Saturday, 31 May 2025

थरूर और खुर्शीद देश के प्रतिनिधि बनकर विदेश गए हैं किसी दल के नहीं

इन दिनों भारत के सात  संसदीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का पर्दाफाश कर रहे हैं। उनमें विभिन्न दलों के सांसदों के अलावा अनुभवी गैर सांसद भी हैं। आजादी के बाद पहली बार इतनी सार्थक कूटनीतिक पहल भारत ने की जिसमें भाजपा विरोधी नेताओं को शामिल किये जाने पर भिन्न - भिन्न प्रतिक्रियाएं सुनाई दीं। सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस सांसद शशि थरूर को अमेरिका जाने वाले दल का नेता बनाये जाने की हो रही है। इसी तरह असदुद्दीन ओवैसी का नाम भी चौंकाने वाला रहा जो भाजपा के घोर विरोधी हैं।  सनातन विरोधी द्रमुक सांसद कनिमोजी भी एक प्रतिनिधिमंडल की अगुआई कर रही हैं। हर दल में एक मुस्लिम सदस्य है भी है। पूर्व  केंद्रीय मंत्री  गुलाम नबी आजाद और सलमान खुर्शीद के नाम पर भी आश्चर्य हुआ। बीते एक सप्ताह से ये दल विभिन्न देशों में पहलगाम के आतंकवादी हमले और ऑपरेशन सिंदूर से उत्पन्न हालात पर भारत का पक्ष रखते हुए पाकिस्तान के आतंक समर्थक चेहरे को अनावृत्त कर रहे हैं। इसीलिए इनकी भूमिका को  देश सम्मान की निगाह से देख रहा है किंतु दूध में नींबू निचोड़ने की आदत से मजबूर तबके के पेट में दर्द उठने लगा है। शशि थरूर को नेता बनाये जाने पर तंज कसा गया कि भाजपा के पास काबिल लोग नहीं होने से कांग्रेस से लिया गया। जब श्री थरूर  विदेशी धरती पर बोले कि वे सत्ता नहीं अपितु विपक्ष के सांसद हैं तब कहा गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को झटका दे दिया किंतु जब उन्होंने  पाकिस्तान को बेनकाब करना शुरू किया तब  उनके भाजपा में जाने के बारे में भी अटकलों का दौर शुरू हो गया। लेकिन विघ्नसंतोषी ये देखकर हैरत में आ गए कि गुलाम नबी और ओवैसी भी पाकिस्तानी दुष्प्रचार की धज्जियां उड़ाने में जुटे हुए हैं। इन दौरों पर गए विपक्षी सांसद तथा अन्य नेता भारत की विदेश नीति का गुणगान करते हुए आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के संकल्प  का प्रतिपादन करते हुए देश की एकता का प्रमाण दे रहे हैं । और इधर देश के भीतर कांग्रेस विदेश नीति की विफलता का राग अलाप रही है। राहुल गाँधी तो आये दिन ऐसे सवाल पूछ रहे हैं जिनसे पाकिस्तानी दावों को बल मिलता है। लेकिन ये गर्व का विषय है कि एक दूसरे के घोर विरोधी नेता इन प्रतिनिधिमंडलों में अपनी दलीय विचारधारा और नीति से ऊपर उठकर  देशहित और विदेश नीति के अनुसार ही बात कर रहे हैं। इसी क्रम में गत दिवस इंडोनेशिया गये प्रतिनिधिमंडल के सदस्य  पूर्व विदेश राज्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ट नेता सलमान खुर्शीद ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने को उचित निर्णय बताते हुए कहा कि इससे वहाँ के हालात सुधरे हैं तथा निष्पक्ष चुनाव के बाद निर्वाचित लोकप्रिय सरकार का गठन हो सका। उन्होंने स्पष्ट किया कि 370 के रहते जम्मू कश्मीर के भारत से अलग होने का एहसास होता था जो उसके समाप्त होने से लुप्त हो गया और एक बड़ी समस्या का भी अंत हुआ। श्री खुर्शीद को भाजपा का मुखर विरोधी कहा जा सकता है। उन्होंने 370 हटाये जाने का विरोध भी किया  था और गत वर्ष उनका ये बयान भी  विवादों में घिर  गया कि भारत में बांग्लादेश सरीखे हालात बन सकते हैं। लेकिन विदेशी धरती पर वे  राष्ट्रीय हितों के लिहाज से बोले। जो विपक्षी नेता भारत सरकार की नीति और निर्णयों को विदेशी मंचों पर सही ठहराकर पाकिस्तान के हौसले पस्त कर रहे हैं उनको भाजपा से जोड़ना अपरिपक्वता है। ये लोग भूल जाते हैं कि स्व. अटल बिहारी वाजपेयी को जब स्व. पी. वी नरसिम्हा राव ने पाकिस्तान के विरुद्ध मोर्चेबंदी करने जिनेवा गए भारतीय दल का नेता बनाया था और उन्होंने  पाकिस्तान की व्यूहरचना को ध्वस्त कर दिया  तब  किसी ने उनके कांग्रेस के निकट होने की बात कहना तो दूर सोची तक नहीं। ऐसे में श्री थरूर और श्री खुर्शीद के बारे में अटकलें लगाना इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशन की गंभीरता को नुकसान पहुँचाना है। उल्टे जो विपक्षी सांसद  विभिन्न देशों में पाकिस्तान की आतंकवादियों से सांठगांठ को उजागर कर रहे हैं उनकी  प्रशंसा होनी चाहिए क्योंकि  वे पक्ष या विपक्ष के नहीं समूचे देश के प्रतिनिधि हैं। स्मरणीय है 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद स्व. अटल जी ने तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकार किया तब लोग चौंके क्योंकि उनकी पार्टी जनसंघ  पं. नेहरू द्वारा तिब्बत पर चीन के कब्जे को मान्यता देने का पुरजोर विरोध करती रही। तब अटल जी ने स्पष्ट किया कि वे भारत सरकार के विदेश मंत्री हैं और सरकार की नीति को ही सामने रखेंगे। उस दृष्टि से सातों दल ठीक वैसे ही कार्य कर रहे हैं जैसी उनसे अपेक्षा थी। जो लोग उनके बयानों को दलगत राजनीति के लिहाज से देखते हैं उनको  राजनीति और राष्ट्रीय नीति का अंतर समझना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 30 May 2025

बंगाल के मुस्लिम बहुल जिले कश्मीर बनने की ओर: हिंदू आबादी असुरक्षित


प. बंगाल के दौरे में  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत दिवस मुर्शिदाबाद में हुए सांप्रदायिक उपद्रव की चर्चा की। उस दौरान वहाँ के अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हुआ अत्याचार राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया था। उच्च और सर्वोच्च न्यायालय तक को कहना पड़ा कि वे चुपचाप नहीं रह सकते। साथ ही उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बल दंगा प्रभावित क्षेत्रों में तैनात करने का आदेश दिया क्योंकि राज्य की पुलिस मुस्लिम दंगाइयों को नियंत्रित करने में न केवल विफल रही बल्कि कहीं - कहीं तो  उसने उपद्रवियों को खुली छूट दी। मुर्शिदाबाद का जनसंख्या संतुलन पूरी तरह से इकतरफा हो चुका है। निकटवर्ती मालदा के भी यही हाल हैं। इन इलाकों में मुस्लिम आबादी इस हद तक बढ़ी कि लगता है बांग्लादेश में खड़े हों। और ये सही भी है क्योंकि 1971 से बांग्लादेशी घुसपैठियों कारण पूर्वोत्तर राज्यों में मुस्लिम आबादी बेतहाशा बढ़ी जिनमें  असम और प. बंगाल मुख्य हैं।  प. बंगाल में तो कुल 30 फीसदी आबादी मुसलमानों की हो चुकी है और इसीलिए  सत्ता की चाबी उनके हाथ में है। उदाहरण के लिए मुर्शिदाबाद जिले की बहरामपुर लोकसभा सीट से पिछ्ली लोकसभा में  कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी कई चुनावों से लगातार जीतते आ रहे थे किंतु 2024 में ममता बैनर्जी ने विशुद्ध सांप्रदायिक दाँव चलते हुए  एक मुस्लिम उम्मीदवार  उतार दिया और वह भी गुजरात के क्रिकेटर युसुफ पठान को। पठान इस क्षेत्र के लिए पूरी तरह अपरिचित थे जबकि अधीर रंजन जमीनी नेता माने जाते थे । लेकिन ज्योंही तृणमूल ने उनके मुकाबले एक बाहरी  मुस्लिम उम्मीदवार उतारा चौधरी साहेब का जनाधार धराशायी हो गया और  वे बुरी तरह हार गए। बहरामपुर मुस्लिम बहुल होते हुए भी गैर मुस्लिम अधीर रंजन को चुनता रहा क्योंकि वे बतौर कांग्रेसी हिंदुवादी भाजपा के विरोधी माने जाते थे। लेकिन ज्योंही उनके सामने मुस्लिम उम्मीदवार आया उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि एक झटके में खत्म हो गई। ये स्थिति प. बंगाल के अलावा असम, बिहार , उ.प्र और केरल सहित देश के अनेक हिस्सों में उत्पन्न हो चुकी है। जाति और धर्म के आधार पर चुनावी समीकरण बनना - बिगड़ना  राजनीति में सामान्य बात है। लेकिन प. बंगाल के मुस्लिम बाहुल्य  जिले राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी  संवेदनशील हो उठे हैं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि जिस तरह कश्मीर घाटी में रहने वालों पर सदैव ये आरोप लगता है कि वे पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों को सहयोग और संरक्षण प्रदान करते हैं वही हाल प. बंगाल के उन मुस्लिम बहुल इलाकों का है जो बांग्लादेश की सीमा से सटे हैं। कश्मीर घाटी में आने वाले घुसपैठिये  वेशभूषा, खानपान , बोली और  रहन - सहन में चूंकि स्थानीय वाशिंदों जैसे होते हैं इसलिए उनको अलग से पहचान पाना कठिन हो जाता है। बिलकुल यही स्थिति प. बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा तथा असम के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की है जिनमें अवैध रूप से आने वाले बांग्लादेशी आसानी से स्थानीय लोगों में घुल - मिल जाते हैं। वैसे तो ये सिलसिला आजादी के बाद ही शुरू हो गया था । पूर्वोत्तर राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा की अनदेखी और अलगाववादी संगठनों की गतिविधियां भी इसमें सहायक हुईं किंतु 1970 में बांग्लादेश के अंदरूनी हालात बिगड़ने के बाद आये घुसपैठिये शरणार्थी की हैसियत पाने के बाद यहीं बस गए। उनको वापस भेजने की बात स्वयं  इंदिरा गाँधी ने कही थी किंतु वोट बैंक की राजनीति ने देश हित को ठेंगा दिखा दिया। ममता बैनर्जी की पूर्ववर्ती वामपंथी सरकारों ने भी यही पाप किया था जो चीन समर्थक मानी जाती थीं। लेकिन गत वर्ष बांग्लादेश में  भारत विरोधी सत्ता विराजमान होने  के बाद  हिंदुओं पर जिस तरह के अमानुषिक अत्याचार हुए उन्हीं की हूबहू नकल मुर्शिदाबाद में देखने मिली। हिंदुओं के घरों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में लूटपाट, आगजनी और महिलाओं के साथ बलात्कार के रूप में आतंक का नंगानाच करते हुए उन्हें इलाका छोड़ने को बाध्य किया गया। पूरे घटनाक्रम के वीडियो सार्वजनिक हो चुके हैं । लेकिन राहुल गाँधी मणिपुर और कश्मीर घाटी के लोगों का दर्द जानने तो गए किंतु आज तक मुर्शिदाबाद का नाम तक नहीं लिया। अखिलेश, तेजस्वी, केजरीवाल, ओवैसी, उद्धव, पवार, स्टालिन और वामपंथी नेताओं को भी वहाँ आने की फुर्सत नहीं मिली क्योंकि मारने वाले मुस्लिम थे।  प. बंगाल में हालात जिस तरह बिगड़े उनको देखते हुए केंद्र सरकार को प्रभावी कदम उठाना होंगे। ममता बैनर्जी तो मुस्लिम प्रेम में अंधी हो चुकी हैं इसलिए उनसे कोई अपेक्षा व्यर्थ है। इस बारे में ये आशंका गलत नहीं है कि यदि मौजूदा स्थिति बनी रही तो प. बंगाल के सीमावर्ती जिले भी कश्मीर घाटी जैसे हो जायेंगे जहाँ हिंदुओं का रहना असंभव होगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 29 May 2025

ट्रम्प की मूर्खता से अमेरिका की चौधराहट खतरे में

मेरिका के पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन का मुख्य सलाहकार जॉर्ज सोरोस  था जिनकी   छवि तो सटोरिया, निवेशक और सामाजिक कार्यकर्ता क थी किंतु असलियत में वह एक षडयंत्रकारी  था  जिसकी रुचि विश्व राजनीति में हलचल पैदा करने में थी। चूंकि बाइडेन में वह क्षमता नहीं थी जो अमेरिका के राष्ट्रपति से अपेक्षित है इसलिए वे  सोरोस के चंगुल में फंसते गए। यूक्रेन , गाजा और बांग्लादेश आज जिस  हालात से गुजर रहे हैं उनके लिए बाइडेन को ही कसूरवार माना जाता है। लेकिन परदे के पीछे पूरा कुचक्र सोरोस ने ही रचा था। भारत के लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने के लिए भी उसने  व्यूहरचना की । हिंडनबर्ग नामक संस्थान द्वारा उद्योगपति गौतम अडानी के विरुद्ध रिपोर्ट प्रकाशित कर भारतीय शेयर बाजार को तहस - नहस करने का जाल बुना ताकि विदेशी निवेशक भारत से बिदकने लगें। लेकिन वह गुब्बारा फूट गया। बाइडेन के हटते ही हिंडनबर्ग ने बोरिया बिस्तर समेट लिया । नरेंद्र  मोदी को सत्ता से हटाने के लिए बाइडेन और सोरोस ने काफी प्रयास किये लेकिन  श्री मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की शुरुआत में बाइडेन समर्थित कमला हैरिस मजबूत नजर आ रही थीं किंतु धीरे - धीरे डोनाल्ड ट्रम्प ने रफ्तार पकड़ी और अमेरिकी राष्ट्रवाद का मुद्दा उछालकर बाजी अपने पक्ष में कर ली। रोचक बात ये रही कि ट्रम्प के पक्ष में अमेरिका के चर्चित धनकुबेर एलन मस्क खुलकर खड़े हो गए। चुनाव जीतते ही अपनी प्रशासनिक जमावट के लिए ट्रम्प ने जिस तरह से मस्क को खुला हाथ दिया  उसकी पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी। महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उनकी निर्णायक भूमिका रही। इसके कारण कहा जाने लगा कि जिस तरह बाइडेन को सोरोस ने अपने चंगुल में फंसा रखा था ठीक वैसे ही ट्रम्प पर मस्क का शिकंजा कस चुका है। जब अमेरिका ने विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध शुरू किया तब उसे भी मस्क के दिमाग की उपज बताया गया। भारत में टेस्ला वाहनों के आयात पर कम शुल्क लगाए जाने के लिए ट्रम्प ने भारत पर जो दबाव बनाया उसके पीछे भी मस्क को उपकृत करना ही था। लेकिन धीरे - धीरे ट्रम्प ने जिस सनकीपने का प्रदर्शन किया उसकी वजह से पूरी दुनिया में वे हंसी का पात्र बनने लगे। युक्रेन - रूस का युद्ध रुकवाने के उनके दावे फुस्स हो गए। जब यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की  मिलने गए तब ट्रम्प ने उनको अपमानित कर बाहर जाने कह दिया क्योंकि उन्होंने इकतरफा युद्धविराम करने से मना कर दिया। तब लगा था वे रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ हैं किंतु हाल ही में उन्होंने उनके बारे में भी हल्की टिप्पणियां कर डालीं। चीन पर अनाप शनाप टैरिफ थोपने के बाद वे राष्ट्रपति जिनपिंग को दोस्त बताने लगे और चीन से   समझौते में टैरिफ 145 से घटाकर 30 प्रतिशत पर ले आये। इसी तरह वे श्री मोदी से अपनी निकटता का ढोल पीटते हैं किंतु भारत पर भी बढ़े हुए टैरिफ थोपने की धौंस देने से बाज नहीं आते। हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य टकराव में ट्रम्प ने जिस तरह का जोकरपना दिखाया उससे अमेरिका के राष्ट्रपति पद की गरिमा तार - तार हो गई। युद्धविराम करवाने का श्रेय लूटने के बारे में उन्होंने बदल - बदलकर जो बयान दिये उससे उनकी तो किरकिरी हुई ही अमेरिका की भी साख गिरी। अपने पड़ोसी कैनेडा को वे अमेरिका का राज्य बनने धमका रहे हैं। ग्रीनलैंड हथियाने के उनके इरादे से पूरा यूरोप दहशत में है। दरअसल विश्व की अर्थव्यवस्था को हिलाने के फेर में वे अपने देश की माली हालत खराब कर रहे हैं। एपल फोन बनाने वाली कंपनी को भारत के बजाय अमेरिका में उत्पादन करने की सलाह के साथ वे धमकी दे बैठे कि भारत में बने फोन पर अमेरिका 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगा देगा। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को व्हाइट हाउस बुलाकर उनके साथ जो व्यवहार ट्रम्प ने किया वह राजनायिक शिष्टाचार का तो खुला उल्लंघन था ही , मेजबानी के लिहाज से भी बेहूदगी थी।  इन हरकतों से पूरी दुनिया में उनकी थू - थू होने के साथ ही अमेरिका की छवि को भी क्षति पहुंची है। उसके परंपरागत मित्र भी किनारा करते जा रहे हैं। यूरोप ने अपनी सैन्य और आर्थिक सुरक्षा के लिए अमेरिका पर अपनी निर्भरता खत्म करने के लिए कदम बढ़ा दिये हैं। अब ताजा खबर ये है कि एलन मस्क ने भी ट्रम्प का साथ छोड़ने का ऐलान कर दिया है। वे उनके नीतिगत निर्णयों से असहज अनुभव करने लगे हैं। ऐसा लगता है ज्यादा होशियारी दिखाने के फेर में ट्रम्प मूर्खता पर मूर्खता करते गए जिनकी वजह से अमेरिका दुनिया में अलग - थलग पड़ता जा रहा है। घरेलू मोर्चे पर भी वे लगातार आलोचनाओं का शिकार हो रहे हैं। उनकी सनक हार्वर्ड जैसे विश्वविद्यालय पर भी भारी पड़ रही है। वीजा नीतियों के कारण अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की धड़कनें तेज हैं। भले ही वे दावा करें कि उनकी आर्थिक नीतियाँ और कूटनीतिक निर्णय अमेरिका और उसकी जनता के हित में हैं किंतु उनका दुष्परिणाम दुनिया के इस चौधरी की चौधराहट खत्म होने के रूप में सामने आ रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 28 May 2025

कोरोना पहले से कम खतरनाक किंतु असावधानी घातक हो सकती है


देश में कोरोना का आगमन हो चुका है। इक्का - दुक्का मामलों से शुरू होकर संख्या एक हजार के करीब पहुँच रही है। कुछ मौतें भी हो चुकी हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक इस बार भी  इसका संक्रमण दक्षिण एशिया के देशों से ही आया है लेकिन ये नया वैरिएंट  उतना खतरनाक नहीं है जितना 2020 और 2021 के दौरान देखने मिला था। हालांकि उसके बाद वाले वर्षों में भी दुनिया के अनेक देशों में कोरोना के शिकार लोग मिलते रहे किंतु महामारी के उस भयावह दौर की तुलना में वह समुद्र में एक बूंद जैसा था। चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि कोरोना वायरस न समाप्त हुआ और न होगा लेकिन वह कमजोर होता जाएगा और इसीलिये 2021 के बाद उसका प्रकोप और विस्तार पूर्वापेक्षा कम हो गया। अभी कोरोना का जो  संक्रमण आया उससे पीड़ित मरीज कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो रहे हैं और तकलीफ भी काफी साधारण है। सर्दी, खाँसी और बुखार जैसे सामान्य लक्षण ही कोरोना के संकेत हैं। हालांकि जिन लोगों को पहले टीके ( वैक्सीन) लग चुके थे उनको कोरोना होने पर भी वे जल्द स्वस्थ हो गए। लेकिन टीका लगवाने वाले व्यक्ति को ये खुशफहमी दिल से निकाल फेंकना चाहिए कि उसके पास ऐसा रक्षा कवच है जिसके कारण वह कोरोना से पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। अब तक जितने भी लोग  कोरोना से संक्रमित हुए उनमें से ज्यादातर लोग टीका लगवा चुके थे। फ़ायदा ये हुआ कि उन पर  इलाज का असर उन लोगों की तुलना में अधिक हुआ जिन्होंने  टीका नहीं लगवाया था। ऐसे में भले ही बीमारी का आक्रमण पहले जैसा शक्तिशाली न हो किंतु सावधानी हटी ,दुर्घटना घटी वाला सूत्र इस मामले में भी पूर्णरूपेण  लागू होता है। इसलिए इसके पहले कि कोरोना दोबारा महामारी का रूप ले, लोगों में। बचाव के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना आवश्यक है। बीमार होने के बाद इलाज करवाना तो मजबूरी होती है किंतु यदि पहले से ही सावधानी रखें तो बचाव भी सम्भव है, विशेष रूप से जब बीमारी संक्रामक और विश्वव्यापी हो तब तो सतर्कता और भी जरूरी है। हालांकि एक बात अच्छी है कि कोरोना के  लक्षण और उसके उपचार के प्रति ज्यादातर लोग अवगत हैं। पिछली दोनों लहरों के बाद बीमारी के बारे में चिकित्सा विज्ञान में काफी शोध हो चुके हैं जिसकी वजह से  कारगर दवाइयों का भी उत्पादन होने  लगा है। टीके भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। बावजूद इसके कभी - कभी वायरस की चालाकी के सामने इंसान असहाय होकर रह जाता है क्योंकि वह तेजी से रूप बदलने में माहिर होता है। इसलिए जरूरी है कि भले ही कोरोना के नये वेरिएंट को पहले जितना खतरनाक न माना जा रहा हो लेकिन उसे हल्के में लेना जानलेवा हो सकता है। इस बारे में ध्यान रखना होगा कि कोरोना की पहली लहर का सफलतापूर्वक सामना करने के कारण देश में जो बेफिक्री आई उसका दुष्परिणाम दूसरी लहर में कई गुना ज्यादा मौतों के रूप में सामने आया। ये देखते हुए पिछली गलतियों से सबक लेकर हरसंभव सावधानी बरतने की जरूरत है। लोगों में भय फैलाने की बजाय उनमें कोरोना से बचाव हेतु सामान्य सावधानियों का पालन करने के प्रति दायित्व बोध जागृत करने की आवश्यकता है। ये इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय विदेश यात्रा पर जाते हैं। इसी तरह अन्य देशों के काफी नागरिक भारत आते हैं। इसलिए  संक्रमण का खतरा बना रहेगा । सरकार के अलावा विभिन्न राजनीतिक दलों और समाजसेवी संगठनों को चाहिए वे लोगों को कोरोना से बचने के लिए सावधानी के लिए प्रेरित करने आगे आएं। जनता को भी ये जान लेना चाहिए कि एक व्यक्ति के संक्रमित होने से उसका पूरा परिवार ही नहीं अपितु संपर्क में आने वाले हर किसी को कोरोना अपनी चपेट में ले सकता है। लिहाजा भीड़ भरी जगहों पर मास्क का उपयोग एक आदत बना लेना चाहिए। इसके अलावा  हाथ मिलाने जैसे अभिवादन के तौर - तरीकों के स्थान पर भारतीय संस्कृति में प्रचलित नमस्कार की आदत डाली जाए। अकारण भीड़ वाले क्षेत्रों में जाने से परहेज करना भी जरूरी है। खान - पान की शुद्धता भी संक्रमण से बचाने में सहायक होती है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि पिछली बार कोरोना चिकित्सकों और आम जनता दोनों के लिए अपरिचित था किंतु इस बार उसकी पदचाप स्पष्ट  महसूस की जा सकती है । इसलिए  सरकार की चेतावनी का इंतजार किये बिना ही सतर्क होना  जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 27 May 2025

बेहतर है पार्टी के प्रति वफ़ादारों को महत्व दें राहुल

हुल गाँधी भले ही कांग्रेस संगठन के किसी पद पर न हों किंतु पार्टी उन्हीं की मनमर्जी से चलती है। दिखाने के लिये भले ही मल्लिकार्जुन खरगे अध्यक्ष हैं किंतु निर्णय प्रक्रिया पर  राहुल का नियंत्रण रहता है। हालांकि  इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं क्योंकि वे प्रधानमंत्री पद हेतु  पार्टी का चेहरा हैं। भाजपा में भी जब तक अटल जी रहे तब तक उनके सामने सब बौने थे और आज वही  स्थिति  नरेंद्र मोदी की है। इसीलिए कांग्रेस में किसी भी नीतिगत निर्णय में श्री गाँधी की निर्णायक भूमिका रहती है।  अध्यक्ष चाहे उनकी माताजी सोनिया गाँधी रहीं या वे स्वयं, सारे फैसले उन्हें केंद्र में रखकर ही हुए । यही वजह है कि चुनावी असफलता के लिए उन्हें ही जिम्मेदार माना गया। 2004 में जब डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार बनी तब शुरू में तो उसका श्रेय सोनिया जी के खाते में गया किंतु धीरे - धीरे संगठन और सत्ता की लगाम राहुल के हाथों आती गई जिसका प्रमाण उनके द्वारा भरी पत्रकार वार्ता में मंत्रीमंडल द्वारा स्वीकृत विधेयक की प्रति फाड़कर फेंकना था।  2014 से कांग्रेस के पराभव का दौर शुरू हो गया तब उसकी जिम्मेदारी लेते हुए श्री गाँधी ने अध्यक्ष पद भले छोड़ दिया लेकिन किसी सक्षम नेता को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बजाय अनिश्चितता बनाये रखी और अंततः सोनिया जी को कामचलाऊ अध्यक्ष बनाकर कमान अपने पास  रखी। एक के बाद एक राज्य हारते जाने के कारण पार्टी में असंतोष व्याप्त हुआ और जी- 23 नामक समूह बना जिसमें तमाम नामचीन चेहरे थे। उन्होंने पार्टी में आंतरिक प्रजातंत्र की आवाज उठाई किंतु बजाय उस पर ध्यान देने के असंतुष्टों को किनारे लगाने की मुहिम चली। उसके कारण अनेक ऐसे चेहरे पार्टी से बाहर आ गए जो गाँधी परिवार के वफादार माने जाते थे। बीच - बीच में कांग्रेस को कुछ राज्यों की सत्ता हासिल हुई किंतु उसका कारण प्रादेशिक नेता और स्थानीय परिस्थितियाँ ही रहीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में श्री मोदी की वापसी और ज्यादा ताकत के साथ हुई तब ये लगा कि कांग्रेस का रसातल में जाना तय है। लेकिन कुछ राज्यों में सफलता मिलने से पार्टी की उम्मीदें बनीं रहीं जिनके कारण उसने इंडिया नामक विपक्षी दलों का गठन किया जिसने राहुल को अपना अघोषित उम्मीदवार मान लिया।  लेकिन 2023 में तीन राज्यों के चुनावों में भाजपा ने जबरदस्त वापसी कर कांग्रेस की वजनदारी तो घटाई ही श्री गाँधी की क्षमता पर भी सवालिया निशान और गहरे कर दिये। हालांकि विगत  लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उछलकर 99 तक आ गई किंतु उससे बड़ी बात रही भाजपा का बहुमत से पिछड़ जाना जिसके लिए मुख्य रूप से उ.प्र और महाराष्ट्र जिम्मेदार रहे। लेकिन पूरा विपक्ष मिलकर भी श्री मोदी की वापसी न रोक सका। राहुल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तो बन गये किंतु इंडिया गठबंधन को एकजुट रखने में विफल साबित हुए। नतीजा हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के रूप में सामने आया। कांग्रेस के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद राहुल को एकला चलो की नीति याद आई और वे पार्टी संगठन को ताकतवर बनाने में जुट गए। गुजरात से इसकी शुरुआत के बाद अब म.प्र में उनके आने की खबर है।  श्री गाँधी इन दिनों गद्दारों की खोज कर रहे हैं जिनके बारे में संदेह है कि वे भाजपा से मिले हैं। म.प्र में उनका आगमन भी इसी उद्देश्य को लेकर होने वाला है। लेकिन लगभग 20 साल से पार्टी  के शीर्ष पर बैठे श्री गाँधी ये नहीं समझ सके कि कांग्रेस की असली समस्या गद्दार नहीं बल्कि पार्टी में योग्य और वफादारों की उपेक्षा है जो भले ही गाँधी परिवार की हाँ में हाँ न मिलाएं किंतु पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा हर परिस्थिति में कायम रही। जिन प्रांतों में कांग्रेस लगातार पराभव का शिकार होती जा रही है उनमें भी चाटुकार प्रवृत्ति के नेताओं को महत्व दिया गया। पंजाब, राजस्थान, उ.प्र, म.प्र , छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में समय रहते सही लोगों को अवसर नहीं देने का दुष्परिणाम पार्टी भोग चुकी है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की कलह सतह पर है। कुल मिलाकर कांग्रेस में गाँधी परिवार के अलावा किसी को शक्तिशाली बनाने से परहेज करने की नीति  ही उसके लिए घातक साबित हो रही है। श्री गाँधी को    अब पार्टी में दरबारी संस्कृति के लोगों की बजाय ऐसे युवाओं को बागडोर सौंपना चाहिए जिनका अपना जनाधार भी हो। वरना वह अपनी मौजूदा दुरावस्था से उबर नहीं सकेगी। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता कितनी खोखली थी ये उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में साबित हो चुका है। और ये भी कि क्षेत्रीय पार्टियां अपने प्रभाव क्षेत्र में कांग्रेस को किसी भी हालत में आगे बढ़ने नहीं देंगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 26 May 2025

वैश्विक स्तर के पर्यटन स्थल अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दे सकते हैं

नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी राज्यों को सुझाव दिया कि वे कम से कम एक वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल विकसित करें । ऐसा होने पर विदेशी पर्यटक आकर्षित होंगे तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को संबल मिलेगा। कुछ वर्ष पूर्व  प्रधानमंत्री ने घरेलू पर्यटकों को  भारत दर्शन हेतु प्रेरित किया था। ये संयोग ही है कि नीति आयोग की उक्त बैठक के साथ ही ये जानकारी भी आ गई कि भारत , जापान को पीछे छोड़कर विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन गया। अब उससे आगे जर्मनी, चीन और अमेरिका ही हैं ।  वार्षिक विकास दर जिस  गति से बढ़ रही है उसे देखते हुए  जल्द ही हम जर्मनी से आगे निकलकर तीसरे स्थान पर आ जाएंगे जो बड़ी उपलब्धि होगी। प्रधानमंत्री ने नीति आयोग में आर्थिक नीतियों से जुड़ी चर्चा  करने के साथ हर राज्य में एक वैश्विक स्तर का पर्यटन स्थल विकसित करने की जो बात कही वह चौंकाने वाली हो सकती है किंतु उसके निहितार्थ को समझने पर उसका महत्व स्पष्ट हो जाता है। मसलन जब गुजरात में दुनिया की सबसे ऊँची  सरदार पटेल की मूर्ति स्थापित की गई तब उसे पैसे की बर्बादी बताते हुए उतना धन अन्य विकास कार्यों में लगाए जाने बात भी उठी। लेकिन ज्योंही वह मूर्ति स्थापित हुई , देखते - देखते वह पूरा इलाका विकसित होने लगा। अब वहाँ  हजारों सैलानी प्रतिदिन आते हैं। जिससे प्रतिमा पर व्यय की गई राशि से अधिक सरकार के पास लौट आई है। साथ ही उस उपेक्षित क्षेत्र के निवासियों को अकल्पनीय आर्थिक लाभ सैलानियों से होने लगा है। उसके बाद प्रधानमंत्री की पहल पर बनारस के ऐतिहासिक विश्वनाथ मन्दिर परिसर का सौंदर्यीकरण जब हुआ तब  बनारस में ही उसका पुरजोर विरोध हुआ। लेकिन जब वह  नये स्वरूप में सामने आया तो पर्यटकों की संख्या में कल्पनातीत वृद्धि हुई जिससे स्थानीय  अर्थव्यवस्था में भी जबरदस्त उछाल आया। उसके बाद अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण पर भी विघ्नसंतोषी तत्वों ने अनर्गल प्रलाप किया। लेकिन  निर्माण के एक वर्ष बाद ही अयोध्या  वैश्विक आकर्षण का केंद्र बन गयी। प्रयागराज में संपन्न महाकुंभ के दौरान जितने श्रृद्धालु आये उनमें से ज्यादातर ने अयोध्या और बनारस के साथ ही चित्रकूट की यात्रा भी की। मोटे अनुमान के  अनुसार महाकुंभ को वैश्विक स्तर पर प्रचारित करने के कारण  विदेशी पर्यटकों के अलावा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बसे भारतवंशी हिन्दू भी लाखों की संख्या में आये।  इससे  हर व्यवसाय को जबरदस्त कमाई हुई जिसका लाभ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को स्वाभाविक रूप से मिला। म.प्र में उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर परिसर का भी बनारस के विश्वनाथ मंदिर जैसा विकास किये जाने का सुपरिणाम वहाँ आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि के तौर पर देखने मिल रहा है। निकटवर्ती ओंकारेश्वर भी ऐसे ही परिणाम दे रहा है। इस सबसे उत्साहित होकर वृंदावन के प्रसिद्ध बिहारी  जी के मंदिर और गुवाहाटी की  कामाख्या शक्तिपीठ को भी विकसित करने का कार्य शुरू हुआ है।  प्रधानमंत्री की सोच ये है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता पूरे विश्व में अनोखी है। इसलिए प्रत्येक राज्य यदि अपने यहाँ कोई बड़ा पर्यटन केंद्र विकसित करे तो उसमें वहाँ की झलक होगी। बीते दो - तीन दशक में भारत में मध्यमवर्गीय परिवारों में भी पर्यटन के प्रति ललक पैदा हुई है। धार्मिक यात्राओं की तो परंपरा सदियों पुरानी है किंतु उसका स्वरूप बदला है। सड़कों के साथ ही अन्य सुविधाओं के विकास के कारण उत्तराखंड की चार धाम यात्रा उस पिछड़े राज्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान दे रही है।  राजस्थान के अलावा जिन राज्यों में पहाड़ी पर्यटन स्थल हैं वहाँ पर्यटकों का आना होता है किंतु आज भी ऐसे अनेक अछूते स्थान हैं जिनमें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों तो सैलानियों की आवाजाही में वृद्धि हो सकती है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में आदि कैलाश नामक स्थान पर जाकर उसका प्रचार किया जहाँ से छोटे कैलाश नामक पर्वत के दर्शन होते हैं। उसके बाद से ही वह स्थल तेजी से लोकप्रिय हो गया। कहने  का आशय ये है कि पर्यटन आधुनिक अर्थव्यवस्था में काफी महत्वपूर्ण हो गया है। विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने के अलावा  उन भारतीय पर्यटकों को विदेश जाने से रोकने के लिए भी जरूरी है कि भारत के पर्यटन उद्योग को वैश्विक स्तर पर विकसित किया जाए। आज भी भारत दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र है किंतु आवश्यक सुविधाओं और पेशेवर कार्यशैली के अभाव में जितने सैलानी  आने चाहिए उतने नहीं आते। दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के बाद पर्यटन उद्योग को वैश्विक स्वरूप देना भी समय की मांग है क्योंकि इससे आर्थिक प्रगति को मजबूत आधार मिलता है। मालदीव, मॉरीशस, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और दुबई इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। और अब तो सऊदी अरब भी इस बारे में सोचने लगा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 24 May 2025

न्यायमूर्ति श्री ओक की टिप्पणी पर गंभीरता से विचार जरूरी


किसी और ने ये कहा होता तब शायद उस पर ध्यान नहीं जाता किंतु गत दिवस सेवा निवृत्त हुए  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अभय. एस. ओक ने विदाई भाषण में जो टिप्पणियां कीं वे न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और छवि को लेकर जारी विमर्श में एक नया आयाम जोड़ सकती है। उन्होंने  प्रधान न्यायाधीश की उपस्थिति में कहा  कि सर्वोच्च न्यायालय से  ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से उच्च न्यायालयों में काम होता है क्योंकि वे कमेटियों के जरिए कार्य करते हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय प्रधान न्यायाधीश केंद्रित है। उन्होंने मामलों में ऑटो लिस्टिंग की जरूरत पर बल देते हुए स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय  में एक निश्चित रोस्टर होता है। इसमें प्रधान न्यायाधीश  को भी विवेकाधिकार नहीं मिलता। इसलिए जब तक हम मानवीय हस्तक्षेप को  कम कम नहीं कर देते, तब तक हम बेहतर लिस्टिंग नहीं कर सकते। न्यायामूर्ति श्री ओक की उक्त टिप्पणी  सर्वोच्च न्यायालय के  उन तमाम न्यायाधीशों की पीड़ा की अभिव्यक्ति है जो इस बात से नाराज रहते हैं कि  कि कौन सा मामला किस न्यायाधीश को सौंपा जाए ये प्रधान न्यायाधीश की मर्जी पर निर्भर है। जनवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के 4 वरिष्ट न्यायाधीशों ने उसी  परिसर में पत्रकार वार्ता के जरिये तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर प्रशासनिक अनियमितताओं के जो आरोप लगाए थे उनके मूल में भी वही भाव थे जो श्री ओक द्वारा विदाई समारोह में व्यक्त किये। उनका ये कथन भी बेहद तीखा था कि सर्वोच्च न्यायालय उम्मीदों को पूरा नहीं कर सका।  श्री ओक ने जाते - जाते अपनी कर्तव्यपरायणता का परिचय देते हुए आखिरी कार्यदिवस पर  11 फैसले लिखे।एक दिन पहले ही उनकी माँ का निधन हुआ था जिनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के बाद वे दिल्ली लौट आये। हालांकि एक बात ये खटकती है कि उच्च पदों पर विराजमान महानुभाव अपने कार्यकाल के दौरान तो प्रचलित व्यवस्था के साथ जुड़कर काम करते रहते हैं और सेवानिवृत्त होने वाले दिन या उसके बाद वे उस उसके विरोध में मुँह खोलते हैं । आजकल भूतपूर्व होने के बाद किताबें लिखकर चर्चा में आने का चलन भी है। ये बात सही है कि पद पर रहते हुए उससे जुड़ी सेवा शर्तों की मर्यादा का पालन करना पड़ता है लेकिन किसी भी विवेकशील व्यक्ति से सदैव अपेक्षा रहती है कि वह सेवाकाल में भी गलत  बातों का विरोध करने का साहस दिखाये ।  पद से हटने के बाद ऐसी बातों को सम्बन्धित व्यक्ति के मन में असंतोष अथवा कुंठा से जोड़कर देखा जाता है। फिर भी  श्री ओक ने  विदाई भाषण में  सर्वोच्च न्यायालय के बारे में जो कुछ भी कहा  और सुझाव दिये वे निश्चित रूप से विचारणीय हैं। न्यायापालिका के बारे  में ये चर्चा आम है कि सुनवाई हेतु प्रकरणों के आवंटन में पक्षपात होता है। इसे न्यायपालिका में व्याप्त गुटबाजी के रूप में भी देखा जाता है।  सामान्य तौर पर  न्यायपालिका में व्याप्त बुराइयों की जो चर्चा होती है वह अपनी जगह है किंतु जब सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा प्रधान न्यायाधीश के सामने ही ये कहा जाए कि देश की सबसे बड़ी अदालत में शक्तियों का केंद्रीकरण उसके सबसे बड़े ओहदेदार के पास है तो ये बड़ी बात है। वैसे  न्यायपालिका पर भ्रष्टाचार के आरोप अब चौंकाते नहीं हैं। किसी अधिकारी या राजनेता पर मामला दर्ज करने के लिए कुछ घंटों का समय देने और फिर लगाई गई धाराओं को कमजोर बताने वाली न्यायपालिका उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश के  यहाँ करोड़ों रूपये नगद जप्त होने के बाद भी अब तक पुख्ता कारवाई नहीं कर पाई। इसीलिए न्यायमूर्ति श्री ओक का ये कहना उचित प्रतीत होता है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने आपको उम्मीदों पर खरा साबित नहीं कर सका। देखना ये है कि  मामलों के आवंटन में प्रधान न्यायाधीश की मनमर्जी का जो मुद्दा श्री ओक ने जाते - जाते छेड़ दिया उस पर प्रधान न्यायाधीश श्री गवई क्या कदम उठाते हैं या फिर रात गई, बात गई की तर्ज पर इस विषय को भी उन प्रकरणों की तरह ठंडे बस्तों में डाल दिया जाएगा जो दशकों से लंबित पड़े हुए है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी