े - लिखे तबके में भी जाति का असर स्पष्ट रूप से दिखता है। इस प्रवृत्ति को राजनीतिक पार्टियों और उनका नेतृत्व करने वालों की विफलता कहा जाना गलत न होगा। इस चुनाव में  मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त उपहारों का जिस तरह बखान हुआ वह चुनाव की बजाय किसी उत्पाद की मार्केटिंग  प्रतीत हुई। बिना सोचे समझे किये जा रहे कतिपय वायदों से देश हित किस तरह प्रभावित होगा इसकी चिंता नहीं किया जाना खतरनाक लक्षण है। चुनाव जीतने के लिए मतदाताओं को लुभाना स्वाभाविक प्रक्रिया है किंतु उसकी आड़ में देश और समाज को आग के हवाले करने का प्रयास असहनीय है। दुख की बात ये है कि राजनीतिक स्वार्थों की खातिर राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा की जा रही है। इस चुनाव में किसकी जीत होगी ये उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि देश का हित किसके हाथों में सुरक्षित रहेगा? इस बात की जरूरत हर समझदार व्यक्ति महसूस कर रहा है कि एक देश एक चुनाव की व्यवस्था वापस लौटनी चाहिए जिसके अभाव में निर्णय प्रक्रिया और विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं। बीते दो महीनों से केंद्र और राज्यों की सरकारों के अनेक जरूरी काम आचार संहिता की वजह से रूके पड़े हैं। ये सब देखते हुए चुनाव के बाद इस बात पर राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श होना चाहिए कि चुनाव प्रक्रिया और राजनीतिक बहस का स्तर किस तरह सुधारा जाए? 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 29 May 2024

जेल से सरकार चल सकती है तो इलाज क्यों नहीं हो सकता




दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक बयान काफी चर्चित हुआ था जिसमें वे आम आदमी पार्टी के लोगों से कह रहे थे कि जेल जाने से न डरें क्योंकि वह दिल्ली सरकार के ही अधीन है। उनकी उस बात को हल्के में लिया गया था। लेकिन जब उनके कुछ मंत्री जेल गए और उन्हें घर जैसी सुविधाएं मिलीं तब उक्त बयान का मर्म समझ में आ गया। रोचक बात ये है कि दिल्ली पुलिस का नियंत्रण केंद्र सरकार के पास है जबकि तिहाड़ जेल दिल्ली सरकार के अधीन है। इसलिए उसमें बंद आम आदमी पार्टी के नेताओं को  विशेष सुविधाएं मिल रही हों तो उसमें आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। वैसे भी जेल में बंद कैदियों को पैसा खर्च करने पर जो चाहो मिल जाता है। कुख्यात माफिया सरगनाओं द्वारा जेल में बैठकर मोबाइल फोन के जरिये अपने गैंग का संचालन किये जाने के दर्जनों उदाहरण सामने आ चुके हैं। पैसे के दबाव और राजनीतिक प्रभाव के चलते जेल के भीतर भी ऐशो - आराम के सारे इंतजाम होते हैं , ये खुला सच है। अनेक बंदी जेल प्रशासन के साथ संगामित्ती कर  अस्पताल में भरती हो जाते हैं। इन सबके लिए तिहाड़ जेल भी बुरी तरह बदनाम है। ऐसे में श्री केजरीवाल द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से  अपनी अंतरिम जमानत एक सप्ताह बढ़ाने की जो अर्जी लगाई गई उसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रद्द कर दिये जाने से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। उल्लेखनीय है जैसे ही  उन्हें गिरफ्तार किया गया वैसे ही आम आदमी पार्टी जेल में उनका स्वास्थ्य बिगड़ने का शोर मचाने लगी। वे मधुमेह के मरीज हैं इसलिए अदालत ने उनको घर से लाया भोजन करने की सुविधा प्रदान की थी। उसके बाद भी ये आरोप लगाया जाने लगा कि जेल प्रशासन की लापरवाही से उनका वजन तेजी से घट गया और ब्लड शुगर की मात्रा भी बढ़ गई। जबकि जेल प्रशासन ने प्रत्येक आरोप का अधिकृत रूप से खंडन किया। उसके बाद जब न्यायालय ने चुनाव प्रचार के नाम पर मुख्यमंत्री को 1 जून तक अंतरिम जमानत दी तो उस फैसले पर काफी उंगलियाँ उठीं क्योंकि इसी मामले में बंद पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की जमानत अर्जियाँ लगातार अस्वीकृत हुईं। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी चुनाव प्रचार हेतु रिहाई नहीं मिली। सबसे बड़ी बात बात ये है कि श्री केजरीवाल ने जेल जाने पर भी मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र नहीं दिया और जेल में बैठे -  बैठे सरकार चलाने की घोषणा कर डाली। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनको हटाये जाने संबंधी याचिकाएं ये कहते हुए खारिज कीं कि संविधान इस बारे में मौन है।  स्मरणीय है श्री सिसौदिया एवं दिल्ली सरकार के अन्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने भी  गिरफ्तारी के काफी समय बाद पद छोड़ा था। 2 जून को जेल जाने से बचने के लिए श्री केजरीवाल ने अदालत में जो आधार बताये उनके मुताबिक उन्हें गंभीर बीमारियों का अंदेशा है जिसकी तत्काल जाँच  जरूरी है। इसके बाद ही  चर्चा होने लगी कि जेल से बाहर आते ही मुख्यमंत्री ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार में कूद पड़े। दिल्ली के अलावा उ.प्र और पंजाब में भी उन्होंने अनेक जनसभाओं और रोड शो सरीखे आयोजनों में घंटो मौजूदगी दर्ज करवाई। इस दौरान उनको स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या नजर नहीं आई। ऐसे में वे जेल जाने से बचने के लिए अदालत की सहानुभूति अर्जित करना चाह रहे थे। ऐसा लगता है उनको अंतरिम जमानत मिलने पर न्यायपालिका की जिस प्रकार से आलोचना हुई उसका प्रभाव सर्वोच्च न्यायालय पर  आज का फैसला देते समय  पड़ा होगा। यदि श्री केजरीवाल अस्वस्थ हैं और उनकी जाँच जरूरी है तो वह होनी चाहिए किंतु  मुख्यमंत्री रहते हुए जेल से जब वे सरकार चला सकते हैं तब अपनी चिकित्सकीय  जाँच और इलाज करवाने का आदेश भी जेल प्रशासन को दे सकते हैं जो कि उनकी सरकार के अधीन है। वैसे भी  श्री केजरीवाल न्यायायिक हिरासत में हैं न कि सजायाफ्ता कैदी। इसी वजह से उनको जेल में अनेक ऐसी सुविधाएं दी गईं जो साधारण बन्दियों को नहीं मिलतीं। इसीलिए जब उन्होंने अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाने की अर्जी लगाई तब ये टिप्पणियां सुनाई देने लगीं कि वे  लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद की राजनीतिक उठापटक में शामिल रहने के लिए हाथ - पाँव मार रहे हैं। अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया है लिहाजा उनको 2 जून को जेल जाना होगा परंतु  जब वे मुख्यमंत्री के रूप में  जेल में बैठे - बैठे सरकार चला सकते हैं तब कम से कम अपनी बीमारी की जांच और इलाज से उनको कौन रोक सकता है?

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 May 2024

घोषणापत्र के वायदों को पूरा करना अनिवार्य किया जाए


एक प्रत्याशी किसी मंंदिर में गया और आरती की थाली में कुछ रुपये डाल दिये। विरोधी पक्ष ने उसका वीडियो निर्वाचन अधिकारी को भेजा जिसने उसे नोटिस देकर जवाब मांग लिया। ऐसा ही एक उम्मीदवार द्वारा भिखारी को पैसे देने पर हुआ। चुनावों के दौरान प्रत्याशी द्वारा  मतदाताओं को पैसा या कोई वस्तु देना आचार संहिता का उल्लंघन माना जाता है। हालांकि शायद ही इस वजह से किसी का चुनाव रद्द हुआ होगा।  इसके ठीक उलट  किसी  प्रत्याशी या राजनीतिक पार्टी द्वारा  मतदाताओं को धनराशि या कोई वस्तु देने का वायदा चुनाव घोषणा पत्र  में किया जाता है तो आपतिजनक नहीं माना जाता। मतदाता को ग्राहक समझकर लुभाने का चलन तमिलनाडु से शुरू हुआ जहाँ टीवी, मिक्सी और मंगलसूत्र जैसे वायदे कर चुनावी मुकाबला जीता जाने लगा। धीरे - धीरे ये फार्मूला अन्य राजनीतिक दल भी अपनाने लगे। बात बढ़ते - बढ़ते नगद राशि देने तक आ पहुंची। साइकिल, लैपटाॅप, टेबलेट जैसी चीजें भी आम हो चली हैं। आटो वालों को मुफ्त ईंधन, महिलाओं को मुफ्त रसोई गैस सिलेंडर जैसे वायदे भी सुनाई देते हैं। राष्ट्रीय या प्रमुख क्षेत्रीय दल यदि ऐसा करें तो बात समझ में भी आती है किंतु जो पार्टियां दो - चार उम्मीदवारों तक सीमित हैं वे भी जब आसमां को जमीन पर उतारने का वायदा करती हैं तब हँसी आती है। रेवड़ियां बाँटकर सत्ता का सुख लूटने की इस संस्कृति को लेकर राजनीतिक दलों का रवैया विरोधाभासी है। मसलन मोदी सरकार गरीबों को पाँच किलो खाद्यान्न देती है तो काँग्रेस उसका मजाक उड़ाती है। लेकिन उसने इस चुनाव में 10 किलो का वायदा कर डाला। विभिन्न राज्यों में महिलाओं और वृद्धों को आर्थिक सहायता के तौर पर प्रतिमाह  निश्चित राशि दी जाती है। कांग्रेस हर महिला को सालाना 1 लाख देने का वायदा बढ़ चढ़कर कर रही है। अन्य पार्टियां भी पीछे नहीं हैं। इन वायदों को पूरा करने के लिए सरकारी खजाने पर पड़ने वाले  असर की चिंता किसी को नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए सरकार यदि  सहायता दे तो उसका स्वागत होना चाहिए। इसी तरह निराश्रित वृद्धों और दिव्यांगों को सहायता भी मानवीयता की दृष्टि से उचित है। छात्र - छात्राओं को फीस, पुस्तकें, गणवेश, साइकिल आदि देने का भी औचित्य है। लेकिन इनसे जो वर्ग लाभान्वित हो रहा है वह तो खुश है किंतु बाकी को लग रहा है कि राजनीतिक पार्टियां  वोटों का थोक सौदा करने के लिए उनके कंधों पर करों का भार बढ़ा रही है। इसीलिए असंतोष बढ़ रहा है।  गत वर्ष कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में काँग्रेस द्वारा घोषणापत्र में किये गए कुछ वायदों को गारंटी का नाम दिया गया जिसका लाभ भी उसे मिला। उसके बाद फिर भाजपा में मोदी की गारंटी चल पड़ी। मतदाता निश्चित रूप से इनके प्रति आकर्षित होते हैं। महिलाओं को  मुफ्त बस यात्रा, 100 यूनिट तक निःशुल्क बिजली और पानी जैसे वायदे अब  आम हो चले हैं। लेकिन गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक के चुनाव में दी गई गारंटियों के विरुद्ध प्रस्तुत याचिका ये कहते हुए खारिज कर दी कि जनकल्याण की योजनाओं के वायदे कदाचरण की श्रेणी में नहीं आते। इस फैसले के बाद अब आगामी चुनावों में मुफ्त उपहारों का दायरा बढ़ता जायेगा। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद अनेक ऐसी ही योजनाएं चलाकर लोकप्रिय बने हुए हैं किंतु वे भी इनके दूरगामी नुकसानों के प्रति आगाह कर चुके हैं।  चूंकि  सर्वोच्च न्यायालय ने ही चुनावी वायदों में नगद राशि या ऐसे ही अन्य वायदों को अनुचित मानने से मना कर दिया है इसलिए चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक बिरादरी मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने में नहीं हिचकिचायेगी। ये देखते हुए  जरूरी हो गया है कि चुनाव घोषणापत्र में किये गए वायदों को पूरा करने की कानूनी बाध्यता तय की जाए। राजनीतिक दलों को ये बताना अनिवार्य किया जाए कि इन खैरातों के लिए आर्थिक संसाधन कहाँ से आएंगे? जितनी भी मुफ्त योजनाएं चलाई जा रही हैं वे सरकारी खजाने को खाली करने का कारण बन रही हैं। परिणाम स्वरूप  सरकार पर कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है जिसका दुष्परिणाम अंततः जनता को भोगना पड़ता है। इसलिए इस पर रोक लगानी जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय को चाहिए वह घोषणापत्र को शपथ पत्र मानकर उसमें किये गए वायदों को पूरा करने को अनिवार्य बनाये। वरना गरीबी हटाने के वायदों के बावजूद  गरीबी बढ़ती जाएगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 27 May 2024

बढ़ता तापमान महज खबर ही नहीं बड़ा खतरा भी है


लोकसभा चुनाव अंतिम चरण में आ चुका है। राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है। 1 जून को मतदान के बाद शाम को एग्जिट पोल के नतीजे प्रसारित होने के साथ ही परिणामों का हल्का संकेत भी मिल जायेगा। हालांकि स्थिति 4 जून को ही स्पष्ट होगी।  राजनीतिक गरमागरमी तो समाचार माध्यमों में छाई हुई है किंतु आसमान से बरसती आग केवल सूचना बनकर रह गई है। समाचार माध्यम देश भर में बढ़ रहे तापमान के जो आंकड़े प्रसारित करते हैं वे भयावह भविष्य की चेतावनी हैं। लेकिन शायद ही किसी  नेता ने इसे चुनाव का मुद्दा बनाया हो। वृक्षारोपण करते हुए नेताओं और पर्यावरण प्रेमियों के चित्र एक फैशन बन गई है। इसके तहत  जितने पौधे देश भर में प्रतिदिन रोपित होते हैं उसका हिसाब लगाएं तो प्रतिवर्ष उनकी संख्या करोड़ों  में होगी। लेकिन वास्तविकता ये है कि आधे से अधिक पौधे रखरखाव के अभाव में दम तोड़ देते हैं। चुनाव प्रचार में आये प्रत्याशी और उनके समर्थकों को नाली, सड़क, पुलिया, बिजली और पानी की कमी पर जनता के गुस्से का सामना करना पड़ता है। कुछ इलाकों के लोग मतदान का बहिष्कार भी करते हैं। लेकिन किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को इस बात पर नाराजगी जताते नहीं देखा सुना गया कि सरकार साल दर साल बढ़ती गर्मी से राहत देने कुछ नहीं करती। समाजसेवा करने वाले प्याऊ भले लगा दें किंतु  धूप से बचाव के लिए सिर छुपाने का स्थान उपलब्ध  कराने के बारे में कोई नहीं सोचता। शहरों में विकास के नाम पर सैकड़ों वर्ष पुराने वृक्ष काट डाले गए। यही हाल नये बन रहे राजमार्गों का है जिन पर दूर - दूर तक  ऐसा कोई स्थान नजर नहीं आता जहाँ  वृक्ष की छाँव मिल सके। कहने का आशय ये है कि बढ़ती गर्मी के कारणों की चर्चा तो खूब होती है परंतु उन्हें दूर करने के प्रति जो प्रयास होना चाहिए उनका अभाव होने से हालात हर साल पहले से खराब होते जा रहे हैं। एक जमाना था जब 40 डिग्री तापमान की खबर  लोगों को डरा देती थी किंतु इन दिनों  देश के बड़े इलाके में तापमान  45 डिग्री के इर्द गिर्द बना हुआ है। कुछ में तो पारा 47 - 48 डिग्री को छू रहा है। वहीं सट्टे के लिए विख्यात राजस्थान का फलोदी कस्बा 50 डिग्री का दंश भोग रहा है। अपनी वन संपदा के लिए प्रसिद्ध म.प्र के बड़े क्षेत्र में गर्म हवा के थपेड़े रेगिस्तान जैसा अनुभव करा रही हैं। उत्तर भारत का मैदानी भूभाग भी लू का प्रकोप झेल रहा है। भारतीय ऋतु चक्र के अनुसार अप्रैल, मई और जून का महीना ग्रीष्म काल माना जाता है।  उत्तर भारत में तो मानसून आते तक आधी जुलाई बीत जाती है। लेकिन तापमान जिस तरह ऊपर जा रहा है उसे ऋतु  से जोड़कर उपेक्षित नहीं किया जा सकता। इस बारे में जिस प्रकार की उपेक्षा और लापरवाही  बरती गई उसके कारण स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। आधुनिक जीवन शैली भी इसके लिए उत्तरदायी है। सुविधाओं की अंधी दौड़ में पर्यावरण के साथ किया जा रहा अत्याचार भी बढ़ते तापमान का कारण है। एक समय था जब ए.सी रईसों की चीज माना जाता था किंतु अब वह मध्यवर्गीय परिवारों में भी सामान्य हो चला है। किसी बहुमंजिला इमारत पर बाहर से नजर डालें तो उसमें लगे सेकड़ों ए.सी अंदर बैठने वालों को भले ही शीतलता प्रदान करते हों किंतु वे बाहरी वातावरण को उतना ही गर्म कर देते हैं। आजकल ए.सी  वाहनों की खफत भी बढ़ती जा रही है । उनकी वजह से भी तापमान में अतिरिक्त वृद्धि हो रही है। ये देखते हुए ये जरूरी लगता है कि आम जनता इस दिशा में न सिर्फ जागरूक हो अपितु मुखर भी। उसे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के साथ ही पर्यावरण की लगातार बिगड़ रही स्थिति पर भी अपनी चिंता व्यक्त करनी चाहिए। केवल सरकार और चंद पर्यावरण प्रेमियों के भरोसे सब छोड़कर बैठ जाने का ही परिणाम है जो हर साल  रिकार्ड तोड़ रही गर्मी राजनीतिक विमर्श और चुनावी घोषणा पत्रों का हिस्सा नहीं बन सकी। मौजूदा लोकसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम रहने के लिए भीषण गर्मी को भी एक कारण माना जा रहा है। इसके चलते भविष्य में चुनाव ऐसे समय कराये जाने की चर्चा भी चल पड़ी है जब तापमान कम हो। लेकिन कोई भी तापमान की उड़ान को रोकने के उपायों की बात नहीं कर रहा। इस चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने विभिन्न विषयों पर अपनी नीति और कार्य योजना मतदाताओं के समक्ष रखी किंतु किसी ने भी ये वायदा नहीं किया कि सत्ता में आने के बाद अगले पाँच वर्षों में देश को गर्म होने से बचाने के लिए सरकार क्या कदम उठायेगी ? जब तक जनता इसे लेकर दबाव नहीं बनाती तब तक ए.सी में बैठे नेताओं को होश नहीं आयेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 25 May 2024

न्यायपालिका में रचनात्मक आलोचना सुनने की सहनशीलता होनी चाहिए


दिल्ली शराब घोटाले में गिरफ़्तार  मनीष सिसौदिया की जमानत अर्जी अदालत द्वारा ठुकरा दी जाती है जबकि उसी मामले में बन्द हुए आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह को जमानत देकर जेल से बाहर आने की सुविधा दे दी गई। इसी तरह का भेदभाव  अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन के प्रकरण में नजर आया। चुनाव प्रचार करने के लिए  श्री केजरीवाल को तो बिना मांगे 1 जून तक के लिए अंतरिम जमानत का लाभ मिल गया वहीं इसी आधार पर श्री सोरेन को  जमानत नहीं मिली। विगत दिनों पुणे  में एक नाबालिग रईसजादे द्वारा दो लोगों को अपनी महंगी कार से कुचल दिये जाने के बाद उसे अदालत ने जमानत दे दी । जब पूरे देश में न्यायाधीश की आलोचना हुई तब जाकर उस लड़के के अलावा  लाइसेंस न होने के बाद भी उसको  कार  देने वाले पिता और सबूत नष्ट करने वाले दादा को भी गिरफ्तार किया गया। और भी कुछ  लोग सींखचों के भीतर भेज दिये गए। उस दर्दनाक घटना के बाद देश भर में नाबालिग द्वारा किये जाने वाले अपराधों पर कानूनी प्रावधानों को लेकर खुलकर  लोगों ने अपने विचार व्यक्त किये और संबंधित न्यायाधीश पर भी चौतरफा हमले हुए। लेकिन दिल्ली में सर्वोच्च और उच्च न्यायालय द्वारा दो नेताओं को जमानत दिये जाने और दो को इंकार करने पर हल्की - फुलकी टीका-  टिप्पणी तो हुई लेकिन ज्यादा बोलने से राजनेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और यहाँ तक कि विधि क्षेत्र के लोग भी बचते नजर आये। जाहिर है इसका कारण न्यायपालिका का भय है जिसके फैसलों पर बौद्धिक चर्चा तक से लोग बचते हैं। अधिवक्ता गण अवश्य अपनी नाराजगी जताते हैं किंतु वे भी न्यायाधीशों की आलोचना से पीछे हट जाते हैं। इस वजह से न्यायपालिका की जवाबदेही पर जैसा विमर्श होना चाहिए वह नहीं हो पाता। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि इस कारण न्यायिक सक्रियता की आड़ लेकर न्यायपालिका में श्रेष्ठता का भाव बढ़ता ही जा रहा है। किसी आतंकवादी की फांसी रुकवाने के किये पेश याचिका की सुनवाई हेतु आधी रात के समय भी सर्वोच्च न्यायालय खोल दिया जाता है क्योंकि उस पर विशिष्ट लोगों के हस्ताक्षर होते हैं । वहीं किसी साधारण नागरिक के प्रति ऐसी सहृदयता दिखाए जाने के उदाहरण कम ही हैं। न्यायपालिका पर ये आरोप भी लगता है कि वह नामी- गिरामी अधिवक्ताओं का लिहाज करती है जिससे उनके पक्षकारों की सुनवाई  प्राथमिकता के आधार पर हो जाती है । ऐसा नहीं है कि पूरी न्यायपालिका गैर जिम्मेदार या पक्षपात पूर्ण हो चली है किंतु निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक में आम आदमी के लिए न्याय हासिल करना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा है। ऐसे में न्यायाधीशों द्वारा दिये जाने वाले अनेक फैसले लोगों के गले नहीं उतरने के बाद भी उनके बारे में टिप्पणी करने से बचा जाता है। ये बात बिल्कुल सही है कि हर मामले की  कानूनी स्थिति अलग - अलग होती है परंतु मनीष सिसौदिया, संजय सिंह और अरविंद केजरीवाल जब एक ही प्रकरण में गिरफ्तार किये गए तब उनकी जमानत पर अलग - अलग रवैया सवाल खड़े करता है। उल्लेखनीय है इसी मामले में तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के.सी.राव की सुपुत्री के. कविता भी जेल में हैं। उनको भी जमानत नहीं मिल रही। श्री सिसौदिया, श्री सोरेन और सुश्री कविता को जमानत देने से अदालत इसलिए इंकार करती आ रही है ताकि वे सबूतों से छेड़छाड़ और गवाहों को प्रभावित न कर सकें। लेकिन संजय सिंह और श्री केजरीवाल को जमानत देते समय  इस खतरे को क्यों नजरंदाज किया गया इसका जवाब कौन देगा? इन सबके साथ एक बात समान रूप से जुड़ी हुई है कि सभी राजनीतिक शख्सियत हैं और  बाहर आने पर अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करते। हेमंत सोरेन को जमानत न मिलने पर ये टिप्पणी भी सुनने मिली कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर गलती कर दी क्योंकि श्री केजरीवाल को अंतरिम जमानत देते समय अदालत ने उनके मुख्यमंत्री होने  को आधार माना। चूंकि हमारे देश में न्यायपालिका का लिहाज करने का संस्कार है इसलिये  अनुचित लगने वाले  फैसलों को भी बिना मीन - मेक के स्वीकार कर लिया जाता है। लेकिन समय आ गया है जब उसे रचनात्मक आलोचना सुनने  की सहनशीलता विकसित करनी चाहिए। उसका सम्मान अपनी जगह है किंतु कानून के साथ समाज के प्रति उसकी जवाबदेही भी होनी चाहिए। न्याय की आसंदी के अलावा सार्वजनिक मंचों पर न्यायाधीश गण विभिन्न विषयों पर अपनी राय खुलकर व्यक्त करते हुए शासन और प्रशासनिक व्यवस्था की आलोचना करने में भी नहीं झिझकते। ऐसे में ये सुविधा और अधिकार समाज को भी होना चाहिए कि वह न्यायपालिका में व्याप्त विसंगतियों पर निडर होकर उंगली उठा सके। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 24 May 2024

सीबीआई में भी भ्रष्टाचार तो भरोसा किस पर करें

प्र में 364 नर्सिंग कालेजों के फर्जीवाड़े की जांच  उच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई को सौंपी गई थी। प्राप्त जानकारी के मुताबिक 318 कालेजों की जाँच  होने के बाद उक्त एजेंसी ने 169 को क्लीन चिट भी दे दी। लेकिन कुछ दिन पहले सीबीआई द्वारा  जाँच से जुड़े अपने इंस्पेक्टर राहुल राज को ही 10 लाख की रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ लिया । सीबीआई  ने जब अपना जाल और फैलाया तो उसके कुछ और अधिकारी भी शिकंजे में फंस गए। करोड़ों रुपये नकद और आभूषण आदि भी बरामद हो चुके हैं।  सीबीआई के लोगों को घूस देकर नियम विरुद्ध क्लीन चिट हासिल करने वाले कुछ नर्सिंग कॉलेज संचालक भी गिरफ्तार हुए हैं। राहुल राज नामक घूसखोर सीबीआई इंस्पेक्टर बहुचर्चित व्यापमं घोटाले की जाँच में भी था और उसमें भी क्लीन चिट मिल गई थी। जैसे - जैसे सीबीआई इस मामले में आगे बढ़ रही है वैसे - वैसे नये - नये खुलासे हो रहे हैं। निजी नर्सिंग कॉलेजों की जरूरत इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि अस्पतालों की बढ़ती संख्या के कारण नर्सों की माँग बढ़ने लगी। एक जमाना था जब केरल  की नर्सें पूरे देश में नजर आती थीं। धीरे - धीरे उनकी माँग विदेशों में भी होने लगी।  लिहाजा  निजी क्षेत्र को नर्सिंग कॉलेज खोलने की अनुमति दी जाने लगी। इसका लाभ भी हुआ । देश भर में नर्सिंग कोर्स करने के प्रति लड़कियों ने रुचि दिखाई। अब तो लड़के भी इस पेशे में आ रहे हैं। हालांकि अभी भी माँग बनी हुई है। यही कारण है कि निजी नर्सिंग कॉलेज कमाई के साधन बन गए। इनमें प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूप में राजनेताओं का पैसा लगा हुआ है। इसीलिए निर्धारित मापदंडों को पूरा किये बिना ही मान्यता दी जाने लगी। इन कॉलेजों में पढ़ने वाले ओबीसी तथा अनु. जाति और जनजाति के छात्र - छात्राओं को सरकार छात्रवृत्ति देती है। जिसमें भारी घपलेबाजी होती है। लेकिन सबसे बड़ा घोटाला है मापदंडों पर खरा न उतरने के बावजूद कॉलेज खोलने की अनुमति मिलना। ज्यादातर कॉलेजों के पास न तो समुचित भूमि और भवन है और न ही प्रशिक्षण का सही इंतजाम। इसके बाद भी वे खुलते और चलते हैं। जब शिकायतें बढ़ीं और मामला अदालत के संज्ञान में आया तब उच्च न्यायालय ने सीबीआई को जाँच की जिम्मेदारी सौंप दी। इस एजेन्सी को बेहद सक्षम, पेशेवर और कार्यकुशल माना जाता है। लेकिन राहुल राज के पकड़े जाने के बाद इसकी साख पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं। चूंकि व्यापमं घोटाले की जाँच में भी उसकी सक्रिय भूमिका रही लिहाजा अब उसमें दी गई क्लीन चिट  पर भी संदेह पैदा होने लगा है। सीबीआई का अपना प्रशासनिक ढांचा है जिसमें राज्यों की पुलिस के अधिकारी भी प्रतिनियुक्ति पर जाते हैं। इसलिए ये मान लेना तो झूठी आत्म संतुष्टि होगी कि उसमें सब कुछ पाक साफ है । फिर भी इसकी साख और धाक  काफी हद तक बनी हुई है। इसीलिए संगीन किस्म के भ्रष्टाचार और अन्य अपराधों के प्रकरण इस जाँच एजेन्सी को सौंपे जाते हैं। चूंकि यह केंद्र सरकार के अधीन होती है इसलिए ये विश्वास किया जाता रहा है कि राज्य सरकार उस पर दबाव नहीं बना सकेगी। वैसे सीबीआई में भी भ्रष्ट लोग हैं ये बात पहले भी सामने आ चुकी है। उसके बड़े - बड़े अधिकारी भी घूस खाते हुए पकड़े जा चुके हैं। अनेक चर्चित प्रकरणों को सुलझाने और अपराधियों को दंडित करवाने में उसके हाथ विफलता ही लगी वहीं  कुछ मामले राजनीतिक दबाव में भी ठंडे बस्ते में डालने का आरोप  लगा। म.प्र के नर्सिंग कॉलेजों को क्लीन चिट देने के बदले करोड़ों की कमाई करने वाले सीबीआई इंस्पेक्टर और अधिकारियों का पर्दाफाश होने के बाद प्रदेश के वे सभी  कॉलेज संदेह के घेरे में आ गए जिन्हें राहुल  और उनके साथियों ने घूस खाकर उपकृत किया। वैसे ये गोरखधंधा निजी क्षेत्र के ज्यादातर शिक्षण संस्थानों में चल रहा है। पेशेवर शिक्षा के जितने भी संस्थान हैं उनमें से अधिकांश नियमों के अनुसार नहीं चलते। उनको मान्यता देने वाला जो भी अधिकृत विभाग या  अमला है उसमें ईमानदारी का  अभाव होने से अवैध को वैध करने का कारोबार बेरोकटोक चल रहा है। नर्सिंग कॉलेजों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार की जांच में भी भ्रष्टाचार होना चिंता का बड़ा कारण है। हालांकि कुछ लोगों की बेईमानी के कारण पूरे महकमे को कठघरे में खड़ा करना अनुपयुक्त प्रतीत होता है किंतु यदि सीबीआई में भी भ्रष्टाचार है तब किस पर भरोसा किया जावे इस सवाल का जवाब कौन देगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 23 May 2024

वामपंथियों के पतन से कोई सबक नहीं लिया ममता ने



लोकसभा चुनाव के अंतिम दौर में कोलकाता उच्च न्यायालय के ताजा फैसले से प. बंगाल  में जबरदस्त हड़कम्प मच गया।  शेष दो चरणों में राज्य की 19 सीटों पर मतदान होना है। इस बीच  उच्च न्यायालय ने 2010 के बाद राज्य में जारी तकरीबन 5 लाख  ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द कर दिये। हालांकि उन लोगों को इस फैसले से अप्रभावित रखा जो  उनके तहत नौकरी पा चुके हैं। इसी तरह भर्ती प्रक्रिया में शामिल लोग भी फैसले से मुक्त रखे गए हैं। ये प्रमाणपत्र 2011 में ममता बैनर्जी के सत्ता में आने के उपरांत जारी किये गए थे।  इस निर्णय के बाद प. बंगाल में कोई ओबीसी नहीं रह गया है तथा 1993 के तत्संबंधी अधिनियम के अंतर्गत नई सूची बनेगी । इसीलिए ममता ने  उच्च न्यायालय के फैसले से असहमति जताते हुए उसे मानने से इंकार कर दिया। राज्य सरकार इस निर्णय को रुकवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटायेगी। उसने यदि  स्थगन आदेश पारित नहीं किया तब मुख्यमंत्री की मुश्किलें और बढ़ जायेंगी। ये कहना भी गलत न होगा कि लोकसभा की जिन सीटों पर मतदान होना है वहाँ तृणमूल काँग्रेस को नुकसान होने की आशंका बढ़ गई है। इसीलिए मुख्यमंत्री ने बिना समय गंवाए सर्वोच्च न्यायालय जाने की घोषणा कर दी। उल्लेखनीय है हाल ही में कोलकाता उच्च न्यायालय ने 25 हजार शिक्षकों की नियुक्ति रद्द करते हुए उनको दिये वेतन की वसूली किये जाने का फैसला भी सुनाया था जिस पर सर्वोच्च न्यायालय स्थगन आदेश जारी कर चुका है। वह निर्णय  भी चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद आने से ममता सरकार की छवि को धक्का लगा। उससे वह उबर भी नहीं पाई थी कि ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द करने का फैसला आ गया। चूँकि  लाखों लोगों का हित जुड़ा हुआ है इसलिए सर्वोच्च न्यायालय अंतरिम स्थगनादेश जारी कर देगा इसकी संभावना काफी है किंतु उच्च न्यायालय ने  निर्णय का  जो कारण बताया वह ममता सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त है। प. बंगाल में ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने का अधिनियम 1993 से लागू है। उसी का संज्ञान लेते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि  पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह लिए बिना जारी किये गए लाखों ओबीसी प्रमाणपत्र असंवैधानिक हैं। कानूनी पहलू से हटकर देखें तो उच्च  न्यायालय के इस फैसले का जबरदस्त राजनीतिक असर होना तय है। यदि सर्वोच्च न्यायालय  भी प्रक्रिया के उल्लंघन की बात से सहमत हुआ तब वह स्थगन देने से इंकार भी कर सकता है। इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर ओबीसी प्रमाणपत्र हासिल करने वालों की अनेक सूचियाँ प्रसारित हो रही हैं जिनमें ज्यादातर नाम मुसलमानों के हैं। हालांकि इनके अधिकृत होने की पुष्टि नहीं की जा सकी किंतु  वास्तव में ऐसा ही है तब भले ही लोकसभा चुनाव में ममता अपने को बचा ले जाएं किंतु भविष्य में ये बड़ा मुद्दा बने बिना नहीं रहेगा। 2026 का विधानसभा चुनाव आते तक भाजपा इस मामले को गर्म रखते हुए सुश्री बैनर्जी के मुस्लिम प्रेम को उछालकर ध्रुवीकरण के अपने अभियान को तेज कर देगी। भले ही ओबीसी प्रमाणपत्र जारी करने में मुसलमानों  को विशेष रूप से उपकृत करने की बात पूरी तरह सत्य न भी हो किंतु नियमों और प्रक्रियाओं का पालन न करने की बदनामी जिस तरह से ममता सरकार के साथ जुड़ती जा रही है उससे  गैर लाभान्वित वर्ग उनके प्रति  नाराजगी और बढ़ती जाएगी। वैसे भी बीते काफी समय से जिस प्रकार उच्च न्यायालय उनकी सरकार के विरुद्ध फैसले सुना रहा है उससे उनकी  सरकार  भी वामपंथी मोर्चा की तरह ही प्रशासनिक गुंडागर्दी  के लिए कुख्यात होती जा रही है। ममता अपने स्वभाव अनुसार केंद्र सरकार के साथ ही न्यायपालिका पर भी गुस्सा उतारती रहती हैं  ।  एक जमाने में  खुद को सर्व शक्तिमान  और अपराजेय मान बैठे वाम मोर्चे में भी ऐसी ही अकड़ थी। उसका घमंड तोड़ने का कारनामा सुश्री बैनर्जी के नाम ही लिखा हुआ है। आश्चर्य है उन्होंने वाम मोर्चे के पतन से कोई सबक नहीं लिया। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 22 May 2024

बजाय केजरीवाल को दबाने के काँग्रेस उनके दबाव में आकर नुकसान कर बैठी



आम आदमी पार्टी लोकसभा की मात्र 22 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। वह इंडिया नामक गठबंधन का भी हिस्सा है जिसके तहत उसने काँग्रेस को दिल्ली में तीन सीटें  दीं। स्मरणीय है दिल्ली सरकार की शराब नीति में भ्रष्टाचार की शिकायत सबसे पहले काँग्रेस द्वारा ही की गई थी। इसीलिए जब गत वर्ष उप मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया की गिरफ्तारी हुई तब दिल्ली काँग्रेस के वरिष्ट नेता अजय माकन ने उसका स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल  पर भी कारवाई की मांग कर डाली थी। हालांकि अभिषेक मनु सिंघवी और जयराम रमेश ने गिरफ्तारी का विरोध किया वहीं पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने आम आदमी पार्टी पर ये कहते हुए हमला किया कि जब सोनिया गाँधी और राहुल को ईडी घेर रही थी तब उसने मौन साधे रखा था। उस समय  काँग्रेस ने आम आदमी पार्टी के कार्यालय का भी घेराव किया था। लेकिन लोकसभा चुनाव के मद्देनजर  दोनों एक मंच पर आ गए। काँग्रेस को अब शराब नीति विरोधी अपनी शिकायत याद नहीं है। इसीलिए  जब श्री केजरीवाल गिरफ्तार हुए तब पार्टी के बड़े नेताओं ने उसकी निंदा कर डाली।  उनको जेल से बाहर निकालने के लिए काँग्रेस नेता प्रख्यात अधिवक्ता श्री सिंघवी ने धरती - आसमाँ एक कर दिया। ये बात बिल्कुल सही है कि यदि शराब घोटाले में न फंसती  तो आम आदमी पार्टी दिल्ली में काँग्रेस को घास नहीं डालती। इसी तरह काँग्रेस को ये लगा कि दिल्ली में उसके हाथ पूरी तरह खाली हैं इसलिए वह तीन सीटों पर ही लड़ने के लिए राजी हो गई। चुनाव प्रचार के नाम पर जब श्री केजरीवाल को अंतरिम जमानत मिली तो उनकी पार्टी से अधिक खुश काँग्रेस हुई क्योंकि उसे लगा कि उनके सहारे उसकी नैया भी पार हो जायेगी। हालांकि काँग्रेस के ज्यादातर स्थानीय नेता और कार्यकर्ता इस समझौते को पचा नहीं पा रहे। प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली सहित बहुत से लोगों ने पार्टी से किनारा भी कर लिया। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित भी आम आदमी पार्टी के अलावा पूर्वी दिल्ली से कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाये जाने का खुलकर विरोध कर चुके हैं। रोचक तथ्य ये है कि दिल्ली में काँग्रेस का समर्थन कर रहे श्री केजरीवाल ने पंजाब में काँग्रेस को पूरी तरह ठेंगा दिखा दिया और उसके लिए एक भी सीट नहीं छोड़ी। जानकार बताते हैं कि काँग्रेस को श्री केजरीवाल ने पूरी तरह बेवकूफ बना दिया। उनको डर था कि वह मैदान से हटी तब उसके समर्थक भाजपा अथवा अकाली दल के पाले में जा सकते हैं जिससे आम आदमी पार्टी को नुकसान होना तय है। इसीलिए उन्होंने काँग्रेस को चुनाव लड़ने उकसा दिया।   इस तरह इंडिया गठबंधन के दोनों घटक एक दूसरे के सामने तलवार भाँज रहे  हैं। काँग्रेस जहाँ  मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान पर जमकर हमले कर रही है वहीं श्री मान का कहना है उन्होंने  अनेक काँग्रेसियों को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भेज दिया इसीलिए वह उनका विरोध कर रही है। दिल्ली की तरह से ही पंजाब के कॉंग्रेसी भी आम आदमी पार्टी से नफरत करते हैं। दोनों राज्यों में उसी की वजह से काँग्रेस धरती पर आ गिरी। पिछले लोकसभा चुनाव में उसे इस राज्य में अच्छी सफलता मिली किंतु विधानसभा चुनाव में सूपड़ा साफ हो गया। सरकार बनाने के बाद आम आदमी पार्टी ने काँग्रेस सरकार के दौर में हुए भ्रष्टाचार की जाँच शुरू करवाई और उसके अनेक नेता गिरफ्तार कर लिए गए। इसे लेकर दोनों के बीच दुश्मनी बढती चली गई। लेकिन इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी के शामिल हो जाने के बाद पंजाब के कांग्रेसियों की स्थिति  दयनीय होकर रह गई है। भले ही  पार्टी के  हाथ से सत्ता खिसक चुकी हो किंतु गठबंधन धर्म के अनुसार काँग्रेस राज्य में  पाँच - छह सीटों की हकदार तो थी ही। दिल्ली में भी बंटवारा इसी आधार पर  हुआ है। लेकिन श्री केजरीवाल ने पंजाब में उसे उपकृत करने से इंकार कर दिया। उनके इस रवैये से वैसे तो काँग्रेस का उच्च नेतृत्व भी  असहज अनुभव कर रहा है किंतु बजाय छोटी सी पार्टी को दबाने के वह उसका दबाव झेल रहा है। जिस तरह पंजाब में आदमी पार्टी ने एकला चलो की  नीति अपनाई यदि वैसी ही काँग्रेस दिल्ली में दिखाती तो श्री केजरीवाल की साँसें फूलने लग जातीं। लेकिन काँग्रेस नेतृत्व न जाने किस डर से उनके सामने झुक गया जबकि मौजूदा परिस्थिति में  काँग्रेस थोड़ा सा कड़ा रुख दिखाती तो आम आदमी पार्टी  के सामने  उसकी शर्तों को मानने के अलावा कोई चारा ही नहीं था। दुर्भाग्य से जिन क्षेत्रीय  पार्टियों ने काँग्रेस की ये दुर्गति की वह उन्हीं के भरोसे दोबारा खड़े होने के ख्वाब देख रही है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 21 May 2024

नेता कितने भी ऊर्जावान हों किंतु मतदाता थका नजर आ रहा


पाँच चरण का मतदान संपन्न होने के बाद अब दोनों  खेमे जीत - हार के परस्पर विरोधी दावे कर रहे हैं। लेकिन  इस चुनाव की सबसे बड़ी बात ये है कि राजनीतिक नेता कितनी भी ऊर्जा दिखाएं लेकिन मतदाता थका - थका सा दिखता है। चुनाव आयोग के तमाम प्रयासों के बावजूद  पिछले दो चुनावों की तुलना में कम मतदान चौंकाने वाला है। एनडीए के मुकाबले बने इंडिया नामक गठबंधन ने ज्यादातर सीटों पर सीधे मुकाबले की स्थिति पैदा कर दी। ऐसे में मतों का ध्रुवीकरण होने का आकलन सभी कर रहे थे। सामान्यतः ऐसे हालात में मतदान का आंकड़ा बढ़ता है और मतदाता खुद होकर उत्साह पूर्वक मतदान केंद्र पर कतारबद्ध होते हैं। हालांकि पहले भी विधानसभा चुनावों की तुलना में लोकसभा के लिए मत प्रतिशत कम ही होता रहा है। लेकिन जब भी सत्ताधारी दल के विरुद्ध विपक्षी एकजुटता हुई तब मतदाता में अपेक्षाकृत अधिक उत्साह परिलक्षित होता दिखा। इस चुनाव में जिस तरह की स्वस्फूर्त चेतना अपेक्षित थी उसका अभाव निश्चित तौर पर नजर आया। मतदाताओं का ये रवैया किसके पक्ष या विरोध में है ये अनुमान लगाने में बड़े - बड़े चुनाव विशेषज्ञ कठिनाई अनुभव कर रहे हैं। यद्यपि नेताओं की रैलियों और रोड शो आदि में तो बड़ी सँख्या में लोगों की मौजूदगी देखी गई किंतु मतदान का प्रतिशत देखकर ऐसा लगा जैसे नेताओं की बातों से लोग प्रभावित नहीं हुए। ये भी गौरतलब है कि बड़े नेताओं को सुनने अथवा देखने के लिए आने वाली जनता में ज्यादातर उसकी पार्टी से जुड़ा तबका होता है। यह लोकतंत्र के लिहाज से शुभ संकेत नहीं है। एक जमाना था जब न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि प्रादेशिक स्तर के नेताओं के भाषण सुनने के लिए विरोधी विचारधारा वाले श्रोता भी आते थे। आज के बड़े  नेता भी बमुश्किल 20 - 25 मिनिट में अपना भाषण देकर आगे बढ़ जाते हैं। आजकल श्रोताओं के बैठने के लिए कुर्सियां लगाई जाती हैं। धूप और बरसात से बचाव हेतु आधुनिक शामियाने तान दिये जाते हैं। सभा स्थल तक आने - जाने के लिए वाहन सुविधा के अलावा चाय - नाश्ते की व्यवस्था भी रखी जाती है। इन सबके कारण भीड़ तो आ जाती है किंतु उसमें प्रतिबद्ध लोग ज्यादा होते हैं। यही कारण है कि मतदाताओं का वह वर्ग जो सबके विचार सुनकर अपना मन बनाता था वह मतदान केंद्र तक जाने से बचता है। और यही वह मतदाता है जो चुनाव को जीवंत बनाता है। नुक्कड़ सभाओं का तो चलन ही लुप्त होता जा रहा है। नेताओं की सभाएं वैचारिक खुराक देने की बजाय किसी मार्केटिंग पेशेवर की तरह नये - नये ऑफर देने का जरिया बन गई हैं। ये प्रवृत्ति कमोबेश समूचे राजनीतिक परिदृश्य पर हावी हो चुकी है। इसका दुष्प्रभाव मतदान के दिन देखने मिल रहा है। पिछले चुनाव की तुलना में कम मतदान , मतदाताओं की उदासीनता से ज्यादा राजनीतिक पार्टियों और  नेताओं के प्रति बढ़ती वितृष्णा का संकेत है। ऐसा नहीं है कि प्रचार में कमी या कंजूसी की गई हो। चुनाव को लेकर टीवी, समाचार पत्र, सोशल मीडिया, यू ट्यूब आदि  पर जितनी चर्चा होती है वह समाज में विचारोत्तेजना उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है। कभी - कभी तो लगता है वह जरूरत से ज्यादा हो रही है। बावजूद इसके कुछ राज्यों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो मतदान का प्रतिशत या तो कम हुआ या स्थिर हो चला है। सत्ता पक्ष को लगता है कि उसकी नीतियों और कार्यक्रमों से संतुष्ट मतदाता बिना शोर शराबा किये मतदान कर रहा है। वहीं विपक्ष इसे अपने पक्ष में अंडर करेंट  मानकर आत्ममुग्ध है। उनमें से कौन सही है ये तो 4 जून की दोपहर तक स्पष्ट हो सकेगा किंतु ये कहने में  कुछ भी गलत नहीं है कि मतदाताओं में समर्थन या विरोध को व्यक्त करने का उत्साह नहीं है। जिस लहर  की चर्चा चुनाव के समय होती है वह यदि नजर नहीं आ रही तो इसके लिए मतदाताओं की बजाय राजनीतिक पार्टियां और नेता दोषी हैं। अभी मतदान के दो चरण शेष हैं किंतु अभी से चुनाव उबाऊ लगने लगा है। मुद्दों को लेकर भी अस्पष्टता है। लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय विषयों पर होना चाहिए किंतु उसे स्थानीय रूप देने का प्रयास दोनों ओर से हुआ है। इस कारण लोकसभा चुनाव की गंभीरता भी जाती रही है। नतीजा जो भी हो लेकिन राजनीतिक  दलों के लिये ये बड़ा विचारणीय मुद्दा है कि वे उस जनता के मन में अपने लिए वैसा विश्वास और श्रद्धा जाग्रत करने में क्यों विफल हैं जिसके हितचिंतक बनने का दावा करते वे थकते नहीं हैं। 

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 रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 20 May 2024

ममता के बारे में अधीर रंजन की राय पूरी तरह सही है



लोकसभा चुनाव के लिए आज पाँचवे चरण का मतदान हो रहा है। इसके साथ 428 सीटों पर मतदान प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी। शेष दो चरणों में 115 सीटों का फैसला होगा। भाजपा की मानें तो चौथे चरण के बाद ही वह बहुमत  का आंकड़ा पार कर चुकी है जबकि विपक्ष उसके अधिकतम 250 सीटों तक पहुँचने की बात कर रहा है। इसी बीच तृणमूल काँग्रेस प्रमुख प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के उस बयान से विपक्षी खेमे में हलचल मच गई जिसमें उन्होंने कहा कि नतीजे आने के बाद वे सरकार बनाने के लिए इंडिया गठबंधन का बाहर से समर्थन करेंगी । वहीं प. बंगाल में उन्होंने किसी गठबंधन से इंकार करते हुए कहा कि यहाँ काँग्रेस और वामपंथी भाजपा के लिए  काम कर रहे हैं। उनके बयान पर काँग्रेस  नेता अधीर रंजन चौधरी ने कुछ समय पूर्व दिये उस बयान का हवाला दिया जिसमें तृणमूल नेत्री ने कहा था कि उनके राज्य में इंडिया ब्लाॅक का कोई अस्तित्व ही नहीं है। उल्लेखनीय है ममता ने प. बंगाल में काँग्रेस और वामपंथियों को एक भी सीट नहीं दी। यहाँ तक कि श्री चौधरी के विरुद्ध बहरामपुर सीट पर गुजरात से लाकर क्रिकेटर युसुफ पठान को खड़ा कर दिया ताकि वे साढ़े तीन लाख मुस्लिम मतों को बटोरकर काँग्रेस की हार का रास्ता साफ करें। अधीर रंजन और सुश्री बैनर्जी के बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। चुनाव के दौरान ममता का ये बयान काफी चर्चित हुआ कि काँग्रेस और वामपंथियों को मत देने का अर्थ है भाजपा का समर्थन करना। उन्होंने काँग्रेस के 40 सीटों पर सिमट जाने की बात भी कही। इसके जवाब में श्री चौधरी ने दो कदम आगे बढ़कर कह दिया कि भले ही भाजपा को वोट दे देना किंतु तृणमूल को नहीं। इसीलिए बाहर से समर्थन करने वाले ममता के बयान पर उन्होंने कहा कि तृणमूल नेत्री अवसरवादी हैं। इंडिया ब्लाॅक की अच्छी स्थिति देखकर वे उसके साथ आना चाहती हैं जबकि वे उससे अलग हो चुकी थीं। ममता को अविश्वसनीय बताते हुए काँग्रेस नेता ये तक बोल गए कि वे भाजपा के साथ भी जा सकती हैं। इन दोनों के बीच  तल्खी लंबे समय से चली आ रही है। ममता काँग्रेस से इसलिए नाराज हैं क्योंकि प.बंगाल में वह उनके सबसे बड़े शत्रु वामपंथियों के साथ है। काँग्रेस ने तृणमूल से 6 लोकसभा सीटें माँगी थीं किंतु ममता दोनों को मिलाकर मात्र 2 सीटें दे रही थी।  उस वजह से राज्य में इंडिया गठबंधन  एकजुट नहीं रह सका। यदि वे अधीर रंजन की सीट ही छोड़ देतीं  तब उसे  दोस्ताना मुकाबला माना जाता किंतु बहरामपुर में  श्री चौधरी को चक्रव्यूह में फंसाकर उन्होंने गठबंधन की रही - सही संभावना भी समाप्त कर डाली। इसीलिए जब उन्होंने विपक्षी गठबंधन की सरकार बनने पर बाहर से समर्थन की बात कही तो श्री चौधरी भन्ना गए और सुश्री बैनर्जी को अवसरवादी और गैर भरोसेमंद कहकर विरोध कर डाला। लेकिन काँग्रेस  अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अधीर रंजन को फटकारते हुए कह दिया कि केंद्र में सरकार बनाने का काम हाई कमान का है और यदि श्री चौधरी को उसका फैसला मंजूर नहीं तो वे पार्टी छोड़कर जा सकते हैं। जवाब में अधीर रंजन ने कहा कि वे भी काँग्रेस कार्यसमिति के सदस्य होने के नाते उच्च नेतृत्व का हिस्सा हैं। इस टकराव का असर यहाँ तक देखने मिला कि प. बंगाल में लगे काँग्रेस के बैनर पर अंकित श्री खरगे के चित्र पर कालिख पोत दी गई। इस लड़ाई में श्री चौधरी अकेले पड़ते दिख रहे हैं क्योंकि विपक्ष के अनेक नेताओं द्वारा  ममता के बयान का स्वागत  कर दिया गया। लेकिन  लोकसभा में अपने नेता को जिस तरह काँग्रेस ने लताड़ा वह अच्छा संकेत नहीं है। प्रणब मुखर्जी के बाद श्री चौधरी ही इस राज्य में काँग्रेस की पहिचान जीवित रखे हुए हैं। उनकी उपेक्षा से ये साबित हो गया कि काँग्रेस क्षेत्रीय दलों के सामने आसानी से घुटने टेक देती है। पंजाब और दिल्ली में उसने आम आदमी पार्टी के सामने आत्म समर्पण कर दिया। उ.प्र में वह 17 और बिहार में 9 सीटें लेकर ही संतुष्ट हो गई। ममता ने उसे एक भी  सीट न देकर एक तरह से गठबंधन से किनारा कर लिया था। लेकिन अचानक  इंडिया गठबंधन की सरकार को बाहर से समर्थन देने संबंधी उनके बयान पर काँग्रेस हाई कमान के बल्लियों उछलने से प्रदेश नेतृत्व के तो पर ही कट गए। हालाँकि 4 जून को क्या होगा ये तो कोई नहीं बता सकता किंतु अधीर रंजन ने ममता के बारे में जो कुछ कहा वह पूरी तरह सच है। वर्तमान भारतीय राजनीति में सबसे तुनक मिजाज शख्सियत के तौर पर उन्हें माना जा सकता है। जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली और पंजाब में काँग्रेस का सफाया कर दिया ठीक वही काम ममता ने प. बंगाल में कर दिखाया।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 18 May 2024

गाँव - मोहल्ले में आत्मनिर्भरता के बाद भी सब एक दूसरे पर निर्भर थे, परिवारों की टूटन से सामाजिकता के संस्कार भी कमजोर पड़े


मेरे बचपन का गाँव आत्मनिर्भर था किन्तु गाँव का हर व्यक्ति एक दूसरे पर निर्भर था | सहकारिता की अर्थव्यवस्था में गाँव में अमन - चैन और खुशहाली का भाव था , जो आज कहीं खो गया है | फेसबुक पर मित्रवर Lakshmikant Sharma  की उक्त पोस्ट ने मेरा ध्यान ही नहीं खींचा मानो एक  दिशा दिखा दी | मुझे ये स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि गाँवों से मेरा किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है | लेकिन दूसरी तरफ ये भी सही है कि बचपन से गाँवों में मेरा आना जाना रहा है | यहाँ तक कि मैं ऐसी कुछ बारातों में भी शामिल रहा जो किसी गाँव में आज  की तरह केवल एक रात नहीं अपितु तीन दिन ठहरीं | मेरे ननिहाल में पुरानी जमींदारी होने से गर्मियों की  छुट्टियों में नाना जी के साथ ग्रामीण इलाके देखने  का भी खूब मौका मिला किन्तु  उसके पीछे आकर्षण खुली जीप में धूल भरे रास्तों पर घूमना ज्यादा था | लेकिन ग्रामीण भारत का जो  रेखाचित्र किशोरावस्था से मानसपटल पर अंकित हुआ उसके रंग बहुत ही पक्के होने से आज तक हल्के नहीं पड़े |

और फिर बतौर अधिकारी लगभग साढ़े तीन वर्ष तक राष्ट्रीयकृत बैंक की ग्रामीण शाखा के प्रबन्धक के रूप में सेवाएं देने के दौरान भी गाँवों को निकट से देखने और जानने का अवसर मिला | बावजूद उसके ग्रामीण जीवन पर कुछ कहने या लिखने के लिए मैं स्वयं को पात्र नहीं मानता |

लेकिन लक्ष्मीकांत जी ने बहुत  ही कम शब्दों में गाँवों के सामाजिक ढांचे  के साथ आर्थिक नियोजन का जो खाका खींच दिया वह एक तरह का सूत्र है जिसकी सहायता से भारत की आत्मा से साक्षात्कार किया जा सकता है | लेकिन मैं इसके आधार पर  हमारी उस मोहल्ला व्यवस्था को स्मृत करना चाहूँगा जो मेरे जीवन से बेहद अंतरंगता से जुड़ी हुई है | हालाँकि मोहल्ले से कॉलोनी में आये भी 36 बरस का लम्बा अरसा बीत गया किन्तु 1956  में हमारा परिवार जबलपुर आया तो शहर के बीचों - बीच स्थित साठिया कुआ नामक मोहल्ले में पहली मंजिल पर किराये का एक मकान हमारा आश्रयस्थल बना | उस मोहल्ले की ख़ास बात ये थी कि उसमें उस जमाने के बहुत बड़े जमींदार , गांधीवादी राजनेता और साहित्यकार ब्यौहार राजेन्द्र सिंह की बखरी थी,  जिससे किसी राजप्रासाद का एहसास होता था   | महात्मा गांधी भी उसमें ठहर चुके थे | अपनी भूदान पदयात्रा के दौरान आचार्य विनोबा भावे को  बखरी में आते मैनें देखा और बाद में जयप्रकाश नारायण जी को भी | जबलपुर छोड़ने के पहले तक आचार्य  रजनीश भी उनसे मिलने आते थे , जो बाद में ओशो नाम से विख्यात हुए |

उस मोहल्ले की सामाजिक रचना इस तरह की थी मानो वह  किसी कम्यून की तरह हर दृष्टि से आत्मनिर्भर हो | सुनार , बढ़ई , नाई , धोबी , घरेलू काम करने वाली जातियां , खेलने हेतु दो मैदान , अखाड़ा  , मलखम्ब , मंदिर , पुजारी , हलवाई , किराना , आटे की चक्की , पान की दुकान , सार्वजनिक कुए , लड़कियों और लड़कों के लिए माध्यमिक शिक्षा तक का अलग - अलग स्कूल  जैसी समस्त मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध थीं |

वहां रहने वालों में प्रोफेसर , शिक्षक , रक्षा कारखानों के कर्मचारी , वकील , चिकित्सक , पत्रकार , व्यवसायी सभी  पेशों से जुड़े हुए लोग थे | जैसा प्रारंभ में गाँव के बारे में कहा  गया , यहां भी सब अपने आप में आत्मनिर्भर होने के बाद भी एक दूसरे  पर निर्भर थे | सामाजिक समरसता इतनी थी कि किसी भी जाति या पेशे  का बड़ा - बुजुर्ग  आ रहा हो तो उसे हम सम्मान देते थे | और वह भी अधिकारपूर्वक हिदायतें देने या डांटने तक का अधिकार रखता था | जिस नाई से बाल कटवाते वह लाख निवेदन के बाद भी मशीन चला ही देता था | बढ़ई के पास जाकर कहते दादा गिल्ली खो  गयी तो वह थोड़ी सी ना  - नुकुर करने के बाद लकड़ी के किसी  टुकड़े से नई बनाकर चेतावनी भी देता कि अबकी बार गुम हुई तो नहीं बनाऊँगा | हालाँकि उसने अपनी चेतावनी पर कभी अमल नहीं किया |

मोहल्ले के सभी बच्चे साथ खेलते थे | दुर्गा जी की प्रतिमा के लिए एक चबूतरा था | पूरा मोहल्ला उसके लिए  चंदा देता और दशहरा जुलूस में मोहल्ले के लोग प्रतिमा को हनुमानताल में विसर्जित करने जाते | होली पर भी सार्वजनिक चन्दा होता था और जमकर रंग खेला जाता | मोहल्ला  पूरी तरह हिन्दुओं का था लेकिन मोहर्रम के समय एक सुनार और दो कायस्थ सवारी रखते थे जिसमें सभी शामिल होते |

छोटे - बड़े का आधार आयु होती थी , आर्थिक हैसियत नहीं | यही वजह थी ब्यौहार जी से , जिन्हें सब राजा भैया कहते थे , हम बच्चे भी निःसंकोच मिल लेते | स्कूल की छुट्टियों में उनकी विशाल बखरी हम बच्चों का क्रीड़ास्थल रहता था | हमारे मकान  मालिक का अपना एक प्रिंटिंग प्रेस था | 27 साल हमारा परिवार उनका किरायेदार रहा लेकिन कभी विवाद नहीं हुआ | जिस महिला ने बर्तन मांजने का काम शुरू से किया वह मोहल्ला छोड़ते तक काम करती रही |

अति साधारण परिवेश के बावजूद उस मोहल्ले से एक से एक प्रतिभाएं निकलीं | ब्यौहार जी के पुत्र स्व. राममनोहर सिन्हा विश्वप्रसिद्ध चित्रकार थे | आचार्य नन्दलाल बोस के शिष्य के रूप में उन्होंने भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी कला से संवारा था | कुल मिलाकर वह एक सम्पूर्ण इकाई थी जहाँ रहने वाले एक पारिवारिक भावना से बंधे हुए थे | फर्क था तो ये कि पुरुष बाबा , दादा , चाचा , काका या भैया थे तो महिलाएं बड़ी माँ , चाची , काकी या दीदी थीं | अंकल - आंटी संस्कृति का प्रवेश उस समय तक वहां  नहीं हुआ था | छोटे बच्चे पूरे  मोहल्ले में एक घर से दूसरे में खिलाये जाते थे |

वक्त बदला , पीढ़ी बदली , और फिर लोगों का वहां से जाना शुरू हो गया | सायकिल से स्कूटर युग आ चुका था | हम भाई - बहिन बड़े हुए और जगह कम पड़ने लगी तब 1984 में अपने नए मकान में आने को हुए तो पूरा मोहल्ला दुखी था | हम सब भी बेहद भावुक थे | मकान मालिक को पिताजी ने घर की चाबी सौंपते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया तो उलटे उन्होंने पिता जी का हाथ पकड़कर कहा कि आप अपने मकान में जा रहे हैं , ये खुशी की बात है लेकिन हमारी इच्छा तो थी , यहीं  रहते |

जिस कॉलोनी में हम रहने गये उसमें भी 27 साल बिताये  लेकिन उसमें मोहल्ले जैसे सम्बन्ध नहीं बन सके | और बीते  एक दशक से जिस कॉलोनी में रह रहे हैं यहाँ सामाजिक मेलजोल तो काफी है , लेकिन निःसंकोच कहूंगा  कि वह माहौल नहीं है जिसका जिक्र मोहल्ले के संदर्भ  में किया जा चुका है | हालाँकि बढ़ती उम्र इसका कारण हो सकती है किन्त्तु कॉलोनी के बच्चों और युवाओं में भी वैसी  पारिवारिकता नहीं दिखती |

हालांकि ये मेरे अकेले का अनुभव नहीं , अपितु हम  में से न जाने कितनों के मन में भी इसी तरह की अनुभूतियां भरी पड़ी हैं | मोहल्ला छोड़े हुए 36 साल बीत गए | अधिकतर लोग दूसरी  जगह रहने चले गये लेकिन जब भी किसी शादी - ब्याह में मिलना होता है तो थोड़ी देर का वह पुनर्मिलन भावनाओं की  अभिव्यक्ति और सुनहरी यादों को पुनर्जीवित करने  का अवसर बन जाता है | नई पीढ़ी के बच्चों से परिचय पुराने पड़ोसी के रूप में नहीं बल्कि रिश्ते का नाम लेकर करवाया जाता है |

दरअसल हमारे समाज में जो पारिवारिकता थी उसका स्रोत संयुक्त परिवार से मिले संस्कार ही थे | अब चूँकि परिवार हम दो , हमारे दो तक सिमट गए हैं और ताऊ - ताई , चाचा - चाची, मामा - मामी , बुआ - फूफा सब अंकल - आंटी में आकर केन्द्रित हो गये , इसीलिये समाज में संवेदनहीनता आती जा रही है |

मौजूदा संदर्भ में जो माहौल देश भर में दिखाई दे रहा है उसके पीछे गाँव और मोहल्लों की सामाजिक रचना में आया बदलाव भी है | उसे देखकर ये डर भी लग रहा है कि शहरों की बेरुखी से  हलाकान हो चुके जो श्रमिक गाँव लौट रहे हैं क्या उन्हें वह सब मिल सकेगा जिसकी उम्मीद लिए वे पांवों के छालों का दर्द भूलकर भी चले आ रहे हैं |

सवाल और भी हैं किन्तु जवाब किसी के पास नहीं क्योंकि गाँव में भी अब नीम की दातून करने वाली पीढ़ी इतिहास बन गयी है और परिवार को फैमिली कहा जाने लगा है |

( नोट:- दिनांक - 18 मई 2020 को प्रसारित पोस्ट जिसकी प्रासंगिकता आज भी यथावत है। )

मालीवाल को केजरीवाल से मिलने से रोकने का कारण सामने आना जरूरी

 आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सचिव द्वारा की गई कथित मारपीट के मामले में पार्टी का बदलता रुख उसके गले पड़ गया है। मुख्यमंत्री के सचिव बिभव कुमार पर जो आरोप लगाए गए वे गंभीर अपराध की श्रेणी में आते जिनमें  लंबी सजा हो सकती है। आम आदमी पार्टी अपने आक्रामक रवैये के लिए विख्यात है। लेकिन स्वाति  प्रकरण में मुख्यमंत्री के भरोसेमंद सांसद संजय सिंह ने पत्रकार वार्ता में मारपीट की निंदा के साथ ही श्री केजरीवाल द्वारा कारवाई का आश्वसान भी दिया। सबसे बड़ी बात उन्होंने स्वाति की सेवाओं का उल्लेख करते हुए  कहा कि पार्टी उनके साथ है। बाद में वे उनके घर भी गए। लेकिन ज्योंही स्वाति ने पुलिस में रिपोर्ट कराने के साथ ही मजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज करवाये त्योंही पार्टी का दृष्टिकोण बदल गया। दिल्ली सरकार में मंत्री आतिशी मार्लेन ने स्वाति पर ताबड़तोड़ आरोप लगाते हुए इस कांड के पीछे भाजपा की भूमिका बता डाली। उनका ऐसा कहना श्री सिंह द्वारा कही गई बातों के सर्वथा विपरीत था। पार्टी ने मुख्यमंत्री निवास का एक वीडियो भी जारी किया जिसमें स्वाति और सुरक्षा कर्मियों के बीच बहस दिखाई गई। आज एक और वीडियो जारी हुआ जिसमें महिला पुलिस उनको मुख्यमंत्री निवास से बाहर ले जा रही है। दावा किया जा रहा है कि उसमें न स्वाति के कपड़े फटे दिख रहे हैं और न ही शरीर पर चोट के निशान हैं। दूसरी तरफ पुलिस ने उनकी चिकित्सकीय जाँच करवाई जिसके बाद ये सुनने में आया है कि उनको चार जगह चोटें आईं। आश्चर्य की बात ये है कि पूरे घटनाक्रम पर मुख्यमंत्री और बिभव कुछ भी कहने से बचते रहे किंतु जैसे ही स्वाति द्वारा पुलिस में रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिये जाने की खबर आई त्योंही बिभव ने भी स्वाति के विरुद्ध पुलिस में अपनी शिकायत दर्ज करवाई। इस प्रकार जो पार्टी शुरू में  बिभव पर करवाई की बात कर रही थी वही स्वाति को भाजपा का मोहरा बता रही है। घटना के बाद बिभव मुख्यमंत्री के साथ चुनावी दौरे पर भी गए। ऐसे में प्रश्न ये है कि क्या श्री केजरीवाल से पूछे बिना श्री सिंह ने पत्रकार वार्ता में स्वाति के पक्ष में खड़े होने का ऐलान किया? और क्या वे उनके घर भी अपनी मर्जी से गए थे? ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस में रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट के सामने सुश्री मालीवाल के बयान होने के पहले तक तो उनसे हमदर्दी दिखाई जाती रही किंतु उसके तुरंत बाद उनको खलनायिका बनाने का पैंतरा चल दिया। आज पुलिस ने बिभव को गिरफ्तार कर लिया। उन पर लगी धाराओं में जमानत होना कठिन होगा। मुख्यमंत्री  निवास में घटनास्थल का मुआयना पुलिस कर चुकी है। पार्टी के लिए संजय सिंह और आतिशी के परस्पर विरोधी बयान गले की फांस बन गए हैं। दोनों श्री केजरीवाल के करीबी हैं। सफाई में कहा गया कि श्री सिंह को पहले स्वाति का पक्ष ही पता था इसलिए उनका साथ देने की घोषणा कर दी किंतु बिभव का पक्ष जानने के बाद दूसरा रुख अख्तियार किया गया। ये स्पष्टीकरण इसलिए हास्यास्पद है क्योंकि श्री सिंह ने पत्रकार वार्ता के बाद सुश्री मालीवाल से भेंट की। अर्थात उनका पक्ष जाने बिना ही समर्थन का बयान पत्रकारों को दे डाला। मुख्यमंत्री के सचिव का पक्ष जाने बिना उन्होंने वैसा किया ये बात गले नहीं उतरती। लखनऊ यात्रा में श्री सिंह भी बिभव के साथ थे। तब भी उन्होंने उनका बचाव नहीं किया। कुल मिलाकर बात ये समझ आती है कि सुश्री  मालीवाल किसी गंभीर विषय पर श्री केजरीवाल से मिलने गईं थीं। उनके आरोपों की सच्चाई तो जांच से बाहर आयेगी किंतु  जब श्री सिंह द्वारा घर जाकर मनाने पर भी वे नाराज रहीं तब आक्रमण ही सर्वोत्तम सुरक्षा की रणनीति पर अमल हुआ। ये प्रकरण महज मारपीट तक सीमित नहीं है। स्वाति और मुख्यमंत्री के बीच बातचीत घटना के बाद भी तो हो सकती थी । दोनों के बीच अच्छे  रिश्ते रहे तभी उनको महिला आयोग और राज्यसभा में जगह दी गई। आम आदमी पार्टी को इस बात का खुलासा करना चाहिए कि ऐसी कौन सी बात हो गई जो  पार्टी की स्थापना से जुड़ी नेत्री इतनी नाराज हो उठी। यदि आतिशी के इस आरोप को सही मान भी लें कि स्वाति भाजपा के हाथ में खेल रही हैं और उनको किसी जांच का भय दिखाकर ये सब करने बाध्य किया गया तब भी ये प्रश्न तो उठता ही है कि वह कौन सा भ्रष्टाचार या अनियमितता है जो उन्हें अपनी मातृ संस्था से बगावत के लिए मजबूर कर रही है ? पहला वीडियो आने के बाद स्वाति की प्रतिक्रिया में बिना नाम लिए जो निशाना साधा गया वह श्री केजरीवाल पर ही प्रतीत होता है। ऐसे में अब मुख्यमंत्री को भी अपना मौन तोड़ना चाहिए क्योंकि सारा बखेड़ा उनसे मुलाकात को लेकर हुआ।  स्वाति को श्री केजरीवाल से मिलने क्यों नहीं दिया गया इसका उत्तर मिलने तक असलियत सामने आने से रही। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि आम आदमी पार्टी भी बिभव की बलि चढ़ाकर किसी को बचा रही है। वो कौन है ये सभी जान गए हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 17 May 2024

स्वाति मालीवाल : गईं थीं मुलाकात करने मिले मुक्के - लात


न तो घटना पुरानी है और न ही विरोधियों द्वारा तैयार की गई पटकथा पर आधारित तथ्यहीन आरोप। दिल्ली के मुख्यमंत्री से मिलने पहुंची आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सदस्य स्वाति मालीवाल के साथ हाथापाई हुई और वह भी मुख्यमंत्री के सचिव विभव कुमार द्वारा। सांसद ने पुलिस को फोन भी किया, थाने भी पहुंची किंतु रिपोर्ट नहीं लिखवाई। उसके बाद वे लापता हो गईं। सोशल मीडिया पर भी नहीं दिखी। वे दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। सबसे बड़ी बात ये कि अरविंद केजरीवाल के शुरुआती साथियों में उनकी गिनती होती रही। चूंकि प्रकरण चर्चा में आ गया लिहाजा आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने पत्रकार वार्ता बुलाकर स्वाति के साथ श्री केजरीवाल के सचिव द्वारा की गई मारपीट को स्वीकार करते हुए कहा कि पार्टी ऐसी बातों को सहन नहीं करेगी और मुख्यमंत्री दोषी विभव पर कारवाई करेंगे। चूंकि स्वाति ने रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई और कोई बयान भी नहीं दिया तो लगा घर की बात घर में ही रह गई। गत दिवस लखनऊ यात्रा में श्री केजरीवाल और श्री सिंह के साथ विभव कुमार की मौजूदगी से मामला ठण्डा पड़ने का संकेत भी मिला। लेकिन शाम होते - होते स्वाति ने बाकायदा लिखित शिकायत पुलिस को की जिसने उनके बयान भी लिए। शिकायत के अनुसार सुश्री मालीवाल के साथ काफी मारपीट की गई। जैसा बताया गया उसके अनुसार वे मुख्यमंत्री से मिलने गई थीं किंतु विभव ने उनको रोका जिस पर कहा सुनी हुई और फिर वही हुआ जो शिकायत में उल्लिखित है। एक चर्चा ये भी चली कि श्री केजरीवाल उन्हें जमानत दिलवाने वाले अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को राज्यसभा सीट का आश्वासन दे चुके थे। उसके लिए स्वाति पर सदस्यता छोड़ने का दबाव बनाया गया जिसके विरुद्ध वे मुख्यमंत्री से मिलने गईं जहाँ उक्त वारदात घट गई। बहरहाल मामला पुलिस के पास है। पीड़िता अपना बयान दे चुकी हैं। विभव पर धाराएँ भी लग गईं। हो सकता है उनको गिरफ्तार कर लिया जाए। लेकिन इस सबके बीच श्री केजरीवाल की चुप्पी से चर्चाओं का बाजार गर्म है। भाजपा मौके का लाभ उठाने आगे आ गई है। प्रियंका वाड्रा ने घटना की निंदा तो की किंतु महिला सांसद के साथ हुई मारपीट पर श्री केजरीवाल की चुप्पी पर कोई टिप्पणी नहीं की। निश्चित रूप से ये प्रकरण कर्नाटक के यौन उत्पीड़न से अलग मामला है किंतु मुख्यमंत्री के आवास पर उनका सचिव उन्हीं की पार्टी की महिला सांसद की लात - घूँसों से धुनाई करे तो उसे छोटी बात मानना गलत होगा। लोकसभा चुनाव के कारण श्री केजरीवाल सार्वजनिक रूप से चुप रहने की नीति पर चल रहे हैं किंतु विभव कुमार को अब तक नहीं हटाये जाने से उन पर जो अंगुलियाँ उठ रही हैं उन्हें गलत नहीं कहा जा सकता। इससे इस आरोप की पुष्टि हो रही है कि सुश्री मालीवाल के साथ मारपीट करने वाले को ऊपर से शह मिली हुई थी। श्री केजरीवाल घटना के समय दूसरे कमरे में मौजूद रहे किंतु उन्होंने बाहर आकर मामला ठण्डा करवाने कुछ किया हो ये भी कोई नहीं बता रहा। इससे रहस्य का पर्दा और गहरा होता जा रहा है। स्वाति के पूर्व पति के बयान मामले को दूसरा मोड़ दे रहे हैं। चूंकि चुनाव चल रहे हैं इसलिए भाजपा का आक्रामक होना तो स्वाभाविक है किंतु काँग्रेस और इंडिया गठबंधन की अन्य पार्टियां भी चूंकि बचाव नहीं कर पा रहीं इसलिए जेल से निकलते ही भाजपा और प्रधानमंत्री पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे श्री केजरीवाल मुँह में दही जमाकर बैठ गए। होना तो यह चाहिए था कि अब तक वे विभव कुमार को पुलिस के हवाले करते । स्वाति के बयान हो जाने के बाद अब आम आदमी पार्टी बुरी तरह घिर गई है। चूंकि वारदात श्री केजरीवाल के आवास पर घटित हुई इसलिए वे अपना पिंड नहीं छुड़ा सकते। दिल्ली में 25 मई को मतदान है। उसके पहले हुआ यह कांड चुनाव को कितना प्रभावित करेगा ये कहना तो जल्दबाजी होगी लेकिन इससे ये बात एक बार फिर प्रमाणित हो गई कि आम आदमी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। उसकी स्थापना करने वाले तमाम दिग्गजों को जिस प्रकार बाहर जाने मजबूर किया गया वह किसी से छिपा नहीं है। लगता है स्वाति मालीवाल का नाम भी उसी सूची में जुड़ने जा रहा है। जिन्हें मुख्यमंत्री से मुलाकात के बदले मुक्के - लात मिले। दिल्ली सरकार में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रहीं आतिशी मार्लेना का मौन भी चौंकाने वाला है।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 16 May 2024

जिसकी जीत के आसार हों उसी के वायदों पर लोग भरोसा करते हैं


मोदी सरकार द्वारा 80 करोड़ लोगों को 5 किलो खाद्यान्न प्रति माह दिये जाने का मजाक उड़ाते हुए विपक्ष ये कहता आया है कि इससे स्पष्ट होता है कि इतने लोगों के पास पेट भरने की हैसियत भी नहीं है। इसके अलावा ये आरोप भी लगाया जाता है कि मात्र 5 किलो अनाज देकर यह सरकार लोगों का मुँह बन्द रखना चाहती है जिससे वे उसकी विफलताओं पर मुँह न खोलें। सरकार के विरोधी ये भी कहते हैं कि मुफ़्त गल्ला बाँटने से लोग अकर्मण्य होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि मजदूरों की कमी के लिए भी मुफ्त अन्न योजना को जिम्मेदार माना जाता है। ये जानकारी भी आती है कि बड़ी संख्या में लोग मुफ्त में मिले अनाज को किराने वाले को बेचकर कुछ और खरीद लेते हैं। मनरेगा के प्रारंभ होने के बाद गाँवों में शराब की बिक्री बढ़ने लगी थी। मुफ्त अनाज ने भी इसमें योगदान दिया। कुछ राज्यों में गरीब महिलाओं को प्रति माह कुछ धनराशि मिलने से घरेलू काम करने वालों का टोटा होने लगा। मध्यम वर्ग में इसे लेकर भारी असंतोष है किंतु उसकी बात को न कोई सुनने वाला है और न ही समझने वाला। काँग्रेस ने अपने घोषणापत्र में हर गरीब  परिवार की एक महिला को प्रति माह 8500 रु. देने के साथ ही बेरोजगारों को प्रशिक्षु के तौर पर सालाना 1 लाख देने का वायदा किया है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में ऐसी ही गारंटियों ने काँग्रेस को जीत दिलवा दी थी लेकिन कुछ माह बाद  म.प्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में मतदाताओं ने उन्हीं वायदों को ठुकरा दिया।  दरअसल हर चुनाव का अपना स्वभाव होता है। जिस जनता ने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को भारी बहुमत दिया उसी ने लोकसभा में सातों सीटें भाजपा को सौंप दीं।  राहुल गाँधी ने 2019 में किसान कल्याण निधि की राशि  72 हजार करने का वायदा उछाला किंतु मतदाताओं ने मोदी सरकार के 6 हजार से ही संतुष्टि दिखाई। कहने का आशय ये है कि जनता भी  इस  बात का अंदाज लगाती है कि सरकार किसकी बन सकती है। जिसकी संभावनाएं उसको ज्यादा प्रतीत होती हैं वह उसके वायदों पर भरोसा जताती है। इसीलिए  जिन राज्यों में भाजपा की जीत के आसार नहीं होते वहाँ प्रधानमंत्री की रैलियां भी कारगर नहीं होतीं। वहीं उ.प्र जैसे राज्य में कृषि कानूनों के विरोध में हुए आंदोलन से उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों में भी पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को सफलता मिली। लोकसभा चुनाव में भी यही फार्मूला कारगर होता दिख रहा है।  प. बंगाल, उड़ीसा, हिमाचल और दिल्ली में जहाँ गैर भाजपा सरकारें हैं उनमें भी  भाजपा मुख्य मुकाबले में है तो उससे स्पष्ट होता है कि मतदाता केंद्र में उसकी वापसी के प्रति भरोसा रखते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस के 10 किलो अनाज और महिलाओं तथा बेरोजगारों को 1 लाख देने का चुनावी वायदा जमीनी स्तर तक नहीं पहुँच पा रहा। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार की प्रचंड लहर नजर आ रही हो। लेकिन रायबरेली और कन्नौज जैसी सीट पर राहुल गाँधी और अखिलेश यादव के पक्ष में बोलते लोग भी मानते हैं कि केंद्र में एनडीए सरकार वापसी करने जा रही है। सबसे बड़ी बात विपक्षी गठबंधन का साझा घोषणापत्र जारी नहीं होना है। राहुल, अखिलेश, केजरीवाल, तेजस्वी सभी चिल्ला - चिल्लाकर कह रहे हैं कि 4 जून के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे किंतु इंडिया गठजोड़ का कोई भी नेता अपने प्रधानमंत्री का नाम बताने की हिम्मत नहीं बटोर पा रहा। जेल से छूटने के बाद केजरीवाल प्रधानमंत्री से उत्तराधिकारी का नाम बताने की माँग कर रहे हैं किंतु उनकी हिम्मत भी नहीं होती कि राहुल या अन्य किसी को बतौर भावी प्रधानमंत्री पेश कर सकें। उ.प्र में कांग्रेस मात्र 17 सीटों पर पर लड़ रही है जिनमें से मात्र रायबरेली और अमेठी ही चर्चा में हैं। बाकी के काँग्रेस उम्मीदवारों तक के नाम लोग नहीं जानते। भाजपा में जहाँ 400 पार को लेकर सभी  एकमत हैं वहीं राहुल गाँधी भाजपा के 150 पर सिमटने की बात कहते हैं तो कोई विपक्षी नेता 200 तो कोई 250 का आंकड़ा गिनाता है। उ.प्र में बकौल राहुल, इंडिया गठबंधन 50 सीटें जीतेगा तो अखिलेश 79 सीटों का दावा कर रहे हैं। केजरीवाल ये कहते हुए विपक्ष समर्थक मतदाताओं का मनोबल तो़ड़ रहे हैं कि सितम्बर में नरेंद्र मोदी अपनी जगह अमित शाह को बिठा देंगे वहीं उ. प्र से योगी को हटा देंगे। इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयानों से विपक्ष में वैचारिक सामंजस्य की कमी सामने आ रही है। राहुल कुछ भी वायदे करें किंतु वे जनता को ये विश्वास नहीं दिलवा पा रहे कि काँग्रेस 150 सीटें जीतेगी। विश्लेषक तो उसके 100 तक पहुँचने की संभावना पर भी सवाल उठा रहे हैं। इसीलिए उसके वायदों का अपेक्षित प्रभाव नजर नहीं आ रहा। रही बात केजरीवाल जैसे नेताओं की तो उनकी पार्टी 25 से भी कम सीटें लड़ रही है इसलिए उनके बयान छोटे मुँह बड़ी बात माने जा रहे हैं। लोकसभा की 70 फीसदी सीटों पर मतदान होने के बाद भी विपक्ष ये विश्वास नहीं पैदा कर सका कि उसको बहुमत मिल रहा है। जिसकी जीत  के आसार हों उसी के वायदों पर लोग भरोसा करते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 15 May 2024

2004 से 2014 के बीच आरक्षण की सीमा बढ़ाने की याद क्यों नहीं आई


लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने संविधान को एक बड़ा मुद्दा बनाया हुआ है। भाजपा द्वारा 400 पार के नारे को लेकर सभी विपक्षी दल ये प्रचार करने में जुटे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  इतना बड़ा बहुमत हासिल करने के बाद आरक्षण समाप्त करने जैसा कदम उठाएंगे जिसके लिए संविधान बदलना होगा। इस मुहिम  का मकसद दलित समुदाय को अपनी ओर खींचना है जो धीरे - धीरे भाजपा के साथ आने लगा था।  उ.प्र में भाजपा की चुनावी सफलता का श्रेय जिस सोशल इंजीनियरिंग को दिया जाता है उसकी वजह से गैर यादव मतदाताओं ने भी सपा का साथ छोड़कर भाजपा को समर्थन दिया। हालांकि आरक्षण को लेकर रा.स्व.संघ और भाजपा को घेरने का विपक्षी पैंतरा नया नहीं है। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत के एक बयान को लालू प्रसाद यादव ने  मुद्दा बना लिया जिसमें उन्होंने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी । हालांकि संघ की ओर से आरक्षण को बनाए रखने का आश्वासन दोहराते हुए कहा गया कि जब तक उसकी जरूरत है आरक्षण जारी रहना चाहिए। उस चुनाव में भाजपा को हुए नुकसान के लिए डाॅ. भागवत के संदर्भित बयान को जिम्मेदार माना गया। लेकिन बाद के अनेक चुनावों में दलित और पिछड़ी जातियों का भरपूर समर्थन भाजपा की झोली में आया। इसी का परिणाम है कि इन वर्गों के सर्वाधिक सांसद भाजपा के हैं। प्रधानमंत्री स्वयं पिछड़ी जाति से हैं जबकि उनकी सरकार बनने के बाद रामनाथ कोविंद और द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाया गया जो क्रमशः अनु. जाति और अनु. जनजाति वर्ग से हैं। वर्तमान उपराष्ट्रपति भी पिछड़ी जाति से आते हैं। केंद्रीय मंत्रीमण्डल में भी जातिगत संतुलन है। म.प्र जैसे भाजपा के गढ़ में 2003 से अब तक भाजपा के जो चार मुख्यमंत्री हुए वे सभी पिछड़ी जातियों के रहे। ऐसे में ये कहना कि मोदी सरकार  वापस आने पर  संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर देगी बेहद शरारत पूर्ण है। राहुल गाँधी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को समाप्त करने का वायदा कर रहे हैं। तमिलनाडु जैसे राज्यों में ऐसा हो भी चुका है। आर्थिक दृष्टि से कमजोर सवर्णों को  10 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। मुस्लिमों को आरक्षण का मुद्दा भी गर्म है जिसका भाजपा विरोध कर रही है। ऐसे में  आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर नया बखेड़ा खड़ा करना चुनावी लाभ दे सकता है किंतु कालांतर में ये गले की फांस बने बिना नहीं रहेगा। आज सर्वत्र बेरोजगारी की चर्चा हो रही है जिसका सीधा - सीधा तात्पर्य सरकारी नौकरी न मिलना है। हर पार्टी सत्ता में आने के लिए नौकरियों का आश्वासन देती है किंतु  सरकार में आने के बाद उनके लिए वैसा करना संभव नहीं हो पाता। 2004 में कांग्रेस ने रोजगार देने के नाम पर चुनाव जीता किंतु मनरेगा से ज्यादा  वह कुछ न कर सकी। यदि 10 साल के डाॅ. मनमोहन सिंह के राज में भरपूर सरकारी नौकरियां बांटी जातीं तब 2014 में काँग्रेस की इतनी दुर्गति न होती। राहुल को ये भी याद रखना चाहिए कि मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद भी उ.प्र और बिहार में सपा और राजद के साथ सभी पिछड़ी जातियाँ लंबे समय तक गोलबंद नहीं रह सकीं। बसपा भी सवर्णों को गालियाँ देने के बाद ब्राह्मणों को आरक्षण देने का समर्थन करने लगी। आज काँग्रेस को जातिगत जनगणना जैसे मुद्दे याद आ रहे हैं। लेकिन लालू प्रसाद यादव जैसे मंडलवादी के साथ सरकार चलाते समय उन्हें आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से बढ़ाये जाने की याद क्यों नहीं आई? अब जबकि उनकी पार्टी क्षेत्रीय दलों के रहमो करम पर निर्भर हो गई तब उन्हें ये सब सूझ रहा है  जो, निरा अवसरवाद है। सरकारी नौकरियों का बढ़ना अब सपने देखने जैसा है। रोजगार के अवसर बढ़ाये जाने की कार्ययोजना जरूर कोई हो तो उसे वे जनता के सामने रखें। सरकार के लिए वेतन भत्ते ही असहनीय होते जा रहे हैं। मुफ्त योजनाओं की वजह से भी खजाना खाली हो रहा है। बेहतर हो वायदे वही किये जाएं जो पूरे हो सकें। मोदी सरकार अपनी तमाम उपलब्धियों के बाद भी अधूरे रह गए वायदों के कारण कुछ मुद्दों पर रक्षात्मक होने मजबूर है। विपक्ष को इससे सबक लेना चाहिए। इसी तरह संविधान बदल दिया जाएगा और ये चुनाव आख़िरी होगा जैसी बातें उछालने से भी कुछ हासिल नहीं होने वाला। श्री गाँधी 2019 में भी ऐसे ही बड़बोलेपन का नुकसान उठा चुके हैं। भाजपा के 400 पार दावे का तो वे खूब मजाक उड़ाते हैं लेकिन काँग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी ये बताने का साहस वे आज तक नहीं जुटा सके जबकि  मतदान के चार चरण पूरे हो चुके हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 14 May 2024

इसके पहले कि पहाड़ धैर्य खो बैठे......


उत्तराखंड के गढ़वाल अंचल में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री सनातन धर्मियों की आस्था के प्राचीनतम केंद्र हैं। इस क्षेत्र को देवभूमि भी कहा जाता है। अनेकानेक पौराणिक घटनाओं का यहाँ से गहरा संबंध है। यूँ तो समूचा गढ़वाल ही पवित्र स्थलों से भरा हुआ है किंतु उक्त चारों धाम के दर्शन करना हर हिन्दू के जीवन का सपना होता है। प्राचीन काल से यहाँ की यात्रा प्रतिवर्ष गर्मियों में अक्षय तृतीया से प्रारंभ होकर दीपावली तक जारी रहती है। एक जमाना था जब श्रद्धालु ऋषिकेश से पैदल इन तीर्थों के दर्शन करने जाया करते थे। रास्ते में बसे पहाड़ी गाँवों और कस्बों में बने लकड़ी के घरों में उन्हें ठहरने और भोजन की सुविधा मामूली शुल्क पर उपलब्ध थी। सुविधाओं के अभाव में यात्रा कठिन होने पर भी  आस्था रूपी शक्ति के कारण यात्री अपने गन्तव्य तक पहुंचकर जीवन को सार्थक  मान लेते थे। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद इस क्षेत्र में सड़कों के साथ ही संचार सुविधाएं बढती गईं और अब बारह मासी राजमार्ग बना दिये गए हैं। पैदल यात्रा तो दशकों पहले ही इतिहास का विषय बन चुकी थी । अब तो आरामदेह बसें , टैक्सी और निजी वाहनों की वजह से चार धाम यात्रा ने धार्मिक पर्यटन का रूप ले लिया है।  हेलीकाप्टर के जरिये कुछ  दिन की यात्रा कुछ घंटों में संभव होने लगी है। ऐसे स्थलों पर यात्रियों के आवागमन और ठहरने आदि की समुचित व्यवस्थाएं होना स्वागत योग्य है। इनकी वजह से उक्त तीर्थ स्थलों की यात्रा करने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई जिसने यात्रा मार्ग पर पड़ने वाले इलाकों की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है जो चिंता में डालता  है। ताजा उदाहरण कुछ दिन पहले का है। यमुनोत्री के पट खुलने के दिन वहाँ जाने वाले संकरे पहाड़ी रास्ते पर भीड़ के कारण जाम लगने से अव्यवस्था फैल गई। अनेक तीर्थ यात्री और खच्चर दुर्घटना का शिकार हो गए। ताजा जानकारी के अनुसार यमुनोत्री और गंगोत्री के अंतिम 50 - 60 किमी की दूरी तय करने में लोगों को 20 घण्टे का समय लग रहा है। इस खबर से ही अंदाज लग जाता है कि  यात्रा के शुरुआती दिनों में ऐसे हालात हैं तब आने वाले समय में तो स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। जून 2013 में  केदारनाथ मंदिर के पीछे से आए जल सैलाब ने प्रलय का पूर्वाभास करवा दिया था। उसी तरह का हादसा कुछ वर्ष पहले अमरनाथ की पवित्र गुफा के दर्शनों हेतु एकत्र हजारों भक्तों ने झेला। इस सबसे  साबित होता है कि इन पर्वतीय स्थलों पर मानवीय हस्तक्षेप का अतिरेक अब अत्याचार का रूप लेने लगा है। वैसे तो सभी पहाड़ी इलाके प्रदूषण के शिकार होकर अपनी सुंदरता खोने लगे हैं लेकिन उत्तराखंड के चारों धाम सर्वाधिक  भुक्तभोगी हैं। बद्रीनाथ जाने वालों के लिए टोकन व्यवस्था किए जाने से वहाँ सुविधाजनक स्थिति बनाने में सफलता मिली है किंतु यमुनोत्री और गंगोत्री से आ रही खबरें विचलित कर रही हैं। हिमाचल के लोकप्रिय पर्यटन केंद्र शिमला और मनाली के रास्ते में चाहे जब जाम लगने से हजारों वाहन फंसकर रह जाते हैं। पहाड़ों के धसकने की घटनाएं भी जल्दी - जल्दी होना प्रकृति की चेतावनी है। जोशीमठ में धरती के धंसने के कारण पूरे शहर का अस्तित्व ही खतरे में आ गया था। कुछ समय पहले कुमाऊँ अंचल में बादल फटने के कारण नैनीताल की झील का पानी बाहर आकर निचले इलाकों के गाँव और कस्बों में भरने लगा। इस सबका कारण पहाड़ों के एकांत में बढ़ता खलल ही है। गढ़वाल में स्थित चारधाम आस्था के प्रमुख केंद्र होने से आकर्षण का केंद्र हैं। बद्रीनाथ तो आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में से है। केदारनाथ प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में है तो यमुनोत्री और गंगोत्री  क्रमशः यमुना और गंगा नदी के उद्गम होने के के कारण हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। पहले  वृद्धावस्था में इन स्थानों की यात्रा लोग करते थे किंतु अब उम्र का बंधन समाप्त हो चुका है। आर्थिक समृद्धि और बढती सुविधाओं के कारण ये धाम अब धार्मिक आस्था से ऊपर उठकर आमोद -  प्रमोद और रोमांच के लिए भी जाने जाते हैं। ट्रैवल एजेंसियां पेशेवर सुविधाएं प्रदान कर रही हैं। धर्मशालाओं की जगह गेस्ट हाउस और होटल आ गए हैं। यात्रा के मूल भाव  पर भी इन सब बातों का असर पड़ा है। हाल ही के वर्षों में चार धाम यात्रा के दौरान कोई न कोई हादसा होता रहा है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार को केवल सुविधाओं के विकास तक सीमित रहने की बजाय  आस्था के साथ अनुशासन लागू करने पर भी ध्यान देना चाहिए। इसके पहले कि पहाड़ अपना धैर्य खो बैठे  सतर्क हो जाने में ही  बुद्धिमत्ता है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 13 May 2024

राष्ट्रीय चुनाव पर हावी होने लगे हैं स्थानीय मुद्दे

सभा चुनाव के चौथे चरण में 96 सीटों पर मतदान हो रहा है। 11 बजे तक औसत लगभग 25 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया  कुछ राज्यों में पहले चरण से ही शुरू हुआ कम मतदान का सिलसिला आज भी दिखाई दे रहा है। इससे साबित होता है कि इस बार 2014 और 2019 जैसा उत्साह नहीं दिख रहा। इसके कई कारण राजनीतिक  विश्लेषक मान रहे हैं जिनमें सबसे बड़ा है राष्ट्रीय चुनाव में स्थानीय मुद्दों का हावी होना। जिन राज्यों में बीते एक वर्ष में विधानसभा चुनाव हो चुके हैं वहाँ के मतदाता राज्य सरकार का मूल्यांकन करते हुए इस चुनाव में मत देने का संकेत दे रहे हैं। क्षेत्रीय दलों के घोषणापत्र से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका उद्देश्य अपने राज्य के भीतर पाँव जमाये रखना मात्र है। आंध्र और उड़ीसा में विधानसभा चुनाव साथ ही होने से  ज्यादा चर्चा प्रादेशिक मुद्दों की हो रही है। अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति है। विभिन्न चैनलों के संवाददाता  समाज के विभिन्न वर्गों से जो बात करते हैं उसमें ज्यादातर लोगों को मोदी का नाम और काम तो मालूम है किंतु वे स्थानीय समस्याओं का बखान ज्यादा करते हैं। सुशिक्षित वर्ग भी राष्ट्रीय मुद्दों की चर्चा तो करता है किंतु घुमा फिराकर अपने इर्द गिर्द मंडराती समस्याओं पर उसकी बातचीत केंद्रित हो जाती है। इसी तरह कुछ सीटों पर किसी बड़े नेता की उम्मीदवारी होते ही सारे विषय आकर उसकी जाति पर केंद्रित हो जाते हैं जो बेहद चिंताजनक है। उ.प्र में कानून - व्यवस्था की बेहतर स्थिति के लिए महिलाएं राज्य की योगी सरकार की तारीफ करती हैं किंतु यह भी एक तरह से प्रदेश सरकार से जुड़ा मुद्दा है। राजमार्ग और फ्लाई ओवर का निर्माण बेशक केंद्र सरकार की उपलब्धि के तौर पर ज्यादातर मतदाताओं की पसंद है वहीं मुफ्त अन्न और मकान भी राष्ट्रीय मुद्दे के तौर पर चर्चा में आते हैं  किंतु उसके साथ ही ये भी सुनाई देता है कि पांच किलो राशन महीने भर के लिए अपर्याप्त है। उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस सिलेंडर प्राप्त करने वाली ज्यादातर महिलाएं अधिक कीमत की शिकायतें करती सुनाई देती हैं। युवाओं द्वारा सरकारी नौकरी हेतु ली जाने वाली परीक्षा  के पेपर लीक होने से जो  नाराजगी व्यक्त की जा रही है वह भी है तो राज्य स्तर की समस्या किंतु उसका असर लोकसभा चुनाव में भी साफ महसूस किया जा सकता है। और भी ऐसी अनेक बातें हैं जो विशुद्ध तौर पर स्थानीय होने के बाद भी लोकसभा चुनाव को प्रभावित कर रही हैं। इसका कारण हर समय चुनाव का माहौल देश में बने रहना है। लोकसभा चुनाव संपन्न होने के फ़ौरन बाद ही हरियाणा, महाराष्ट्र और जम्मू कश्मीर में चुनाव होना हैं । 2025 में देश दिल्ली के साथ ही बिहार में विधानसभा चुनाव देखेगा तो 2026 में प. बंगाल, केरल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होंगे। इस वजह से मुद्दों का इतना घालमेल हो चुका है कि आम मतदाता के लिए ये समझना कठिन हो जाता है कि वह  राज्य सरकार चुनने मतदान कर रहा है या केंद्र के लिए । इसका असर क्षेत्रीय मुद्दों के  राष्ट्रीय राजनीति पर हावी होने के तौर पर दिखाई देने लगा है। इसीलिये  प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी और राहुल गाँधी भी चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय राजनीति से जुड़ी बातों  पर जोर देना नहीं भूलते। कुछ राज्यों में मुफ्त खाद्यान्न योजना केंद्र और राज्य दोनों संचालित कर रहे हैं। ऐसा ही मुफ्त इलाज के बारे में है। म.प्र सदृश राज्य में किसानों को किसान सम्मान निधि मोदी सरकार भी देती है और प्रदेश सरकार भी। चूंकि मतदाता को लाभार्थी बनाकर छोटे - छोटे फायदों में उलझा दिया गया है लिहाजा लोकसभा चुनाव से जुड़े विषयों को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाता। ये प्रवृत्ति चुनाव परिणामों को किस हद तक प्रभावित करेगी ये आज कहना कठिन है। हालांकि आलोचना करने वाले ज्यादातर लोग बातचीत के अंत में मोदी सरकार की वापसी की संभावना जताते हैं किंतु चुनाव का समूचा विमर्श और बहस राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय स्थानीय समस्याओं के अलावा जाति और व्यक्ति विशेष पर केंद्रित हो गया है। दावे कोई कितने भी करे लेकिन मतदाता उदासीन भी है और शांत भी। आम तौर पर तो यह यथास्थिति बने रहने का सूचक है किंतु क्षेत्रीय दल और उनके नेताओं के सीमित दायरे ने राष्ट्रीय और प्रांतीय चुनाव का फर्क कम कर दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 11 May 2024

जेल में रहकर सरकार चलाओ : लोकतंत्र और संविधान बचाओ !


दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सर्वोच्च न्यायालय ने आखिरकार अंतरिम जमानत दे दी किंतु उन्हें 2 जून को पुनः जेल जाना पड़ेगा। 51 दिन पहले ईडी द्वारा दिल्ली सरकार की शराब नीति में हुए भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें  गिरफ्तार किया गया था। उसके फ़ौरन बाद ही उन्होंने अदालतों  के दरवाजे खटखटाने शुरू कर दिये किंतु निराशा  हाथ लग रही थी। उनके अधिवक्ता ने ये तर्क भी रखा कि लोकसभा चुनाव के ऐलान के बाद  गिरफ्तारी  प्रचार से रोकने की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने दो - तीन दिन पहले से ही ये कहना शुरू कर दिया था कि वे चुने हुए मुख्यमंत्री हैं,  प्रचार उनका मौलिक अधिकार है, हम उन्हें अंतरिम जमानत दे सकते हैं। लेकिन वे मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं जा सकेंगे तथा बिना उप राज्यपाल की अनुमति के किसी फाईल पर हस्ताक्षर की अनुमति भी उन्हें नहीं होगी। प्रकरण से संबंधित गवाहों  से मिलना भी प्रतिबंधित रहेगा।  जिस खंडपीठ द्वारा  अंतरिम जमानत दी गई उसने ये टिप्पणी भी कि श्री केजरीवाल आदतन अपराधी नहीं हैं। उनकी रिहाई को लेकर पक्ष - विपक्ष से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। कुछ को इसमें न्याय की जीत नजर आ रही है वहीं एक वर्ग  न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है। रोचक बात ये है कि श्री केजरीवाल ने जमानत मांगी ही नहीं थी, बल्कि गिरफ्तारी के समय और वैधानिकता पर आपत्ति जताई थी किंतु अदालत ने बजाय गिरफ्तारी के कानूनी पहलुओं पर फैसला करने के उनको  जेल से बाहर आकर चुनाव प्रचार करने की छूट दे दी। दूसरी तरफ  झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन महज इसलिए जेल से बाहर नहीं आ पा रहे क्योंकि वे गिरफ्तार होने के पूर्व ही कुर्सी छोड़ चुके थे । जबकि श्री केजरीवाल ने त्यागपत्र न देकर जेल में रहते हुए सरकार चलाने की हेकड़ी दिखाई । अंततः उनका मुख्यमंत्री होना ही अंतरिम जमानत का आधार बन गया। तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के. सी राव की बेटी के. कविता भी शराब नीति घोटाले में गिरफ्तार होकर जेल में है। वे भी आंध्र प्रदेश में अपनी पार्टी बी. आर.एस की विधायक हैं और पूर्व लोकसभा सदस्य भी। उनकी जमानत अर्जी भी  अदालत में अस्वीकार होती रही हैं, ऐसे में यदि चुनाव प्रचार ही अंतरिम जमानत का आधार है तब श्री सोरेन और सुश्री कविता को उससे वंचित रखना न्याय के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन है।  न्यायपालिका का हमारे देश में बेहद सम्मान है किंतु श्री केजरीवाल को बिना मांगे ही  अंतरिम जमानत दिये जाने से इस अवधारणा को बल मिला है कि वह आम और खास में अंतर करती है। ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या ये फैसला उन तमाम लोगों के जेल से बाहर आने का रास्ता नहीं खोल देगा जो राजनीतिक नेता हैं और अपनी पार्टी के लिए चुनाव में प्रचार करते हैं। स्मरणीय है बिहार और उ.प्र के अनेक माफिया सरगना जेल में रहते हुए चुनाव जीत गए किंतु उनको अपना चुनाव प्रचार करने की अनुमति अदालत से नहीं मिली। और न ही सदन में बैठने का अवसर दिया गया। हाल ही में दिवंगत उ.प्र के बाहुबली मुख्तार अंसारी 15 साल जेल में रहे और वहीं रहते तीन विधानसभा चुनाव जीते। बिहार के शहाबुद्दीन भी ऐसा ही कारनामा कर चुके हैं। देश में अनेक राजनेता विभिन्न कारणों से जेल में बंद रहे हैं। उनकी जमानत अर्जियाँ मंजूर भी हुईं और खारिज भी किंतु श्री केजरीवाल जैसी बिना मांगे जमानत शायद ही किसी की दी गई हो। अनेक विधि विशेषज्ञ कह रहे हैं इस फैसले की सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ में समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि राजनीति के क्षेत्र  में ऐसे लोगों की  संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जिनका जेल आना - जाना बना रहता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव बीमारी की आड़ में जमानत पर बाहर आकर जिस प्रकार से राजनीति करते हैं उससे कानून और दंड प्रक्रिया दोनों का मजाक उड़ता है।  न्यायपालिका की निष्पक्षता और विवेक का सम्मान करना सभी का कर्तव्य है किंतु श्री केजरीवाल को मिली  जमानत पर जो आलोचनात्मक टिप्पणियां आ रही हैं या तो उनको अदालत की अवमानना मानकर  कारवाई की जाए और यदि ऐसा करना जरूरी न हो तब मुख्य न्यायाधीश श्री डी. वाय. चंद्रचूड़ को स्वतः संज्ञान लेकर संदर्भित फैसले की समीक्षा करनी चाहिये वरना जेल में रहते हुए सरकार चलाने की सुविधा राजनीति को अपराधियों की शरण स्थली बना देगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 10 May 2024

काँग्रेस के बयान वीर पार्टी के लिए गड्ढा खोदने में जुटे


काँग्रेस के घोषणापत्र में महिलाओं को प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए देने का वायदा किया गया है। लेकिन गत दिवस म.प्र की रतलाम झाबुआ सीट के पार्टी प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने चुनावी सभा के मंच से अजीबोगरीब घोषणा करते हुए कहा कि जिनकी दो बीवियां हैं उनको दोगुनी रकम अर्थात  2 लाख रुपये दिये जाएंगे। उनकी इस बात का मंच पर मौजूद प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने समर्थन कर दिया। भाजपा ने फौरन इस घोषणा को तुष्टीकरण से जोड़ दिया क्योंकि 2 बीवियां रखने की अनुमति इस्लाम में ही है।  काँग्रेस द्वारा  वायदे से आगे निकलकर उसके प्रत्याशी द्वारा किये सार्वजनिक ऐलान का वहाँ उपस्थित पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा समर्थन किया जाना भी बेहद गैर जिम्मेदाराना कदम था। ऐसा लगता है केंद्रीय नेतृत्व के कमजोर होने के कारण काँग्रेस में ऊलजलूल बातें करने की छूट मिली हुई है। अमेठी से प्रत्याशी बनाये गए किशोरीलाल शर्मा के बारे में खुद पार्टी ने बताया कि वे चूंकि लंबे  समय से रायबरेली और अमेठी में गाँधी परिवार का राजनीतिक प्रबंधन देखते आ रहे थे इसलिए  बाहरी होते हुए भी स्थानीय जनता और कार्यकर्ताओं से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं। लेकिन नामांकन भरने के बाद जब उनसे पूछा गया कि स्थानीय किसी कार्यकर्ता को उपेक्षित करते हुए उनको अमेठी जैसी सीट से महज इसलिए  प्रत्याशी बनाया गया क्योंकि वे गाँधी परिवार के करीबी हैं तो वे तैश में आकर बोले मैं गाँधी परिवार का नौकर नहीं और न उससे कोई वेतन लेता हूँ। 40 वर्षों से  काम करते रहने के कारण मेरी अपनी सियासी  जमीन यहाँ तैयार हुई है। उनकी उक्त टिप्पणी से न सिर्फ आम जनता अपितु पार्टी कार्यकर्ता भी भौचक रह गए क्योंकि श्री शर्मा की पहिचान गाँधी परिवार के निजी सेवक से ज्यादा कुछ भी नहीं है। अमेरिका में बैठे ओवरसीज काँग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने पहले विरासत टैक्स जैसा विवादित मुद्दा उठाया और उसके बाद भारत के विभिन्न अंचलों में रहने वालों की तुलना अरबी, चीनी और अफ़्रीकियों से कर बवाल मचा दिया। जैसे ही उनके बयान का भाजपा और इंडिया गठबंधन के घटक दलों ने विरोध शुरू किया त्योंही उन्होंने पद से त्यागपत्र दे दिया। राहुल गाँधी ने उनके सलाहकार कहे जाने वाले श्री पित्रोदा की आलोचना से तो परहेज किया किंतु उनके बहनोई रॉबर्ट वाड्रा ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि एक पढ़ा लिखा इंसान आखिर ऐसी बातें कैसे कह सकता है? लेकिन उनसे भी चार कदम आगे बढ़कर काँग्रेस के वरिष्ट नेता और म.प्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अनुज लक्ष्मण सिंह ने तो यहाँ तक कह दिया कि श्री पित्रौदा को जितने जूते मारे जाएं, कम हैं। लेकिन आश्चर्य है दिग्विजय सिंह इस बारे में मौन हैं। राहुल गाँधी भी ये तय नहीं कर पा रहे कि वे अपने बौद्धिक सलाहकार के बौद्धिक दिवालियेपन पर हँसें या रोएं। इन मुसीबतों से मुक्ति मिलती उसके  पहले ही काँग्रेस के एक और बड़बोले नेता मणिशंकर अय्यर का साक्षात्कार प्रसारित होने लगा जिसमें वे ये कहते सुने जा रहे हैं कि भारत को पाकिस्तान की इज्जत करनी चाहिए क्योंकि उसके पास एटम बम है। उनके अनुसार  बीते 10 साल में पड़ोसी से बातचीत बंद रखना गलत है क्योंकि अपनी उपेक्षा पर पाकिस्तान  परमाणु अस्त्रों का उपयोग करने बाध्य हो सकता है। उन्होंने ये भी कहा कि भारत को अपनी ताकत का प्रदर्शन करते समय याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान के पास भी वही ताकत है। श्री अय्यर विदेश सेवा में रहने के दौरान पाकिस्तान में पदस्थ भी रहे ।  उनका जन्म भी बंटवारे के पूर्व  लाहौर में ही हुआ था। ये वही मणिशंकर हैं जिन्हें  प्रधानमंत्री श्री मोदी के प्रति अपशब्दों का उपयोग करने के कारण कुछ समय के लिए काँग्रेस ने निलंबित कर दिया था। उसके बाद से ही उनकी पूछ परख कम हो गई। वर्तमान लोकसभा चुनाव में अभी तक वे पृष्ठभूमि में थे किंतु पाकिस्तान की इज्जत किये जाने जैसे साक्षात्कार के कारण वे फिर चर्चा में आ गए। इस प्रकार  काँग्रेस के लिए उसके ये अघोषित प्रवक्ता गले का फंदा बन गए हैं। पार्टी भले ही इनके बयानों से  पल्ला झाड़े किंतु श्री पित्रोदा , श्री भूरिया  और श्री अय्यर  के ताजा बयान पार्टी के लिए समस्या बन गए हैं। जब श्री वाड्रा और लक्ष्मण सिंह जैसे लोगों ने श्री पित्रोदा के विरुद्ध  कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया व्यक्त की हो तब आम मतदाता कितना नाराज होगा इसका अंदाज लगाया जा सकता है। श्री भूरिया द्वारा दो बीवियों पर दो लाख देने और मणिशंकर द्वारा पाकिस्तान को इज्जत देने जैसी बातें कहकर काँग्रेस पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप की पुष्टि ही की। चुनाव के दौरान इस तरह की बयानबाजी काँग्रेस को हमेशा नुकसान पहुंचाती रही है।  इस बार भी वैसा ही होता दिख रहा है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 9 May 2024

जिसके पित्रौदा जैसे दोस्त हों उसे दुश्मनों की क्या जरूरत


सैम पित्रोदा के बारे में जन सामान्य तो उतना नहीं जानता क्योंकि वे अव्वल तो भारत में रहते नहीं और दूसरा पेशेवर व्यक्ति हैं। पहली बार उनकी शख्सियत  तब चर्चा में आई जब स्व. राजीव गाँधी के शासनकाल में उनके मार्गदर्शन पर संचार क्रांति हुई जिसके परिणामस्वरूप मोबाइल और इंटरनेट सुविधाएं देश को मिलीं। बाद की काँग्रेस सरकारों के दौर में भी वे बतौर सलाहकार अपनी सेवाएं प्रदान करते रहे। उनकी पेशेवर दक्षता अपनी जगह है किंतु  सत्ता प्रतिष्ठान की निकटता ने उनके मन में भी राजनीति का आकर्षण उत्पन्न कर दिया।  बीते कुछ वर्षों में काँग्रेस नेता राहुल गाँधी के विदेशों में आयोजित कार्यक्रमों के पीछे श्री पित्रौदा की ही भूमिका रही। कुछ दिनों पहले ही उन्होंनें अमेरिका के विरासत कर की प्रशंसा करते हुए भारतीय संदर्भ में वैसी ही जरूरत बताई तब उनके साथ ही पूरी काँग्रेस आलोचना का शिकार हुई। उस बयान की हर तरफ चर्चा हुई जिस पर काँग्रेस को रक्षात्मक होना पड़ा।  पार्टी के घोषणापत्र में संपत्ति के सर्वेक्षण जैसे वायदे को श्री पित्रौदा के विरासत कानून जैसे सुझाव से जोड़कर भाजपा ने काँग्रेस की घेराबंदी की। तब ये बात लोगों की जानकारी में आई कि वे काँग्रेस की ओवरसीज शाखा के अध्यक्ष भी हैं। ऐसे में जब विरासत कर को लेकर दिये उनके सुझाव से पार्टी को नुकसान होने का अंदेशा पैदा हुआ तब उससे किनारा कर लिया गया । वह विवाद ठंडा होता उसके पूर्व ही श्री पित्रौदा ने ये  कहकर बखेड़ा खड़ा कर दिया कि  उत्तर भारत के लोग यूरोपियन, पश्चिम के अरबी, दक्षिण के अफ्रीकी और पूर्व के चीनी जैसे लगते हैं। उन्होंने इसके आगे कहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और सब मिल जुलकर रहते हैं। उन्होंने इस विविधता की प्रशंसा भी की। लेकिन पूर्वी भारत के लोगों को चीनी और दक्षिण भारत के निवासियों को अफ्रीकी जैसा बताकर उन्होंने एक बार फिर बर्र के छत्ते में पत्थर मार दिया। सात समंदर पार बैठे श्री पित्रौदा ने उक्त टिप्पणी भले ही भारत की विविधता को लेकर की हो किंतु लोकसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच इस तरह के बयान आग में घी का काम कर जाते हैं और वही हुआ भी। प्रधानमंत्री तो ऐसे मुद्दों की तलाश में ही रहते हैं। उन्होंने जैसे ही श्री पित्रौदा का बयान सुना त्योंही काँग्रेस पर पर जबरदस्त आक्रमण कर दिया। उनके पहले वाले बयान की जलन अभी कम नहीं हुई थी कि श्री पित्रौदा ने और बड़ा घाव दे दिया। इस अप्रत्याशित और अनावश्यक टिप्पणी ने काँग्रेस के चेहरे की हवाइयाँ उड़ा डालीं। बिना देर लगाए पार्टी प्रवक्ता जयराम रमेश ने सामने आकर स्पष्ट किया कि ये श्री पित्रौदा के निजी विचार है जिनसे पार्टी को कुछ भी लेना - देना नहीं है। और कोई समय होता तब काँग्रेस नेतृत्व उसे उपेक्षित कर देता लेकिन लोकसभा चुनाव में मतदान के चार चरण शेष रहने के कारण पार्टी के मन में पूर्वी और दक्षिणी के साथ देश के पश्चिमी हिस्सों में जनता की नाराजगी का डर समा गया। भले ही उसने उक्त बयान से पल्ला झाड़ लिया हो किंतु  इंडिया गठबंधन के अन्य  दलों ने भी जब उसकी तीखी आलोचना करते हुए  किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किये जाने जैसी टिप्पणी की तब काँग्रेस की चिंता बढ़ी । उसके बाद श्री पित्रौदा ने ओवरसीज काँग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और वह  आनन - फानन स्वीकार भी हो गया। यद्यपि पार्टी ने सफ़ाई दी है कि उन्होंने स्वेच्छा से पद त्याग किया किंतु लोकसभा चुनाव न चल रहे होते तब गाँधी परिवार के निकटस्थ व्यक्ति को पार्टी इतनी आसानी से नहीं हटने देती। बावजूद इसके उसके लिए उक्त बयान ने मुश्किल तो  खड़ी कर ही दी। स्मरणीय है श्री पित्रौदा ने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर विवादास्पद बयान देकर काँग्रेस के लिए संकट उत्पन्न कर दिया था। प्रश्न ये है कि इस तरह की अधकचरी सोच और राजनीतिक परिपक्वता के अभाव वाले व्यक्ति को राहुल गाँधी अपना सलाहकार बनाये रहे क्योंकि वह विदेशों में उनके लिए कार्यक्रम आयोजित करवा देता है। इस बारे में बसपा प्रमुख मायावती की निर्णय क्षमता की दाद देनी पड़ेगी जिन्होंने अपने भतीजे को अपने राजनीतिक  उत्तराधिकारी के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक पद से ये कहते हुए हटा दिया कि वे अपरिपक्व हैं। दरअसल बुआ जी भतीजे से इसलिए नाराज हो गईं क्योंकि उसने चुनावी मंच से आपत्तिजनक टिप्पणियां कर दी थीं। वैसे प्रचारित भले ही ये किया जा रहा है कि श्री पित्रौदा ने खुद होकर पद त्याग किया है किंतु सच्चाई यही है कि  काँग्रेस ने फिलहाल उनसे पिंड छुड़ाने का दिखावा किया है। यदि पार्टी वाकई उनके बयान से नाराज है तो उसे भी श्री पित्रौदा को अपरिपक्व कहने का साहस दिखाना चाहिए। विशेष रूप से राहुल को यह काम करना चाहिए क्योंकि वे उन्हीं के सलाहकार हैं। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 8 May 2024

विपक्षी गठबंधन में वैचारिक एकरूपता और सामंजस्य का अभाव


राहुल गाँधी कह रहे हैं वे आरक्षण  पर लगी 50 प्रतिशत की बंदिश खत्म करवा देंगे, लालू प्रसाद यादव मुसलमानों को आरक्षण देने का वायदा कर बैठे, रामगोपाल यादव के मुताबिक अयोध्या में बना राम मंदिर बेकार है, असदुद्दीन  ओवैसी बाबरी मस्ज़िद जिंदाबाद करवा रहे हैं। ममता बैनर्जी और विजयन अपने राज्य में सी.ए.ए लागू नहीं होने देने का ऐलान कर चुके हैं। वामपंथी जम्मू कश्मीर में धारा 370 को बहाल करने का दम भर रहे हैं। ऐसे में एकजुट होकर भाजपा के विरुद्ध चुनाव मैदान में उतरे इंडिया गठबंधन के घटक दलों के बीच नीतिगत मतभिन्नता साफ नजर आ रही है। वैसे भी सभी ने अपने अलग - अलग घोषणापत्र जारी करते हुए ये साबित कर ही दिया कि उनकी एकता केवल मंच पर एक साथ खड़े होकर फोटो खिंचवाने तक ही सीमित है। संपत्ति का सर्वेक्षण और विरासत टैक्स जैसे मुद्दों पर भी विपक्ष की वैचारिक अस्पष्टता उजागर हो रही है।  परिणाम ये निकल रहा है कि  इंडिया गठजोड़ में शामिल पार्टियां एक - दूसरे के नीतिगत बयानों से असहमत होने पर भी उनका विरोध नहीं कर पा रहीं।  ये भी देखने मिल रहा है कि विपक्षी  नेताओं के बीच भी सामंजस्य की कमी है। लालू प्रसाद द्वारा मुस्लिम आरक्षण के पक्ष में दिये बयान पर भाजपा ने आक्रामक रुख दिखाया तो उनके बेटे तेजस्वी सफाई देते दिखाई दिये। इसी तरह रामगोपाल द्वारा राम मंदिर को बेकार कहे जाने पर ज्योंही समाजवादी पार्टी पर हमले शुरू हुए त्योंही अखिलेश यादव ने राम भक्त होने का राग छेड़ दिया। इस तरह के बयानों को रोकने की कोई संगठनात्मक व्यवस्था नहीं होने से चुनाव के बीच इंडिया गठबंधन में वैचारिक एकजुटता गायब सी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  आरक्षण को 50 प्रतिशत  की सीमा से बाहर निकालने के श्री गाँधी के बयान पर ये कहते हुए हमला कर रहे हैं कि वे दलित और ओबीसी के कोटे का आरक्षण छीनना चाहते हैं। इसी तरह श्री गाँधी  लगभग रोजाना ही अंबानी और अडानी के विरुद्ध बोलते हैं लेकिन ममता और शरद पवार से उन दोनों के विरुद्ध  एक शब्द भी नहीं सुनाई देता। उद्धव ठाकरे भी इस मुद्दे पर  साथ नहीं हैं। इन्हीं विरोधाभासों के कारण विपक्षी गठबंधन की धाक राष्ट्रीय स्तर पर नहीं बन पा रही। सबसे बड़ी बात क्षेत्रीय दलों द्वारा काँग्रेस को ताकतवर होने से रोकने की रणनीति है। यही वजह है कि श्री गाँधी ये तो कहते हैं कि भाजपा 150 सीटों तक ही सिमट जायेगी किंतु वे ये कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे कि काँग्रेस के कितने सांसद जीतेंगे? अन्य दलों को भी काँग्रेस की   चिंता नहीं है। उ.प्र को ही लें तो अखिलेश ने काँग्रेस को वैसे तो 17 सीटें दे दीं किंतु काँग्रेस का पूरा तामझाम रायबरेली और अमेठी में आकर सिमट गया है। राहुल के अमेठी छोड़कर रायबरेली से लड़ने से भी ये संदेश गया कि प्रधानमंत्री पद के दावेदार  होने के बावजूद वे 2019 में हारी अपनी सीट को दोबारा हासिल करने की हिम्मत न दिखा सके। प्रियंका वाड्रा  भी अमेठी में लड़ने से पीछे हट गईं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी पूरे आत्मविश्वास से मैदान में है। अखिलेश के अलावा उनकी पत्नी डिंपल सहित परिवार के पांच सदस्य चुनाव लड़ रहे हैं। प. बंगाल में प्रणव मुखर्जी के बाद काँग्रेस के सबसे बड़े चेहरे अधीर रंजन चौधरी के विरुद्ध  मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर  ममता ने एकला चलो का नारा बुलंद कर दिया। रायबरेली में तो सपा ने गठबंधन धर्म निभाते हुए राहुल के विरुद्ध  उम्मीदवार नहीं उतारा किंतु ममता नहीं मानीं। और तो और वायनाड में सीपीआई ने अपना  प्रत्याशी हटाने से इंकार करते हुए उल्टे राहुल को ही उत्तर भारत जाकर भाजपा को हराने की नसीहत दे डाली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तो विपक्षी गठबंधन  काँग्रेस के कारण ही टूटने के कगार पर आ गया क्योंकि उसके प्रदेश अध्यक्ष ने ही आदमी पार्टी के साथ सीटों के बंटवारे का विरोध करते हुए पार्टी छोड़ दी।  उस दृष्टि से भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ बेहतर समन्वय बना रखा है। राजनीतिक प्रेक्षक भी भले ही 400 पार के दावे को अतिशयोक्ति पूर्ण मान रहे हों किंतु मोदी सरकार की वापसी से इंकार नहीं करते। मतदान के तीन चरण संपन्न होने के बाद हालांकि बहुत साफ  संकेत तो नहीं मिले किंतु विपक्ष के  प्रचार अभियान में एकरूपता के अभाव की वजह से वह सत्ता परिवर्तन का एहसास जगाने में फिलहाल तो विफल है। वहीं हर चरण के बाद भाजपा ज्यादा जोर मारती दिख रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 May 2024

भ्रष्टाचार न्यूनतम साझा कार्यक्रम का रूप ले चुका है


केंद्र सरकार पर समूचा विपक्ष आरोप लगाता है कि वह ईडी नामक संस्था के जरिये अपने राजनीतिक विरोधियों को डराती है। अनेक विपक्षी नेताओं के  भाजपा में शामिल होने के पीछे भी ईडी का हाथ बताया जाता है। हालांकि उसकी गिरफ्त में आए लोगों में राज नेताओं की संख्या 5 प्रतिशत ही है। वैसे ये मानने में कुछ भी गलत नहीं है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में ईडी और सीबीआई के शिकंजे में फंसने वाले राजनेताओं में ज्यादातर विपक्षी हैं और ये भी कि उनमें से ही कुछ चर्चित चेहरे भाजपा में आकर फिलहाल अभय दान पा गए। ये भी सच है कि ईडी के छापों में कुछ विपक्षी नेताओं के ठिकानों से करोड़ों रु. नगद जप्त हुए। लेकिन ऐसे अवसरों पर ईडी पर आरोप लगाने वाले मुँह में दही जमाकर बैठ जाते हैं। प. बंगाल के एक मंत्री और उनकी महिला मित्र के यहाँ मिली नोटों की गड्डियों को गिनने में ही कई दिन लगे थे । गत दिवस ऐसी ही खबर आई झारखण्ड से जहाँ ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर आलम के निजी सहायक संजीव लाल के नौकर जहांगीर आलम और मुन्ना सिंह सहित कुछ और ठिकानों पर मारे गए छापों में 35 करोड़ रु. से ज्यादा की नगदी बरामद की गई। आज भी छापे मारे गए जिनमें बड़ी राशि जप्त की गई है। इस बारे में जानकारी मिली है कि ईडी ने फरवरी महीने में राज्य के ग्रामीण विकास विभाग के मुख्य अभियंता वीरेंद्र के. राम को गिरफ्तार किया था। साथ ही इस विभाग में चल रही आर्थिक अनियमिताओं की जाँच हेतु राज्य सरकार को गोपनीय पत्र लिखा जिसकी खबर  भ्रष्ट लोगों तक पहुंचा दी गई। इसका प्रमाण तब मिला जब छापेमारी के दौरान जप्त नोटों के बंडलों में ईडी के उक्त पत्र की प्रति भी मिली। झारखण्ड वह राज्य है जो अपने गठन के समय से ही भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा रहा। उसके एक  पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा  घोटाले में जेल जा चुके हैं वहीं दूसरे हेमंत सोरेन अभी जेल में हैं। राज्यसभा चुनाव में झारखण्ड के विधायक किस तरह बिकते रहे यह सर्वविदित है। जिन लोगों से गत दिवस छापेमारी में करोड़ों की गड्डियाँ बरामद हुईं वे सभी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से  उक्त मंत्री से जुड़े हुए हैं। उनके निजी सहायक के नौकर के यहाँ से करोड़ों रु. प्राप्त होना बिना कुछ कहे ही सब कुछ जाहिर कर देता है। छापे के 24 घंटों  तक बाद तक किसी विपक्षी नेता द्वारा कोई बयान नहीं दिया जाना चौंकाने वाला है। उधर मंत्री जी को सरकार से हटाये जाने का भी कोई संकेत नहीं मिला है। भले ही नोटों के बंडल उनके बंगले से नहीं मिले किंतु उनके निजी सहायक के नौकर के फ्लैट पर जमा अकूत दौलत का स्रोत क्या होगा यह साधारण व्यक्ति भी बता देगा। ऐसे में विपक्ष से अपेक्षा है वह इस कांड पर अपना रुख स्पष्ट करे। लेकिन वह मंत्री आलमगीर आलम का इसलिए बचाव करेगा कि वे मुस्लिम हैं और उनको मंत्री पद से हटाये जाने से उस  वर्ग के मतदाता नाराज हो जायेंगे। ये दोहरा रवैया ही भारतीय राजनीति की पहिचान बन गया है। जिसमें अपने या अपनों के दोष नजरंदाज किये जाते हैं।  कर्नाटक के यौन शोषण कांड पर काँग्रेस भाजपा को मुँह खोलने ललकार रही है वहीं कल से भाजपा को मौका मिल गया है विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने का। कुल मिलाकर समूची राजनीतिक व्यवस्था आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। इलेक्टोरल बाँड के मामले में सभी भाजपा पर चढाई कर रहे थे लेकिन ज्योंही तृणमूल काँग्रेस और द्रमुक को भी लाॅटरी किंग से अरबों रु. के बाँड मिलना स्पष्ट हुआ  वैसे ही मामला ठंडा पड़ गया। यही वजह है कि भ्रष्टाचार मुद्दा होकर भी मुद्दा नहीं बन पाता। समय - समय पर  नये - नये कांड उजागर होते रहते हैं। ग्राम पंचायत से लेकर केंद्रीय सचिवालय तक यदि कुछ एक समान है तो वह भ्रष्टाचार ही है। संस्थागत स्वरूप ग्रहण करने के बाद वह संस्कृति बन गया है। ये कहने में भी संकोच नहीं होता कि राजनीति का मुख्य आकर्षण भ्रष्टाचार के जरिये धन बटोरना हो गया है। गाँधी, लोहिया, दीनदयाल और आंबेडकर के चेलों के बीच सैद्धांतिक मतभेद कितने भी हों लेकिन भ्रष्टाचार एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम का रूप ले चुका है। जो पकड़ा जाता है वह शर्मसार होने के बजाय दूसरों का भ्रष्टाचार उजागर करते हुए ये साबित करने में जुट जाता है कि राजनीति नामक स्नानागार में सब वस्त्रहीन हैं। बीते 77 वर्ष में सत्ता बदलती रही लेकिन भ्रष्टाचार को मिटाने के सारे दावे   मिट्टी में मिल गए। स्वर्गीय काका हाथरसी आधी सदी पहले लिख गए थे कि रिश्वत लेते पकड़ जा, तो रिश्वत दे के छूट। दुर्भाग्य से भ्रष्टाचार की गाजर घास अब न्यायपालिका के प्रांगण तक फैल चुकी है। सब कुछ रुपयों से खरीदा जा सकता है की , अवधारणा स्थापित हो जाने  से गलत काम करने वाले निर्भय होते जा रहे हैं। ईडी द्वारा झारखण्ड सरकार को भेजे गोपनीय पत्र की प्रतिलिपि संदर्भित छापों में मिलना नेता और नौकरशाहों के अपवित्र गठजोड़ का ताजा प्रमाण है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 May 2024

यदि 7 मई को भी कम मतदान हुआ तो....


लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण का मतदान मंगलवार 7 मई को होगा। विभिन्न राज्यों की 94 सीटों के मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। पिछले दो चरणों में 2019 की तुलना में मतदान का प्रतिशत कम रहने से राजनीतिक पार्टियां हतप्रभ हैं। चुनाव आयोग भी चिंतित है। हर सीट पर मत प्रतिशत  को लेकर अलग - अलग कारण बताये गए। गर्मी, शादियाँ , फसल की कटाई आदि कम मतदान की वजह बताई गई जिसने उम्मीदवारों के अलावा राजनीतिक दलों और चुनाव सर्वेक्षण करने वालों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं। भले ही एनडीए और इंडिया गठबंधन ये आत्मविश्वास जता रहे हों कि मत प्रतिशत में गिरावट उनके पक्ष में है लेकिन सच्चाई ये है कि सत्ता में बैठे दल के साथ ही जो जहाँ विपक्ष में है उसकी भी नींद उड़ी हुई है । कम मतदान को अमूमन यथास्थिति बनाये रखने वाला माना जाता रहा है जबकि अधिक मतदान को  सत्ता परिवर्तन का संकेत । लेकिन हाल के कुछ वर्षों में उक्त अवधारणा बदली है। मसलन कम मतदान में भी कई सरकारें बदल गई जबकि ज्यादा मतदान सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में गया। भारत इस समय संघीय गणराज्य का जीवंत उदाहरण है। केंद्र में बैठी सरकार की विरोधी विचारधारा वाले दलों की  सरकारें अनेक राज्यों में होने से चुनाव के परिणाम अनुमानों के विपरीत भी जाने लगे हैं। अनेक विख्यात चुनाव विश्लेषकों को तो बाद में माफी भी मांगना पड़ गई। कुछ टीवी चैनल भी अपने गलत अनुमानों के कारण शर्मसार हुए। ये देखते हुए कम  मतदान को लेकर कोई भी निष्कर्ष निकालना मुश्किल हो गया है। कल होने वाले मतदान मेंं भी यदि प्रतिशत 2019 से कम रहता है तब ये कहा जा सकेगा कि मतदाता की उदासीनता को उत्साह में परिवर्तित करने में राजनेता विफल साबित हो रहे  हैं। हालांकि जीत हार तो होगी ही। वैसे भी परिणाम आने के बाद विजयी और पराजित प्रत्याशी को प्राप्त मतों का अंतर चुनावी विश्लेषकों के बुद्धिविलास या माथापच्ची तक सिमटकर रह जाता है। एक वोट से जीतने वाला सांसद या विधायक बन जाता है जबकि हारने वाले के हाथ खाली रहते हैं । फर्क ये जरूर पड़ता है कि कम अंतर से पराजित व्यक्ति के मन में भविष्य को लेकर उम्मीदें कायम रहती हैं जबकि लाखों से हारे प्रत्याशी  का हौसला पस्त हो जाता है। और उसकी पार्टी भी उसे संभावना शून्य मानकर किनारे कर देती है। यही वजह है कि हर प्रत्याशी ज्यादा से ज्यादा मत अर्जित करने का प्रयास करता है। उल्लेखनीय बात ये है कि   देश की सरकार चुनने के लिए हो रहे इस चुनाव में भी स्थानीय मुद्दे जोर मार रहे हैं। दरअसल मतदाताओं का एक वर्ग ऐसा है जो लोकसभा और विधानसभा चुनाव में फर्क नहीं कर पाता। विभिन्न चैनलों के संवाददाता देश भर में घूम कर मतदाताओं से बात कर रहे हैं । उसके जो वीडियो सामने आये उनसे ये स्पष्ट हो जाता है कि मत देने वाले को केंद्र और राज्य के चुनाव का अंतर ही नहीं पता। ये सब देखते हुए अब इस बात की जरूरत महसूस् की जाने लगी है की टुकड़ों में बंट चुके चुनाव को एकजुट किया जावे । स्मरणीय है गत वर्ष के अंतिम महीनों में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे वहाँ के अनेक मतदाता कुछ महीनों के भीतर हो रहे इस चुनाव में राज्य सरकार के कामकाज को मुद्दा बना रहे हैं। विपक्ष भी बजाय राष्ट्रीय के स्थानीय सवाल उठाकर अपना रास्ता साफ करना चाहता है। प. बंगाल, तमिलनाडु  कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में जहाँ विपक्ष की मजबूत राज्य सरकारें हैं वहाँ का चुनावी परिदृश्य पूरी तरह अलग है। इसी तरह उड़ीसा और आंध्र में विधानसभा चुनाव भी लोकसभा के साथ होने से वहाँ पूरी तरह से राज्य सरकार का कामकाज कसौटी पर है। इसीलिए चाहे नरेंद्र मोदी हों या राहुल गाँधी, जो भी केंद्रीय नेता वहाँ जाता है , राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति अपनाता है। ऐसा ही मंजर भाजपा शासित राज्यों में है जहाँ विपक्ष वहाँ के मुख्यमंत्रियों को निशाना बना रहा  है। मुद्दों के इसी घालमेल ने मतदाताओं को  उदासीन भी बना दिया है। राजनीतिक मतभेदों की स्थिति में  केंद्र और राज्य दोनों एक दूसरे को दोषी बताकर जनता की निगाहों में पाक - साफ बने रहना चाहते हैं। जिससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। और यह भी एक कारण है मतदान का प्रतिशत कम होने का। यदि कल तीसरे चरण में भी मतदाताओं ने पहले दो चरणों जैसी सुस्ती या उदासीनता दिखाई तब ये राजनेताओं और राजनीतिक दलों के लिए विचारणीय होगा क्योंकि इससे साबित हो जायेगा कि आम जनता का बड़ा वर्ग इस बात से निराश हो चला है कि सत्ता तो बदलती है किंतु व्यवस्था में बड़ा बदलाव नहीं होता। और ये भी कि चाहे सत्ता हो या विपक्ष दोनों जितना कहते हैं उतना करते नहीं । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 5 May 2024

रायबरेली और अमेठी में गाँधी परिवार का प्रभाव भले हो किंतु काँग्रेस की जड़ें उखड़ चुकी हैं


       लोकसभा चुनाव शुरू होते ही उ.प्र की  रायबरेली और अमेठी सीट  को लेकर कयास लगने शुरू हो गए थे। सोनिया गाँधी के राज्यसभा में निर्वाचित होने के बाद रायबरेली से प्रियंका वाड्रा के चुनाव लड़ने की अटकलें लगने लगीं। जब राहुल गाँधी ने केरल की वायनाड सीट से दोबारा लड़ने का निर्णय किया तब अमेठी को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई। 2019 में इस सीट से पराजय की आशंका के कारण ही उन्होंने वायनाड से भी हाथ आजमाए। अमेठी में उनको स्मृति ईरानी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। उसके बाद पाँच साल में वे भूले - भटके दो - तीन बार ही वहाँ आये। इससे ये अवधारणा बनने लगी कि उनका मन अमेठी से उचट चुका है। लेकिन दबी चर्चा ये भी चलती रही कि वायनाड के मतदाताओं की नाराजगी से बचने के लिए उनके अमेठी से भी लड़ने का निर्णय गुप्त रखा गया है।

     26 अप्रैल को वहाँ मतदान होने के बाद अमेठी और रायबरेली को लेकर काँग्रेस में मंथन शुरू हुआ। अमेठी से श्री गाँधी के लड़ने के संकेत भी आने लगे। वहीं  रायबरेली से प्रियंका की उम्मीदवारी भी तय मानी जा रही थी। 3 मई को नामांकन का आखिरी दिन था किंतु 2 तारीख की रात तक पार्टी की तरफ से अधिकृत घोषणा नहीं किये जाने से कयासों का दौर चलता रहा। अचानक 3 तारीख की सुबह पार्टी ने रायबरेली से राहुल और अमेठी से गाँधी परिवार का राजनीतिक प्रबंधन देखने वाले किशोरीलाल शर्मा को प्रत्याशी घोषित कर सबको चौंका दिया। इंदिरा गाँधी के  जमाने में  यशपाल कपूर और माखन लाल फोतेदार इन दोनों सीटों पर परिवार की राजनीति का पूरा इंतजाम किया करते थे। राजीव गाँधी के आने के बाद से श्री शर्मा ने उनका स्थान ले लिया। कहा जाता है वे इन दोनों सीटों पर काँग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ ही जनसाधारण के बीच भी पैठ रखते हैं। लेकिन उनको अमेठी से उतारे जाने के  फैसले से क्षेत्र के काँग्रेस कार्यकर्ता भी भौचक रह गए।

     इसी तरह रायबरेली से राहुल को उम्मीदवार बनाये जाने की बात भी लोगों को अटपटी लगी। भाजपा ने बिना देर लगाए कहना शुरू कर दिया कि वे हार के भय से अमेठी छोड़कर रायबरेली भाग गए। प्रियंका के नहीं लड़ने पर भी कटाक्ष किये गए। इसके अलावा ये भी कहा जाने लगा कि इस फैसले के पीछे सोनिया  गाँधी की विरासत का मसला छिपा हुआ है जो किसी भी सूरत में वाड्रा परिवार को कांग्रेस की पहिचान नहीं बनने देना चाहतीं। प्रियंका के पति रॉबर्ट भी कुछ समय पूर्व अमेठी से ताल ठोंकते नजर आये थे जिन्हें पार्टी ने कोई भाव नहीं दिया। प्रियंका को स्मृति ईरानी के विरुद्ध लड़ाये जाने की चर्चा भी जोरों पर थी किंतु वे पहले चुनाव में हार का खतरा उठाने से पीछे हट गईं।

    हालांकि काँग्रेस ने श्री शर्मा  को रायबरेली से लड़ाये जाने को अपना मास्टर स्ट्रोक बताते हुए यह प्रचारित  करना शुरू कर दिया कि ऐसा करने से अमेठी में स्मृति ईरानी का महत्व कम हो गया क्योंकि राहुल के मुकाबले में आने से वह सीट हाई प्रोफाइल बन जाती। पार्टी का ये भी सोचना है कि रायबरेली से श्री गाँधी के न लड़ने से वह सीट हाथ से निकल सकती थी। 2019 में भी श्रीमती गाँधी की जीत का अंतर घटकर 1.60 लाख रह गया था। वह भी तब जब सपा और बसपा दोनों ने प्रत्याशी नहीं उतारे। इस बार सपा तो साथ है किंतु बसपा ने दोनों सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करते हुए दलित मतों में बंटवारा होने के हालात बना दिये।

        रायबरेली और अमेठी को गाँधी परिवार का गढ़ कहा जाता रहा है किंतु दोनों में उसका एक भी विधायक नहीं है। सपा के एक विधायक भी भाजपा के साथ जुड़ गए हैं। इससे साफ हो जाता है कि ये दोनों सीटें गाँधी परिवार का गढ़ भले रह गई हों लेकिन काँग्रेस की जड़ें यहाँ उखड़ चुकी हैं। इसके चलते ही  राहुल को रायबरेली से उतारना पड़ा। यदि सपा का समर्थन न हो तो वे यहाँ से लड़ने की हिम्मत ही नहीं करते।

    रही बात किशोरीलाल शर्मा की तो वे काँग्रेस के नहीं अपितु गाँधी परिवार के निजी सेवक हैं। ऐसे में स्थानीय काँग्रेस जनों में इस बात का गुस्सा भी है कि  पार्टी नेतृत्व ने उनमें से किसी को अवसर देने के बजाय ऐसे व्यक्ति पर भरोसा किया जो प्रथम परिवार का वफादार मात्र है।

    कुल मिलाकर रायबरेली को भले काँग्रेस सुरक्षित मानकर चल रही हो लेकिन अमेठी को दोबारा हासिल करने के प्रति उसके मन में संशय है वरना राहुल न सही किन्तु प्रियंका वहाँ से अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत करतीं। एक बात और ये भी विचारणीय है कि जिस तरह श्री शर्मा जैसे नये - नवेले प्रत्याशी के सामने स्मृति ईरानी की प्रतिष्ठा दांव पर है ठीक वैसे ही रायबरेली में भाजपा के दिनेश प्रताप सिंह के सामने अपनी साख बचाना राहुल गाँधी के लिए भी चिंता का विषय है।

    

-रवीन्द्र वाजपेयी