Tuesday, 4 February 2025

राहुल के मुँह से सच्चाई निकल ही गई


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने गत दिवस राष्ट्रपति के अभिभाषण में ज्यादातर तो पुरानी बातों को ही दोहराया किंतु बेरोजगारी के मुद्दे पर वे ऐसी टिप्पणी कर गए जिसने  यूपीए सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उल्लेखनीय है  हाल ही में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का दावा कांग्रेस हमेशा करती आई है। विशेष रूप से बेरोजगारी को लेकर वह वर्तमान मोदी सरकार पर तीखे हमले करती रही। राहुल भी अपनी सभाओं में उनकी सत्ता बनने पर नौजवानों को रोजगार की गारंटी बांटते  हैं।   विगत लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी को इंडिया गठबंधन ने बड़ा मुद्दा बनाया था जिसका कुछ - कुछ असर भी देखने मिला। लेकिन गत दिवस लोकसभा में दिये भाषण में श्री गाँधी ने युवाओं को देश का भविष्य बताते हुए कहा  उनके लिए काम करना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने मोदी सरकार द्वारा प्रारंभ किये गए मेक इन इंडिया अभियान की तो प्रशंसा की किंतु साथ ही ये भी जोड़ दिया कि वह अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। सबसे बड़ी बात उन्होंने ये कही कि बेरोजगारी का  हल करने में यूपीए वन  और टू  के अलावा वर्तमान   सरकार भी  असफल रहीं। इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि 1991 में बनी  कांग्रेस के नेतृत्व वाली पी.वी  नरसिम्हा राव सरकार द्वारा किये गए आर्थिक सुधारों में उपभोग पर तो जोर दिया गया किंतु उत्पादन बढ़ाने के प्रति उदासीनता बरती गई। और वही गलती आने वाली सरकारों के दौर में दोहराई जाती रही। उनका आशय ये था कि उत्पादन बढ़ाने से रोजगार में वृद्धि के साथ  ही विदेशों पर हमारी निर्भरता कम होगी जिससे कि देश आर्थिक और कूटनीतिक दबावों से मुक्त रहेगा। यद्यपि श्री गाँधी ने अभिभाषण के बहाने मोदी सरकार पर जमकर अपनी भड़ास निकाली। महाराष्ट्र में हुई करारी हार की कसक  भी उनके उद्बोधन में चुनाव आयोग पर निशाना साधने के रूप दिखाई दी किंतु पूरे भाषण में उन्होंने एक बात ईमानदारी से स्वीकार कर ली कि यूपीए सरकार ने भी बेरोजगारी घटाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया। उनके भाषण के इन अंशों की प्रशंसा भी हुई क्योंकि उनमें विपक्ष के नेता के साथ ही एक राष्ट्रीय सोच नजर आई।  तथ्यात्मक स्थिति का विश्लेषण करने पर ये बात सामने आयेगी कि  राव सरकार द्वारा जिस उदारीकरण और मुक्त व अर्थव्यवस्था की नीति लागू की गई उसे कमोबेश उसके बाद आई सभी केंद्र सरकारों ने जारी रखा। उस सरकार में वित्तमंत्री डाॅ. मनमोहन  सिंह ही थे जिन्हें कांग्रेस आर्थिक सुधारों का जनक मानती है। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस ने कभी भी राव साहब को इस बात का श्रेय नहीं दिया कि उन्होंने डाॅ. सिंह की प्रतिभा को पहिचानकर उन्हें अपनी सरकार में शामिल किया। बाद में उनको  गाँधी परिवार ने प्रधानमंत्री भी बनवाया। जिन आर्थिक सुधारों को डाॅ. सिंह ने प्रारंभ किया उनके लिए वैश्विक परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार थीं। विश्व व्यापार संगठन के गठन के बाद नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों को जारी रखने से देश अलग - थलग पड़ जाता। उदारवाद ने विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे तो खोले किंतु उसके कारण विदेशी उत्पादों की आवाजाही भी बढ़ने लगी जिसका दुष्प्रभाव भारतीय उद्योगों के बन्द होने के रूप में आने लगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में कारोबार जमाकर एक बड़े बाजार पर कब्जा तो जमाया ही किंतु  सबसे बड़ा बदलाव हुआ उपभोक्तावाद रूपी पाश्चात्य जीवनशैली के प्रादुर्भाव के रूप में। उदारवाद ने उधारवाद की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया जिससे विदेशी कंपनियों को भरपूर मुनाफा हुआ। राहुल ने उपभोग और उत्पादन के बीच संतुलन बिगड़ने की जो बात कही तो उसके लिए डाॅ. सिंह ही जिम्मेदार माने जाएंगे क्योंकि आर्थिक सुधारों ने  रोजगार विहीन विकास को जन्म दिया। उत्पादन नहीं बढ़ा ये कहना पूर्ण सत्य नहीं है। लेकिन वैश्विक बाजारों में जिस तरह चीन छाया हुआ  है उसकी तुलना में भारत बहुत पीछे रह गया। श्री गाँधी ने रोजगार और उत्पादन बढ़ाने में यूपीए सरकारों की असफलता को स्वीकार कर निश्चित रूप से ईमानदारी दिखाई किंतु इसके बाद उन्हें और उनकी पार्टी को वर्तमान केंद्र  सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं रह जाता जिसने 10 वर्षों में भारत को दुनिया की सबसे तेज दौड़ती व्यवस्था के तौर पर प्रतिष्ठित कर दिया। यही वजह है कि भारत  विदेशी निवेशकों का मनपसंद  बन गया। हालांकि श्री गाँधी ने उपभोग और उत्पादन के बीच असंतुलन की बात छेड़कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विकास दर कितनी भी ऊपर चली जाए किंतु  वह रोजगार बढ़ाने में सहायक न हो तो उसका लाभ ही क्या? आजकल चुनाव घोषणापत्र में सत्ता संभालते ही लाखों नियुक्तियों का वायदा किया जाता है किंतु ये नौकरियां आएंगी कहाँ से ये कोई नहीं बताता। श्री गाँधी के पास भी इस समस्या का कोई हल नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 February 2025

संत समाज की एकता के बिना सनातन समुदाय की एकजुटता असंभव

प्रयागराज महाकुंभ में बसंत पंचमी के तीसरे और अंतिम अमृत स्नान पर 3 से 4 करोड़ लोगों के पवित्र संगम में डुबकी लगाने की संभावना है। रविवार  से ही श्रृद्धालुओं का आना शुरू हो चुका था। 13 जनवरी से अब तक 37 करोड़ लोग महाकुंभ में आ चुके हैं। महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस विराट आयोजन में 40 करोड़ लोगों के आगमन का अनुमान था जो बढ़कर 50 करोड़ हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। मौनी अमावस्या के  हादसे के बाद मेला प्रबंधन में जुटा अमला पूरी तरह मुस्तैद है। प्रयागराज में वाहनों का प्रवेश 5 तारीख तक रोक दिया गया। आवागमन अलग - अलग रास्तों से होने की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ स्थित नियंत्रण कक्ष में प्रातः 3 बजे ही आकर बैठ गए। अमावस्या पर हुई दुर्घटना के बाद  व्यवस्था के लिए तैनात अधिकारियों पर आरोप लगना तो स्वाभाविक था किंतु जिस तरह की राजनीति हो रही है वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगती। सबसे दुखद ये रहा कि अविमुक्तेश्वरानंद जी  नामक शंकराचार्य द्वारा अत्यंत क्रोधित अंदाज में योगी जी को अक्षम बताते हुए उनसे त्यागपत्र मांग लिया गया। उसके बाद सोशल मीडिया पर दोनों तरफ से  समर्थन और विरोध का सिलसिला शुरू हो गया। उधर चारों पीठों के शंकराचार्यों में सबसे वरिष्ट पुरी के निश्चलानंद सरस्वती जी ने अविमुक्तेश्वरानंद जी की नियुक्ति को ही फर्जी बता दिया। इसके साथ ही ये जानकारी भी प्रसारित होने लगी कि ब्रह्मलीन द्वीपीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद जी द्वारा अविमुक्तेश्वरानंद जी को ज्योतिष (बद्रीनाथ) पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किये जाने के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है जिसका फैसला लंबित है। स्मरणीय है दो पीठों के शंकराचार्य रहे स्वरूपानंद जी की नियुक्ति पर उठा विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय तक गया था। उनके विरोधी रहे  स्वामी वासुदेवानंद जी खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य घोषित करते आये हैं। उनके भी हजारों भक्त हैं। स्वामी स्वरूपानंद जी के निधन के बाद जब उनकी कथित वसीयत के आधार पर शारदा पीठ में स्वामी सदानंद जी और ज्योतिष पीठ में अविमुक्तेश्वरानंद जी को शंकराचार्य बनाये जाने की घोषणा हुई तब दशनामी संन्यासी  अखाड़ा सहित काशी विद्वत परिषद ने दोनों नियुक्तियों को परंपरा विरुद्ध बताते हुए कहा कि स्वरूपानंद जी की नियुक्ति का विवाद ही नहीं सुलझा तब वे अपना उत्तराधिकारी कैसे नियुक्त कर गए? उल्लेखनीय है सदानंद जी तो ज्यादा बोलते नहीं लिहाजा उन्हें लेकर उतना बवाल नहीं होता किंतु अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने बयानों के कारण शुरुआत से ही विवादों में  फंसते चले गए? निश्चलानंद जी ने तो उनके ब्राह्मण न होने की बात तक कह डाली। उनकी नियुक्ति वैध है या अवैध ये निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय से होगा किंतु सनातन धर्म के सबसे सम्मानित पद  का निर्णय यदि अदालत करे तो यह उस पद के साथ जुड़े जगद्गुरु जैसे अति सम्मानित संबोधन का अपमान है। आद्य शंकराचार्य द्वारा चार प्रमुख पीठाधीश्वरों की नियुक्ति की जो व्यवस्था तय की गई थी उसमें दशनामी अखाड़ा और काशी विद्वत परिषद की भूमिका यदि निर्णायक है तब प्रत्येक संत - महात्मा का यह धर्म है कि उसका पालन करे। ये बात अटपटी लगती है कि शंकराचार्य पर नियुक्त व्यक्ति को दूसरे शंकराचार्य ही स्वीकार न करें। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि चारों पीठों के अधीश्वरों में मतैक्य और आपसी विश्वास  नहीं हैं तब वे सनातन धर्म के अनुयायियों को एकजुट रहने का उपदेश वे किस अधिकार से देंगे? इसका दुष्परिणाम ये है कि एक शंकराचार्य का भक्त दूसरे के प्रति असम्मानजनक टिप्पणी करने से बाज नहीं आता। महाकुंभ में अपने बयानों के कारण अविमुक्तेश्वरानंद जी संत समाज में अकेले पड़ गए जिसे अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता । सनातन धर्म से जुड़े असंख्य संतों में प्रमुख स्वामी अवधेशानंद जी ने महाकुंभ के प्रबंध को लेकर आलोचना करने वालों को जिस तरह आड़े हाथ लिया वह अप्रत्यक्ष तौर पर अविमुक्तेश्वरानंद जी पर ही निशाना है जो अपने स्वभाव विशेष की वजह से आये दिन विवादों में घिर जाते हैं। कुंभ में आयोजित होने वाली धर्म संसद  सनातन धर्म को व्यवस्थित करने हेतु निर्देश जारी करती है। अतीत में उसके द्वारा लिए गए अनेक निर्णयों का राष्ट्रीय जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वर्तमान समय में सनातन धर्म  पर जिस प्रकार देश के भीतर और बाहर दोनों से हमले हो रहे हैं उन्हें देखते हुए संत समाज को भी अपने मतभेद दूर कर  एकजुट होना चाहिए। अन्यथा हिन्दू समाज को टुकड़ों में बांटकर देश को कमजोर करने का षडयंत्र सफल होते देर नहीं लगेगी। याद रहे संत समाज की एकता के बिना सनातनी समुदाय को एक सूत्र में बांधना असंभव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 February 2025

महामंडलेश्वर और जगद्गुरु की पदवी मज़ाक बन गई


महाकुंभ से यूँ तो रोज नई - नई खबरें आ रही हैं किंतु उन सबके बीच नये महामंडलेश्वर बनाये जाने को लेकर विवाद भी सामने आये हैं। किन्नर अखाड़े द्वारा एक पूर्व अभिनेत्री ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उसमें  मतभेद पैदा हो गए तथा अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास  ने अभिनेत्री को नियुक्त करने वाले आचार्य डाॅ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को भी अखाड़े से बाहर कर दिया। ममता का फिल्मी कैरियर बहुत ही संक्षिप्त रहा। उसके बाद वे अंडरवर्ल्ड के साथ जुड़ने के आरोप में घिर गईं। अपने अश्लील फोटो शूट के लिए भी वे काफी बदनाम हुईं थीं। एक सप्ताह पहले ही उन्होंने  संन्यास लेकर महामंडलेश्वर की पदवी हासिल की थी जिसे गत दिवस छीन लिया गया। ये पहला अवसर नहीं है जब महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद किसी को हटाया जाए। कुछ वर्ष पूर्व एक साध्वी कहलाने वाली महिला को भी महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उनसे जुड़े विवादों की वजह से हटाया गया था। जब भी कुंभ का आयोजन होता है तब महामंडलेश्वर की पदवी कुछ लोगों को अखाड़ों द्वारा प्रदान की जाती है। वे लोग संन्यास लेकर सांसारिक मोह  - माया से स्वयं को मुक्त करते हैं। इन पदवियों को धारण करने वाले सनातन धर्म की संत परंपरा के ध्वजावाहक होने के कारण समाज में सम्मान के पात्र होते हैं। त्याग और तपस्या इनकी पहिचान होती है। उनके आचरण के कारण लोग इन्हें अपना आदर्श मानते हैं। समाज में धर्ममय वातावरण बनाकर लोगों को सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करना  इनका कर्तव्य होता है। एक तरह से उन्हें अपना जीवन समाज और धर्म की सेवा के लिए अर्पित करना होता है। सनातन धर्म में जो व्यवस्था आद्य शंकराचार्य बनाकर गए उसमें ऐसी ही अनेक पदवियां हैं। इन पर नियुक्तियाँ आसानी से नहीं होती थीं। पदवी दिये जाने के पूर्व संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक ज्ञान और क्षमता का सूक्ष्म परीक्षण किया जाता था। वरिष्ट धर्माचार्य गहन विचार - विमर्श के उपरांत इस बारे में फैसले किया करते थे। इसी तरह आद्य शंकराचार्य द्वारा गठित चार प्रमुख पीठों के शंकराचार्य जो जगद्गुरु कहलाते हैं , की  चयन प्रक्रिया भी थी। लेकिन धीरे - धीरे उनके प्रति लापरवाही देखने मिलने लगी और महामंडलेश्वर तो क्या शंकराचार्य की नियुक्ति को लेकर भी विवाद बढ़ने लगे। जिन चार पीठाधीश्वरों पर सनातन धर्म के संरक्षण और संवर्धन का दायित्व है उन्हीं में आपसी मतभेद हैं। अदालतों में असली और नकली कै मामले चल रहे हैं। चार मुख्य पीठों के अलावा न जाने कितनी छोटी - छोटी पीठ सामने आने लगी हैं जिनके महंत जगद्गुरु की पदवी हासिल करते जा रहे हैं। इस कारण सनातन धर्म के इन बेहद सम्मानित पदों की प्रतिष्ठा धूमिल होती जा रही है। महामंडलेश्वर और जगद्गुरु जैसी पदवियां राजनीतिक नियुक्तियों जैसी होने लगी हैं। यही कारण है उनके प्रति आदरभाव घटता जा रहा है। जो अखाड़े या अन्य धार्मिक संस्थाएं ये पदवियां बांटती हैं उनके विवेक और ईमानदारी पर संदेह बढ़ता जा रहा है जो सनातन धर्म की प्रतिष्ठा और पवित्रता के लिए खतरा है। संन्यास कोई मजाक नहीं है कि कोई भी आकर रातों -  रात सब कुछ त्यागने का दावा करते हुए महामंडलेश्वर या जगद्गुरु जैसी पदवी हासिल कर महिमामंडित हो जाए। ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने और महज सात दिनों बाद  हटाये जाने का निर्णय ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि संबंधित अखाड़े का संचालन कर रहे लोगों में आपसी सामंजस्य का नितांत अभाव है। इसी तरह जिस प्रकार थोक के भाव नये जगद्गुरु नियुक्त होते जा तरह हैं उसकी वजह से चार प्रमुख शंकराचार्यों का प्रभाव घट  रहा है क्योंकि नव नियुक्त जगद्गुरु खुद को किसी से कम नहीं समझते। जनसंख्या में वृद्धि के कारण अतीत में कुछ उप पीठें बनाई गई थीं। उनके प्रमुख को भी जगद्गुरु की पदवी दी गई किंतु जिस तेजी से  नये जगद्गुरु बन रहे हैं उससे इनके बीच भी खींचातानी शुरू होने की आशंका बढ़ रही है।  देश में अनेक ऐसे संत हैं जिन्हें उनकी विद्वता, सरलता और धर्मनिष्ठा के कारण महामंडलेश्वर अथवा जगद्गुरु की पदवी हासिल किये बिना भी सम्मान प्राप्त है। दूसरी ओर कुछ कथावाचक पांच सितारा जीवनशैली और फिल्मी सितारों जैसी चमक - दमक के कारण आम लोगों की पहुँच से बाहर हो गए हैं क्योंकि उनके आयोजन में करोड़ों का खर्च होता है। महाकुंभ के अवसर पर आयोजित होने वाली धर्म संसद में सनातन धर्म के साथ जुड़ती जा रहीं इन विसंगतियों को दूर करने पर गंभीरता से विचार - विमर्श होकर ठोस निर्णय होना चाहिए अन्यथा धर्म के नाम पर पाखंडियों का वर्चस्व बढ़ता जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 31 January 2025

आम बजट पर रह सकती दिल्ली के चुनाव की छाया


कल लोकसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण केंद्रीय बजट प्रस्तुत करेंगी।  मई  2024 में तीसरी बार सत्ता में आने  के बाद मोदी सरकार का यह बजट कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण होगा। पिछला बजट आधे वर्ष के लिए ही था जबकि  इस  बजट का प्रभाव पूरे कारोबारी वर्ष पर होने से यह पूर्ण  माना जाएगा।  हमारे देश में हर वर्ष कहीं न कहीं चूंकि चुनाव होते रहते हैं इसलिए केंद्र में सत्तासीन दल पर  अनेक तरह के दबाव होते हैं। विभिन्न राज्यों में विरोधी विचारधारा की सरकारें होने से भी  बजट में  राजनीतिक संतुलन बनाने पड़ते हैं। लिहाजा उस पर सियासत पूरी तरह हावी होती है। ये देखते हुए नये  बजट में भी वित्त मंत्री  पर राजनीतिक दबाव रहेगा क्योंकि मात्र 4 दिन बाद ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव हेतु मतदान  है। वहाँ ढाई दशक से  भाजपा सत्ता से बाहर है इसलिए केंद्र सरकार ऐसा कुछ जरूर करेगी जिससे उन मतदाताओं को प्रभावित कर सके जो लोकसभा में तो कमल का बटन दबाने में नहीं झिझकते किंतु विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को  समर्थन देते हैं क्योंकि उसने  मुफ्त बिजली, पानी जैसी सुविधाएं दे रखी हैं। यद्यपि ये वर्ग हिंदुत्व सहित अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा के साथ है किंतु  मुफ्त सुविधाओं का लालच भी नहीं छोड़ पाता। इस बार हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत से भाजपा का हौसला काफी बुलंद  है। इसलिए प्रधानमंत्री  बजट में जितना संभव होगा ऐसा  प्रयास करेंगे जिससे कि  दिल्ली के मध्यमवर्गीय शासकीय कर्मचारियों और व्यवसायियों को  भाजपा के पक्ष में ला सकें। आर्थिक  विशेषज्ञ अनुमान लगा रहे हैं कि  आयकर में छूट के साथ ही महिलाओं और गरीबों के कल्याण के लिए कुछ ऐसे प्रावधान होंगे जिनका असर दिल्ली चुनाव पर पड़े। उस दृष्टि से आयकर  छूट की सीमा 10 लाख तक बढाए जाने के साथ ही पेट्रोल - डीजल सस्ता करने जैसे  उठाए जा सकते हैं। ऐसा करने से  मध्यम वर्ग के साथ ही अन्य तबके भी लाभान्वित होंगे जो महंगाई से परेशान हैं। उल्लेखनीय है भाजपा के परंपरागत समर्थक वर्ग में इस बात को लेकर काफी नाराजगी है कि केंद्र सरकार गरीबों को तो दिल खोलकर बाँट रही है किंतु उसका भार करदाताओं पर पड़ता है। पेट्रोल - डीजल के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में घटने के बाद भी भारत में उस अनुपात में कम नहीं किये गए। लोकसभा चुनाव में भाजपा के स्पष्ट बहुमत से पीछे हो जाने के पीछे मध्यमवर्गीय मतदाताओं की उदासीनता भी एक बड़ा कारण थी। प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी तक में इस वर्ग ने मतदान के प्रति अपेक्षित उत्साह नहीं दिखाया जिससे उनकी जीत का अंतर बहुत ही साधारण रह गया। यद्यपि  हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में भाजपा को धमाकेदार जीत हासिल हुई किंतु जम्मू कश्मीर और झारखंड में स्थानीय समीकरण  खिलाफ होने से उसे पराजय झेलनी पड़ी। दिल्ली में उन्हीं आधारों पर आम आदमी पार्टी की मजबूती है जिसे तोड़ने के लिए भाजपा को उसके द्वारा खींची लकीर से बड़ी खींचनी होगी। केंद्रीय बजट में ही वह इसकी कोशिश करेगी ऐसी उम्मीद है। यद्यपि मुफ्त उपहारों की राजनीति के प्रधानमंत्री खुद भी विरोधी  हैं किंतु भाजपा भी राज्य स्तर पर वही कर रही है। जहाँ तक विकास की बात है  तो मोदी सरकार की उपलब्धियों से लोगों में खुशी है किंतु आम जनता के सामने अपनी जरूरतें पूरी करने की जो समस्या है उसका हल  किये जाने की जरूरत है। रक्षा और ग्रामीण विकास पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च होता है। इन्फ्रा स्ट्रक्चर पर भी इस सरकार ने भारी निवेश किया जिसका सकारात्मक परिणाम देखने मिल भी रहा है ।  लेकिन शिक्षा और चिकित्सा का बढ़ता खर्च आम जनता को हलाकान किये हुए है। इसमें दो राय नहीं हैं कि  श्री मोदी के कार्यकाल में देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण प्रति माह होने वाला जीएसटी संग्रह है। आयकर सहित अन्य प्रत्यक्ष करों की वसूली भी उम्मीद से ज्यादा बढ़ी है।  वाहनों की बिक्री के अलावा घर बनाने या खरीदने वालों की संख्या में भी जबरदस्त वृद्धि हो रही है। कोरोना काल में  80 करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन और खातों में सीधे राशि जमा किए जाने से देश अराजकता से बच गया। केंद्र सरकार द्वारा गरीबों के कल्याण के लिए जो योजनाएं शुरू की गईं उनका लाभ उन्हें बिना बिचौलियों को घूस दिए मिला। यद्यपि प्रधानमंत्री आवास योजना में ज़रूर घूसखोरी की शिकायतें विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से मिलती हैं किंतु जिन योजनाओं में सहायता राशि सीधे हितग्राही के बैंक खाते में जमा होती है उनमें सरकारी अमले की लूट - खसोट पर विराम लग गया। विख्यात चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर का ये कहना अर्थपूर्ण है कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता के प्रमुख कारणों में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के अलावा लाभार्थी भी हैं।   लेकिन वित्तमंत्री को ध्यान रखना होगा कि  आर्थिक नीतियों से उद्योगपति और गरीब तो संतुष्ट हैं किंतु नौकरपेशा और मध्यमवर्गीय व्यवसायी महसूस करते हैं कि सरकार उसके हितों के बारे में उतनी संवेदनशील नहीं है। ऐसे में अपेक्षा है कि वे  बजट के साथ जुड़ी मर्यादाओं का पालन करते हुए भी मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों और व्यवसायियों के प्रति उदारता बरतें। कम से कम इस बात का संकेत तो दिया ही जा सकता है कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद यह सरकार उनके हितों के संरक्षण हेतु क्या - क्या करेगी ? पेट्रोल - डीजल के दामों के अलावा जीएसटी की दरों को युक्तियुक्त बनाने के बारे में भी लोग उम्मीद लगाए बैठे हैं।  मोदी सरकार की आयुष्मान योजना ने गरीबों और बुजुर्गों को तो जबरदस्त राहत दी किंतु मध्यम आय वाले इलाज के महंगे होने से हलाकान हैं। इसलिए इस बारे में किसी क्रांतिकारी ऐलान की उम्मीद भी है और जरूरत भी।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 30 January 2025

दिल्ली चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन के दो फाड़ होने की आशंका


दिल्ली विधानसभा चुनाव में  कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल के बीच चल रहे शब्द बाणों ने  विपक्ष के दो ध्रुवों में बंट जाने की स्थिति उत्पन्न कर दी है। हालांकि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भले ही एक दूसरे के विरुद्ध लड़ रही हैं किंतु दोनों  इंडिया गठबंधन में हैं। ये भी रोचक है कि गठबंधन में शामिल तृणमूल कांग्रेस, सपा और शिवसेना ने जहाँ खुलकर आम आदमी पार्टी को समर्थन देने का ऐलान कर रखा है वहीं अन्य घटक तटस्थ  हैं। वैसे तो जम्मू कश्मीर और हरियाणा में भी आम आदमी पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे थे किंतु तब उसके और कांग्रेस के बीच उतनी कड़वाहट नजर नहीं आई जितनी दिल्ली में देखने मिल रही है।  अब तक  स्थानीय नेता ही केजरीवाल सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहे लेकिन अब तो श्री गाँधी भी खुलकर हमले कर रहे हैं। उन्होंने श्री केजरीवाल द्वारा सादगी का दिखावा करने  के बाद सभी सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने, मुख्यमंत्री निवास को करोड़ों रुपये खर्च कर महल का स्वरूप देने, यमुना की सफाई न करवाने और गंदे पेयजल की आपूर्ति जैसे मुद्दे उठाकर उनकी तीख़ी आलोचना कर डाली। दूसरे खेमे ने भी जवाब देने में कोई लिहाज नहीं किया  और  नेशनल हेराल्ड मामले में गाँधी परिवार परिवार पर लगे आरोपों को उछालने के साथ ही ये सवाल भी दागा कि रॉबर्ट वाड्रा अब तक कैसे बचे हुए हैं?  सबसे मजेदार बात ये है कि  दोनों एक दूसरे पर भाजपा से मिले होने का आरोप लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि श्री गाँधी अपनी तरफ से आम आदमी पार्टी के प्रति नर्म रवैया अपनाने के पक्षधर थे। इसीलिए  कुछ समय तक प्रचार से दूर भी रहे । इससे ये धारणा बनने लगी कि किसी को बहुमत नहीं मिला तो कांग्रेस 2013 की तरह से ही श्री केजरीवाल की ताजपोशी में सहायक बनेगी। ये प्रचार आम आदमी पार्टी को नुकसानदेह लगा , इसीलिए उसने  गाँधी परिवार पर सीधा हमला बोल दिया। यहाँ तक कि सबसे भ्रष्ट नेताओं का जो पोस्टर प्रकाशित किया उसमें राहुल को तीसरे स्थान पर बता दिया जिससे उनका तिलमिलाना स्वाभाविक था। चुनावी ऊँट किस करवट बैठेगा ये तो अच्छे - अच्छे नहीं बता पा रहे क्योंकि भाजपा ने तो श्री केजरीवाल के विरुद्ध तगड़ी मोर्चेबंदी की ही किंतु  कांग्रेस भी पूरे उत्साह के साथ लड़ती दिखाई दे रही है। शुरुआती हिचक के बाद श्री गाँधी ने आम आदमी पार्टी पर आरोपों की जो बौछार की उसके पीछे  विपक्षी राजनीति के भावी समीकरण ही हैं। उनके मन में ये भय बैठ गया है कि यदि आम आदमी पार्टी  बहुमत ले गई और श्री केजरीवाल फिर  मुख्यमंत्री बने तो विपक्षी  गठबंधन में वे बड़े नेता के तौर पर स्थापित हो जाएंगे।  हरियाणा और महाराष्ट्र की  पराजय के बाद इंडिया गठबंधन में श्री गाँधी  के विरुद्ध आवाजें उठने का परिणाम ही है कि ममता बेनर्जी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी के पक्ष में खड़े हो गए। उन सबका मानना है कि कांग्रेस इस चुनाव में भी बुरी तरह हारेगी जिसके बाद राहुल का बचा - खुचा आभा मंडल भी फीका पड़ जाएगा। वहीं  श्री केजरीवाल सरकार बनाने में सफल हो गए तब वे विपक्ष के ऐसे चेहरे के तौर पर उभरेंगे जिसने प्रधानमंत्री से लगातार तीसरा मुकाबला जीता। ये स्थिति श्री गाँधी को किसी भी तरह स्वीकार नहीं होगी। उनके मन में ये बात भी गहराई तक बैठ गई है कि महाराष्ट्र की हार के लिए तो शरद पवार और उद्धव ठाकरे भी जिम्मेदार माने गए किंतु हरियाणा में यदि श्री केजरीवाल ने अपने प्रत्याशी नहीं उतारे होते तो भाजपा विरोधी मतों में विभाजन की नौबत नहीं आती। इसीलिए  वे आम आदमी पार्टी से हरियाणा का बदला लेने पर उतारू हैं। वे इस बात को समझ गए हैं कि दिल्ली में भाजपा की जीत श्री केजरीवाल की शिकस्त मानी जाएगी जिसके बाद कांग्रेस को अपने पाँव दोबारा जमाने में सहूलियत होगी। स्मरणीय है 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस अकेले लड़ी तब उसका मत प्रतिशत आम आदमी पार्टी से काफी ज्यादा था । 2013 में वह श्री केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने में मदद न करती तो आम आदमी पार्टी इतनी बुलंदियों पर न पहुंच पाती। गाँधी परिवार इस बात को भी भांप गया है कि श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाएं केवल दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने तक सीमित नहीं रहने वालीं। और इस बार भी वे जीते तब  उनका कद काफी ऊँचा हो जाएगा जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस और श्री गाँधी को होगा। यही सब सोचकर कांग्रेस दिल्ली चुनाव को त्रिकोणीय बनाने में जुट गई है। भाजपा को रोकने के लिए आम आदमी पार्टी को अपनी पीठ पर लादने की गलती वह नहीं दोहराना चाह रही। इसका कितना लाभ उसे मिलेगा ये तो 8 फरवरी की दोपहर को पता चलेगा किंतु  राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल के बीच की जुबानी जंग ने इंडिया गठबंधन के दो फाड़ होने की शुरुआत कर दी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 29 January 2025

ताकि आगे ऐसी दुर्घटना न हो


प्रयागराज  महाकुंभ में मौनी अमावस्या पर स्नान करने पहुंचे श्रद्धालुओं की संख्या अनियंत्रित हो जाने से हुई धक्का - मुक्की में बीती रात  लगभग डेढ़ - दो बजे  20 लोगों के मारे जाने की खबर आने के बाद लोगों के प्रयागराज  आगमन पर  रोक लगा दी गई।  प्रारंभिक कारणों में अफवाह फैलना माना जा  रहा है।   गत दिवस  लगभग 5 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। आज 10 करोड़ लोगों का अनुमान था जो उक्त हादसे के बाद  कुछ कम हो सकता है किंतु अभी बसंत पंचमी का अमृत स्नान शेष है और उस दिन भी  जनसैलाब उमड़ेगा। 144 साल बाद बने ग्रह - नक्षत्रों के योग के कारण यह  महाकुंभ माना गया जिसकी वजह से पूरे विश्व भर से न सिर्फ सनातन धर्मी अपितु अन्य धर्मों में आस्था रखने वाले भी प्रयागराज पहुँच रहे हैं। आज की संख्या मिलाकर 20 करोड़ लोग स्नान कर चुके होंगे। महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस आयोजन में 40 करोड़ श्रद्धालुओं के शामिल होने का अनुमान है। उ.प्र सरकार ने इस महाकुंभ के लिए जबरदस्त व्यवस्थाएं कर रखी हैं। मकर संक्रांति के प्रथम अमृत स्नान पर ही जो जनसैलाब उमड़ पड़ा उसने आगे का  संकेत दे दिया था। समाचार माध्यमों के जरिये हो रहे प्रचार के कारण महाकुंभ वैश्विक आयोजन बन गया। जिस प्रकार की विस्तृत जानकारी प्रसारित की जा रही है उसने प्रयागराज आने के प्रति लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया । परिणामस्वरूप भीड़ उम्मीद से अधिक होती गई। इसीलिए  दो - तीन दिन  पहले से ही प्रयागराज में आने वाले वाहनों को रोक दिया गया जिसकी वजह से चारों तरफ से आने वाले रास्तों पर 10 - 15 कि.मी तक जाम की स्थिति है। महाकुंभ में इस बार अब तक की जो सबसे बड़ी और अत्याधुनिक व्यवस्था की गई है उसकी सराहना भी हो रही है  किंतु आस्था के अतिरेक से देश में हर वर्ष सैकड़ों लोग अपनी जान गँवा बैठते हैं। प्रयागराज में तो करोड़ों लोग जमा हैं किंतु अनेक मंदिरों में किसी बड़े त्यौहार के अवसर पर दर्शनार्थ उमड़ी भीड़ में धक्का - मुक्की से दर्जनों लोग मौत का शिकार बन जाते हैं। वैसे  कुंभ मेले में पहले भी  हादसे हुए हैं । 1954 में प्रयागराज कुंभ में तत्कालीन  प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद के आगमन पर हुई धक्का - मुक्की में भी 1 हजार से ज्यादा मौतें हुई थीं। हरिद्वार के कुंभ में भी एक बार ऐसा हो चुका है। इन दुर्घटनाओं से सबक लेकर आगामी आयोजनों में सुव्यवस्था और सुरक्षा पर काफी ध्यान दिया जाने लगा। वर्तमान महाकुंभ तो अपने विराट स्वरूप की वजह से वैश्विक आकर्षण उत्पन्न करने में सफल रहा। संचार और आवागमन के सीमित साधनों में वृद्धि की वजह से लोगों का आगमन बढ़ता ही जा रहा है। विशेष रेलगाड़ियों और हवाई सेवा के साथ ही निजी वाहनों से लोग आते हैं। पिछले कुछ दिनों से ही ये लगने लगा था कि मौनी अमावस्या पर भीड़ पिछले रिकार्ड तोड़ देगी। इसीलिए लोगों को रोका जाने लगा किंतु हमारे देश में आस्था के उत्साह में  व्यवस्था को भंग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। प्रयागराज में  जमा  लोग  इंतजाम पर भारी पड़ने लगे और बीती रात वही हुआ। यदि मृतकों की जो संख्या बताई गई वह सही है तब तो गनीमत है क्योंकि इतने विशाल जनसागर के कारण ऐसी घटना कहीं भी हो सकती है किंतु ऐसे आयोजनों में शामिल होने वालों से भी अपेक्षा होती है कि वे व्यवस्था का पालन करते हुए आत्मानुशासन का परिचय दें क्योंकि धक्का - मुक्की जैसी घटनाओं का दुष्परिणाम उन्हीं को भोगना पड़ता है। जिन श्रद्धालुओं की इस हादसे में मौत हुई उनके परिजनों के लिए ये महाकुंभ कड़वी यादें छोड़ गया। अभी महाकुंभ आधा ही संपन्न हुआ है। आने वाले दिनों में आयोजकों द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं में हर श्रद्धालु को ईमानदारी से सहयोग करना चाहिए क्योंकि यह महाकुंभ केवल उ.प्र सरकार और प्रशासन के प्रबंधन कौशल ही नहीं अपितु सनातन में आस्था रखने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की अनुशासनप्रियता का परिचय भी समूचे विश्व को देगा। इस हादसे से सबक लेते हुए  श्रद्धालुओं को सभी प्रकार की सावधनियाँ रखते हुए  ही वहाँ जाने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। छोटे बच्चों और अति वृद्धजनों को भी इस महाकुंभ में ले जाने से परहेज करें। सुनी - सुनाई जानकारी के आधार पर प्रयागराज पहुँच जाना और फिर वहाँ जाकर भोजन - आवास की शिकायत करने की प्रवृत्ति उचित नहीं लगती। सुरक्षा ,सफाई , चिकित्सा, यातायात आदि की व्यवस्था देख रहे अमले को कटघरे में खड़ा करना आसान है।  लेकिन श्रद्धालुओं को अपना दोष भी देखना चाहिए। किसी भी बड़े आयोजन में विघ्नकर्ता अपनी कारस्तानी से बाज नहीं आते। इस हादसे का प्रारंभिक कारण अफवाह ही बताया गया। हो सकता है और कोई वजह हो किंतु अब बचे हुए समय में महाकुंभ निर्विघ्न संपन्न हो इसके लिए श्रद्धालुओं को पूर्ण अनुशासन का परिचय देना होगा। जिन श्रद्धालुओं को गत रात्रि अपने प्राण गँवाना पड़े उन्हें ईश्वर सद्गति प्रदान करे और महाकुंभ का शेष आयोजन योजनानुसार संपन्न हो यही प्रभु से प्रार्थना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 28 January 2025

अपने बनाये संसार से बाहर नहीं निकल पा रहे राहुल

म.प्र के महू नगर में गत दिवस कांग्रेस की रैली हुई जिसमें राहुल गाँधी अपने भाषण में  जातिगत जनगणना, आरक्षण की सीमा , अंबानी और अदाणी जैसे  मुद्दों में ही उलझे रहे। संविधान पर खतरे के साथ ही  नौकरशाहों में दलित और पिछड़ी जातियों के अधिकारियों की कम संख्या का रोना भी उन्होंने रोया। इन बातों का जनता पर  कितना प्रभाव हुआ ये तो हालिया चुनाव परिणाम बता ही चुके हैं। आजकल  दिल्ली में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियाँ  हैं। सभी पार्टियां पूरा जोर लगा रही हैं किंतु राहुल एक - दो सभाएं कर सुस्त हो गए। चर्चा है कि वरिष्ट नेता अजय माकन को पत्रकार वार्ता करने से रोक रखा गया है क्योंकि वे केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाने वाले थे।  केजरीवाल सरकार को सबसे बड़ा झटका जिस शराब घोटाले से लगा उसकी जांच भी कांग्रेस की शिकायत पर ही शुरू हुई थी।  इसीलिए इंडिया गठबंधन में आम आदमी पार्टी का शामिल होना भी स्थानीय कांग्रेस जनों को रास नहीं आया। लोकसभा चुनाव  मिलकर लड़ने के बाद भी राजधानी की सातों सीटें हार जाने पर दोनों के बीच खटास फिर बढ़ी और विधानसभा चुनाव में दोनों एक - दूसरे के विरुद्ध डटे हुए हैं। हाल ही में आम आदमी पार्टी ने सबसे भ्रष्ट नेताओं का जो पोस्टर जारी किया उसमें तीसरे स्थान पर श्री गाँधी हैं । अब तक उन्होंने उस पर टिप्पणी का साहस नहीं दिखाया। दिल्ली चुनाव के बारे में कहा जा रहा था कि कांग्रेस इस बार दलितों तथा मुसलमानों के बीच अपना  जनाधार हासिल करने के लिए पूरा जोर लगायेगी किंतु ऐसा लगता है शीर्ष नेतृत्व एक बार फिर  आम आदमी पार्टी को छोड़ भाजपा को रोकने की रणनीति पर चल पड़ा है।  संदीप दीक्षित और अजय  माकन तो न जाने कितनी बार आम आदमी पार्टी के प्रति सख्त होने की मांग कर चुके हैं किंतु ऐसा लगता है गाँधी परिवार आज तक श्री केजरीवाल की उस धमकी से घबराया हुआ है कि उनके हाथ ईडी आ जाए तो सोनिया गाँधी को जेल में डाल देंगे। ये भी स्मरणीय है कि उन्होंने इटली से अगस्ता  वेस्टलैंड हेलीकाप्टरों के सौदे में हुए भ्रष्टाचार के  विरुद्ध कारवाई करने की चुनौती मोदी सरकार को दी थी। रॉबर्ट वाड्रा पर शिकंजा कसने की मांग भी श्री केजरीवाल लम्बे समय तक करते रहे।  ऐसे में जितनी मशक्कत राहुल ने अदाणी और अंबानी के विरुद्ध मोर्चा खोलने में की उसकी आधी भी  केजरीवाल सरकार  की घेराबंदी में करते तो  इस बार मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच हुआ होता। महू की रैली में श्री गाँधी ने समाचार माध्यमों पर  अंबानी परिवार के विवाह के प्रसारण का तंज तो कसा किंतु वे इस बात को भूल गए कि कांग्रेस के तमाम नेता भी उसमें शिरकत करने पहुंचे थे। कुल मिलाकर श्री गाँधी अपने बनाये संसार से बाहर निकलने तैयार नहीं हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव के संदर्भ में जब उन्हें आगे आकर मोर्चा संभालना था तब वे विदेश चले गए। दरअसल लोकसभा चुनाव के बाद वे जरूरत से ज्यादा आत्ममुग्ध हो उठे थे । हालांकि हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों ने उस खुशफहमी की हवा निकाल दी। दिल्ली चुनाव की शुरुआत में ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस को ये बात समझ में आ चुकी है कि उसके असली दुश्मन क्षेत्रीय दल हैं जिन्होंने उसी के वोट बैंक में सेंध लगाकर अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली कि कांग्रेस को उनका पिछलग्गू बनने मजबूर होना पड़ा। आम आदमी पार्टी के कारण तो कांग्रेस राष्ट्रीय राजधानी में चारों खाने चित्त होने जैसी शर्मनाक स्थिति में आ पहुंची। ऐसे में श्री गाँधी को चाहिए था कि वे अपना पूरा समय दिल्ली चुनाव में लगाते हुए कांग्रेस को पुरानी गौरवशाली स्थिति तक ले जाने के प्रयास करते। कांग्रेस के विरोधी भी ये कहते मिल जायेंगे कि दिल्ली का जितना विकास स्व. शीला दीक्षित ने किया वह अतुलनीय है। लेकिन कांग्रेस इसका लाभ नहीं ले पा रही। मत प्रतिशत में वृद्धि की संभावना के बावजूद उसकी सीटों को लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है। वहीं भाजपा 2015 और 2020 की हार से सबक लेते सरकार बनाने के हौसले के साथ उतरी क्योंकि उसका शीर्ष नेतृत्व भी मैदान में है। पाँच फरवरी को दिल्ली में मतदान होना है। मौजूदा सरकार के प्रति नाराजगी सतह पर नजर भी आने लगी है किंतु कांग्रेस अभी तक गंभीर नजर नहीं आ रही जिससे मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच सिमटकर रह गया है। ताजा सर्वे बता रहे हैं कि दोनों पार्टियों के बीच बेहद नजदीकी टक्कर है जिसमें बाजी किसी के भी हाथ लग सकती है। वहीं कांग्रेस शून्य के आंकड़े से कुछ ऊपर आ जाए तो भी आश्चर्य से कम नहीं होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी