Wednesday, 4 December 2024

आयकर छूट की सीमा 10 लाख रु. की जाए


वित्तीय वर्ष 2025 - 26 के लिए केन्द्रीय बजट की तैयारियां सरकारी स्तर पर तेजी से चल रही हैं। मोदी सरकार ने बजट फरवरी में बजट पेश करने और 31 मार्च के पहले उसे पारित करवाने की जो परंपरा शुरू की उसके कारण अब बजट प्रावधानों के अनुसार आवंटन वित्तीय वर्ष शुरू से ही होने से बजट राशि का उपयोग समय रहते होने लगता है। परिणामस्वरूप विकास कार्यों की गति बढ़ी है। अन्यथा पुरानी व्यवस्था में विभिन्न विभागों को बजट राशि का आवंटन होते - होते जून आ जाता था। प्रत्यक्ष करों का भुगतान करने वाले संस्थान या व्यक्तियों को भी बजट जल्द प्रस्तुत होने से कर संबंधी योजना बनाने में आसानी हो गई है। ये भी सही है कि आयकर विभाग की कार्यप्रणाली में उल्लेखनीय सुधार होने से करदाताओं के मन में उसके प्रति व्याप्त खौफ कम हुआ है। रिटर्न भरने और अग्रिम कर जमा करने वालों के रिफण्ड की प्रक्रिया बेहद सरल और नौकरशाही के हस्तक्षेप से मुक्त होने का ही परिणाम है कि आयकर दाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि प्रति वर्ष देखने मिल रही है। परिणामस्वरूप आयकर की कुल वसूली भी सरकार की उम्मीद से अधिक हुई। इसके लिए सरकार द्वारा किये गये सुधारों को श्रेय देने के साथ ही करदाताओं की प्रशंसा करनी होगी जिन्होंने एक जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाते हुए अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में अपनी सहभागिता दी। जहाँ तक बात उद्योग - व्यवसाय की है तो उन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से अनेक प्रकार की रियायतें दी जाती हैं ।  लेकिन मध्यमवर्गीय करदाताओं की श्रेणी जिसमें कारोबारी और नौकरपेशा दोनों आते हैं, उन्हें आयकर की जो छूट  वर्तमान में मिल रही है उसे और बढ़ाया जाना चाहिए। ये बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि आज बाजार में जो रौनक है उसमें मध्यममवर्गीय उपभोक्ताओं का सबसे बड़ा योगदान है। बैंकों से आवास, वाहन, शिक्षा , घरेलू चीजों आदि के लिए कर्ज लेने वालों में भी इसी वर्ग की बहुतायत है। कहने का आशय ये है कि मध्यमवर्ग के बिना अर्थव्यवस्था की  कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसे में अब केंद्र सरकार को सोचना चाहिए कि आगामी बजट में इस तबके के लिए राहत का पिटारा खोले। अभी जो छूट की सीमा है वह समयानुकूल कम प्रतीत होती है। बतौर उपभोक्ता ये वर्ग सरकारी खजाने में जीएसटी के रूप में लगभग रोजाना अपना योगदान देता है। भारत का विशाल मध्यम वर्ग पूरी दुनिया के लिए आकर्षण बना हुआ है क्योंकि इसी के कारण भारत दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार के रूप में स्थापित हुआ है। भारत में आकर बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी उत्पादन इकाइयां भी इसी वजह से लगा रही हैं। ऑटोमोबाइल उद्योग को जो अकल्पनीय उड़ान मिली उसमें भी मध्यमवर्ग को  ही  श्रेय जाता है। भारतीय शेयर बाजार में जो चमक आई है उसके पीछे भी इसी की भूमिका है। बीच में जब दुनिया भर के शेयर बाजार लड़खड़ाने लगे और विदेशी निवेशकों ने अपनी पूंजी निकालना शुरू कर दिया तब भी  मध्यमवर्गीय निवेशक हिम्मत के साथ डटा रहा ।  जिससे वैश्विक स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की धाक और साख दोनों बढी। इसलिए इस वर्ग की क्रय शक्ति बढ़ाना बुद्धिमत्ता होगी। घरेलू पर्यटन उद्योग में जो रौनक नजर आती है उसका असली कारण भी मध्यमवर्ग ही है। यदि आयकर छूट की सीमा 10 लाख कर दी जाए तो भारत के उपभोक्ता और शेयर बाजार में जबरदस्त उछाल आना तय है और उससे सरकार दूसरे रास्ते से आयकर से ज्यादा कर अर्जित कर सकेगी। कोरोना के दौरान सभी आर्थिक विशेषज्ञ जनता के हाथ में पैसा देने की वकालत कर रहे थे जिससे उद्योग - व्यापार चलते रहें। उक्त सभी बिंदुओं के मद्देनजर आयकर छूट की सीमा 10 लाख रु. करना करदाता और सरकार दोनों के हित में रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 3 December 2024

विपक्षी गठबंधन की गाँठें ढीली पड़ने लगीं


संसद में चल रहे गतिरोध को खत्म करने संबंधी जो सहमति गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा आमंत्रित सर्वदलीय बैठक में बनी उससे एक बार फिर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी की किरकिरी हुई जो अमेरिका में उद्योगपति गौतम अडाणी पर दर्ज प्रकरण को मुद्दा बनाकर संसद में बहस के लिए अड़े हुए थे। चूंकि कांग्रेस में उनकी बात टालना किसी के लिए भी संभव नहीं है इसलिए दोनों सदनों में उसके सांसदों ने करवाई ठप्प कर रखी थी। सरकार ने  कांग्रेस की मांग पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया जिसके कारण बीते सप्ताह लोकसभा और राज्यसभा में कुल मिलाकर घंटे भर भी काम नहीं हो सका।  उ.प्र के संभल में मस्जिद के सर्वे  को लेकर हुए फसाद का मुद्दा संसद में  उठाने के लिए सपा उतावली थी । वहीं बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर तृणमूल कांग्रेस चर्चा चाह  रही है।कुछ अन्य दलों के सांसद मणिपुर सहित अन्य विषयों को उठाने की तैयारी किये बैठे थे किंतु शीतकालीन सत्र का प्रारंभिक सप्ताह हंगामे की भेंट चढ़ गया। गत दिवस लोकसभा अध्यक्ष की पहल पर सदन चलाने विपक्ष सहमत हो गया और आज कारवाई शुरू भी हुई किंतु कांग्रेस सांसदों ने इंडिया गठबंधन के कुछ सहयोगी दलों के साथ प्रदर्शन और नारेबाजी की। इसका नेतृत्व राहुल के साथ नवनिर्वाचित प्रियंका वाड्रा ने किया। लेकिन गठबंधन में कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा सांसदों वाली सपा और तृणमूल ने इस प्रदर्शन का बहिष्कार कर दिया। तृणमूल के एक सांसद ने यहाँ तक कह दिया कि अदाणी मुद्दा कांग्रेस का अपना  एजेंडा है। इस बारे में केन्द्रीय मंत्री किरण रिजजू का ये कहना काफी अर्थपूर्ण है कि सुविधाजनक बहुमत होने से सरकार सभी विधेयक बिना चर्चा के पारित करवा सकती है किंतु ऐसा करना उचित नहीं लगता। लेकिन इसे सत्ता पक्ष की सांकेतिक चेतावनी समझा जा सकता है। बहरहाल अदाणी मुद्दे पर एक बार फिर राहुल इंडिया गठबंधन में हाशिये पर जाने मजबूर हो गए हैं। चूंकि उन्होंने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया इसलिए पीछे हटना उनके लिए मुश्किल हो गया है। गठबंधन के कुछ छोटे घटक दल जरूर उनके साथ नजर आ रहे हैं परंतु सपा और तृणमूल का दूर खड़ा रहना  दर्शाता है कि वे राहुल की अपरिपक्व कार्यप्रणाली से ऊबने लगे हैं। दरअसल इसके पीछे अखिलेश यादव और ममता बेनर्जी के अपने - अपने राज्यों के राजनीतिक समीकरण हैं। प. बंगाल में ममता ने एकला चलो की नीति अपना रखी है जिसकी वजह से वहाँ कांग्रेस और वामपंथी दलों की  स्थिति दयनीय हो गई है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस  नेता अधीर रंजन चौधरी को ममता ने गुजरात से बुलाये क्रिकेटर युसुफ पठान से हरवा दिया। 2026 में राज्य विधानसभा के चुनाव हैं इसलिए सुश्री बेनर्जी अभी से कांग्रेस को ठेंगा दिखाने में जुटी हुई हैं। यही सोच सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की है। राहुल के साथ गठबंधन के खट्टे - मीठे अनुभवों के बाद वे इस बात को भांप गए हैं कि उ.प्र में कांग्रेस भविष्य में उनके लिए बोझ बन जायेगी। हाल ही में संपन्न 9 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे पर खटास पैदा हो गई थी। कांग्रेस को जब मनमाफिक सीटें नहीं मिलीं तो उसने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। मजबूरन सपा को सभी 9 सीटों पर उम्मीदवार उतारने पड़े किंतु कांग्रेस ने चूंकि सपा उम्मीदवारों का सहयोग नहीं किया इसलिए 7 सीटों पर उसे हार  झेलनी पड़ी और लोकसभा चुनाव के बाद अखिलेश का ग्राफ जिस तेजी से उठा वह नीचे आ गया। महाराष्ट्र में भी सपा की इच्छानुसार सीटें कांग्रेस ने नहीं दीं। सही बात ये है कि हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव के बाद ममता और अखिलेश ही नहीं उद्धव ठाकरे को भी कांग्रेस की संगत अखरने लगी है। विशेष रूप रूप से राहुल की गैर जिम्मेदार कार्यशैली से इंडिया गठबंधन के अनेक दल नाराज हैं। उद्धव के करीबी संजय राउत ने तो कहा भी कि यदि उनकी पार्टी अलग होकर लड़ती तब बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी। इन्हीं सब बातों का असर संसद में राहुल की जिद से पैदा हुए गतिरोध से तृणमूल और सपा का पल्ला झाड़ लेने के तौर पर दिखाई दे रहा है। हालांकि इसे इंडिया गठबंधन के विघटन की शुरुआत कहना तो जल्दबाजी होगी लेकिन एक बात साफ है कि श्री गाँधी ये भूल जाते हैं कि गठबंधन चलाने के लिए समन्वय बनाकर चलना जरूरी होता है। उनके इकतरफा  निर्णय को बाकी सहयोगी दल भी आँख मूंदकर स्वीकार कर लें ये हमेशा संभव नहीं क्योंकि सब अपने प्रभाव क्षेत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं। भारत जोड़ो यात्रा से राहुल की जो छवि बनी उससे प्रभावित होकर विपक्षी दलों को उनमें नरेंद्र मोदी का विकल्प महसूस होने लगा था। लेकिन तीसरी बार उनके प्रधानमंत्री बन जाने से वह भरोसा कम हो गया। बाकी कसर पूरी कर दी हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजों ने। ये देखते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि गठबंधन की गाँठें ढीली पड़नी शुरू हो गई हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 December 2024

जीएसटी की बढ़ती वसूली के बाद भी जनता को राहत नहीं


बीते नवम्बर माह में जीएसटी वसूली 1.82 लाख करोड़ पहुँच जाना अर्थव्यवस्था के नजरिये से बेहद उत्साहजनक है। ये आंकड़ा गत वर्ष इसी माह हुए संग्रह से 8.5 प्रतिशत ज्यादा है। इससे स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता बाजार , वार्षिक विकास दर की अपेक्षा ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। यद्यपि दीपावली अक्टूबर माह में पड़ने के कारण बाजारों में जमकर खरीदी होने से भी इस माह का आंकड़ा अधिक रहा।  इस वर्ष  अब तक 19.74 लाख करोड़ रु. का जीएसटी वसूल होना उत्पादन और खफत दोनों के लिहाज से सुखद संकेत है। विश्व की  प्रामाणिक वित्तीय एजेंसियों द्वारा 2024 - 25 में  भारत की वार्षिक विकास दर का जो अनुमान लगाया जा रहा है उसके अनुसार वह 7 फीसदी से अधिक भी रह सकती है। और यदि ऐसा हो सका तब यह दुनिया भर में सबसे ज्यादा होगी। जीएसटी के अलावा प्रत्यक्ष करों की वसूली में भी जबरदस्त वृद्धि होने का अर्थ है कि लोगों का विश्वास सरकार में बढ़ा है । आयकर विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार  से भी लोगों में विवरणी भरने के प्रति उत्साह जाग्रत हुआ है। आयकर रिफंड विवरणी भरने के  बाद बहुत ही कम समय में आयकर दाता तक पहुँचने लगे हैं । उस वजह से लोगों की अग्रिम कर जमा करने के प्रति नाराजगी कम हुई है।  इसी तरह राजमार्गों पर प्रतिदिन वसूल होने वाले टोल टैक्स के आंकड़े भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अर्थव्यवस्था के पहिये तेज रफ्तार से दौड़ रहे हैं।   लेकिन इतनी आशाजनक स्थिति के बावजूद भी आम जनता को राहत देने के बारे में जीएसटी काउंसिल बेहद कंजूस  है। छोटा सा उदाहरण स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर लगने वाले जीएसटी का है। बढ़ते चिकित्सा खर्च के कारण लोगों में स्वास्थ्य बीमा कराने का चलन बढ़ा है किंतु उस पर 18 फीसदी की दर से जीएसटी लगाना अमानवीय है। केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने  पत्र लिखकर इसे घटाने कहा। जिस पर  काउंसिल ने सैद्धांतिक सहमति तो दे दी जिसका कारण केंद्र सरकार के एक वरिष्ट मंत्री द्वारा लिखा पत्र था किंतु उसे भी टाला जाता रहा। खबर है दिसंबर की बैठक में 5 लाख तक के स्वास्थ्य और जीवन बीमा पर जीएसटी की दर कम करने का निर्णय काउंसिल करेगी किँतु इससे अधिक राशि के बीमा पर वह 18 फीसदी ही रहेगी जो कि पूर्णतः अनुचित है। 5 लाख से कम की बीमा पाॅलिसी पर यदि जीएसटी पूरी तरह खत्म कर दिया जाए तब भी ये लगेगा कि काउंसिल में बैठे वित्त मंत्रियों में जनता के प्रति कुछ संवेदनशीलता  है। आश्चर्य इस बात का है कि जो विपक्षी दल जीएसटी को लेकर केंद्र सरकार पर आक्रामक बने रहते हैं उनके शासित राज्यों के वित्त मंत्री भी जब काउंसिल की बैठक में आते हैं तब जनता को लूटने में वे भी अन्य पार्टियों के नुमाइंदों की तरह पेश आते हैं। बीमा के अलावा भी अनेक सेवाएं और वस्तुएँ हैं जिन पर जीएसटी की दरें घटनी चाहिए। काउंसिल को ये बात  समझनी होगी कि जीएसटी की अधिक दरें कर चोरी को प्रोत्साहित करती हैं।  जब जीएसटी लागू हुआ तब ये आश्वासन दिया गया था कि भविष्य में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस भी इसके दायरे में लाये जाएंगे किंतु आज तक वह हवा में टँगा हुआ है।   इसी तरह जीएसटी की  एक या अधिकतम दो दरें रखने पर भी सहमति के स्वर सुनाई देते थे। लेकिन उसकी चर्चा तक अब सुनाई नहीं देती। मुद्दे और भी हैं किंतु जिस पैमाने पर जीएसटी की वसूली हर माह बढ़ती जा रही है उसे देखते हुए करों की दरें कम होने के साथ ही पेट्रोल - डीजल को भी उसके अन्तर्गत लाना अपेक्षित है जो अभी सरकारी मुनाफाखोरी का शिकार हैं। काउंसिल के सदस्यों को ये बात मालूम होना चाहिए कि करों की दरों को कम रखने के अलावा उसके ढांचे में जटिलता न होने से उद्योग - व्यवसाय और उपभोक्ता सभी कर देने प्रोत्साहित होते हैं। इसीलिए विकसित देशों में जीएसटी की एक या दो दरें ही हैं। जिस दिन हमारे हुक्मरान इस सच्चाई को स्वीकार कर लेंगे , कर वसूली का आंकड़ा उनकी कल्पना से भी ज्यादा हो जाएगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 30 November 2024

खरगे जी में बड़ा बदलाव करने का न तो साहस है और न ही हैसियत


कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे अनुभवी राजनेता हैं। गाँधी परिवार के प्रति  वफादारी ही उन्हें इस पद पर लेकर आई। यद्यपि उनका बेटा कर्नाटक में मंत्री है किंतु खरगे जी को अपने गृहराज्य का मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला।राष्ट्रीय अध्यक्ष पद भी उन्हें बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा की तर्ज पर मिला क्योंकि राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने  गाँधी परिवार को धता बताते हुए  अध्यक्ष बनने के लिए सत्ता छोड़ने से एन वक़्त पर इंकार कर दिया था। अध्यक्ष बनने के बाद भी वे स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पाते। यही वजह है राज्यों के कांग्रेस संगठनों की हालत बेहद खराब होती जा रही है। कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में सरकार बना लेने के बाद कांग्रेस में जो उत्साह पैदा हुआ वह लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद और बढ़ गया। यद्यपि उसका श्रेय राहुल गाँधी के खाते में गया जिस पर किसी को न आश्चर्य हुआ और न ही ऐतराज क्योंकि पार्टी का चेहरा वही थे। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को दो बड़े झटके लगे। पहला हरियाणा और दूसरा महाराष्ट्र में।  कांग्रेस को उम्मीद थी कि वह  हरियाणा और महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराकर भाजपा को पटकनी देने में सफल होगी। लेकिन जब परिणाम आये तब उसको सांप सूंघ गया। गाँधी परिवार दो राज्यों में मिली जबरदस्त पराजय के लिए दुखी होने के बजाय  प्रियंका वाड्रा के लोकसभा सदस्य बन जाने के जश्न में डूबा है। बहरहाल हार की समीक्षा के लिए पार्टी के बड़े नेताओं की बैठक में खरगे जी ने जो कहा वह राजनीतिक जगत में चर्चा का विषय बन रहा है। उन्होंने  चुनाव लड़ने के तरीके पर उंगली उठाते हुए आगाह किया कि अच्छे माहौल से संतुष्ट होकर बैठ जाना नुकसानदेह साबित होता है। साथ ही पार्टी के भीतर गुटबाजी पर भी नाराजी दिखाई । लेकिन सबसे बड़ी बात ये कही कि कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक बदलाव की जरूरत है। उनका ये कथन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब राहुल गाँधी ने महासचिव के रूप में कांग्रेस संगठन का काम संभाला तब उन्होंने भी इसी तरह की बात कही और संगठन के चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से करवाने की पहल की। युवाओं को आगे बढ़ाने के लिए एक समूह भी बना जिसे टीम राहुल का नाम दिया गया। बाद में वे स्वयं पार्टी के अध्यक्ष बने किंतु 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद पद छोड़ दिया। उनके उस कदम की प्रशंसा भी हुई किंतु किसी नये चेहरे  को आगे लाने के बजाय उनकी माँ सोनिया गाँधी को ही बागडोर सौंपकर परिवार का कब्जा बनाये रखा गया। इसी बीच प्रियंका भी सीधे महामंत्री बना दी गई और उ.प्र जैसे राज्य का प्रभार उन्हें दे दिया गया। लेकिन बीते कुछ सालों में राहुल के करीबी युवा नेता पार्टी  से निकलते गए। राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर श्री खरगे का  चयन बाकायदे चुनाव के जरिये हुआ किंतु वे गाँधी परिवार के प्रत्याशी थे , ये सर्वविदित है। दूसरी तरफ राज्यों के कांग्रेस संगठन में आंतरिक लोकतंत्र का कोई अता - पता नहीं है। पंजाब और राजस्थान में पार्टी के दो बड़े नेताओं का विवाद रोकने की बजाय आलाकमान ने खुद आग में घी डाला। अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के अलावा अशोक गहलोत और सचिन पायलट के झगड़े न रोक पाने के कारण पंजाब और राजस्थान में कांग्रेस की नैया डूब गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, आर. पी. एन. सिंह और मिलिंद देवड़ा जैसे साथी पार्टी को अलविदा कह गए और राहुल देखते रहे। असम के मुख्यमंत्री हिमन्ता बिस्वा शर्मा भी एक उदाहरण हैं। म.प्र में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की चौधराहट ने कांग्रेस का सत्यानाश कर डाला। उ.प्र और बिहार में कांग्रेस घुटनों के बल पर है जबकि प.  बंगाल में उसका नाम तक डूब चुका है। प्रश्न ये है कि खरगे जी ने भी ऐसा क्या किया जिससे संगठन मजबूत होता? और जब वे ऊपर से नीचे तक बदलाव की बात कर रहे हैं तब तो बात गाँधी परिवार से ही शुरू होगी जिसके तीन सदस्य सांसद बन गए हैं। हालांकि आंतरिक लोकतंत्र तो लगभग सभी दलों में दम तो़ड़ चुका है लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की अंदरूनी स्थिति बेहद खराब है। जिसका प्रमुख कारण उसका एक परिवार के खूंटे से बंधा रहना और दूसरा वैचारिक पहिचान खो देना। चूंकि खरगे जी में इन दो विसंगतियों को दूर करने का न तो साहस है और न हैसियत इसलिए किसी बड़े बदलाव की बात सोचना भी मन को बहलाना मात्र है। कहीं ऐसा न हो कि हार का दोष उनके मत्थे मढ़ कर किसी और को अध्यक्ष बना दिया जाए। प्रियंका के सांसद बन जाने के बाद पार्टी में एक और शक्ति केंद्र उदय हो गया है। खरगे जी के प्रति पार्टी के प्रथम परिवार का रवैया कितना उपेक्षा भरा है इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि जिस बैठक में वे उक्त बातें कह रहे थे उसमें से राहुल और प्रियंका बीच से ही उठकर चले गए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 29 November 2024

राहुल की अडानी विरोधी मुहिम पर विपक्षी दलों में ही मतभेद



संसद का शीतकालीन हंगामे की भेंट चढ़ रहा है। 4 दिनों में महज 40 मिनिट ही कामकाज चला। उद्योगपति गौतम अडानी के विरुद्ध अमेरिका में दर्ज प्रकरण को लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी उनकी गिरफ्तारी पर अड़े हैं। जेपीसी ( सं. संसदीय समिति) की मांग भी की जा रही है। हालांकि विपक्ष द्वारा संभल सहित अन्य कुछ मुद्दे  उठाकर भी  दोनों सदनों को चलने नहीं दिया जा रहा ।  लेकिन अडानी का विरोध राहुल का सबसे प्रिय मुद्दा होने से कांग्रेस पार्टी के बाकी नेता भी चाहे - अनचाहे उनके सुर में  सुर मिलाने लगते हैं। ऐसा लगता है उनकी अडानी से कोई निजी खुन्नस है। इसीलिए वे उनके खिलाफ बोलने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। रोचक बात ये है कि इस बारे में इंडिया गठबंधन में ही  एक राय नहीं है। हिंडनबर्ग विवाद के समय भी श्री गाँधी ने जेपीसी की मांग पर संसद की कारवाई नहीं चलने दी। तब अविभाजित रांकपा के अध्यक्ष शरद पवार और प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने उस मांग से किनारा कर लिया था। जिस ताजा विवाद पर अडानी के विरुद्ध मोर्चा खोलकर संसद की कारवाई को रोका जा रहा है उसे लेकर भी विपक्ष में फूट सामने आ गई । ममता तो पहले से ही अडानी का विरोध करने से बचती आई हैं किंतु चौंकाने वाली बात ये हुई कि केरल में सत्तारूढ़ वामपंथी दलों ने भी अडानी विरोधी मुहिम में साथ देने से इंकार किया है। इसका कारण राज्य में बंदरगाह बनाने अडानी की कंपनी से हुआ अनुबंध है। गौरतलब है वामपंथी राष्ट्रीय राजनीति में तो  इंडिया गठबन्धन का हिस्सा हैं किंतु केरल में उनके और कांग्रेस  के बीच 36 का आंकड़ा है । यहाँ तक कि वायनाड लोकसभा सीट पर राहुल के खड़े होने पर वामपंथियों ने एतराज जताते हुए अपना प्रत्याशी भी उतार दिया। रायबरेली से भी जीतने के बाद श्री गाँधी ने उक्त सीट खाली कर दी जिस पर हुए उपचुनाव में उनकी बहिन प्रियंका वाड्रा जीतकर आई हैं। उनके विरुद्ध भी वामपंथी उम्मीदवार खड़ा हुआ था। दरअसल देश के सभी राज्य निवेशकों को आमंत्रित करने में जुटे रहते हैं।  अडानी इस समय देश के सबसे  बड़े निवेशकों में हैं। हर राज्य चाहता है वे उसके विकास में सहभागी बनें। यही वजह है कि राहुल के खुले विरोध को नजरंदाज करते हुए कांग्रेस शासित अनेक राज्यों ने इस समूह को बड़े - बड़े काम दिये जिसका स्पष्टीकरण पत्रकारों द्वारा मांगे जाने पर श्री गांधी उन पर भाजपाई होने का आरोप लगाने लगते हैं। उनका अडानी विरोध जनता के गले भी नहीं उतर रहा। हाल के वर्षों में  कांग्रेस को जहाँ भी चुनावी सफलता हासिल हुई उनमें अडानी मुद्दे की कोई भूमिका नहीं रही। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भी श्री गाँधी द्वारा अडानी की आड़ लेकर प्रधानमंत्री को घेरने का भरपूर प्रयास किया किंतु मतदाताओं ने लेश मात्र ध्यान नहीं दिया। और तो और  कांग्रेस के सहयोगी दलों को भी अडानी का लगातार विरोध बोझ लगने लगा है। संसद में अनेक छोटे - छोटे दलों के सांसद भी हैं। कारवाई नहीं चलने के कारण वे अपने क्षेत्र से  जुड़े मुद्दे उठाने से वंचित रह जाते हैं। कांग्रेस बेशक विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है किंतु उसके नेता की जिद के चलते बाकी पार्टियां महत्वहीन होकर रह जाएं ये तो कहीं से भी उचित नहीं है। अडानी या अन्य किसी ने भी कानून विरुद्ध कोई कार्य किया है तो उसे सजा मिलनी चाहिए किंतु इसके लिए संसद का बहुमूल्य समय नष्ट करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना है। जहाँ तक बात सत्ता पक्ष की है तो उसके लिए राहुल का ये रवैया फायदेमंद है क्योंकि उसे जो कुछ पारित करवाना होता है वह  हंगामे के बीच भी हो जाता है। अब तो राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे हैं कि श्री गाँधी द्वारा अडानी का अंधा विरोध उनकी हताशा को दर्शाने लगा है। ये बात भी चर्चा में आने लगी है कि अमेरिका से अडानी विरोधी जो धमाके हो रहे हैं उनके पीछे व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा का हाथ है। शरद पवार और ममता बैनर्जी के बाद जब वामपंथी भी अडानी मुद्दे पर श्री गाँधी के साथ खड़े होने तैयार नहीं हैं तब उन्हें  समझ लेना चाहिए कि उनकी बात से गठबंधन के साथी ही सहमत नहीं हो रहे । जनहित से जुड़े मुद्दे उठाना नेता प्रतिपक्ष का कर्तव्य है। अन्य सम -  सामयिक ज्वलंत विषयों पर भी उनके अभिमत का महत्व है क्योंकि वह उनके दल की नीति स्पष्ट करता है। लेकिन अडानी से जुड़े विवादों में श्री गाँधी के विरोध का औचित्य जब सभी विपक्षी दलों को समझ नहीं आ रहा तब आम जनता उससे कितनी प्रभावित होगी ये सोचने वाली बात है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 28 November 2024

बांग्ला देश के हिंदुओं की सुरक्षा के लिए समुचित कदम उठाना जरूरी

बांग्ला देश में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद जो अंतरिम सरकार गठित हुई उसका भारत विरोधी रुख पहले दिन ही सामने आ गया था। और जब भारत ने हसीना को अपने यहाँ पनाह दे दी तब रिश्तों में खटास और बढ़ गई। कूटनीतिक स्तर पर ऐसी बातें होती रहती हैं किंतु इस पड़ोसी मुल्क में भारत विरोधी भावनाओं ने जिस प्रकार हिन्दू समुदाय के प्रति नफरत का रूप ले लिया वह ख़तरनाक स्थिति में आ पहुँचा है। सत्ता बदलते ही हसीना विरोधी आंदोलन हिंदुओं के दमन में बदल गया। उनके घरों, मंदिरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर हमले और आगजनी के साथ ही महिलाओं का अपहरण और बलात्कार जैसी वारदातें आम हो चलीं। जब इसकी चर्चा वैश्विक स्तर पर हुई तब वहाँ की सरकार ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का दिखावा शुरू किया। हमला करने वालों पर कारवाई का नाटक भी हुआ। साथ ही ये सफ़ाई भी दी कि हिंदुओं पर हमलों की खबरों को बढ़ा - चढ़ाकर पेश किया जा रहा है जिससे कि बांग्ला देश की छवि  खराब हो। चौतरफा हमलों से परेशान हिंदुओं ने जब एकजुट होकर प्रदर्शन किये और सरकार पर दबाव बनाया तो मुस्लिम उग्रवादियों ने रणनीति बदलते हुए हिंदुओं के धार्मिक संगठनों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। मंदिरों के पुजारियों की धरपकड़ शुरू हो गई। इस्कान नामक संस्था के स्वामी चिन्मय कृष्ण दास पर देशद्रोह का आरोप लगाते हुए उनको जेल में बन्द करने के बाद इस्कान को धार्मिक कट्टरपंथी  संगठन घोषित करने की सरकार प्रायोजित मुहिम शुरू हो गई है। उल्लेखनीय है इस्कान एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जिसकी शाखाएं दर्जनों देशों में हैं। वह भव्य मंदिर बनाने के साथ ही  जन कल्याण के अनेक प्रकल्प संचालित करती है। आज तक  किसी भी देश में उसके बारे में शिकायत नहीं मिली। इसमें दो मत नहीं कि बांग्ला देश मुस्लिम बहुल है। लेकिन वहाँ के लोगों को ये नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान के शिकंजे से उन्हें भारत ने ही मुक्ति दिलाई थी। 1971 में अस्तित्व में आने के कुछ साल बाद ही वहाँ राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीब को मौत के घाट उतारकर कट्टरपंथी ताकतें सत्ता में आ गईं जिससे भारत विरोधी भावना को  संरक्षण मिलने लगा। हालांकि हसीना के सत्ता में रहने के दौरान भी हिंदुओं के दमन का अभियान जारी रहा। हालिया सत्ता परिवर्तन के बाद तो ऐसे हालात बना दिये गये जिनमें हिंदुओं के पास देश छोड़कर भारत आने के सिवाय और कोई चारा न बचे। यद्यपि उन्होंने  संगठित होकर विरोध शुरू कर दिया है किंतु सरकार ही जब मुस्लिम कट्टरपंथियों की पीठ पर हाथ रखे हो तब हिंदुओं का  भयभीत होना स्वाभाविक है। भारत की मजबूरी ये है कि वह  नये शरणार्थियों को स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि बांग्ला देश से सटे सीमावर्ती राज्यों की जनता इसके विरोध में है। 1971 में आये बांग्ला देशी शरणार्थियों को वापिस भेजने के काम में कोई सफलता मिली नहीं और उसके बाद भी उनका अवैध तरीके से आना जारी रहा। इसके परिणाम स्वरूप पूर्वी भारत के राज्यों में कई जिले पूरी तरह मुस्लिम बहुल हो चुके हैं। वोट बैंक की राजनीति ने शरणार्थियों को नागरिकता दिलवाने में मदद की । केंद्र सरकार जब नागरिकता सम्बन्धी कानून लेकर आई तो विपक्षी दल उसके विरुद्ध खड़े हो गए। बांग्ला देश में हिंदुओं पर जो अत्याचार हो रहे हैं उनका विरोध केवल कूटनीतिक स्तर पर करना ही पर्याप्त नहीं है। समय आ गया है जब बांग्ला देश से आए शरणार्थियों को वापिस उनके देश भेजने का अभियान शुरू किया जाए। वे आसानी से जाने वाले नहीं हैं। ऐसे में उनसे मताधिकार छीनने  के साथ ही आधार कार्ड के जरिये मिल रही सुविधाएं रद्द की जाएं। देश हित में जरूरी है कि सभी राजनीतिक पार्टियों को बांग्ला देशी घुसपैठियों के विरोध में खड़ा होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक बांग्ला देश में हिंदुओं की सुरक्षा खतरे में ही रहेगी। वैसे  किसी देश के अंदरूनी मामलों में दखल देना तो उचित नहीं होता किंतु उनसे हमारे हित प्रभावित होते हों और सुरक्षा पर खतरा मंडराने लगे तब बड़ा कदम उठाने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। हालांकि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद बांग्ला देश के वर्तमान सत्ताधारी चिंता में हैं किंतु भारत विरोधी हर देश को चूंकि चीन का समर्थन हासिल होता है इसलिए हमें ज्यादा सतर्क रहना होगा। इसके पहले कि मुस्लिम कट्टरपंथी अपने मकसद में कामयाब हों भारत को वहाँ के हिंदुओं की सुरक्षा के लिए समुचित उपाय करना चाहिए क्योंकि दुनिया भर में फैले हिंदुओं के लिए मुसीबत के समय यही एक सहारा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 27 November 2024

जीते तो नेता और नीतियाँ अच्छीं किंतु हारे तो ईवीएम जिम्मेदार




हरियाणा के बाद महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो जाने के बाद कांग्रेस पूरी तरह हताश है। लोकसभा चुनाव के बाद  उसका जो उत्साहवर्धन हुआ था वह 6 माह के भीतर ही फुस्स होने लगा। न संविधान पर खतरे का नारा काम आया, न ही जातीय जनगणना। मतदाताओं को लुभाने वाली गारंटियां भी बेअसर रहीं। हरियाणा में जाटों और महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की भाजपा से नाराजगी के बूते चुनाव जीतने की उम्मीद भी धोख़ा दे गई। हालांकि जम्मू - कश्मीर में विजयी रही  नेशनल काँफ्रेंस और झारखंड में  जीते झामुमो के साथ गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल थी किंतु श्रेय क्रमशः उमर अब्दुल्ला और हेमंत सोरेन के हिस्से आया। जो राजनीतिक  विश्लेषक 4 जून के बाद राहुल गाँधी को सुपर स्टार की तरह पेश करने लगे थे वही अचानक उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाने लगे।  लेकिन कांग्रेस की मजबूरी ये है कि सफलता का श्रेय उसे गाँधी परिवार को देना ही पड़ता है जबकि पराजय के लिए  बलि के बकरे  खोजे जाते हैं। और ऐसा ही महाराष्ट्र के परिणाम के बाद देखने मिल रहा है। गत दिवस कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ईवीएम ( इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन )  पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए उसके विरुद्ध भारत जोड़ो यात्रा की तर्ज पर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने की घोषणा के साथ ही मतपत्रों से चुनाव करवाए जाने की मांग दोहराई। लेकिन  गत दिवस ही सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका रद्द करते हुए ईवीएम का विरोध करने वालों को जमकर लताड़ा। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि जहाँ जीत मिलती है वहाँ ईवीएम में कोई दोष नहीं निकालता किंतु हारने के बाद उसमें हेराफेरी की आशंका जताई जाती है। स्मरणीय है  लोकसभा चुनाव में उ.प्र और महाराष्ट्र में विपक्ष को जबरदस्त सफलता मिली जिसे मुद्दों की जीत बताकर ढोल पीटे गए । इसी तरह जम्मू - कश्मीर के नतीजों को धारा 370 हटाये जाने के विरुद्ध जनादेश कहकर उसका स्वागत किया गया। झारखंड में भी झामुमो की सफलता का कारण हेमंत सोरेन को जेल भेजने से आदिवासी समुदाय में उपजी नाराजगी के अलावा उनकी सरकार द्वारा संचालित जन कल्याणकारी योजनाओं को बताया गया। ऐसे में  हरियाणा और महाराष्ट्र में विपक्ष की पराजय के लिए ईवीएम पर संदेह किया जाना सच्चाई से मुँह मोड़ने जैसा है। चुनाव में निष्पक्षता और पारदर्शिता लोकतंत्र की सफलता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग से यही अपेक्षा की जाती है कि वह सत्ताधारी दल के नियंत्रण से मुक्त रहकर चुनाव प्रक्रिया को प्रामाणिक बनाये रखे। इसीलिए विभिन्न पार्टियों द्वारा उठाई गई शंकाओं के बाद आयोग ने उन्हें बुलाकर वोटिंग मशीनों में हेराफेरी साबित करने का अवसर दिया किंतु विपक्ष ने उसमें रुचि नहीं ली जिससे ये स्पष्ट हो गया कि उसके आरोपों में कोई दम नहीं है। उसके बाद हुए अनेक चुनावों में विपक्ष को उल्लेखनीय सफलता मिली जिस पर उसने जश्न भी मनाया। ऐसे में केवल हारने पर वोटिंग मशीन पर ठीकरा फोड़ना खीझ नहीं तो और क्या है ? किसी इलेक्ट्रानिक उपकरण में गड़बड़ी नहीं हो सकती ये दावा पूरी तरह सच नहीं है किंतु हजारों ईवीएम में एक साथ छेड़छाड़ संभव नहीं लगती। रही बात दुनिया के अनेक देशों द्वारा उनका उपयोग  बंद कर दोबारा मतपत्रों से चुनाव करवाने की तो उनकी आबादी और भौगोलिक आकार का ध्यान भी रखना होगा। यदि ईवीएम में राष्ट्रीय स्तर पर हेराफेरी संभव होती तो प. बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पंजाब का राजनीतिक परिदृश्य कुछ और होता। बेहतर हो विपक्ष इस मामले में बचकाना रवैया त्यागे। खरगे जी ईवीएम के विरोध में भारत जोड़ो यात्रा जैसा आयोजन करें  ये उनका अधिकार है। लेकिन इस मुद्दे पर उन्हें जनसमर्थन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए क्योंकि चुनाव हारने पर ईवीएम पर आरोप लगाना और जीतने पर अपने नेता और नीतियों को श्रेय देने की बात गले नहीं उतरती। हालिया चुनाव परिणामों के विश्लेषण में ज्यादातर लोगों का मानना है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा का चुनाव प्रबंधन काफी बेहतर रहा। दरअसल उसने लोकसभा चुनाव में लगे झटके के बाद अपनी मैदानी तैयारियों पर ध्यान दिया। दूसरी तरफ कांग्रेस 99 सीटें मिलने से ही खुशफहमी का शिकार हो गई। लगातार दो राज्यों में मिली हार के बाद उसे अपने संगठन पर ध्यान देने के साथ ही एक परिवार के स्तुति गान की बजाय नये ऊर्जावान नेतृत्व को प्रोत्साहित करना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं किया जाता तब तक उसके पुनरुद्धार की कोई संभावना नहीं हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र में बुरी तरह मात खाने के बाद अब तो इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच भी उसका दबदबा कम हो गया। इसलिए खरगे जी को चाहिये वे ईवीएम का विरोध करने के बजाय अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करें क्योंकि  बतौर पार्टी अध्यक्ष चुनावी विफलताओं के लिए वे भी जिम्मेदार हैं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी