Friday, 8 August 2025

कुबेरेश्वर : रुद्राक्ष की चाहत में मिली मौत


म.प्र में सीहोर जिले के पं. प्रदीप मिश्रा पिछले कुछ वर्षों से चर्चाओं में हैं।  कुबेरेश्वर धाम नामक प्राचीन धर्मस्थान उनका कार्यक्षेत्र है।  2022  में उनके द्वारा रुद्राक्ष  महोत्सव शुरू किया गया जिससे कुबेरेश्वर की ख्याति दूर - दूर तक फैलने लगी। लेकिन उनके  प्रत्येक आयोजन में अव्यवस्था का बोलबाला आम हो चला है। पं. मिश्रा साधारण पूजा - पाठ  से बढ़ते - बढ़ते नामी - गिरामी या यूँ कहें कि पांच सितारा शख़्सियत बन गए। बड़े प्रवचनकार होने के कारण राजनेता भी उनके प्रति आकर्षित होने लगे। और फिर  जिन धर्मगुरुओं या प्रवचनकारों के पास नेताओं की आवक बढ़ती है , शासकीय अधिकारी भी उनकी भक्त मंडली में शामिल हो जाते हैं। परिणामस्वरूप उन्हें बिना कुछ किये वी.आई.पी की हैसियत मिल जाती है। पं. मिश्रा भी उसी श्रेणी में आ चुके हैं। इसीलिए उनके आयोजनों में होने वाली बदइंतजामी पर शासन और प्रशासन आँखें मूँद लेते हैं। जबरदस्त भीड़ और वाहनों की असीमित संख्या से भोपाल - इंदौर मार्ग में लंबा जाम लगने से आवागमन बाधित हो जाता है। लेकिन  सबसे बड़ी बात जो  पं. मिश्रा द्वारा किये जाने वाले धार्मिक आयोजनों के साथ स्थायी रूप से जुड़ गई वह है उनमें होने वाली मौतें। लाखों की भीड़ पवित्र रुद्राक्ष प्राप्त करने के साथ ही पं.मिश्रा के दर्शन की अभिलाषा से जमा तो हो जाती है किंतु उसके भोजन, पेयजल, आवास आदि की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से धक्का - मुक्की होती है जिसमें अनेक श्रद्धालु अपनी जान गँवा बैठते हैं। बीते कुछ दिनों से वहाँ कांवड़ यात्रा में शामिल होने आये लाखों श्रद्धालुओं को भी पिछले  आयोजनों की तरह से ही भारी कष्ट उठाने पड़े और आधा दर्जन मौतें भी हो गईं। पं. मिश्रा ने पहले तो इस पर औपचारिक दुःख व्यक्त कर दिया किंतु जब चौतरफा आलोचना हुई तो मृतकों को अपने परिवार का हिस्सा बताकर अपनी संवेदनशीलता  प्रदर्शित की। इधर राजनीतिक जगत संभलकर प्रतिक्रिया दे रहा है। जिनके मिश्रा जी से मधुर रिश्ते हैं उनकी मानें तो ये सब होता रहता है। इतनी बड़े जनसमूह के एकत्र होने से धक्का - मुक्की और अन्य प्रकार की अव्यवस्था उनकी नजर में सामान्य घटना है। राजनेताओं के लिए भीड़ चूंकि प्राणवायु की तरह होती है इसलिये जो भी भीड़ जुटा सके वह उनकी नजर में महत्वपूर्ण हो जाता है। और ये बात केवल कुबेरेश्वर वाले पं. मिश्रा नहीं बल्कि उन जैसी अन्य आध्यात्मिक शख्सियतों पर भी लागू होती है जिनके आयोजनों में आजकल राजनेताओं से अधिक जनता जमा होने लगी है। यही वजह है कि कुबेरेश्वर में लगातार हो तरह हादसों के बावजूद शासन - प्रशासन दोनों ने समुचित व्यवस्थाओं के लिए जरूरी कदम नहीं उठाये। वहाँ आये लोगों  में  पं. मिश्रा के साथ ही पुलिस और प्रशासन के प्रति जिस प्रकार से नाराजगी दिखाई दी वह किसी अकल्पनीय स्थिति को जन्म दे सकती थी क्योंकि समाजविरोधी तत्व ऐसे आयोजनों में कारस्तानी दिखाने से बाज नहीं आते। बहरहाल, कुबेरेश्वर में बीते कुछ दिनों में जो कुछ भी हुआ उससे  एक बात तो स्पष्ट है कि पं. मिश्रा भले ही अच्छे प्रवचनकार हों और उनका आध्यात्मिक ज्ञान भी उच्चस्तरीय हो किंतु बड़े आयोजनों के प्रबंधन में वे बेहद कमजोर हैं। काफी पहले से प्रचार कर लाखों लोगों का जमावड़ा कर लेने के बाद उनके भोजन - आवास आदि को भगवान भरोसे छोड़ देना बेहद गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक है। मिश्रा जी के साथ ही स्थानीय प्रशासन भी बराबरी का कसूरवार है जिसने कुबेरेश्वर में पिछले आयोजनों में हुई मौतों और अव्यवस्था के बाद भी  समुचित कदम नहीं उठाये। हमारे देश में आस्था का अतिरेक दिन ब दिन बढ़ते जाने से धार्मिक आयोजन कुप्रबंध के लिए कुख्यात होते जा रहे हैं। कुबेरेश्वर के अलावा भी अन्य धार्मिक स्थलों पर ऐसे ही हादसे होना आम बात है। जैसा कि प्रारंभ में कहा  गया चूंकि नेता और नौकरशाह भी प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर ऐसे आयोजनों से जुड़े होते हैं इसलिये उनमें होने वाली तमाम गलतियाँ नजरंदाज कर दी जाती हैं। यदि व्यवस्था का यही स्तर बना रहा तब कुबेरेश्वर के भावी आयोजनों में भी श्रृद्धालु धक्के खाने मजबूर होंगे और रुद्राक्ष की चाहत में  कुछ लोगों को मौत नसीब होती रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 7 August 2025

मोदी द्वारा सही समय पर सही जवाब


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आज से लागू 25 फीसदी आयात शुल्क के बाद गत दिवस घोषणा कर दी कि आगामी 27 अगस्त से इसे 50 प्रतिशत कर दिया जाएगा।  इसी बीच उनका एक और बयान आ गया जिसके अनुसार भारत पर इसके अतिरिक्त आयात शुल्क सहित कुछ प्रतिबंध लगाए जाएंगे। चूंकि भारत ने उनके दबाव के सामने झुकने का कोई संकेत नहीं दिया इसलिये वे बौखलाहट में हैं। रूस से कच्चा तेल  खरीदने के  मामले में भारत ने ये कहते हुए  आईना दिखा दिया कि खुद अमेरिका और उसके समर्थक अनेक देश रूस के साथ हर तरह का व्यापार कर रहे हैं। दूसरी बात जिससे ट्रम्प भन्नाए हुए हैं वह है कृषि क्षेत्र में अमेरिका को प्रवेश की अनुमति नहीं देना। अभी तक तो भारत सरकार अपने प्रवक्ताओं के जरिये कूटनीतिक औपचरिकताओं के साथ अमेरिका को जवाब दे रही थी किंतु आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि यद्यपि उन्हें इसके लिए व्यक्तिगत कीमत चुकानी पड़ेगी किंतु  भारत अपने किसानों, मछुआरों और डेयरी क्षेत्र से जुड़े लोगों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा। उनके इस बयान में भले ही  ट्रम्प का नाम नहीं लिया गया किंतु आशय स्पष्ट है कि अमेरिका को भारत के कृषि क्षेत्र पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जाएगी। प्रधानमंत्री रोज - रोज किसी विषय पर बोलने के बजाय सही समय और सही जगह अपनी बात रखते हैं। उक्त  बात  उन्होंने आज दिल्ली में  प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक और हरित क्रांति के जनक स्वर्गीय डॉ. एम़ एस़ स्वामीनाथन की जन्म शताब्दी के उपलक्ष्य में  आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कही।  इस विवाद में अब तक भारत की ओर से जो कुछ कहा गया उसे साधारण प्रतिक्रिया माना जा रहा था। लेकिन अब प्रधानमंत्री का खुलकर सामने आना सरकार की नीति का ऐलान माना जाएगा। ट्रम्प इससे नाराज होकर और कड़े कदम उठा सकते हैं किंतु भारत ने बजाय उत्तेजित होने के सुलझे हुए तरीके से अपनी बात रखने का तरीका चुना । श्री मोदी ने बिना नाम लिए अमेरिका को संदेश दे दिया कि भारत अपने हितों की रक्षा हेतु कटिबद्ध है। इसके साथ ही कूटनीतिक मोर्चे पर भी जवाब देने की रणनीति बना ली गई है जिसके तहत राष्ट्रीय रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल रूस भेजे गए। ट्रम्प ने पिछले दिनों शिगूफा छोड़ा था कि भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीदी घटाई जा रही है। ऐसा कहकर वे दिखाना चाह रहे थे कि वह झुक गया। लेकिन भारत ने इसका खंडन करते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह अपने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में रक्षा सलाहकार का मॉस्को प्रवास किसी बड़े मिशन का हिस्सा माना जा सकता है। इसके साथ ही ये खबर भी आ गई कि श्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलन में भाग लेने चीन जाएंगे।   लेकिन उसके पहले वे जापान की यात्रा भी करेंगे जो अमेरिका  समर्थक होने के बाद भी ट्रम्प के रवैये से त्रस्त है। उल्लेखनीय है हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी चीन गए थे जहाँ उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी. जिनपिंग से हुई । ऐसा लगता है उसी दौरान श्री मोदी के वहाँ जाने की रूपरेखा तैयार हुई क्योंकि गलवान घाटी में हुई मुठभेड़ के बाद उनके और जिनपिंग के बीच बातचीत बंद सी थी। चूंकि यूक्रेन और रूस की जंग के बाद चीन और भारत दोनों रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीददार बनकर सामने आये जिससे अमेरिकी लॉबी द्वारा उस पर लगाए आर्थिक प्रतिबंध बेअसर हो गए। ट्रम्प इसे लेकर ही भारत पर हमलावर हैं। ऐसे में कूटनीतिक मोर्चेबंदी मजबूत करने का दांव खेलकर भारत ने ये दिखा दिया कि वह अमेरिका के अनुचित दबाव में झुकने के बजाय उसका सामना करने तैयार है। प्रधानमंत्री द्वारा प्रदर्शित दृढ़ता का ही परिणाम है कि जिन उद्योगपतियों को अमेरिका द्वारा आयात शुल्क बढ़ाये जाने से नुकसान होने का अंदेशा है वही इसे अवसर मानकर सरकार के साथ खड़े हैं। आम जनता भी यही चाहती है कि भारत इस संकट का सामना साहस के साथ करे।  श्री मोदी द्वारा आज दिये बयान से इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि भारत ट्रम्प के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार से उत्तेजित हुए बिना अपने हितों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ा रहेगा। किसी शक्तिशाली राष्ट्र की यही पहिचान भी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 6 August 2025

गनीमत है अभी तो बादल ही फटे हैं.....


गत दिवस उतराखंड में गंगोत्री के निकट धराली में बादल फटने के बाद हुई तबाही के दृश्य देखकर दिल  कांप उठा। पलक झपकते पूरा कस्बा पहाड़ से पानी के साथ आए मलबे में दब गया। जान - माल की  क्षति का आकलन करना फिलहाल असंभव है। सैकड़ों लोग लापता हैं जिनमें सेना के शिविर में रह रहे सैनिक भी थे। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि किसी को बचाव का अवसर ही नहीं मिला। सकरी सी नालेनुमा पहाड़ी नदी  अचानक कई गुनी चौड़ी हो गई जिसके कारण उसकी चपेट में आये मकान , होटल, वाहन सब जल प्रलय का शिकार हो गए। बचाव कार्य में जुटे दलों को भी विपरीत मौसम के कारण भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ  आज सुबह हिमाचल प्रदेश के किन्नौर में बादल फटने से कैलाश - मानसरोवर यात्रा रोक दी गई क्योंकि पहाड़ धसकने से जगह - जगह मार्ग अवरुद्ध हो गया है। यद्यपि किसी जनहानि की जानकारी नहीं है किंतु चंडीगढ़ - मनाली मार्ग सहित हिमाचल प्रदेश के दर्जनों भीतरी रास्तों पर आवागमन रुक गया है। अभी - अभी खबर आई कि गंगोत्री के निकट भटवाड़ी में भी बादल फट गया जिसकी वजह  से धराली के निकट हर्शिल से उत्तरकाशी आने वाला रास्ता बह गया जिससे  धराली में चल रहे बचाव कार्य में अड़चनें आने की आशंका बढ़ गई है। हालांकि बरसात में पहाड़ों के धसकने और बादल फटने की घटनाएं प्रकृति के व्यवहार का हिस्सा हैं जो कभी - कभार हुआ करती थीं। लेकिन बीते दो - तीन दशकों से भारत के हिमालयी  क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं की पुनरावृत्ति  तेजी से देखने मिल रही है जो चिंता का विषय  है। हिमालय भारतीय आध्यात्मिक चिंतन में देवतुल्य माना गया है। इस विशाल पर्वत शृंखला में हमारी  सीमाएं स्थित हैं। इसकी गोद में जो तीर्थस्थान हैं उनके दर्शन की अभिलाषा सनातन धर्म के अनुयायियों में होने से सदियों से  श्रृद्धालुओं का आना - जाना होता रहा। जब सुख - सुविधा के साधन नहीं  थे तब भी  तीर्थयात्री तरह - तरह की  तकलीफें झेलकर भी  आया करते थे। 1962 के चीनी आक्रमण के बाद सीमा सड़क संगठन बी.आर. ओ) का गठन हुआ और  दुर्गम पर्वतीय इलाकों तक सड़कें बनने लगीं। हालांकि ब्रिटिश काल में विकसित किये गये हिल स्टेशन भी आजादी के बाद घरेलू सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने रहे किंतु उतराखंड के चार धाम के अलावा जम्मू कश्मीर के अमरनाथ की यात्रा में जिस तरह से जनसैलाब उमड़ने लगा उससे इन पर्वतीय क्षेत्रों में पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा रहा है। हिमाचल प्रदेश के जिन निर्जन इलाकों में कोई जाने का साहस नहीं करता था उनमें भी सैलानियों की भीड़ होने लगी। एक समय था जब साधु - संत मानसिक शंति के लिए हिमालय जाकर तप करते थे किंतु आज के दौर में पहाड़ी क्षेत्रों में जाने वालों ने वहाँ की शांति, सौंदर्य और संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता  है। लेकिन धीरे - धीरे यह विकास की वासना का शिकार होती चली गई। केदारनाथ हादसे के पहले भी गंगोत्री के रास्ते में बना पन बिजली संयंत्र  जलसैलाब में बह गया था। तब कहा गया कि पहाड़ में सुरंग खोदने से उसकी भूगर्भीय संरचना को जो क्षति पहुंची उसके कारण वह हादसा हुआ। कुछ साल पहले  बद्रीनाथ के निकट जोशीमठ की जमीन धसकने से शहर का अस्तित्व खतरे में आ गया। उसका कारण भी पन बिजली योजना के लिए बनाई गई सुरंग को माना गया था। लेकिन बजाय संभलने के  विकास के नाम पर प्रकृति पर बलात्कार करने का पाप किया जाता रहा। पहाड़ों का सीना चीरकर बारहमासी फोर और सिक्स लेन सड़कें   बनाने का सिलसिला जारी है। आधुनिक सुख - सुविधा युक्त होटल - गेस्ट हाउस कुकुरमुत्तों जैसे उगते जा रहे हैं। तीर्थयात्रा , धार्मिक पर्यटन में बदलती जा रही है। पहाड़ों की खूबसूरती जिन वृक्षों से थी उनको निर्दयता से काट दिया गया। हिमालय की गोद में पलने वाली बहुमूल्य वनस्पतियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं। जिस अलौकिक शांति का वहाँ अनुभव होता था वह इंसानी शोर - शराबे में डूबकर विलुप्त हो गई। वाहनों के धुएं ने  स्वच्छ हवा को ज़हरीला कर दिया। प्रकृति हमारी पालनहार है इसीलिये वह  समय - समय पर हमें आने वाले खतरों के प्रति सतर्क  करती है। कल और आज जो हादसे हुए इनका पूर्वाभास होने के बाद भी यदि हम नहीं जागे तब प्रकृति को कोसने के बजाय अपने अंतःकरण में झांककर देखना चाहिए। गनीमत है अभी तो बादल ही फटे हैं। आगे क्या - क्या होगा कहना मुश्किल है  क्योंकि सहने की भी कोई सीमा होती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 5 August 2025

शासक की बजाय विदूषक बनते जा रहे ट्रम्प


भारत पर रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने बनाये जाल में बुरी तरह फंसते जा रहे हैं।  1 अगस्त से 25 फीसदी आयात शुल्क लगाए जाने के कुछ देर बाद ही उन्होंने उसे एक सप्ताह आगे बढ़ा दिया। गौरतलब है इसी माह के अंतिम सप्ताह अमेरिका का एक दल यहाँ आकर व्यापार समझौते पर बातचीत करेगा। उसके पहले ही भारत पर मनमाने तरीके से आयात शुल्क थोपने के साथ ही रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भारी - भरकम आर्थिक दंड लगाने की धौंस देकर वे भारत को भयभीत करना चाह रहे हैं। हालांकि भारत सरकार ने उनके बयानों का सीधा जवाब तो नहीं दिया किंतु ये कहने में भी संकोच नहीं किया कि हम अपने हितों के बारे में जागरूक हैं और उनसे समझौता नहीं करेंगे। कूटनीतिक जगत में इस बात की चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  द्वारा इस दौरान  बात नहीं करने से ट्रम्प बौखलाए हुए हैं। भारत ने  दृढ़ता का प्रदर्शन किये जाने के बाद अमेरिका को ही कठघरे में खड़ा करते हुए स्पष्ट कर दिया कि न सिर्फ वह अपितु उसके समर्थक यूरोपीय यूनियन b के अनेक देश रूस से कच्चे तेल के अलावा अन्य चीजें भी बड़ी मात्रा में खरीद रहे हैं। ऐसे में ट्रम्प किस मुँह से भारत पर रूस से व्यापार न  करने का दबाव बना रहे हैं ये समझ से परे है। रोचक बात ये है कि भारत की ही तरह चीन भी रूसी कच्चे तेल और अन्य वस्तुओं का बड़ा खरीददार है। उस पर अनाप - शनाप  आयात शुल्क लगाने के बाद अमेरिका को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे क्योंकि उसने भी ट्रम्प को उन्हीं की शैली में जवाब दिया। इसीलिए उन्होंने चीन पर रूस से कच्चा तेल नहीं  खरीदने का दबाव नहीं बनाया। असल में अमेरिका को ये गलतफहमी हो गई कि वे भारत को अपनी मर्जी से जैसा चाहे झुका लेंगे। लेकिन अब तक जो कुछ भी हुआ उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत ने भी  ट्रम्प की धौंस के सामने झुकने से इंकार कर दिया है। उल्टे अमेरिका की पोल खोलते हुए बता दिया कि  वह खुद भी रूस का व्यापारिक साझेदार है इसलिए भारत को रोकने का कोई नैतिक अधिकार उसे नहीं है। अपने को दुनिया का चौधरी समझने वाले अमेरिका जैसे देश के लिए ये स्थिति वाकई अकल्पनीय है। ट्रम्प के दिमाग में अपने देश की शक्ति का जो घमंड है वही उनकी सनक का कारण  है परंतु जिस तरह से उन्होंने पूरी दुनिया पर हंटर चलाने की बेअक्ली दिखाई उसके कारण अब तो अनेक देश उनसे तू - तड़ाक करने की हिम्मत दिखाने लगे हैं। ब्राज़ील और द.अफ्रीका ने भी ट्रम्प को खरी - खरी सुना दी। पड़ोसी कैनेडा भी अमेरिका की चौधराहट स्वीकार करने तैयार नहीं है। यूरोप के बाद जापान भी अमेरिका के प्रभुत्व से बाहर आने प्रयासरत है। भारत तो पूरी तरह अमेरिका के गुट में कभी रहा ही नहीं और रूस से उसके रिश्ते समय की कसौटी पर  हमेशा खरे साबित हुए हैं। दूसरे कार्यकाल में ट्रम्प जिस प्रकार पाकिस्तान के प्रति झुकाव दिखा रहे हैं उसके बाद उनसे किसी अक्लमंदी की उम्मीद करना बेकार है। इसलिए भारत ने उनकी अकड़ के सामने नहीं झुकने का जो हौसला दिखाया वह पूरी तरह सही है। ट्रम्प  को ये बताने का समय आ गया है कि आज  कोई एक देश या नेता पूरी दुनिया को अपने मुताबिक चलाने में सक्षम नहीं रहा । और अमेरिका भी कोई अपवाद नहीं है। आयात शुल्क में मनमानी वृद्धि से अमेरिका को ऊपरी तौर पर तो आर्थिक लाभ मिलने लगा है। लेकिन वहाँ उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ने से आम जनता काफी नाराज है। चीजें महंगी होने से उनके आयात में भी कमी आई जिससे उनका अभाव भी महसूस किया जा रहा है। भारत ने वैकल्पिक बाजार खोजने की जो पहल की वह बुद्धिमत्ता भरा कदम है। यदि यही स्थिति रही तो दुनिया को अपनी मर्जी से हांकने का मंसूबा देख रहे ट्रम्प अपने देश में ही कमजोर होते जाएंगे। वैसे भी उनकी छवि शासक की बजाय विदूषक की बनती जा  रही है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 4 August 2025

हर अस्पताल में जेनेरिक दवाओं के जन औषधि केंद्र खोलना अनिवार्य हो


केन्द्र सरकार ने गत दिवस कुछ दवाइयों के दामों में 10 से 15 प्रतिशत कमी का निर्णय लिया। इनमें मधुमेह, हृदय, दर्द निवारक तथा बुखार की दवाइयाँ शामिल हैं। ये निर्णय निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है।लेकिन अधिकांश चिकित्सकों द्वारा ब्रांडेड दवाइयाँ लिखे जाने के कारण मरीजों पर अनाप - शनाप बोझ पड़ता है।  कानूनन, डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने का आदेश है। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) दोनों ने डॉक्टरों से जेनेरिक दवाएं लिखने को कहा है, और ऐसा न करने पर दंड का प्रावधान है जिसके अंतर्गत उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। दरअसल जेनेरिक दवाएं, कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं क्योंकि जिन दवाओं पर  पेटेंट खत्म हो जाता है उसका उत्पादन कोई भी कर सकता है। ऐसे में उसे पेटेंट के नाम पर दी जाने वाली राशि से मुक्ति मिल जाती है।जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा को अधिक किफायती, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त  बनाना है। इसीलिए नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद देश भर में जन औषधि केंद्र खोलने की शुरुआत हुई जिनमें मिलने वाली जेनेरिक दवाइयों की कीमत ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 75 से 90 प्रतिशत तक सस्ती होने से उपभोक्ता को अकल्पनीय  बचत होती है। जो लोग उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय और अन्य बीमारियों की दवाइयाँ नियमित लेते हैं उनका मासिक खर्च जन औषधि केंद्र से खरीदी जाने वाली जेनेरिक दवाओं से एक चौथाई रह जाता है। इसीलिए केंद्र सरकार समूचे देश में जन औषधि केंद्र खोलने के कार्यक्रम को आगे बढ़ा रही है जिसके अंतर्गत मार्च 2026  तक इनकी संख्या 25 हजार करने का लक्ष्य है। मोटे - मोटे आंकड़ों के अनुसार जन औषधि केंद्र से दवा खरीदने पर अब तक 25 हजार करोड़ से अधिक की बचत हुई। लेकिन 140 करोड़ की आबादी वाले देश में 25 हजार दुकानें ऊँट के मुँह में जीरा समान हैं। इस बारे में एक बात बिल्कुल साफ है कि चिकित्सा का पेशा  विशुद्ध व्यवसाय बन चुका है। दवा निर्माता कंपनियां, चिकित्सक और अस्पताल रूपी गठजोड़ मरीजों की जेब काटने में जुटा है। अस्पतालों में संचालित दवा दुकानें एम.आर.पी पर बिक्री करती हैं। सर्जिकल सामान में होने वाली लूटमार की तो कोई सीमा नहीं। ग्लूकोज की बोतल के थोक और फुटकर दाम में जमीन - आसमान का अंतर है। दवा कंपनियों  द्वारा चिकित्सकों को बिक्री के लक्ष्य दिये जाते हैं जिन्हें पूरा करने पर उनको विदेश यात्रा के अलावा तरह - तरह से उपकृत किया जाता है। सरकार द्वारा इस पर रोक लगाए जाने के बाद भी कमीशनखोरी का धंधा बेधड़क जारी है। जन औषधि केंद्र जनता को इस लुटाई से बचा सकते हैं । लेकिन एक तो जेनेरिक दवाओं के ये बिक्री केंद्र काफी कम हैं दूसरे जेनेरिक दवाओं के कम असरकारी होने को लेकर चिकित्सा जगत द्वारा भ्रम फैलाया जाता है। जबकि उनका उपयोग करने वालों को  स्वास्थ्य और आर्थिक दोनों लाभ हो रहे हैं। ये देखते हुए केंद्र और राज्य दोनों को चाहिये कि जन औषधि केंद्रों का समुचित प्रचार कर लोगों को आश्वस्त करें जेनेरिक दवाएं सस्ती होने पर भी ब्रांडेड दवाइयों की तरह ही असर करती हैं। इसके अलावा प्रत्येक अस्पताल में अनिवार्य रूप से जन औषधि केंद्र खोलकर मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाइयाँ उपलब्ध करवाने जैसे कदम भी उठाये जाने जरूरी हैं। मोदी सरकार ने आयुष्मान भारत योजना के जरिये गरीबों और 70 वर्ष से ऊपर के सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख रु. तक के इलाज की सुविधा देकर जन स्वास्थ्य की दिशा में जो क्रांतिकारी कदम उठाया उसका लाभ करोड़ों लोगों को मिल रहा है । लेकिन जो लोग इस योजना के दायरे में नहीं आते उन्हें जन औषधि केंद्र बड़ी राहत दे सकते हैं। इसलिए इस दिशा में युद्धस्तरीय प्रयास किये जाने चाहिए हैं क्योंकि चिकित्सा सुलभ होने के साथ ही सस्ती होना भी जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 2 August 2025

राहुल द्वारा एटम बम फोड़े जाने का इंतजार

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी इन दिनों चुनाव आयोग पर हमलावर हैं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ही वे वोटों की चोरी का रोना रोते फिर रहे हैं। उधर चुनाव आयोग का कहना है कि उसके बुलाने पर श्री गाँधी आते नहीं और न ही पत्रों का जवाब देते हैं। पहले विपक्ष की ओर से ईवीएम में गड़बड़ी का शोर मचाकर मतपत्रों से मतदान करवाने का दबाव बनाया जाता रहा। लेकिन चुनाव आयोग ने ऐसे सभी दलों को बुलाकर आरोप साबित करने कहा तब कोई नहीं पहुंचा। बिहार में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण के बाद 65 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम कट जाने से भी विपक्ष भन्नाया हुआ है । संसद इसके कारण चल नहीं पा रही । सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिकाएँ विचाराधीन हैं। आयोग ने मतदाता सूची का प्रारंभिक प्रकाशन कर आपत्तियाँ आमंत्रित की हैं जिसके बाद अंतिम प्रकाशन किया जाएगा। लेकिन राहुल बीते कुछ दिनों से ये दावा करते आ रहे हैं कि उनके पास चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों के पुख्ता प्रमाण आ गए हैं। संभवतः ये कर्नाटक का मामला है जो उनके अनुसार छह महीने तक की गई खोजबीन के बाद उजागर हुआ है। बकौल श्री गाँधी ये एटम बम है  जिसके फूटने के बाद चुनाव आयोग मुँह दिखानें लायक  नहीं रह जाएगा। इसी के साथ उन्होंने आयोग के कर्मचारियों को धमकी दे डाली कि गड़बड़ी करने पर उन्हें बख्शा नहीं जाएगा भले ही वे सेवा निवृत्त हो चुके हों। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आयोग ने अपने अमले को निडर होकर कार्य करते रहने का निर्देश दिया। मतदाता सूचियों में गड़बड़ी के  आरोप नई बात नहीं है। चूंकि इसका काम सरकारी कर्मचारी करते हैं जिनकी चुनाव  ड्यूटी की तरह  इस कार्य में भी कोई रुचि नहीं होती।  ऐसे में कुछ नाम छूटना तो आम है किंतु जबसे बी.एल.ओ नामक व्यवस्था हुई तबसे इस तरह की गड़बड़ी कम होने लगी। इसी तरह मतदाता पर्चियाँ घर - घर पहुंचाए जाने से मतदान के प्रति उत्साह भी बढ़ा है। लेकिन बड़े पैमाने पर अतिरिक्त नाम जोड़ने की शिकायतें जैसी श्री गाँधी बता रहे हैं , गले नहीं उतरती। जो लोग काम - धंधे के सिलसिले में बाहर रहते हैं उनके नाम दो अलग शहरों या राज्यों में बतौर मतदाता दर्ज होने के तो प्रकरण जरूर हैं। बिहार में  पुनरीक्षण के दौरान काटे गए लोगों में ऐसे मतदाता भी हैं। लेकिन श्री गाँधी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में लाखों  नाम जोड़कर चुनाव चोरी करने का जो आरोप लगाते रहते हैं उसका ठोस प्रमाण वे आज तक नहीं दे सके। चुनाव आयोग ऐसे आरोपों पर खुलकर कहता आया है कि सबूत है तो चुनाव याचिका लगाएं या अदालत में शिकायत दर्ज करवाएं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनके द्वारा कही गई बातों में गंभीरता और प्रामाणिकता की अपेक्षा रहती है। ऐसे में वे जिस एटम बम का हल्ला मचा रहे हैं उसे फोड़ने में विलंब क्यों किया जा रहा है ये सवाल उठ खड़ा होता है। यदि जैसा वे कह रहे हैं वैसा है तब उन्हें ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करना चाहिए और बिहार की मतदाता सूचियों के अंतिम प्रकाशन के पहले धमाका कर अपनी विश्वसनीयता कायम करना चाहिए। साथ ही  वे सरकार और आयोग पर चाहे जितने हमले करें किंतु उसके कर्मचारियों और अधिकारियों को परिणाम भुगतने की धमकी देना  शोभनीय नहीं है। हालांकि आजकल चुनावों के दौरान विपक्षी नेताओं द्वारा सरकारी अमले को इस तरह से डराने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है किंतु चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। यदि यही चलन जारी रहा तो भविष्य में न्यायपालिका पर भी इसी तरह दबाव बनाया जाने लगेगा। बहरहाल श्री गाँधी ने जिस एटम बम को फोड़ने की धमकी चुनाव आयोग को दी उसके धमाके का पूरा देश इंतजार कर रहा है। लेकिन उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि यदि वह बम फुस्स निकला तब उसके नुकसान से वे और कांग्रेस दोनों बच नहीं सकेंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 1 August 2025

ट्रम्प का समर्थन कर कांग्रेस की फजीहत करवा रहे राहुल




अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विश्वसनीयता दिन ब दिन घटती जा रही है। वे जो मुँह में आया बोल जाते हैं और फिर पलटी मारने में भी उन्हें शर्म नहीं आती। दो दिन पहले उन्होंने भारत पर 25 फीसदी आयात शुल्क थोपने का ऐलान कर दिया जो आज से प्रभावशील होना था किंतु फिर उसे एक सप्ताह के लिए टाल दिया। लेकिन इसी के साथ  भारत की अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बता दिया। आयात शुल्क बढ़ने से भारत के उद्योग - व्यापार को बड़ा नुकसान होने की आशंका जताई जा रही थी। लेकिन गत दिवस शेयर बाजार मामूली गिरावट के बाद बंद हुए और वही आज भी प्रारंभिक घण्टों में दिखाई दिया। उद्योगपतियों के अलावा तमाम आर्थिक विशेषज्ञों ने भी आत्मविश्वास व्यक्त किया कि अमेरिका के साथ व्यापार राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का बहुत  छोटा अंश है और ट्रम्प की नीतियों से भारत को नये बाजार तलाशने का अवसर मिल गया है । ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ कहने पर ट्रम्प हंसी का पात्र बन गए हैं । भारत के तमाम आर्थिक विशेषज्ञों ने अर्थव्यवस्था की मजबूती की पुष्टि की है।   लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ट्रम्प की टिप्पणी के समर्थन में कूदते हुए बोले कि प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को छोड़कर हर कोई यह जानता है  कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक मरी हुई  है। मुझे खुशी है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने फैक्ट सामने रखा।बीजेपी ने अडानी की मदद के लिए अर्थव्यवस्था को खत्म कर दिया है। नेता प्रतिपक्ष का सरकार से विरोध स्वाभविक है किंतु भारत की अर्थव्यवस्था को मृत कहने से साधारण बुद्धि वाला भी सहमत नहीं होगा। श्री गाँधी की पार्टी के ही दो वरिष्ट सांसद शशि थरूर और राजीव शुक्ला ने ही ट्रम्प की निंदा करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती की पुष्टि की। शिवसेना  उद्धव गुट की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने तो ट्रम्प के बयान की खिल्ली उड़ाते हुए उन्हें अहंकार में डूबा बता दिया। इस प्रकार राहुल के बयान को उनके अपने ही लोगों द्वारा नकार दिया गया। उल्लेखनीय है स्व. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 1998  में किये गए परमाणु परीक्षण से भन्नाए अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध थोप दिये थे।  लेकिन अटल जी ने  दबाव में आने से इंकार कर दिया और विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीयों का देश की सहायता हेतु आगे आने हेतु आह्वान किया। देखते - देखते ही देश का विदेशी मुद्रा भंडार भर गया और  प्रतिबंध दम तोड़ बैठे। तबसे भारत आर्थिक , वैज्ञानिक और सामरिक तौर पर कई गुना विकसित और शक्तिशाली हो चुका है। जो ट्रम्प भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बता रहे हैं उसे ही उनके देश में बैठी दिग्गज रेटिंग एजेंसियां भारत को दुनिया की पांचवी और सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का प्रमाणपत्र दे रही हैं। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष भी इसकी पुष्टि करते हैं जिनमें अमेरिका का दबदबा है। आज भारत की वार्षिक विकास दर अमेरिका और चीन को पीछे छोड़ चुकी है। आने वाले कुछ सालों में हमारी अर्थव्यवस्था के तीसरे स्थान पर आने की प्रबल संभावनाएं हैं। बतौर विपक्षी नेता श्री गाँधी का सरकार की आलोचना करना और उसकी उपलब्धियों को कमतर आंकना कोई अपराध नहीं है लेकिन अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बताने के अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान का आँख मूँदकर समर्थन  करना उनकी नासमझी का ताजा प्रमाण है। बेहतर होता वे अपनी पार्टी के वरिष्ट नेताओं के अलावा आर्थिक विशेषज्ञों के साथ विमर्श करने के बाद इस विषय पर अपनी राय रखते। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों से श्री गाँधी की असहमति सैद्धांतिक कम राजनीतिक ज्यादा है क्योंकि मौजूदा दौर में कांग्रेस नीतिगत शून्यता की शिकार है। हालांकि  सरकार की आलोचना करने के लिए अनेक मुद्दे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बताये जाने के ट्रम्प के बयान का शब्दशः समर्थन कर श्री गाँधी भी अपनी हँसी उड़वा बैठे। उनकी यही  अपरिपक्वता कांग्रेस को भारी पड़ रही है । लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उन्हें इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि आज की दुनिया में किसी भी देश की आर्थिक स्थिति खुली किताब जैसी हो गई है। विश्व व्यापार संगठन के बनने के बाद सब कुछ खुला हुआ है। यहाँ तक कि चीन तक कुछ भी छिपाने में असमर्थ है ।  फिर भारत में तो पूर्ण लोकतंत्र है। भले ही भारत में करोड़ों लोग गरीब हैं और  बेरोजगारी  भी बड़ी समस्या है। रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या पूरी तरह हल नहीं हो पाई है किंतु भारतीय अर्थव्यवस्था को मरा हुआ कहना दिमागी दिवालियापन ही हो सकता है। उस लिहाज से ट्रम्प और राहुल दोनों का मानसिक स्तर एक जैसा ही कहा जाए तो गलत न होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी