Monday, 1 July 2024

प्रकृति को दुख देने से बड़ा पाप और होगा


उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल केदारनाथ के पास विगत दिवस जोरदार हिम स्खलन हुआ। यद्यपि 2013 में आये जल प्रलय जैसी जनहानि तो नहीं हुई किंतु प्रकृति ने एक बार फिर चेतावनी दी है। संयोगवश इसी समय हरिद्वार में एक सूखी पड़ी नदी में अचानक  जल सैलाब आया। वहाँ आने वाले पर्यटक उस सूखी पड़ी नदी का उपयोग पार्किंग के लिए करते हैं। इसलिए जब पहाड़ों से अचानक जलधारा उतरी तब वहाँ खड़ी कारें और बसें पास ही बहने वाली  गंगा नदी में उतराने लगीं। इसके दृश्य दिल दहला देने वाले थे। उत्तराखण्ड के समूचे पर्वतीय क्षेत्र में हिमस्खलन और भूस्खलन आम बात हो चली  है। गर्मियों की शुरुआत होते ही चार धाम की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। इनमें शामिल होने वाले तीर्थयात्री साल दर  साल बढ़ते जा रहे हैं। बढ़िया सड़कें और ठहरने की बेहतर व्यवस्थाओं ने तीर्थ यात्रा को धार्मिक पर्यटन में तब्दील कर दिया है। प्रतिदिन हजारों धुंआ छोड़ते वाहनों की वजह से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ने लगा है। इस सबके कारण ऊंचाई वाली जगहों का तापमान भी बढ़ने लगा है। हिमस्खलन का मुख्य कारण तापमान में वृद्धि को ही माना जाता है। हिमालय पर्वत माला की भूसंरचना  जिस प्रकार की है उसमें बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने की सीमित क्षमता है। गढ़वाल के इलाके को देव भूमि कहने के पीछे उद्देश्य यही था कि इस क्षेत्र की पवित्रता और शांति को सुरक्षित रखा जावे । जब चार धाम की यात्रा पैदल हुआ करती थी तब पर्यावरण के लिए इतना खतरा नहीं था। तीर्थ यात्रियों  की संख्या भी कम थी। वाहनों के शोर और धुएं के अलावा हेलीकाप्टर की गड़गड़ाहट से भी वातावरण मुक्त था। होटल और गेस्ट हाउस रूपी कांक्रीट के ढांचे भी नहीं थे। सच कहें तो बहुत  कुछ वैसा था जैसा ईश्वर ने हमें दिया  किंतु बीते कुछ दशकों में समूचे पर्वतीय क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां जिस तेजी से बढ़ीं और पर्यटन ने उद्योग की शक्ल अख्तियार की उसका दुष्परिणाम रुक -रुककर देखने मिलता रहता है। इस साल चार धाम की यात्रा शुरू होते ही केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री के रास्ते पर वाहनों की लंबी - लंबी कतारें लगने से जाम की स्थिति उत्पन्न हो गई। 30 - 40 कि.मी तक सड़क पर चलने की जगह नहीं थी। कुछ दिनों तक प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह अस्त व्यस्त होकर रह गई। ऐसे ही दृश्य शिमला और मनाली में देखने मिले। ऐसे में यदि पहाड़ अपना धैर्य खो रहे हैं तो दोष उनका नहीं हमारा है जो अपने शौक और श्रद्धा  के लिए उनकी छाती रौंदते हैं। तीर्थ यात्रा के पैकेज वाले विज्ञापन अखबारों में छाए रहते हैं। कश्मीर घाटी में स्थित अमरनाथ गुफा के दर्शन भी प्रारंभ हो चुके हैं। उस स्थान की यात्रा करने वाले भी लाखों की संख्या में होते हैं। परिणाम स्वरूप यात्रा शुरू होने के कुछ दिन बाद ही बर्फ से बनने वाला प्राकृतिक  शिव लिंग पिघल जाता है जिसकी वजह  मानवीय उपस्थिति से बढ़ने वाला तापमान ही होता है। अमरनाथ हेतु  भी हेलीकाप्टर सेवा भी उपलब्ध  है जिसे उस स्थान की शांति नष्ट करने के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है। कुल मिलाकर पर्वतीय क्षेत्र के तीर्थ स्थल हों या हिल स्टेशन, सभी में मानवीय आवाजाही बढ़ने से स्थितियाँ बद से बदतर होती जा रही हैं किंतु न समाज चेत रहा है और न ही सरकार। बाजारवादी  व्यवस्था के बढ़ते प्रभाव ने तीर्थ यात्रा और आमोद - प्रमोद हेतु किये जाने पर्यटन में अंतर खत्म कर दिया है। समय आ गया है जब इस दिशा में गंभीरता से विचार करते हुए  सार्थक कदम उठाये जाएं। अन्यथा केदारनाथ जैसे हादसे जल्दी - जल्दी होने लगेंगे और पहाड़ों से आने वाले जल सैलाब प्रलय का पूर्वाभास करवाते रहेंगे। भारत में प्रकृति संरक्षण के  संस्कार बाल्य काल से ही दे दिये जाते हैं। दूब से लेकर वट वृक्ष और कंकड़ से लेकर पर्वत तक सब पूज्य हैं। हर नदी, तालाब और कुए  को गंगा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन आस्था के अतिरेक में भारतीय संस्कृति के मौलिक सिद्धांतों और जीवन शैली को उपेक्षित किये जाने से ही पर्यावरण का संकट उत्पन्न होने लगा है। तमाम नदियाँ सूखने के कगार पर हैं या उनमें गंदगी का अंबार है। पहाड़ों का प्राकृतिक सौंदर्य दिन ब दिन घट रहा है। इस स्थिति को बदलने के लिए समन्वित प्रयास  जरूरी हैं। कोरोना काल में लगाए गए लाॅक डाउन के दौरान नदियाँ, जंगल और पहाड़ सभी ने राहत की सांस ली थी किंतु जैसे ही हालात सामान्य हुए सब कुछ पहले जैसा हो गया।  इससे साबित हो गया कि प्रकृति प्रदत्त सभी धरोहरों  के स्वरूप को विकृत करने के दोषी हम ही हैं । जिस प्रकृति की गोद में जाकर हम सुख - शांति का अनुभव करते हैं उसे दुख देने से बड़ा पाप और क्या होगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 29 June 2024

संसद के न चलने से विपक्ष का ज्यादा नुकसान होता है

18 वीं लोकसभा का पहला सत्र पूत के पाँव पालने में वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है। प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति से शुरू विवाद अध्यक्ष के चुनाव तक जारी रहा। सदस्यों के शपथ ग्रहण में भी अनावश्यक नारेबाजी और टोकाटाकी चलती रही। स्पीकर चुने जाने पर ओम बिरला को बधाई देते समय भी विपक्षी सदस्यों ने कटाक्ष करने में तनिक भी कंजूसी नहीं की। उसके बाद श्री बिरला के भाषण में आपात्काल के उल्लेख के साथ उस दौरान मारे गए लोगों की स्मृति में मौन रखे जाने पर विवाद की स्थिति बनी। राहुल गाँधी के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं का जत्था विरोध जताने स्पीकर के कक्ष तक  जा पहुंचा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी आपत्काल का जिक्र आग में घी का काम कर गया। शपथ लेते समय असदुद्दीन ओवैसी द्वारा जय फिलीस्तीन कहे जाने के विरुद्ध मामला पुलिस तक जा पहुंचा। यद्यपि स्पीकर के चुनाव में ममता बैनर्जी की नाराजगी की खबर से इंडिया गठबंधन में दरार की आशंका उत्पन्न हो गई थी किंतु वह खत्म कर दी गई। इसका प्रमाण राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के पहले विपक्ष द्वारा नीट परीक्षा घोटाले पर बहस के लिए स्थगन प्रस्ताव पेश करने से मिला। जिसके लिए न सत्ता पक्ष तैयार हुआ और न ही श्री बिरला। उनका कहना है कि अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव से पूर्व अन्य किसी विषय पर चर्चा नियम और परंपरा दोनों के विरुद्ध है। स्पीकर ने विपक्ष को समझाइश देते हुए कहा कि वे अभिभाषण पर बोलते हुए नीट घोटाले सहित सभी विषयों पर बोल सकते हैं किंतु धन्यवाद प्रस्ताव को रोककर स्थगन प्रस्ताव स्वीकार करना संभव नहीं होगा। विपक्ष ने इस पर नारेबाजी की। उस दौरान  राहुल का माइक बंद किये जाने की शिकायत भी हुई और विपक्षी सदस्य गर्भगृह तक आ पहुंचे। संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष को आश्वस्त करते रहे कि अभिभाषण के बाद उन्हें नीट घोटाले पर बोलने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा लेकिन गतिरोध बने रहने से अंततः स्पीकर ने सोमवार तक सदन स्थगित कर दिया। विपक्षी खेमे से जो संकेत मिल रहे हैं उनके मुताबिक अगले हफ्ते भी वह ऐसा ही करेगा। उसकी रणनीति यह है कि नीट घोटाले पर सरकार को रक्षात्मक होने बाध्य किया जावे। दरअसल श्री गाँधी सहित विपक्ष के अन्य दल भी जानते हैं कि अभिभाषण की आलोचना का कोई महत्व नहीं होता क्योंकि बहस के अंत में प्रधानमंत्री  जोरदार भाषण देकर विपक्ष की हालत खराब कर देते हैं। यह सत्र 3 जुलाई तक है विपक्ष  का संख्या बल 10 सालों में सबसे अधिक होने से उसका मनोबल ऊंचा है। इसीलिए वह पहले सत्र से ही सरकार पर हावी होने की रणनीति पर चल रहा है। दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का सोचना है कि शुरुआत में ही विपक्ष  के सामने झुकने से उसका हौसला और बुलंद हो जाएगा जो भविष्य में परेशानी का कारण बने बिना नहीं रहेगा। पिछले 10 सालों में संसद के दोनों सदनों में इस तरह के हंगामे रोजमर्रे की बात थे। लेकिन विपक्ष की ताकत कम होने से सरकार आसानी से अपना काम निकाल लेती थी। लेकिन इस बार लोकसभा में स्थिति भिन्न है। हालांकि सरकार के पास स्पष्ट बहुमत होने से वह आत्मविश्वास से भरी हुई है। इसका परिचय अध्यक्ष के चुनाव से मिल गया। विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव को मंजूर न करने की नीति भी उसी का प्रमाण है। स्पीकर और राष्ट्रपति दोनों के भाषण में आपात्काल का उल्लेख ये दर्शाता है कि प्रधानमंत्री विपक्ष पर हमला करने का कोई अवसर नहीं छोड़ेंगे। जहाँ तक बात विपक्ष के स्थगन प्रस्ताव की है तो वह पुरानी गलती दोहरा रहा है। उसे चाहिए था राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित होने देता। इस दौरान भी राहुल सहित अन्य विपक्षी नेताओं को सरकार पर हमले करने का पर्याप्त मौका मिलता।यदि सत्र के शेष दिनों में भी ऐसा ही गतिरोध बना रहा तब सत्ता पक्ष तो जैसे - तैसे धन्यवाद प्रस्ताव मंजूर करवा ही लेगा किंतु विपक्ष हवा में ही तलवार घुमाते रह जाएगा। काँग्रेस की 99 सीटें होने से राहुल को नेता प्रतिपक्ष का पद मिला है। उस नाते उन्हें हर विषय पर  बोलने का अवसर उपलब्ध रहेगा। धन्यवाद प्रस्ताव पर भी वे सरकार पर चौतरफा आक्रमण कर सकते थे। परंतु विपक्ष ने वह अवसर गँवा दिया। उसे याद रखना चाहिए कि सरकार के पास अपना पक्ष रखने के अनेक साधन होते हैं किंतु विपक्ष के पास संसद सबसे प्रभावशाली और प्रामाणिक माध्यम है। होहल्ला कर सदन स्थगित होने से विपक्ष उसे मिलने वाले समय से भी वंचित हो जाता है। बीते 10 सालों में इस वजह से उसकी छवि को काफी क्षति पहुँची है। यदि इस बार भी वह  सदन को बाधित करने की नीति पर चलता रहा तो उसका बढ़ा हुआ संख्याबल  भी किसी काम का नहीं रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 28 June 2024

आपातकाल : काँग्रेस की दुखती रग पर हाथ रख दिया बिरला ने


काँग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका वाड्रा ने लोकसभा चुनाव के दौरान रायबरेली  की एक जनसभा में इस क्षेत्र से नेहरू - गाँधी परिवार के पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा था कि जब भी आपको लगा कि इस परिवार से गलती हुई तो आपने उसके लिए दंडित भी किया। आगे उन्होंने कहा कि जब आपको इंदिरा गाँधी की कुछ बातें अच्छी नहीं लगीं तो आपने उनको हरा दिया। यद्यपि सुश्री वाड्रा ने इंदिरा जी की पराजय का जिक्र करते हुए आपातकाल का नाम नहीं लिया किंतु बिना कहे ही लोग सब समझ गए। लेकिन जब 18 वीं लोकसभा के स्पीकर चुने जाने के बाद ओम बिरला ने अपने भाषण में आपातकाल को लोकतंत्र और संविधान विरोधी बताते हुए उस दौरान मारे गए लोगों की स्मृति में मौन रखने कहा तो राहुल गाँधी को बेहद नागवार गुजरा।  चूंकि इस वर्ष आपातकाल लगे 50 वर्ष पूरे हुए इसलिए लोकसभाध्यक्ष ने सदन में उसका उल्लेख किया। गत दिवस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी अपने अभिभाषण में आपातकाल को संविधान पर हमला बताया। उसके बाद  राहुल कुछ विपक्षी नेताओं को लेकर श्री बिरला से मिले और उनके द्वारा आपातकाल को लेकर कही गई बातों पर रोष व्यक्त करते हुए उसे राजनीतिक करार दिया। रोचक बात ये है कि उनके साथ अन्य विपक्षी नेताओं के अलावा  मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव तथा लालू यादव की बेटी मीसा भारती भी रहीं। बताने की जरूरत नहीं कि आपातकाल में मुलायम और लालू दोनों जेल गए थे। स्पीकर से मिलने के बाद अखिलेश ने कहा कि इतनी पुरानी बात को भूल जाना ही बेहतर है। स्मरणीय है पूरे लोकसभा चुनाव में राहुल, अखिलेश और तेजस्वी यादव हाथ में संविधान की पुस्तक लेकर भाजपा पर ये आरोप लगाते रहे कि वह उसे बदलना चाहती है। लेकिन ये नेतागण भूल गए कि कि स्वाधीनता के बाद संविधान की हत्या का पहला प्रयास इंदिरा गाँधी द्वारा किया गया और वह भी अपनी गद्दी बचाने के लिए। पूरे विपक्ष को उन्होंने जेल में ठूंस दिया था। समाचार पत्रों पर सेंसर लगाकर अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई। लोगों के मौलिक अधिकार तक निलम्बित कर दिये गए। इंदिरा ही भारत और भारत ही इंदिरा जैसा राग दरबारी गूंजने लगा। इसी गलती का उल्लेख प्रियंका ने रायबरेली में किया था जिसके दंड स्वरूप 1977 के लोकसभा चुनाव  में पूरे  उत्तर भारत के मतदाताओं ने काँग्रेस का सफाया कर दिया। खुद इंदिरा जी भी रायबरेली में हार गईं। आपातकाल के विरुद्ध हुआ अहिंसक संघर्ष भारत के राजनीतिक इतिहास का वह हिस्सा है जिसके बारे में नई पीढ़ी को विस्तृत जानकारी दी जानी चाहिए ताकि उसे संविधान और लोकतंत्र का खात्मा करने रचे गए उस  षड्यंत्र की सूत्रधार  इंदिरा गाँधी और उनके तानाशाही रवैये की वास्तविकता का पता रहे। स्वाधीनता संग्राम, गाँधी हत्या, बांग्ला देश युद्ध जैसी घटनाओं की याद  तो काँग्रेस हमेशा ताजा रखना चाहती है किंतु कश्मीर के भारत में विलय और 1962 में चीनी हमले के समय पंडित नेहरू की गलतियों के अलावा आपातकाल लगाए जाने जैसे कदमों पर विस्मृति की धूल डालने इसलिए आमादा रहती है क्योंकि उनके लिए नेहरू - गाँधी परिवार कठघरे में खड़ा होता है। बतौर नेता प्रतिपक्ष राहुल को सरकार  और उसकी नीतियों का विरोध करने का अधिकार है किंतु अतीत में जो गलतियाँ तत्कालीन सत्ताधीशों ने कीं उनकी  याद दिलाते रहना इसलिए जरूरी है ताकि कोई दूसरा शासक उनको दोहराने की जुर्रत न कर सके। खुद को समाजवादी कहने वाले अखिलेश  ये कैसे भूल गए कि उनके पिता भी इंदिरा जी की तानाशाही के विरुद्ध लड़ने वालों में अग्रणी रहे। यही स्थिति मीसा भारती के बारे में है जिनके पिता लालू यादव आपातकाल की भट्टी में तपकर ही राजनेता बन सके। गठबंधन राजनीति की मजबूरियों में राजनीतिक पार्टियां  विरोधी विचारधारा वाले दलों से भी गठबंधन करती हैं। इंडिया नामक विपक्षी गठजोड़ भी उसी का रूप है। ऐसे में राहुल , अखिलेश और तेजस्वी का साथ आना चौंकाता नहीं किंतु उन्हें ये ध्यान रखना होगा कि पूर्व पीढ़ी के संघर्षों को भुला देने से आपकी  पहिचान नष्ट हो सकती है। राहुल के साथ लोकसभा अध्यक्ष के भाषण का विरोध करने पहुंचे विपक्षी सांसदों को आपातकाल के बारे में  अपनी पितृ पीढ़ी के विचारों को जानना चाहिए। राहुल  ने उनको साथ लेकर दरअसल अपनी दादी द्वारा किये गए संविधान और लोकतंत्र को कुचलने के प्रयास को वैधता प्रदान करने की चाल चली। लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाने जैसे निर्णय आपातलाल में लिए गए थे। संसद इंदिरा जी के दरबार जैसा बन गया था। सैकड़ों मीसाबन्दी जेलों में चल बसे थे। लाखों परिवारों के कमाने वाले  सदस्य   के जेल जाने से उनके सामने रोजी - रोटी का संकट उत्पन्न हो गया। भारत की जनता ने उसी का दंड काँग्रेस को दिया था। प्रियंका ने रायबरेली के मतदाताओं को जागरूक बताते हुए इंदिरा जी की हार का जिक्र किया था। क्या राहुल अपनी बहिन के उस भाषण का भी विरोध करेंगे? सही बात तो ये है कि राहुल द्वारा आपातकाल की चर्चा का विरोध करने से  काँग्रेस का अपराधबोध उजागर हो गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 27 June 2024

पित्रौदा की पुनर्नियुक्ति से काँग्रेस सवालों के घेरे में


सैम पित्रोदा भारत के बाहर रहने वाले एक पेशेवर व्यक्ति हैं। उनका नाम स्व. राजीव गाँधी के शासनकाल में चर्चित हुआ । उन्हें देश में संचार क्रांति का सूत्रधार माना जाता रहा है। बाद की काँग्रेस सरकारों में भी वे सलाहकार रहे। बीते कुछ सालों में वे काँग्रेस नेता राहुल गाँधी के विदेशी दौरों के प्रायोजक की भूमिका निभा रहे थे। इसीलिए काँग्रेस ने उनको इंडियन ओवरसीज काँग्रेस का अध्यक्ष बना दिया जिसमें किसी को ऐतराज नहीं हो सकता था। लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव के दौरान उनका एक साक्षात्कार अमेरिका में प्रसारित हुआ जिसमें उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में रहने वालों की तुलना कुछ खास नस्लों से करते हुए पूर्वी हिस्से के वासियों को चीनी और दक्षिण भारतीयों को अफ्रीकियों जैसा बताया। जैसे ही उस साक्षात्कार की जानकारी आई देश में बवाल मचने लगा।  उसके पहले उन्होंने अमेरिका में उत्तराधिकार के नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि किसी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी 55 फीसदी संपत्ति सरकार लेती है जबकि उत्तराधिकारी को महज 45 फीसदी हासिल होता है।  चुनाव के चलते भाजपा सहित काँग्रेस विरोधी अन्य दलों द्वारा श्री पित्रौदा के बयानों को मुद्दा बनाकर काँग्रेस की घेराबन्दी की जाने लगी । फिर क्या था बिना देर किये उनको इंडियन ओवरसीज काँग्रेस पद से हटा दिया गया। साथ ही ये सफाई भी दी जाने  लगी कि पार्टी का उनकी टिप्पणियों से कोई सम्बन्ध नहीं है और वह उनका समर्थन नहीं करती।  उस समय तो बात आई - गई  हो गई। श्री पित्रौदा भी मौन साधकर बैठ गए। लेकिन एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भविष्यवाणी कर दी कि कुछ समय बाद श्री पित्रौदा अपने पद पर पुनः बैठ जायेंगे। यह सब काँग्रेस की चाल है। वह अपने कुछ नेताओं से इस तरह के बयान दिलवाकर विवाद उत्पन्न करवाती है। कुछ दिनों के लिए उन्हें दूर रखकर पुनः वापस पद दे दिया जाता है। उसके बाद लोकसभा चुनाव संपन्न होने तक उनकी कोई चर्चा भी नहीं सुनाई दी। गत दिवस अचानक वे एक बार फ़िर सुर्खियों  में आये किंतु किसी बयान या अन्य गतिविधि की बजाय नहीं अपितु इंडियन ओवरसीज काँग्रेस के अध्यक्ष पद पर दोबारा नियुक्ति को लेकर। उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि उन्होंने खुद होकर पद छोड़ा था न कि पार्टी ने हटाया था। इसके अलावा उन लोगों को नस्लीय सोच का बता दिया जिन्होंने उनके बयान की आलोचना की थी। काँग्रेस अपनी पार्टी से जुड़े संगठनों में किसको नियुक्त करे ये उसका अधिकार है किंतु जो व्यक्ति चुनाव के दौरान विवादास्पद बयान देने के कारण पार्टी के लिए असहनीय हो गया था और उसके बचाव के लिए कोई आगे नहीं आया हो उसे चुनाव समाप्त होते ही पुनः उसी पद पर नियुक्त कर देने से श्री मोदी के आरोपों की पुष्टि हो गई है। वैसे भी ये पहला मौका नहीं है जब उन्होंने विवादित बयान देकर पार्टी को मुश्किल में डाल दिया। बीते वर्षों में  राम मन्दिर और  पुलवामा पर की गईं उनकी टिप्पणियां आलोचना का पात्र बनीं। इसी तरह 84 के सिख दंगों पर हुआ तो हुआ जैसा कटाक्ष  सिख समुदाय की नाराजगी की वजह बना। वहीं संविधान के निर्माण में डाॅ. आंबेडकर से ज्यादा भूमिका पण्डित नेहरू की थी जैसे बयान से दलित समुदाय में रोष फैला। उनके तकनीकी ज्ञान और पेशेवर दक्षता पर कोई संदेह किये बिना ये कहा जा सकता है कि ऐसे गैर राजनीतिक सलाहकारों के कारण ही पहले राजीव गाँधी और डाॅ. मनमोहन सिंह के हाथ से सत्ता खिसकी। अब वे राहुल के बेहद नजदीकी बने हुए हैं। उनकी पुनर्नियुक्ति से काँग्रेस के सामने यह सवाल आ खड़ा हुआ है कि क्या चुनाव खत्म होते ही श्री पित्रौदा के वे बयान फायदेमंद हो गए जिनके कारण उन्हें हटना पड़ा या हटाया गया था। और ये भी कि क्या काँग्रेस पार्टी उनके उन बयानों से अब सहमत हो गई जो चुनाव के समय उसे नुकसानदायक प्रतीत हो रहे थे। उनकी पुनर्नियुक्ति से ये लगता है कि श्री गाँधी के करीबी होने के कारण  श्री पित्रौदा को अभयदान मिलता रहा है । लेकिन इस तरह के व्यक्ति अक्ल के अजीर्ण से ग्रसित होने के कारण परेशानी का सबब बन जाते हैं। भविष्य में भी वे पार्टी के लिए मुसीबत नहीं बनेंगे इसकी गारंटी कौन देगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 26 June 2024

पहले मुकाबले में एनडीए भारी पड़ा : काँग्रेस की रणनीति फुस्स साबित हुई

कसभा अध्यक्ष पद के लिए मुकाबले की स्थिति बन जाने का अर्थ ये निकला  कि चुनाव के दौरान उत्पन्न कटुता आगे भी जारी रहेगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा आम सहमति बनाने के लिए की गई बैठक में काँग्रेस ने  शर्त रखी  कि उपाध्यक्ष पद दे दो तो अध्यक्ष के लिए सत्ता पक्ष के उम्मीदवार को सर्व सम्मति से चुन लिया जाएगा। समझौता न होने के दो कारण सामने आये । पहला ये कि राजनाथ सिंह ने लौटकर फोन नहीं किया और दूसरा यह कि भाजपा द्वारा ओम बिरला का नाम सामने लाने से काँग्रेस सहित विपक्ष बिदक गया। और उसकी ओर से केरल के वरिष्ट सांसद  के. सुरेश को उतारकर  मुकाबले की स्थिति बना दी गई। विपक्ष का मानना था कि  ध्वनि मत की बजाय मतपत्र से चुनाव होने पर एनडीए के कुछ सांसद  भीतरघात करेंगे। हालांकि श्री बिरला की ओर से 10 सेट नामांकन के भरे जाने से  एनडीए की एकजुटता सामने आ गई थी वहीं श्री सुरेश केवल 3 नामांकन सेट ही दाखिल कर पाए। उस पर भी तृणमूल काँग्रेस ने इसे इकतरफा निर्णय बताते हुए काँग्रेस की चौधराहट स्वीकार नहीं करने का संकेत दे दिया। ये इस बात का प्रमाण है कि ममता इंडिया गठबंधन में अपनी शर्तों पर रहेंगी। दरअसल काँग्रेस इस मामले में जल्दबाजी कर गई। पहले तो उसने प्रोटेम स्पीकर पर  विवाद खड़ा कर सत्ता पक्ष को नाराज किया साथ ही उपाध्यक्ष पद की शर्त रखते हुए अध्यक्ष  के चुनाव में टकराव का इशारा कर दिया। यही नहीं तो तेलुगु देशम को अध्यक्ष पद के लिए समर्थन का लालच देकर एनडीए से बाहर आने भी उकसाया । लेकिन इस सबसे भाजपा चौकन्नी हो गई और उसने तेलुगु देशम तथा जनता दल (यू) द्वारा अध्यक्ष पद हेतु बनाये जा रहे कथित दबाव को खत्म करते हुए श्री बिरला को ही दोबारा अध्यक्ष बनाने की बिसात बिछाई और काँग्रेस को उपाध्यक्ष पद हेतु कोई आश्वासन न देकर अपना आत्मविश्वास प्रकट कर दिया । चर्चा है पिछली दो लोकसभा की तरह इस बार भी  उपाध्यक्ष नहीं होगा किंतु गठबंधन में संतुलन के लिए जरूरी लगा तो सहयोगी दल के किसी सांसद को इस पद पर बिठा दिया जाएगा। इस मामले में काँग्रेस नेतृत्व की अपरिपक्वता एक बार उजागर हो गई क्योंकि उसने लोकसभा चुनाव के नतीजों के फ़ौरन बाद अध्यक्ष के चुनाव के लिए सत्ता पक्ष में तोडफ़ोड़ करने का जो दांव चला वह कारगर नहीं हो सका। उलटे तृणमूल काँग्रेस की नाराजगी सामने आने से विपक्ष में बिखराव  का संकेत मिल गया।  हालांकि बाद में राहुल गाँधी द्वारा ममता से बात किये जाने पर वे मान तो गईं किंतु उन्होंने ये नसीहत तो दे ही दी कि वे तृणमूल को हल्के में न लें। असल में राहुल से ममता की नाराजगी की एक वजह चुनाव बाद उनके द्वारा बधाई देने के लिए किया फोन नहीं उठाना और न ही  पलटकर फोन करना भी है। काँग्रेस इन दिनों जिस प्रकार अखिलेश यादव को महत्व दे रही है उससे भी उनको तकलीफ है। बहरहाल, काँग्रेस का सारा बड़बोलापन धरा रह गया जब ओम बिरला ध्वनि मत से ही निर्वाचित हो गए और विपक्ष मत विभाजन की मांग करने का साहस तक न जुटा सका। इस प्रकार सत्तारूढ़ एनडीए ने इंडिया गठबंधन से नये सदन में पहले शक्ति परीक्षण में सफलता ही हासिल नहीं की अपितु ये भी स्पष्ट कर दिया कि विपक्ष के पास अच्छे रणनीतिकारों की कमी है। वरना वह बिना शर्त लगाए अध्यक्ष के लिए श्री बिरला का समर्थन कर देता और उनके निर्वाचन के बाद फिर उपाध्यक्ष पद हेतु दावा करता। उस स्थिति में यदि सत्ता पक्ष नहीं मानता तब उसे आलोचना का शिकार होना पड़ता। लेकिन पहले प्रोटेम स्पीकर के चयन में अनावश्यक तौर पर दलित का मुद्दा उठाना, फिर अध्यक्ष पद के लिए समर्थन के बदले उपाध्यक्ष की सौदेबाजी करना और अंततः ध्वनि मत से श्री बिरला के चुने जाने पर मत विभाजन की मांग नहीं करने से ये बात सामने आ गई कि विपक्ष में दिखावटी हौसला कितना भी हो लेकिन हिम्मत का अभाव है। विपक्ष को डर था कि मतदान की स्थिति में उसके कुछ वोट श्री बिरला के पक्ष में  जा सकते हैं। दूसरी बार अध्यक्ष बनकर श्री बिरला ने स्व. बलराम जाखड़ की बराबरी कर ली जिनको बतौर अध्यक्ष दो  कार्यकाल मिले। वे अनुभव संपन्न होने के साथ कड़क भी हैं। सदन का संचालन करने में अनुभव काफी मददगार होता है। हालांकि विपक्ष की बेंचों पर इस बार ज्यादा सांसद हैं । इंडिया गठबंधन के तौर पर उनकी ताकत और बढ़ गई है जिससे आसंदी का काम कठिन होगा किंतु वे उस स्थिति से कुशलता पूर्वक निपट सकेंगे ये उम्मीद है। इस चुनाव में मिली विफलता से विपक्ष को यह सीखना चाहिए कि बिना पर्याप्त तैयारी और ताकत के मुकाबले में उतरना बुद्धिमत्ता नहीं होती। अपना अध्यक्ष चुनवाकर भाजपा ने सहयोगी दलों को भी ये एहसास करवा दिया कि उसका संख्याबल  भले ही कम हुआ किंतु मनोबल यथावत है । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

आपातकाल ने भारतीय राजनीति की चाल , चरित्र और चेहरा बदल डाला


50 बरस पहले 25 और 26 जून 1975 की दरम्यानी रात भारत में तख्ता पलट जैसी घटना घटी | लेकिन ये तख्ता पलट किसी सत्ताधीश का न होकर इस देश के लोकतंत्र का था | 12 जून 1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा  1971 के लोकसभा  चुनाव में रायबरेली सीट का चुनाव रद्द किए जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता  बचाये रखने के लिए संसदीय लोकतन्त्र को ही बंधक बना लिया |

आपातकाल लगाकर समूचे विपक्ष को जेल में भेजने के साथ ही उन्होंने समाचार माध्यमों पर सेंसर लगाकर लोकतंत्र की आवाज बंद कर दी | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरे बिठाते हुए जीवन सहित सभी मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए | विपक्ष से वंचित संसद राग दरबारी का मंच बन गई | इन्दिरा जी को ही इण्डिया बताने जैसी  भाटगिरी तक हुई | और भी बहुत कुछ ऐसा हुआ जो लोकतंत्र के माथे पर काले धब्बे से कम नहीं  कहा जा सकता | 1977 की  जनवरी में श्रीमती गांधी ने लोकसभा चुनाव का ऐलान कर  दिया |  उन्हें विश्वास हो चला था  कि आपातकाल के बीते डेढ़ साल में जनता को भी विपक्ष से विरक्ति हो गई होगी क्योंकि देश तो सुचारू रूप से चल ही रहा था | आचार्य विनोबा भावे उसे अनुशासन पर्व  नामक चरित्र प्रमाण पत्र भी प्रदान कर चुके थे |

लेकिन जब दो माह बाद चुनाव हुए तब देश ने इंदिरा गांधी को बुरी तरह हराकर लोकतंत्र का पुनः राजतिलक किया | आपस में एक दूसरे की टांग खींचने वाली तमाम गैर कांग्रेसी पार्टियां जनता पार्टी के नाम से मैदान में उतरीं और जनता ने आजाद हिन्दुस्तान में पहली बार केन्द्रीय सत्ता से कांग्रेस को उतार  फेंका । इंदिरा जी  द्वारा आपातकाल लगाने जैसी भयंकर भूल किये जाने का परिणाम विपक्षी एकता के साथ ही जनता के मन में सत्ता परिवर्तन के साहस के तौर पर सामने आया | वह निश्चित रूप से ऐतिहासिक बदलाव था |

हालांकि प्रखर समाजवादी नेता डा. राममनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का जो सिद्धांत दिया उसके अनुसार 1967 से देश में विपक्ष की अनेक सरकारें बनीं किन्तु वह प्रयोग राज्यों तक ही सीमित रहा और विपक्ष की दर्जनों छोटी - बड़ी पार्टियों में कोई समन्वय और वैचारिक साम्य न  होने से राज्यों में बनी संयुक्त सरकारें जल्द ही  अपने अंतर्विरोधों के चलते जैसे बनीं ,  वैसे ही चलती बनीं | लेकिन इससे एक सबक विपक्ष को  जरुर मिल गया कि उनकी एकजुटता कांग्रेस पर भारी पड़ सकती है | साथ ही जनता के मुंह को भी सत्ता परिवर्तन रूपी स्वाद लग गया |

आपातकाल ने मजबूरी में ही सही एक अवसर विपक्ष के सामने परोसकर रख दिया और जेलखाने में रहते हुए उन सभी को ये बात समझ में आ गयी कि  चाहे - अनचाहे एक होना पड़ेगा | और वैसा करना कारगर भी  रहा | समूचे उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया | इंन्दिरा जी और आपातकाल के शिल्पकार कहे  जाने वाले उनके पुत्र संजय गांधी क्रमशः रायबरेली और  अमेठी से हार गये |

नई - नवेली जनता पार्टी सत्ता में आ गयी | मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बन गए | लेकिन सत्ता  की अतृप्त कामना  एक बड़े अवसर को इतिहास के कूड़ेदान में फेंकने का कारण बनने लगीं | 27 महीने बाद ही जिन इंदिरा जी और संजय गांधी की तानाशाही के विरुद्ध विपक्षी एकता का जन्म हुआ उन्हीं  ने कुछ लोगों की महत्वाकांक्षाएँ जगाते हुए दाना फेंका और चौधरी चरण सिंह जैसा अनुभवी राजनेता उसकी लालच में दौड़ पड़ा | यही नहीं तो गैर कांग्रेसवाद का गुरुमंत्र लेकर सियासत की पाठशाला से निकले लोहिया जी के चेले तक कांग्रेस की गोद में जाकर बैठ गये | फिर  होना क्या था , मोरार जी सरकार गिर गयी | चौधरी साहब प्रधानमन्त्री बन तो गये लेकिन चंद रोज बाद ही कांग्रेस ने अपना असली रूप दिखाते हुए उनको दी गई  समर्थन नामक बैसाखी खींच ली | वह सरकार भी चलती बनी |

नये चुनाव हुए और इंदिरा जी पुनः सत्ता में लौट आई | आपातकाल का विरोध करने वाले आपस में ही लड़ मरे जिससे आपातकाल लगाने का अपराध जनता की अदालत में बेअसर होकर रह गया ।  इंदिरा जी ने लोकतंत्र की हत्या का जो प्रयास किया वह केंद्र में पहली बार हुए सत्ता परिवर्तन के साथ ही विपक्षी फूट का नया प्रमाण बनकर सामने आया | यही नहीं तो  गैर कांग्रेसवाद का जनाजा भी निकल गया | कांग्रेस ने भी श्रेष्ठता के भाव को त्यागकर दूसरे दलों के साथ गठबन्धन करने की व्यवहारिकता सीखी |

उसके बाद का एक दशक कांग्रेसी सत्ता का रहा | 1984 में इंदिरा  जी की नृशंस हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने किन्तु एक बार सत्ता का खून मुंह में लग जाने के कारण विपक्षी एकता रूपी काठ की हांडी फिर आग पर चढ़ी तथा 1989 के चुनाव  में राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस दोबारा सत्ता से बाहर हुई और उसी से निकले विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमन्त्री बन बैठे | लेकिन उनके चयन से ही विवाद सतह पर आ गया | लोहिया जी के चेलों ने मौके का लाभ लेकर मंडल कार्ड खेला तो भाजपा राम मन्दिर के मुद्दे के साथ मैदान में कूद पड़ी | उसके समर्थन वापिस लेने से  11 महीने में विश्वनाथ प्रताप चलते बने |  व्यक्तित्वों के टकराव और सत्ता की प्यास ने जनता पार्टी वाला वृतान्त दोहरा  दिया | कांग्रेस ने अपना पुराना दांव आजमाया और इस बार चन्द्रशेखर की  लार टपक पड़ी जो विश्वनाथ प्रताप और देवीलाल की चालबाजी से प्रधानमन्त्री बनते - बनते रह गये थे | अंततः  वे राजीव गांधी का सहारा लेकर सत्ता में आ तो गये किन्तु जल्द ही  वे भी चौधरी साहब की तरह से ही निपटाए गए | नये चुनाव के दौरान राजीव की हत्या हो गई | कांग्रेस सबसे बड़े  दल के रूप में उभरी और बाहरी समर्थन से सरकार बना ली | लेकिन ये पहला अवसर था जब कांग्रेस उन विपक्षियों का समर्थन लेकर सत्ता में आई जिनका वह मजाक उड़ाया करती थी | वह दौर आते तक भारतीय राजनीति में राजनीतिक गठबन्धनों की नई - नई परिभाषाएं गढ़ी जाने लगीं | वैचारिक मतभेद गुजरे ज़माने की बातें हो गईं | पीवी नरसिम्हा राव की  वह सरकार कहने को तो पांच साल चली किन्तु कांग्रेस  के पाँव उखड़ने लगे |

1996 में तेरह दिन के लिए अटल बिहारी  वाजपेयी प्रधानमन्त्री बने लेकिन विपक्ष का ही बड़ा हिस्सा उनके विरोध में आ गया | उनके बाद कांग्रेस के समर्थन से पहले एचडी देवगौड़ा की सरकार बनी लेकिन कांग्रेस ने कोई बहाना  बनाकर उसे चलता किया और तब इंदर कुमार गुजराल ढूंढ़कर निकाले गये | लेकिन कांग्रेस ने उन्हें भी नहीं टिकने दिया और 1998 में देश पर फिर चुनाव लाद दिए गये | लेकिन अस्थिरता बनाये रखने के कारण कांग्रेस जनता की नजरों से गिरती गयी जिसका लाभ राममन्दिर आन्दोलन से लगातार ताकतवर होती गई भाजपा को मिला और वह 180 सीटें ले आई | जिन समाजवादियों ने कभी दोहरी  सदस्यता के नाम पर जनता पार्टी सरकार गिरवा दी थी उनमें से अनेक श्री वाजपेयी के उदारवादी चेहरे से प्रभावित होकर उनकी सरकार बनाने में सहायक बन गये | इनमें 13 दिन की  सरकार को गिरवाने वाले भी थे | लेकिन तब तक भाजपा जरूरी और मजबूरी दोनों बन चुकी थी | वाजपेयी जी भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनका कांग्रेस से कभी सम्बन्ध नहीं रहा परन्तु नाटकीय घटनाक्रम में मात्र 13 महीने बाद अविश्वास प्रस्ताव पर बसपा द्वारा वायदा खिलाफी किये जाने से एक मत से वह सरकार गिर गयी किन्तु मध्यावधि के पहले कारगिल हो गया  और उसमें भारत की जीत वाजपेयी सरकार की  वापिसी का कारण  बन गई |

इस बार उनने  पूरे पांच साल सरकार चलाते हुए कांग्रेस के इस आरोप को गलत साबित कर  दिया कि विपक्ष स्थायी सरकार नहीं  दे सकता | यद्यपि बतौर प्रधानमन्त्री शानदार छवि के बाद भी अटल जी की ऊर्जा सहयोगियों के नखरे  उठाने में खर्च होती रही वरना वे और भी प्रभावशाली हो सकते थे | 2004 में सत्ता उनके हाथ से खिसकी तो फिर दस साल तक कांग्रेस के डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमन्त्री बने रहे किन्तु पूर्ण बहुमत के अभाव में कांग्रेस को दूसरे दलों के साथ यूपीए नामक गठबंधन बनाना पड़ा जिसे वामपंथियों तक का बाहरी समर्थन मिला | वहीं वाजपेयी सरकार में रहे कुछ समाजवादी भी सत्ता से आकर जुड़ गये |

वाजपेयी युग समाप्त होने के बाद विपक्ष के पास कोई चमकदार चेहरा नहीं होने से 2009 में भी मनमोहन सिंह  वापिस लौटे और वह  भी पहले से ज्यादा सीटों के साथ | वामपंथी तब तक दूर जा बैठे थे किन्तु गठबन्धन पूरे पांच वर्ष चला परन्तु मनमोहन सरकार पर गांधी परिवार नामक रिमोट से चलने का  आरोप लगने लगा | भ्रष्टाचार के चर्चित काण्ड उजागर हुए | इन सबसे  व्यक्तिगत ईमानदारी के बावजूद वे  कमजोर  प्रधानमंत्री के रूप में अलोकप्रिय होते गए | और तभी भाजपा ने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में छाप छोड़ने वाले नरेन्द्र मोदी को पेश कर दिया | उसका नतीजा 2014 के चुनाव  में भाजपा को अपने दम पर मिले बहुमत के रूप में सामने आया और पांच साल बाद तो  300 से ज्यादा सीटें जीतकर श्री मोदी अब तक के सबसे ताकतवर  गैरकांग्रेसी प्रधानमन्त्री बनकर उभरे |

लेकिन इस लम्बे इतिहास से  एक बात सामने आई कि 1977 में केंद्र की सत्ता में हुए परिवर्तन के बाद देश में राजनीतिक गठबन्धन  वैचारिक आधार पर न होकर सुविधा के समझौतों पर आकर टिक गये | कौन कब किससे गठबन्धन कर लेगा और कब अलग हो जाएगा ये नीति नहीं वरन नीयत पर निर्भर करने लगा है | भाजपा ने पीडीपी के साथ सरकार बनाई तो सपा और बसपा एक साथ हो लिए | कांग्रेस बंगाल में सीपीएम के साथ लड़ी लेकिन उसी समय केरल में दोंनों आमने  - सामने आ गये | महाराष्ट्र में कांग्रेस को शिवसेना की  साम्प्रदायिकता से परहेज नहीं  रहा वहीं आन्ध्र में चन्द्र बाबू नायडू उसके साथी बन बैठे | बिहार में नीतीश ने लालू से लड़ने भाजपा को पकड़ा फिर उसे छोड़ अकेले चले | सफलता हाथ नहीं आने  पर फिर लालू के साथ मिलकर सत्ता में लौटे किन्तु  दोबारा उसी भाजपा के साथ गलबहियां किये हुए हैं |

इस प्रकार आपातकाल के बाद का राजनीतिक परिदृश्य सिद्धांतविहीन राजनीति का दौर लेकर आया | बीते दो दशकों  में मंडल और मंदिर की बजाय साम्प्रदायिकता विरोधी मोर्चा बनता - बिगड़ता रहा और इधर कुछ सालों से समूचा राजनीतिक विमर्श मोदी समर्थन और मोदी विरोध में आकर सिमट गया है | कांग्रेस अपना आधार तेजी से गंवाती जा रही है | एक ही परिवार पर निर्भरता ने उसका वास्तविक स्वरूप ही नष्ट कर दिया | भाजपा का वैचारिक विरोध करने में केवल वामपंथी ही सक्षम थे किन्तु वे जनता से कटते चले गये | मजदूर और किसान दोनों  उनके हाथ से खिसक चुके हैं | और फिर उनकी राजनीति खीज से भरपूर होने से आकर्षण खो बैठी | विपक्ष में कौन किसके साथ और कौन किसके विरुद्ध है ये कोई नहीं बता सकता | भाजपा अपने स्वर्णयुग में पहुंचकर भी अपनी वैचारिक पवित्रता को बनाये नहीं रख सकी | और धीरे - धीरे उसी व्यक्तिवादी राजनीति में लिप्त हो चुकी है जिसके लिए वह दूसरों को कोसा करती थी |

आजाद भारत की  राजनीति इस प्रकार तीन कालखंडों में विभाजित की जा सकती है | पहला 47 से 77, दूसरा 77 से 2014 और तीसरा उसके बाद से जो जारी है | इन तीनों में राष्ट्रीय राजनीति में बड़े चारित्रिक बदलाव हुए | उसकी दिशा और दशा जिस तरह बदलती  गई उसकी वजह से राजनेताओं का सम्मान और साख दोनों घटते जा रहे हैं |

शासन करते हुए कौन सफल रहा कौन नहीं ये उतना बड़ा मुद्दा नहीं बचा | चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने में संकोच नहीं रहा | यहाँ तक कि राजनीतिक हित राष्ट्रीय हितों पर भारी पड़ने लगे हैं | देश पहले से विकसित हुआ है तथा  दुनिया में उसकी ताकत बढ़ी है लेकिन राजनीति और राजनेताओं की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता का अवमूल्यन रुकने का नाम नहीं ले रहा |

हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव ने मुस्लिम ध्रुवीकरण का जो उदाहरण पेश किया उसके बाद राजनीति क्या करवट लेती है? गत दिवस लोकसभा में शपथ लेते समय असदुद्दीन ओवैसी द्वारा जय फलस्तीन का नारा लगाया जाना इस ध्रुवीकरण से उपजे साहस का प्रमाण है। 

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  आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 25 June 2024

25 जून : संविधान को सूली पर चढाए जाने की बरसी

ज 25 जून है | कहने को ये एक तिथि  मात्र है परंतु  आजाद भारत में ये तारीख बेहद महत्वपूर्ण है | आधी सदी पहले आज ही अर्ध रात्रि  के समय उस वक्त की  प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने संविधान और लोकशाही  की हत्या का घिनौना प्रयास किया था | इसके पहले 12 जून  1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से श्रीमती गांधी  के विरुद्ध 1971 का लोकसभा चुनाव लड़े समाजवादी नेता स्व. राजनारायण की चुनाव याचिका मंजूर करते हुए उस चुनाव को अवैध  करार दिया | न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा  के उस फैसले ने राजनीतिक भूचाल ला दिया | 1971 के लोकसभा चुनाव ने इंदिरा जी को राजनीतिक तौर पर बेहद ताकतवर बना दिया था |  बांग्ला देश के  निर्माण के बाद  तो पूरे विश्व में उनकी प्रशस्ति फैल गई। | लेकिन  चुनाव अवैध घोषित हो जाने के कारण उनकी सत्ता  खतरे में पड़ गई | होना तो ये चाहिए था कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की खातिर वे त्यागपत्र दे देतीं | लेकिन हुआ इसके विपरीत। जगह -  जगह न्यायमूर्ति स्व. सिन्हा के पुतले जलाए जाने लगे। इंदिरा जी के उत्तराधिकारी के तौर पर उभर रहे उनके छोटे बेटे  स्व. संजय गांधी ने तो ये तक कहा कि करोड़ों मतदाताओं द्वारा चुनी हुई  प्रधानमंत्री को  एक न्यायाधीश भला कैसे हटा सकता है ? उधर विपक्ष इंदिरा जी से  इस्तीफे  की मांग करने लगा | ऐसे में विशाल बहुमत होते हुए भी श्रीमती गाँधी अलोकप्रिय होने लगीं | गुजरात से 1974 में प्रारंभ छात्र आन्दोलन बिहार होता हुए पूरे  देश में फैल चुका था। सर्वोदयी नेता  स्व. जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व करते हुए उसे सम्पूर्ण क्रांति का नाम दे दिया |  उसके अंतर्गत 6 मार्च 1975 को दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले से बोट क्लब तक जो सर्वदलीय रैली निकली उससे इंदिरा जी चिंतित हो उठीं। | संसद भी चल नहीं पा रही थी | कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता भी श्रीमती गांधी के रवैये और संजय के व्यवहार  से  रुष्ट थे | इस सबसे  इंदिरा जी चारों तरफ से घिर गईं और फिर  तब प्रजातंत्र को ही खत्म करने का पाप किया और 25 जून  1975 की आधी रात में जब  पूरा देश नींद में था तब तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगाने वाले  अध्यादेश पर हस्ताक्षर करवा लिए | सुबह होते तक जयप्रकाश नारायण , आचार्य कृपालानी , अटल बिहारी वाजपेयी , चौधरी चरण सिंह , लालकृष्ण आडवाणी , चन्द्रशेखर , मधु लिमये , राजनारायण , मधु दंडवते , नानाजी देशमुख , प्रकाश सिंह बादल आदि को तो गिरफ्तार किया ही गया किंतु  उनके अलावा देश भर से प्रदेश , जिला और तहसील  तक के विपक्षी नेता हिरासत में ले लिए गये | अभिव्यक्ति की आजादी के साथ ही  मौलिक अधिकार भी निलंबित कर दिए गए | समाचार पत्रों पर सेंसर  लगा दिया गया। जयप्रकाश बाबू के  आन्दोलन को देश  के लिए खतरा बताते हुए उनकी तुलना हिटलर से की गई| सरकार के प्रचार माध्यम ये माहौल बनाने लगे कि  विपक्ष जनता द्वारा चुनी श्रीमती गाँधी की सरकार को अपदस्थ करने का षडयंत्र रच रहा था | यद्यपि आपत्काल के औचित्य को साबित करने के लिए जमाखोरों, मुनाफाखोरों सहित अनेक  समाज विरोधी तत्वों  को भी गिरफ्तार  कर लिया गया | लेकिन इस सबका असली कारण अलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह  फैसला  ही था  |  19 महीने देश में श्रीमती गांधी की तानाशाही  चली | लोकसभा का कार्यकाल  एक वर्ष बढ़ाकर  उच्च न्यायालय का फैसला उलट दिया गया | जब लगा कि विपक्ष दम तोड़ बैठा है तब उन्होंने मार्च 1977 में लोकसभा  चुनाव करवाए  जिसमें कांग्रेस पराजित हुई और नई गठित जनता पार्टी की सरकार बन गयी |  यहाँ तक कि श्रीमती गांधी  रायबरेली और संजय  गांधी अमेठी से चुनाव हार गये | दुनिया के किसी देश के  प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए  संसद का चुनाव हारने का ये पहला अवसर था | हालांकि जनता पार्टी  सरकार भी आपसी खींचतान  के चलते  27 महीने में गिर गई और 1980 में इंदिरा जी की वापिसी हो गई | लेकिन आपातकाल रूपी अपराधबोध के कारण  वे  पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं  | आज जो लोग संविधान को खतरे में बताने का राग अलाप रहे हैं , वे इंदिरा जी द्वारा थोपे गये आपातकाल और उसके दौरान हुए अत्याचारों के बारे में पढ़ें और जानें तब उनको एहसास होगा कि 19 माह का वह दौर कितना भयावह था | हालंकि उस समय की  जनता बधाई की हकदार है जिसने  तानाशाही को उखाड़ फेंका | तबसे हमारा लोकतंत्र मजबूत तो हुआ लेकिन जनता पार्टी की लहर में ऐसे लोग भी प्रथम पंक्ति के नेता बन बैठे जिन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम पर प्रस्तुत व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प की धज्जियां उड़ाते हुए जातिवाद का जो  जहर फैलाया वही आज  भरतीय राजनीति की पहचान बन गया है | उस दृष्टि से  25 जून हर संविधान प्रेमी के लिए आत्मावलोकन का  दिन है | ये भी अजीब संयोग है कि उस आपातकाल के शिकार नेता और उनकी पार्टियां आज उसी कांग्रेस की सहयोगी  हैं जिसके माथे पर संविधान की हत्या का कलंक है | गत दिवस 18 वीं  लोकसभा के शुभारंभ पर काँग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित तमाम नेता संविधान की प्रति लेकर गए थे। देखना है संविधान को सूली पर चढाए जाने वाले दिन की बरसी पर उनके हाथ में क्या होगा?? 


-रवीन्द्र वाजपेयी