Monday, 30 June 2025

याद न जाए बीते दिनों की ...



आज 1 जुलाई है । 

बचपन में गर्मियों की छुट्टियां ननिहाल में बिताने के बाद जबलपुर लौटने पर ये तारीख मानों पैरोल खत्म होने का एहसास करवाती थी।
शिक्षा मनुष्य के विकास के लिए जरूरी है।लेकिन पारिवारिक रिश्तों की अहमियत सीखना भी बच्चों के लिए उतना ही जरूरी है ।
दादा -दादी , चाचा -ताऊ , चाची-ताई , बुआ फूफा , नाना -नानी , मामा - मामी , मौसा - मौसी  भाई-बहिन के अलावा भी गांव -मोहल्ले के मुंह बोले रिश्ते जीवनपर्यंत निभाने के संस्कारों को पुनर्जीवित करना नितांत आवश्यक है जिससे हमारे नौनिहालों को इंडिया छोड़ भारत में अनुराग हो।

उन्हें समोसे , मंगोड़े , पकोड़े , कचौड़ी , सेव ,चूड़ा , गोलगप्पे और रबड़ी मलाई की कुल्फी भी खिलाते  रहें ताकि वे पिज़्ज़ा और बर्गर और कोल्ड ड्रिंक के ही न होकर रह जाएं।
उनके बचपन को समय से पहले विदा होने से बचाइए वरना मौजूदा दौर में जो सामाजिक विकृतियां पैदा हो रही हैं उन्हें कोई नहीं रोक सकेगा ।
आप जिस धर्म या पंथ के हों उसकी प्रार्थना में बच्चों को अवश्य साथ रखें जिससे उन्हें अपनी बुनियाद याद रहे ।
संस्कृति के इस संक्रान्तिकाल में बाल्य और किशोरावस्था के बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि शाला कितनी भी अच्छी और महंगी हो , लेकिन संस्कारों की जो शिक्षा परिवार में मिलना सम्भव है वह और कहीं नहीं ।
हो सके तो बच्चों के साथ खेलिये वरना वे एकाकीपन का शिकार होकर मोबाइल और टीवी में दोस्त तलाशने लग जाएंगे जो बाद में आपको नागवार गुजरेगा ।
ध्यान रहे माता - पिता ही बच्चे के सबसे अच्छे शिक्षक और साथी होते हैं ।
बच्चों की हर जिद पूरी करने की बजाय उन्हें समझाएँ कि वैसा करना क्यों सम्भव नहीं , वरना वे उसके आदी हो जाएंगे।
आज जब आधी सदी पीछे की स्मृतियों को क्रमशः कुरेदता हूँ तो पता चलता है कि रिश्तों और परिवार की परवरिश का व्यक्ति के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान होता है ।
समय कभी लौटकर नहीं आता लेकिन उसके पदचिन्ह कभी मिटते नहीं। बरबस पुरानी स्मृतियां आकर मन के दरवाजे खटखटाती हैं । अक्सर बच्चों को विद्यालय जाते देखकर बहुत कुछ याद जाता है । पुराने संगी - साथी , गुरुजन और उन सबसे जुड़ी यादें।
मेरा आशय किसी को उपदेश देने का नहीं अपितु अपने माता-पिता ,गुरुओं और परिवारजनों से जो सीखा और पाया उसे सबके साथ बांटना भी तो मेरा फर्ज है ।
और फिर यादों को अपने तक समेटकर रखना भी आसान नहीं होता।
जीवन की इस पायदान पर जब लगता है कि हमने सब कुछ पा लिया और जी लिया तब कपड़े का वह साधारण बस्ता टांगकर पैदल शाला जाने का उत्साह और उमंग याद आ गये , जिसके आगे आज अपने लैपटॉप का बैग और ब्रीफ़केस बोझ लगते हैं ।

कवि शैलेन्द्र के एक गीत की ये पंक्तियां शायद इसीलिए होठों पर गाहे बगाहे आ जाया करती हैं :-
दिन जो पखेरू होते , पिंजरे में मैं रख लेता।
पालता उनको जतन से , मोती के दाने देता।
सीने से रहता लगाए,
याद न जाए बीते दिनों की ....

- रवीन्द्र वाजपेयी

पुरी हादसा : अव्यवस्था का हिस्सा बनने से बचें


उड़ीसा में  जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा एक विश्वस्तरीय वार्षिक आयोजन है। यूँ तो भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा का उत्सव पूरे देश में कहीं बड़े तो कहीं साधारण स्तर पर मनाया जाता है किंतु जगन्नाथ पुरी  आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों में है जहाँ जगन्नाथ जी का ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इस मंदिर के साथ अनेक चमत्कारी बातें जुड़ी हुईं हैं जिन्हें लेकर वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित हैं। उदाहरण के लिए मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज हवा की विपरीत दिशा में फहराता है। इसके अलावा भी जगन्नाथ जी की मूर्तियों के साथ जुड़ी ऐसी बातें हैं जिनका रहस्य आज तक कोई नहीं जानता। पुरी के नाम से प्रसिद्ध समुद्र के किनारे स्थित इस प्राचीन और पवित्र नगरी में साल भर श्रृद्धालुओं का आना - जाना लगा रहता है ।  इसके अलावा अन्य धार्मिक स्थलों की तरह से ही पुरी भी पर्यटकों की बड़ी पसंद बन गई है। लेकिन रथ यात्रा महोत्सव के दौरान यहाँ जनसैलाब उमड़ पड़ता है। उड़ीसा सरकार भी इसका खूब प्रचार करती है जिससे यह उत्सव धार्मिक पर्यटन का रूप लेने लगा है। साल दर साल रथ यात्रा में आने वालों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए सरकार के अलावा पर्यटन व्यवसायी भी काफी व्यवस्थाएं करते हैं किंतु  हर साल कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है जिससे समूची व्यवस्था पर उंगली उठती है। गत दिवस भी हादसे की पुनरावृत्ति हो गई जब मुख्य मंदिर के अलावा  एक मंदिर में धक्का - मुक्की के कारण 3 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ गया वहीं लगभग 100 घायल हैं। उनमें से कुछ की हालत गंभीर है। पुरी के वरिष्ट  प्रशासनिक अधिकारियों को हटाकर दूसरे पदस्थ किये गए हैं। मुख्यमंत्री ने माफी भी मांगते हुए स्वीकार किया है कि ये लापरवाही क्षमा योग्य नहीं हैं। जैसा होता आया है इस घटना के बाद भी  मृतकों के परिजनों को मुआवजे और घायलों के  मुफ्त इलाज की मेहरबानी सरकार द्वारा की जाएगी। एक जांच दल बनेगा जिसकी रिपोर्ट आते - आते अगली रथ यात्रा आ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। सरकारी अमले के कुछ लोग निलंबित होंगे और फिर सब सामान्य हो जाएगा। भारत में धार्मिक स्थलों पर जानलेवा हादसे अब स्थायी हो चले हैं। महाकुंभ में तो करोड़ों लोगों की उपस्थिति होने से कोई अनहोनी अस्वाभविक नहीं कही जाती किंतु प्रति वर्ष किसी न किसी मंदिर में  श्रृद्धालुओं की भीड़ व्यवस्थाओं पर भारी पड़ जाने से धक्का- मुक्की में लोग मारे जाते हैं। उत्तराखंड स्थित चार धाम की स्थिति भी ऐसी ही है। विशेष धार्मिक आयोजनों के पहले शासन और प्रशासन हरसंभव व्यवस्था का दावा करते हैं किंतु भीड़ उनके अनुमान से अधिक होने के अलावा अनुशासन तोड़ने पर आमादा रहती है। उससे भी बड़ी समस्या है वी. आई.पी जो अपने ओहदे की ठसक दिखाते हुए सभी इंतजामों की धज्जियां उड़ा देते हैं। पुरी में भी कल हुए दर्दनाक हादसे में भी उनके लिए की गई  विशेष व्यवस्था को जिम्मेदार माना जा रहा है।  दरअसल इस प्रकार की दुर्घटनाओं की सच्चाई कभी सामने नहीं आती क्योंकि जो शासन और प्रशासन इसके लिए कसूरवार होता है , जाँच भी उसी के नियंत्रण में होती है। लेकिन दुर्भाग्य का विषय ये है कि ऐसे हादसों से जनता कोई सबक नहीं लेती जबकि जान का खतरा उसे ही रहता है। सूचना क्रांति के इस युग में भीड़ और यातायात की जानकारी प्रसारित होते रहने के बाद भी लोग आयोजन में शामिल होने का दुस्साहस करते हैं। धर्म के प्रति आस्था भारत की आत्मा है किंतु उसका पालन करते समय अनुशासन का ध्यान रखना भी आवश्यक है। भीड़ के प्रबंधन में लगे शासकीय तंत्र की भी अपनी सीमाएं और क्षमता होती है। ऐसे में बुद्धिमत्ता इसी में है कि सरकारी प्रबंध पर पूरी तरह निर्भर न रहते हुए अपनी और अपनों की हिफ़ाजत  के प्रति सतर्क रहें। रथ यात्रा अगले साल भी होगी लेकिन जो ज़िंदगी से हाथ धो बैठे उनको ये अवसर दोबारा नहीं मिलेगा। आस्था का पालन स्वागतयोग्य है किंतु उसके अतिरेक से बचना चाहिए। तीर्थ यात्रा के पीछे मोक्ष की कामना छिपी होती है लेकिन वह धक्का - मुक्की में कुचलकर मर जाने से प्राप्त नहीं होता। विवेकशीलता यही है कि हम व्यवस्था का हिस्सा बनें , अव्यवस्था का नहीं।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 28 June 2025

उद्धव और राज : फ्यूज बल्बों से रोशनी नहीं होती


भाषावार प्रांतों के गठन ने क्षेत्रीयता को कितना बढ़ावा दिया ये किसी से छिपा नहीं है। आजादी के बाद राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर विभिन्न राज्यों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करते हुए उन्हें नये नाम भी दिये गए। कालांतर में कुछ ने अपना नाम फिर बदला । उदाहरण के लिए मद्रास को तमिलनाडु और मैसूर को कर्नाटक नाम मिला। इसके पीछे भाषायी आधार पर अपनी पहिचान स्थापित करने का उद्देश्य ही था। इस भावना ने अलगाव के बीजों को खाद - पानी देकर अंकुरित होने में मदद की। रोचक बात ये है कि भाषा के नाम पर क्षेत्रीय अस्मिता की आवाज बुलंद करने वालों में लेखक, कवि या साहित्यकार वर्ग से ज्यादा राजनीतिक नेता ही सामने आते रहे और उनमें भी राष्ट्रीय पार्टियों के कम और क्षेत्रीय दलों से जुड़े चेहरे अधिक  हैं। वैसे तो भाषा के नाम पर अनेक राज्यों में जनभावनाएं भड़काने का खेल चलता है लेकिन उनमें तमिलनाडु सबसे अग्रणी है। वहाँ चूंकि दो प्रमुख क्षेत्रीय दल ही अनेक दशकों से सत्ता पर काबिज हैं लिहाजा राष्ट्रीय पार्टियाँ भावनात्मक मुद्दों पर खुलकर नहीं बोल पातीं। तमिल भाषा के समर्थन की आड़ में वहाँ की दोनों बड़ी पार्टियों द्वारा हिन्दी के विरोध को अपना हथियार बना रखा है।  समय - समय पर अन्य राज्यों में भी भाषा के नाम  पर वातावरण खराब करने का षडयंत्र रचा जाता है। ताजा उदाहरण है महाराष्ट्र का जहाँ केंद्र की नई शिक्षा नीति में हिन्दी की शिक्षा अनिवार्य किये जाने के विरोध में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे बैर भूलकर साथ आने के संकेत दे रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस साफ तौर पर कह चुके हैं कि मराठी भाषा की उपेक्षा कर हिन्दी लादने की बात  गलत है। लेकिन ठाकरे बंधुओं, की पार्टियां  हिन्दी के विरोध को  राजनीतिक मुद्दा बनाकर उन मराठी भाषियों को वापस अपने पाले में खींचना चाहते हैं जो धीरे - धीरे भाजपा की तरफ झुकते चले गए। एक जमाना था जब स्व. बाल ठाकरे मुंबई और निकटवर्ती जिलों के बेताज बादशाह हुआ करते थे। जब राज ठाकरे ने अलग पार्टी बनाई तब नासिक सहित कुछ इलाकों में उनका सिक्का चलने लगा। नब्बे के दशक में भाजपा के साथ गठबंधन  करने करने के बाद शिवसेना का फैलाव तो पूरे राज्य में हो गया लेकिन अपनी तेज - तर्रार छवि के बावजूद राज की पार्टी मनसे कुछ खास नहीं कर सकी। बाल ठाकरे के अवसान के बाद उनके बेटे उद्धव ने शिवसेना की कमान संभाली जिन्हें वे अपना उत्ताधिकारी बना गए थे और उसी कारण राज ने पार्टी और परिवार छोड़ा था। उद्धव ने  उत्तर भारतीयों के विरोध की नीति को काफी हद तक लचीला किया और हिन्दी के प्रति भी दुराग्रह में कमी की । दूसरी तरफ राज अपने पुराने अंदाज में ही नजर आते रहे किंतु बाल ठाकरे की विरासत उद्धव के पास आकर ठहर गई। भाजपा का  साथ मिलने से उनकी पार्टी बड़ी ताकत बन गई। लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी की सत्ता कायम होते ही भाजपा ने शिवसेना से बड़े भाई का ओहदा छीनने की रणनीति बनाई। कुछ  समय तक हिंदुत्व दोनों को जोड़े रहा किंतु  रूठने - मनाने का सिलसिला नहीं रुका।  अंततः अलगाव हो ही गया और वह भी ऐसा कि उद्धव ठाकरे अपने पिता की पुण्याई को समुद्र में  डुबोकर सत्ता की लालच में उस कांग्रेस और शरद पवार की गोद में जा बैठे जो हिंदुत्व के नाम से ही बिदकते थे। यहाँ तक कि सपा का साथ भी उन्होंने स्वीकार किया जिसके नेता स्व. मुलायम सिंह यादव ने राम भक्तों पर गोली चलवाने जैसा महापाप किया था। इस वजह से उनकी पार्टी टूट गई और सत्ता भी हाथ से खिसक गई। पिछले विधानसभा चुनाव में उद्धव वाली Bशिवसेना का सितारा पूरे तौर पर डूब चुका है। उधर  राज किसी मुकाम पर नहीं पहुँच पा रहे। प्रदेश सरकार के पास भारी बहुमत है। उद्धव बीमार हैं और राज का जनाधार सिमट चुका है। ऐसे में अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने से  दोनों को अपने बेटों की चिंता सताने लगी है जिनकी जनता के बीच कोई पकड़ नहीं है। क्योंकि शिवसेना के मूल चरित्र से  उनका व्यक्तित्व मेल नहीं खाता। लगता है हिन्दी  विरोध का सहारा लेकर बेटों को स्थापित करने दोनों वरिष्ट ठाकरे दुश्मनी भुलाकर निकट आ रहे हैं किंतु  ये दाँव पहले भी कारगर नहीं हुआ और आगे भी नहीं होगा क्योंकि जिस मुंबई से  ठाकरे खानदान की पहचान जुड़ी रही वह खुद ही मराठीभाषियों के वर्चस्व से मुक्त है। भले ही उद्धव और राज, भाषायी उन्माद फैलाकर उपद्रव की स्थिति उत्पन्न करने का दुस्साहस करें किंतु महाराष्ट्र और तमिलनाडु की राजनीति और सोच में बड़ा अंतर है। तमिलनाडु के नेता और अभिनेताओं की छवि सीमित क्षेत्र में ही है जबकि महाराष्ट्र से निकली शख्सियतों को देश भर में प्रसिद्धि और दुलार मिलता रहा। लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न न मिला होता तब भी वे देश भर में सम्मानित थे जबकि वह छवि एम. जी. राम चंद्रन की नहीं बन सकी। ठाकरे बंधु ये भूल जाते हैं की मुंबई हिन्दी फिल्मों का गढ़ है। ये देखते हुए उनकी हिन्दी विरोधी मुहिम पानी के बुलबुले से ज्यादा कुछ नहीं है। वैसे भी फ्यूज बल्बों से रोशनी नहीं होती। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 June 2025

चीन को जोर का झटका धीरे से दिया राजनाथ ने

  

चीन में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन 
(एस सीओ) की बैठक के बाद संयुक्त घोषणापत्र जारी नहीं हो सका। इसका कारण भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे रक्षा मंत्री राजनाथ का विरोध था जिन्होंने ये कहते हुए  हस्ताक्षर करने से इंकार किया कि घोषणापत्र के प्रारूप में न तो पहलगाम में हुए आतंकी हमले का  उल्लेख था और न ही आतंकवाद संबंधी भारत की चिंताओं को स्थान दिया गया। लेकिन चीन और पाकिस्तान की सांठ - गांठ से बलूचिस्तान में चल रहे संघर्ष का जिक्र आतंकवाद के रूप में किया गया जिस पर  श्री सिंह ने कड़ी आपत्ति जताते हुए दस्तखत से मना कर दिया। ये निश्चित रूप से बड़ा निर्णय था जिसके जरिये भारत ने  कूटनीतिक दृढ़ता के साथ ही इस संगठन के बाकी सदस्यों को ये एहसास करवा दिया कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा  के लिए  आतंकवाद का विरोध करने में पीछे नहीं हटेगा। स्मरणीय है शंघाई सहयोग संगठन दस सदस्य देशों का एक यूरेशियन राजनीतिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा और व्यापार संगठन है। इसकी स्थापना 2001 में चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस , ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान की ओर से की गई थी। बाद में भारत, पाकिस्तान  ईरान और बेलारूस भी इसके सदस्य हो गए थे।  फिलहाल  चीन ही इसका अध्यक्ष  है। इसलिए उसको  लगा कि वह इस बैठक  में सब कुछ अपनी मर्जी से करवा लेगा। ये बात भी सही है कि इस संगठन की सबसे ज्यादा जरूरत उसी को है क्योंकि वन बेल्ट वन बेल्ट सड़क के जरिये वह अपने व्यापारिक हितों को साधना चाह रहा है। चूंकि पाकिस्तान के बिना यह महत्वाकांक्षी परियोजना पूरी नहीं हो सकती इसलिए चीन उसकी हर गलती पर पर्दा डालने तत्पर रहता है। पहलगाम हमले की उसने निंदा तो की थी किंतु उसमें पाकिस्तान का हाथ होने के  आरोप पर उसका रवैया गोलमोल  रहा और इसीलिए उसने उस घटना की निष्पक्ष जाँच की मांग करते हुए परोक्ष तौर पर पाकिस्तान को बेगुनाह साबित करने का प्रयास किया। इसी तरह जब भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट करने के लिए  ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया तब चीन ने पाकिस्तान को अपना पक्का दोस्त बताकर भारत पर दबाव बनाने का दांव चला था। पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियार और लड़ाकू विमान देकर चीन वैसे भी भारत की सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करता रहता है। संरासंघ में जब भी भारत ने आतंकवाद के सवाल पर पाकिस्तान को घेरना चाहा चीन ने वीटो का उपयोग कर उसका बचाव किया। ऐसे में उससे किसी सदाशयता की आशा करना तो फिजूल  है किंतु बतौर मेजबान उसका फ़र्ज़  था कि वह उसके देश में आये अतिथियों को नाराज न होने देता। लेकिन उसकी कूटनीति धूर्तता से भरी हुई होती है। एससीओ बैठक में भी वह इससे बाज नहीं आया तभी उसे बलूचिस्तान में तो आतंकवाद नजर आ गया लेकिन पहलगाम के हत्याकांड की निंदा  जरूरी नहीं लगी। उसका सीधा - सीधा  कारण ये है कि उस घटना के तार सीधे - सीधे पाकिस्तान से जुड़े हुए थे। चीन को ये उम्मीद थी कि भारत थोड़े से ना - नुकूर के बाद संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर देगा किंतु  रक्षा मंत्री श्री सिंह ने उसकी चाल को समझते हुए मना कर दिया। उल्लेखनीय है आगामी अगस्त में एससीओ का शिखर सम्मेलन भी चीन में ही आयोजित होने जा रहा है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिस्सा लेना  है। कूटनीतिक क्षेत्रों में चर्चा है कि सम्भवतः वे नहीं जाएंगे। इसका कारण हाल ही में चीन द्वारा लगातार भारत विरोधी गतिविधियों का समर्थन किये जाने के अलावा ये भी है कि दिल्ली में हुए जी-20 देशों के सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी नहीं आये थे । बहरहाल , एससीओ की बैठक में राजनाथ सिंह ने जो पैंतरा दिखाया वह महज एक संकेत है इस बात का कि चीन की चालाकी और चालबाजी को भारत समझता है। कूटनीति में इस तरह के फैसले दूरगामी असर डालते हैं। संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने से मना कर रक्षा मंत्री ने चीन को उसी के घर में जोर का झटका धीरे से दे दिया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 26 June 2025

जान बचाने अमेरिका के आगे झुके खामेनेई


इजराइल और ईरान के बीच भले ही युद्धविराम हो गया लेकिन शत्रुता का भाव बरकरार है। दोनों अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। युद्धविराम करवाने का श्रेय श्रेय लूटने में वैसे तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प आगे - आगे हो रहे हैं लेकिन दूसरी चर्चा ये भी है कि कतर स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर ईरान के सांकेतिक हमलों के बाद कतर के शासक शेख तमीम ने ईरान पर दबाव डाला जिससे वह भी जंग रोकने राजी हो गया। वरना अमेरिका द्वारा उसके परमाणु संयंत्रों पर बड़े विमान गिराए जाने के बाद जो  खामेनेई अमेरिका को नतीजा भुगतने की धमकी दे रहे थे वे अचानक ठंडे नहीं पड़ते। इस जंग में जीत हार का आकलन भी अपने - अपने नजरिये से हो रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि ईरान काफी बड़ा देश है जिसके पास अकूत तेल संपदा है। उसकी भौगोलिक स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण है। उसकी तुलना में इजराइल बहुत छोटा देश है जिसके चारों तरफ मुस्लिम देश हैं किंतु उसने ईरान के सभी प्रमुख सेना प्रमुखों के अलावा दर्जनों परमाणु वैज्ञानिकों को चुन - चुनकर मार दिया। यही नहीं तो ईरान के सैन्य प्रतिष्ठानों को भी काफी नुकसान हुआ। युद्धविराम के दो दिन पहले अमेरिका ने उसके परमाणु संयंत्रों पर जो बमबारी की उसके बाद ये दावा विश्वास योग्य नहीं है कि उनको मामूली क्षति पहुंची और ईरान का परमाणु कार्यक्रम जारी रहेगा । यदि इसमें  सच्चाई होती तब खामेनेई भला युद्धविराम के लिए क्यों राजी हुए जबकि पूरी दुनिया में ईरान समर्थक ये ढोल पीट रहे हैं कि इजराइल को हरा दिया गया। सही बात ये है कि इजराइल को जो नुकसान हुआ वह निश्चित रूप से  नई बात है क्योंकि उसका रक्षा तंत्र ईरान की सभी मिसाइलों को रोक नहीं सका। इसी कारण उसके एक बंदरगाह और रिहायशी इलाकों में काफी नुकसान हुआ किंतु जहाँ तक मौतों का प्रश्न है ईरान में  मरने वालों की संख्या जहाँ एक हजार से ज्यादा है वहीं इजराइल में 100 से भी कम लोगों की जान गई। ये आंकड़ा ही अपने आप में बहुत कुछ कह देता है। लड़ाई के दिनों में इजराइली हमलों से भयातुर होकर राजधानी तेहरान से लाखों लोग भागकर देश के भीतरी हिस्सों में चले गए जबकि इजराइल की राजधानी तेल अबीब में लोग हमले का सायरन बजते ही बंकरों में चले जाते और खतरा  टलते ही सब सामान्य  हो जाता। ईरान अपनी सैन्य क्षमता का कितना भी बखान करता रहे किंतु आखिरी दो दिनों में वह बदहवासी का शिकार हो चला था। युद्धविराम की घोषणा के बाद इजराइल पर दागी गईं मिसाइलें इसका प्रमाण हैं। लेकिन युद्धविराम के बाद ट्रम्प के जो  बयान आये उनसे लगता है ईरान ने अपने ऐलानिया दुश्मन अमेरिका के साथ कोई समझौता किया है जिसमें खामेनेई की जान बख्शने का प्रावधान भी है। लेकिन इस जंग की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो ये बात स्पष्ट होती है कि 7 अक्टूबर 2023 को  आतंकवादी संगठन हमास ने इजराइल पर राकेट दागकर बर्र के छत्ते को छेड़ने की जो मूर्खता की उसी ने ईरान और इजराइल के बीच युद्ध की नींव रख दी थी। गाजा पट्टी पर हमास का आधिपत्य , अवैध कब्जे जैसा है। इसे ईरान ही पालता - पोसता है। इसके अलावा हिजबुल्ला नामक संगठन भी उसका पालतू है । इनका एकमात्र काम इजराइल को परेशान करना रहा है। लेकिन जब हमास ने पूरे तौर पर हमले  का दुस्साहस करते हुए इजराइलियों की हत्या और अपहरण किया तब जवाबी कार्रवाई में इजराइल ने गाजा को कब्रिस्तान में बदल दिया। ईरान इसके लिए पूरे तौर पर जिम्मेदार था। उसे अपने परमाणु कार्यक्रम पर जरूरत से ज्यादा ग़रूर हो गया था जिसके कारण वह अमेरिका को धमकी देने की जुर्रत करने लगा। लेकिन 12 दिनों की लड़ाई के बाद उसकी परमाणु क्षमता किसी काम नहीं आई । उल्टे उसकी सैन्य शक्ति की कमर टूट गई। थोक में सेना के जनरलों और परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कितना बड़ा नुकसान है ये जानकार लोग बता सकते हैं। युद्ध के दौरान खामेनेई द्वारा उत्तराधिकारियों का चयन भी उनके डर का प्रमाण था। इस लड़ाई में भले ही विजेता का औपचारिक ऐलान करना कठिन है किंतु अमेरिका ने ईरान की अकड़ निकाल दी वहीं इजराइल ने उसे इतना कमजोर कर दिया कि वह हमास और हिजबुल्ला को की मदद करने के बजाय अपनी बर्बादी से उबरने में जुटेगा जिसका संकेत उसे ट्रम्प ने दिया है। आने वाले दिनों में ये साबित हो जाएगा कि इजराइल को नष्ट करने वाला ईरान अमेरिका के इशारों पर उठक -  बैठक करेगा और अपनी जान बख्शने के एवज में खामेनेई अमेरिका की पसन्द के व्यक्ति को सत्ता सौंपने मजबूर होंगे। सच बात बात तो ये है कि ईरान के पड़ोसी मुस्लिम देश भी खामेनेई से नफरत करते हैं क्योंकि उनकी वजह से  प. एशिया बारूद के ढेर पर बैठने मजबूर है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 25 June 2025

जब आधी रात को संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाई गईं

आज 25 जून है । कहने को ये एक तिथि  मात्र है परंतु  आजाद भारत में ये तारीख बेहद महत्वपूर्ण है | आधी सदी पहले आधी रात में तबकी प्रधानमंत्री  इंदिरा गांधी ने संविधान और लोकतंत्र की हत्या का दुस्साहस  किया था ।इसके पूर्व 12 जून  1975 को अलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से श्रीमती गांधी  के विरुद्ध 1971 का लोकसभा चुनाव लड़े समाजवादी नेता स्व. राजनारायण की चुनाव याचिका मंजूर करते हुए उस चुनाव को अवैध  करार दिया | न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा  के उस फैसले ने राजनीतिक भूचाल ला दिया । 1971 में बांग्ला देश के  निर्माण के बाद पूरे विश्व में  इंदिरा जी की प्रशस्ति फैल गई थी। लेकिन  चुनाव अवैध हो जाने के कारण उनकी सत्ता  खतरे में पड़ गई । अपेक्षित तो ये था कि लोकतान्त्रिक मूल्यों की खातिर वे त्यागपत्र  देतीं । लेकिन  जगह -  जगह न्यायमूर्ति . सिन्हा के पुतले जलाए जाने लगे। उनके  छोटे बेटे  स्व. संजय गांधी ने तो ये तक कहा कि करोड़ो लोगों द्वारा चुनी हुई  प्रधानमंत्री को  एक न्यायाधीश भला कैसे हटा सकता है ? उधर विपक्ष इंदिरा जी से  इस्तीफे  की मांग करने लगा । असल में विशाल बहुमत होते हुए भी श्रीमती गाँधी अलोकप्रिय होने लगीं  थीं। गुजरात से 1974 में प्रारंभ छात्र आन्दोलन बिहार होता हुए पूरे  देश में फैल चुका था। सर्वोदयी नेता  स्व. जयप्रकाश नारायण ने उसका नेतृत्व करते हुए  सम्पूर्ण क्रांति का नाम दे दिया । उसके अंतर्गत 6 मार्च 1975 को दिल्ली में जो सर्वदलीय रैली निकली उससे इंदिरा जी चिंतित हो उठीं।  कांग्रेस पार्टी के कुछ नेता भी श्रीमती गांधी के रवैये और संजय के व्यवहार  से  रुष्ट थे । इस तरह से वे चारों तरफ से घिर गईं और  25 जून  1975 की आधी रात में जब  पूरा देश नींद में था तब तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल लगाने वाले  अध्यादेश पर हस्ताक्षर करवा लिए । सुबह होते तक जयप्रकाश नारायण , आचार्य कृपालानी , अटल बिहारी वाजपेयी , चौधरी चरण सिंह , लालकृष्ण आडवाणी , चन्द्रशेखर , मधु लिमये , राजनारायण , मधु दंडवते , नानाजी देशमुख , प्रकाश सिंह बादल आदि को तो गिरफ्तार किया ही गया किंतु  उनके अलावा देश भर से प्रदेश , जिला और तहसील  तक के विपक्षी नेता हिरासत में ले लिए गये ।अभिव्यक्ति की आजादी के साथ ही  मौलिक अधिकार भी निलंबित कर दिए गए । समाचार पत्रों पर सेंसर  लग  गया। जयप्रकाश जी की तुलना हिटलर से की गई।सरकार के प्रचार माध्यम ये माहौल बनाने लगे कि  विपक्ष जनता द्वारा चुनी श्रीमती गाँधी की सरकार को अपदस्थ करने का षडयंत्र रच रहा था ।यद्यपि आपत्काल के औचित्य को साबित करने के लिए जमाखोरों, मुनाफाखोरों सहित अनेक  समाज विरोधी तत्वों  को भी गिरफ्तार  कर लिया गया । लेकिन इस सबका असली कारण अलाहाबाद उच्च न्यायालय का वह  फैसला  ही था  ।  19 महीने देश में श्रीमती गांधी की तानाशाही  चली । लोकसभा का कार्यकाल  एक वर्ष बढ़ाकर  उच्च न्यायालय का फैसला उलट दिया गया । जब लगा कि विपक्ष ठंडा पड़ गया है तब उन्होंने मार्च 1977 में लोकसभा  चुनाव करवाए  जिसमें कांग्रेस पराजित हुई और नई गठित जनता पार्टी की सरकार बन गयी ।  यहाँ तक कि श्रीमती गांधी  रायबरेली और संजय  गांधी अमेठी से चुनाव हार गये । दुनिया के किसी देश के  प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए  संसद का चुनाव हारने का ये पहला अवसर था । हालांकि जनता पार्टी  सरकार भी आपसी खींचतान  के चलते  27 महीने में गिर गई और 1980 में इंदिरा जी की वापिसी हो गई । लेकिन आपातकाल रूपी अपराधबोध के कारण  पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रहीं  । आज जो लोग संविधान को खतरे में बताने का राग अलाप रहे हैं , वे इंदिरा जी द्वारा थोपे गये आपातकाल और उसके दौरान हुए अत्याचारों के बारे में पढ़ें और जानें तब उनको एहसास होगा कि 19 माह का वह दौर कितना भयावह था । हालंकि उस समय की  जनता बधाई की हकदार है जिसने  तानाशाही को उखाड़ फेंका । तबसे हमारा लोकतंत्र मजबूत तो हुआ लेकिन जनता पार्टी की लहर में ऐसे लोग भी प्रथम पंक्ति के नेता बन बैठे जिन्होंने सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम पर प्रस्तुत व्यवस्था परिवर्तन के संकल्प की धज्जियां उड़ाते हुए जातिवाद का जो  जहर फैलाया वही आज  भरतीय राजनीति की पहचान बन गया है । उस दृष्टि से  25 जून हर संविधान प्रेमी के लिए आत्मावलोकन का  दिन है । ये भी अजीब संयोग है कि उस आपातकाल के शिकार नेता और उनकी पार्टियां आज उसी कांग्रेस की सहयोगी  हैं जिसके माथे पर संविधान की हत्या का कलंक है । गत वर्ष नई लोकसभा के शुभारंभ पर काँग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित तमाम नेता संविधान की प्रति लेकर गए थे। देखना है संविधान को सूली पर चढाए जाने  की बरसी पर उनके हाथ में क्या होगा? भले ही राहुल अब मानते हैं कि आपातकाल गलत था लेकिन क्या उनमें इतना साहस है कि वे अपनी दादी द्वारा संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाए जाने की निंदा करें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 24 June 2025

ये जंग उबाऊ हो चुकी है


अपने चिर परिचित नाटकीय अंदाज में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान और इजराइल के बीच लगभग दो सप्ताह से चल रही जंग रुकने का ऐलान कर दिया। इजराइल ने तो ये कहते हुए ट्रम्प से सहमत होते हुए कहा कि उसका उद्देश्य पूरा हो गया लिहाजा वह युद्ध रोकने तैयार है। दूसरी तरफ ईरान ने ट्रम्प की घोषणा से किनारा करते हुए कहा कि यदि इजराइल हमला नहीं करेगा तो  ईरान भी हमलावर नहीं रहेगा। हालांकि ट्रम्प के ऐलान के बाद ही उसने इजराइल पर  मिसाइलें दागीं। उधर इजराइल ने भी दावा किया कि उसने ईरान के एक और परमाणु वैज्ञानिक को मौत के घाट उतार दिया। ट्रम्प की घोषणा का आधार क्या है ये अभी तक किसी को नहीं पता। लेकिन एक बात जरूर सोचने में आ रही है कि तीन बड़े परमाणु संयंत्रों पर भारी बमबारी करने के बाद अमेरिका इस बात पर संतुष्ट है कि ईरान की परमाणु अस्त्र बनाने की क्षमता नष्ट हो चुकी है। इसके बाद युद्ध जारी रखने में उसके अपने हाथ भी जले बिना नहीं रहेंगे। दूसरी तरफ उसे इस बात की चिंता भी होने लगी कि ईरान ने कतर में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर  हमला करने के बाद प. एशिया में उसके अन्य अड्डों को निशाना बनाने की धमकी भी दे डाली। कूटनीतिक क्षेत्रों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद रूस की कड़ी प्रतिक्रिया और उसे परमाणु अस्त्र देने के संकेत ने ट्रम्प को चिंतित कर दिया। इजराइल के पास अस्त्र - शस्त्रों का भंडार खत्म होने की खबर ने भी अमेरिका को परेशान कर दिया। वैसे भी जंग अपना उद्देश्य खोती जा रही है। इजराइल खामेनेई की हत्या करने पर अड़ा हुआ था किन्तु ट्रम्प ने इससे साफ इंकार कर दिया। दूसरी तरफ ईरान को इजराइली हमले के बाद मुस्लिम देशों के अलावा रूस और चीन जैसी महाशक्तियों से वैसा समर्थन नहीं मिल सका जैसा अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों ने इजराइल का किया। कतर ने ईरान के हमले पर जिस  तरह की रोषपूर्ण प्रतिक्रिया दिखाई उसके बाद उसे ये महसूस हुआ होगा कि वह अपने ही इलाके में घिर जाएगा। पाकिस्तान के दोगले रवैये ने भी खामेनेई को निराश कर दिया। हमास और हिजबुल्ला की कमर टूट जाने के बाद ईरान के लिए इजराइल को घेरना कठिन हो चुका था। और फिर भौगोलिक दूरी भी बड़ी दिक्कत है। इजराइल के पड़ोसी जोर्डन और इजिप्ट उसके साथ लड़ाई से तौबा कर चुके हैं। लेबनान भी पिट- पिटकर निराश हो चुका है। सीरिया के टुकड़े होने के बाद इजराइल को पड़ोस से घेरने वाला कोई बड़ा देश बचा नहीं। चूंकि सऊदी अरब ने इस युद्ध में पूरी तरह दूरी बना ली इसलिए भी ईरान को निराशा हुई। लेकिन एक बात जरूर है कि ईरान ने इजराइल ही नहीं अमेरिका को भी हतप्रभ। कर दिया। ऐसे में इजराइल और ईरान दोनों थकने लगे थे। अमेरिका भी सीधे जंग में उतरने का खामियाजा अफगानिस्तान में भुगत चुका है। ऐसे में अब ये जंग उबाऊ होने लगी है। लेकिन ईरान , अमेरिका के इकतरफा प्रस्ताव पर कितना भरोसा करेगा ये फिलहाल कहना कठिन है क्योंकि रूस और चीन उसे अमेरिका के निकट नहीं जाने देंगे। जहाँ तक इस जंग का वैश्विक प्रभाव है तो कच्चे तेल के संकट का खतरा मंडराने लगा है। इसके अलावा ईरान प्रायोजित आतंकवादियों द्वारा भी खाड़ी में उपद्रव मचाने की आशंका है। इजराइल की परेशानी ये है कि ईरान के हमलों ने इजराइल में जिस पैमाने पर तबाही मचाई उसके बाद उसके लिए भी पुनर्निर्माण समस्या है। ऐसे में युद्धविराम की जरूरत दोनों पक्षों को है। हालांकि डोनाल्ड ट्रम्प की बातों पर कितना भरोसा किया जाए ये बड़ा सवाल है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी