Thursday, 8 August 2024

सलमान और सज्जन के बयान से टुकड़े- टुकड़े गैंग और नक्सलियों का हौसला बढ़ेगा

यद्यपि पूरा समाचार जगत विनेश फोगाट को  ओलंपिक कुश्ती प्रतियोगिता के फाइनल में 100 ग्राम ज्यादा वजन के कारण अयोग्य घोषित किये जाने में उलझा है किंतु  दो ऐसी खबरें ऐसी भी हैं जिनका संबंध लोकतंत्र से होने पर भी उनको अपेक्षित महत्व नहीं मिला। गत दिवस कांग्रेस के दो नेताओं के बयानों ने  बवाल मचा दिया। पहले थे म.प्र शासन के पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा । उन्होंने  कहा कि श्रीलंका और बांग्ला देश में जनता ने क्रमशः राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री  के आवास में घुसकर लूटपाट की। भारत में भी प्रधानमंत्री की गलत नीतियों के कारण जो जनता सड़कों पर हिलोरें मार रही है वह उनके आवास में घुसकर  कब्जा कर लेगी। प्रदेश शासन में मंत्री रह चुका व्यक्ति इस तरह की बात करे तो दो ही बातें मन में आती हैं। पहली , यह कि उनका मानसिक संतुलन डगमगा चुका है और दूसरी यह कि वे ऐसे किसी षडयंत्र का हिस्सा हैं जो देश को अराजकता की खाई में धकेलने पर आमादा है। उनका बयान सामने आने के साथ ही कांग्रेस के बड़े नेता और देश के विदेश मंत्री रह चुके सलमान खुर्शीद ने भी कह दिया कि भारत में भी बांग्ला देश जैसे हालात बन सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के बड़े अधिवक्ताओं में उनकी गिनती होती है। उनके पिता खुर्शीद आलम खान  भी केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल रहे। देश के तृतीय राष्ट्रपति डाॅ. ज़ाकिर हुसैन उनके नाना थे। सज्जन  सिंह का तो पता नहीं किंतु श्री खुर्शीद ने विदेश में  पढ़कर कानून की उपाधि अर्जित की थी। पूर्व विदेश मंत्री को इतना तो पता होगा कि उन जैसों के  सार्वजनिक बयान का संज्ञान न केवल देश बल्कि विदेशों तक में लिया जाता है। कल ही पाकिस्तान के टीवी चैनलों ने उनके बयान को आधार बनाते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया कि  भारत के भीतरी हालात भी अराजकता की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि कांग्रेस पार्टी क्या उक्त बयानों को निजी विचार बताकर अपना पल्ला झाड़ सकेगी? श्री वर्मा तो म.प्र तक ही सीमित हैं किंतु श्री खुर्शीद तो कांग्रेस के बड़े चेहरे रहे हैं। गाँधी परिवार से उनकी निकटता भी सर्वविदित है। यद्यपि वे और उनकी पत्नी लुईस लगातार चुनाव हारने की वजह से जनता से कटे हुए हैं किंतु इस तरह के उनके बयान का प्रभाव कांग्रेस पर पड़े बिना नहीं रहेगा। अतीत में भी श्री खुर्शीद के विवादास्पद बयान पार्टी को मुसीबत में डाल चुके हैं। ये बात सच है कि  उन्होंने  और श्री वर्मा ने बांग्ला देश जैसे अराजक हालात भारत में भी उत्पन्न होने जैसा जो बयान दिया वह उन उपद्रवियों को भड़काने का काम करेगा जो इस देश में संविधान और लोकतंत्र को नष्ट करने पर आमादा हैं। इन नेताओं को ये बात समझना चाहिए थी कि इस देश की  जनता स्वभाव से शांतिप्रिय है। 1977 के  लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी थी। पूरे उत्तर भारत में उसका सफाया हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और उनके पुत्र संजय गाँधी तक हार गए। उस दिन पूरे देश में दूसरी आजादी मिलने जैसा माहौल था। यदि वैसा ही पाकिस्तान या बांग्ला देश में होता तो जनता इंदिरा गाँधी के साथ वैसा ही व्यवहार करती जैसा हम उक्त देशों में देखते हैं। श्रीलंका के राष्ट्रपति और बांग्ला देश की प्रधान मंत्री ने जिन परिस्थितियों में देश छोड़ा उनमें उनका जीवन असुरक्षित था किंतु भारत की जनता उस तरह की हिंसात्मक सोच से सर्वथा दूर है। भ्रष्टाचार में लिप्त अनेक शासकों को जनता ने चुनाव के जरिये सत्ता से उखाड़ फेंका किंतु उनको दंडित करने का जिम्मा अदालत पर छोड़ दिया। केंद्र और राज्य में चुनाव हारते ही प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अविलम्ब  स्तीफा देकर नई सरकार के गठन का रास्ता साफ कर देते हैं। आज तक ऐसा नहीं हुआ कि चुनाव हारने के बाद किसी भी प्रधानमंत्री या मुख्यमन्त्री ने सत्ता छोड़ने में आनाकानी की हो। श्री खुर्शीद और श्री वर्मा क्रमशः उस केंद्र और राज्य सरकार में मंत्री रहे जिसने चुनाव में हारते ही सत्ता त्यागकर बहुमत हासिल करने वाली पार्टी को सरकार बनाने का अवसर दिया। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी को कांग्रेस से महज 6 सीटें कम मिलीं। राष्ट्रपति भी उनके कार्यकाल में ही चुने गए थे किंतु सबसे बड़े दल के रूप में कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला। ऐसे अनेक प्रसंगों से भारतीय राजनीति का इतिहास भरा हुआ है। वैचारिक मतभेदों के बावजूद सत्ता परिवर्तन का अधिकार हमारे देश में जनता के पास है। वहीं  सेना देश की रक्षा का काम करती है। किसी प्राकृतिक आपदा या फसाद की स्थिति में भी वह बिन बुलाए नहीं आती। कई बार केंद्र में राजनीतिक अनिश्चितता उत्पन्न हुई। जल्दी - जल्दी चुनाव की नौबत भी आई किंतु सेना ने कभी किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप नहीं किया। ये सब देखते हुए श्री खुर्शीद और श्री वर्मा जैसे अनुभवी राजनेताओं का संदर्भित बयान बहुत ही खतरनाक है जो टुकड़े - टुकड़े गैंग के  अलावा नक्सलियों को सिर उठाने प्रोत्साहित करेगा। इसलिये इन दोनों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कारवाई होनी चाहिए वरना इस तरह के अराजक बयान देने वालों की बाढ़ आ जायेगी।  कांग्रेस को भी इन नेताओं को पार्टी से निकाल बाहर करना चाहिए जो इस देश के लोकतांत्रिक चरित्र को नष्ट करने का घिनौना कार्य कर रहे हैं। 


 -रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 7 August 2024

बांग्ला देशी घुसपैठियों को न खदेड़ा गया तो भारत की अखंडता खतरे में पड़ जायेगी



अनेक अरब देश हैं जहाँ लाखों भारतीय हिन्दू कार्यरत हैं। इस्लामिक कट्टरता यहाँ पूरी तरह लागू है। लेकिन वहाँ से कभी ये खबर नहीं आई कि हिंदुओं को परेशान किया जाता हो या  मुस्लिम बनने का दबाव डाला जाता हो।  दुबई और अबू धाबी में तो मन्दिर बनाने हेतु शासकीय भूमि भी प्राप्त हुई। अर्थात अरब देशों की कट्टर इस्लामिक व्यवस्था में भी हिन्दू आराम से अपनी रोजी - रोटी कमा रहे हैं। भारतीय निर्माण कंपनियों को भी इन देशों में बड़े - बड़े ठेके मिले  हैं। लेकिन ये वातावरण पाकिस्तान और बांग्लादेश में नहीं नजर आता।  कई अरबी देश ऐसे भी हैं जो कश्मीर पर भारत के रुख के विरोधी भी किन्तु उनमें कार्यरत  हिंदुओं को कभी किसी भी तरह से परेशान नहीं किया गया। जबकि भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्ला देश में उन हिंदुओं को भी हर तरह से त्रस्त किया जाता है जो वहाँ के मूल निवासी हैं और पीढ़ियों से वहाँ रह रहे हैं। 1947 में देश का विभाजन धर्म के आधार पर होने के बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमान  भारत में रह गए वहीं लाखों हिंदुओं ने पाकिस्तान के पश्चिमी और पूर्वी हिस्से को ही अपना वतन माना।  भारत में रहने वाले मुसलमान तो पूरी तरह सुरक्षित रहे किन्तु पाकिस्तान में  मुस्लिम कट्टरपंथ रंग दिखाने लगा। और उसी के साथ हिंदुओं के उत्पीड़न की खबरें भी आने लगीं।  हिन्दू मंदिरों के बाहर माँस की दुकानें खोल दी गईं। हिन्दू लड़कियों से जबरन  निकाह करने की घटनाएं तो बीते 76 सालों से चली आ रही हैं। जोर जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन करवाने के मामले भी बढ़ते गए। कहने को वहाँ का कानून इन सबको गलत मानता है किन्तु पुलिस से लेकर न्यायाधीश तक घोर हिन्दू विरोधी होने से कोई सुनवाई नहीं होती। कहा जाता है भारत से गए मुसलमानों को वहाँ मुहाजिर ( शरणार्थी) कहा जाता है। उनको दोयम दर्जे का भी माने जाने की जानकारी है किंतु उन्हें प्रताड़ित करने जैसी घटना अपवाद स्वरूप ही हुई होगी। 1971 में बांग्ला देश के जन्म में भारत की भूमिका पूरी दुनिया जानती है। पश्चिमी पाकिस्तान के सैनिकों ने वहाँ की मुस्लिम आबादी के साथ अमानुषिक अत्याचार किये । लाखों लड़कियाँ व्यभिचार की शिकार हुईं। करोड़ों बंगाली मुस्लिम भागकर भारत आये और वापस नहीं गए। लेकिन पाकिस्तान से मुक्त होते ही वहाँ के मुस्लिम अपने मूल स्वभाव पर लौट आये और जो स्थिति पाकिस्तान में  थी वही बांग्ला देश में बना दी गई। हिंदुओं की हत्या, मंदिरों में तोडफ़ोड़ और धर्म परिवर्तन का दबाव आम हो गया। इन घटनाओं को केवल हिन्दू विरोध मान लेना अर्ध सत्य है। दरअसल इसके पीछे भारत का विरोध है जिसे ये दोनों देश अपना शत्रु मानते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में मुसलमानों के साथ छोटी सी घटना घट जाने पर पूरा मुस्लिम जगत छाती पीटने लगता है जबकि पाकिस्तान और बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर मौन साध लिया जाता है। यहाँ तक कि भारत के  मुस्लिम संगठन तक शांत रहते हैं। कश्मीर घाटी में रहने वाले हिंदुओं को किन हालातों में जान बचाकर भागना पड़ा ये पूरी दुनिया को पता है किंतु किसी भी मुस्लिम नेता ने इस्लामिक  आतंकवाद के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं दिखाया। बांग्ला देश बीते काफी दिनों से जलता रहा है। आरक्षण विरोधी  आंदोलन की परिणिती शेख हसीना सरकार के पतन के तौर पर हुई। लेकिन उसके बाद  वहाँ  हिन्दू मंदिरों को आग के हवाले करने की घटनाएं होने लगीं। आतंकित हिन्दू समुदाय जान बचाकर भारत आने की तैयारी कर रहा है। यदि स्थिति नहीं सुधरी तो भारत पर शरणार्थियों का नया बोझ आने वाला है। सवाल ये है कि पाकिस्तान हो या बांग्ला देश, इन्हें अपने यहाँ रहने वाले हिन्दू बर्दाश्त क्यों नहीं होते ? उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि भारत में करोड़ों मुस्लिम आराम से रहते हैं। हिंदुओं से परेशान होकर भारत से शायद ही कोई मुस्लिम परिवार पाकिस्तान या बांग्ला देश गया हो। इससे ये साबित होता है कि भले ही भारत हिन्दू राष्ट्र न हो किंतु पाकिस्तान और बांग्ला देश में रह रहे हिंदुओं को वहाँ के मुसलमान भारतीय मानकर उनको आतंकित और प्रताड़ित करते हैं।  उक्त दोनों पड़ोसी इस्लामिक देश भूल जाते हैं कि उनकी जनसंख्या से अधिक मुस्लिम आबादी भारत में रहती है। पाकिस्तान तो खैर बना ही भारत से नफरत की बुनियाद पर किंतु बांग्ला देश के निर्माण में तो भारत के सैनिकों ने भी अपना बलिदान दिया था। यदि भारत मैदान में न आता तो जनरल याह्या खां के दरिंदे बंगाली मुस्लिम नस्ल को ही नष्ट करने पर आमादा थे। वहाँ  लाखों लड़कियों को गर्भवती करने के पीछे भी यही सोच रही। बांग्ला देश के ताजा हालात ये साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हम कितने भी सहिष्णु हो जाएं किंतु पाकिस्तान और बांग्ला देश में बसे हिंदुओं के प्रति वहाँ के आम मुसलमान नफरत का भाव रखते हैं। ऐसे में भारत को अब बांग्ला देशियों को भगाने का अभियान छेड़ना ही होगा। यूरोप आज जिस समस्या से जूझ रहा है वह भारत में पैदा करने का जो षडयंत्र रचा जा रहा है उसे समय रहते विफल न किया गया तो देश की अखंडता के लिए खतरा और बढ़ता जायेगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 6 August 2024

हसीना के तख्ता पलट में भारत विरोधी शक्तियों का हाथ


बांग्ला देश में जिस प्रकार से आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन अनियंत्रित होता जा रहा था उसे देखते हुए  शेख हसीना के तख्ता पलट से बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ।  यदि उनकी चचेरी बहिन के बेटे ने, जिन्हें अन्य वरिष्ट अधिकारियों को नाराज कर सेनाध्यक्ष बनाया गया, उन्हें वायुसेना के विमान से भारत भागने में मदद न की होती तो  पिता शेख मुजीबुर्रहमान की तरह उनकी भी हत्या हो जाती। 1971 के मुक्ति संग्राम में भाग लेने वालों को 30 फीसदी आरक्षण  दिये जाने से भड़की हिंसा अंततः उनको ले डूबी। 15 वर्ष से सत्ता पर काबिज हसीना ने इसी वर्ष भारी बहुमत से चुनाव जीता। विपक्षी पार्टी बी.एन.पी ने पहले की तरह उस चुनाव का बहिष्कार किया था। उसकी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में थीं जिन्हें कल ही राष्ट्रपति ने रिहा करने के आदेश दे दिये। जिस तरह  भीड़ ने प्रधानमंत्री निवास में  लूटपाट कर  देश शेख मुजीब की प्रतिमा तोड़ी उससे  स्पष्ट हो गया कि छात्र आंदोलन के पीछे  विदेशी शक्तियों की भूमिका है। 2018 में   उक्त आरक्षण घटा दिया गया तथा हसीना और छात्रों के बीच हुए समझौते के बाद स्थिति सामान्य हो गई किन्तु हाल ही में उच्च न्यायालय ने  उस निर्णय को रद्द करते हुए 30 प्रतिशत को पुनः लागू करवा दिया। उसके बाद ही देशव्यापी हिंसा भड़की। बाद में  सर्वोच्च न्यायालय ने उस फैसले की पलटते हुए आरक्षण की  सीमा 5 प्रतिशत कर दी परंतु  आंदोलन  और उग्र होता गया क्योंकि  उसका उद्देश्य दरअसल हसीना को गद्दी से उतारना था। बीएनपी को घोषित भारत विरोधी माना जाता है। उसके साथ ही जमात ए इस्लामी भी जुड़ गई जिसे हसीना सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा था। इस तरह उनके तमाम दुश्मन एक हो गए किन्तु जैसा प्रारंभ  में कहा गया विदेशी शक्तियाँ  भारत और बांग्ला देश के बीच मजबूत होते रिश्तों में दरार डालना चाह रही थीं  जो हसीना के रहते असंभव था। हालांकि 1971 में अस्तित्व में आने के बाद इस देश में कई बार  सत्ता पलटी किन्तु  ये तख्ता पलट किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा है जिसका रिमोट देश के बाहर है। हालांकि अभी तक उस विदेशी शक्ति का नाम स्पष्ट नहीं है किन्तु अमेरिका, चीन और पाकिस्तान तीनों पर शक की सुई घूम रही है। बी.एन.पी के साथ जमात ए इस्लामी का खड़ा हो जाना यह प्रमाणित करता है कि वहां भारत विरोधी शक्तियाँ शक्तिशाली हो उठीं। सबसे बड़ी बात ये है कि जिस हसीना ने देश को कंगाली से उबारकर  तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बनाया और भारत के साथ बेहतर कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते विकसित किये उसे देश छोड़कर भागना पड़ा।  यद्यपि उनके रहते हुए भी हिंदुओं और उनके मंदिरों पर हमले नहीं रुके , फिर भी वहाँ रह रहे हिन्दू उनके शासन में खुद को  अपेक्षाकृत सुरक्षित  समझते थे। पिछले आम चुनाव में उन्होंने खुलकर हसीना की पार्टी अवामी लीग का समर्थन किया जिससे कट्टरपंथी ख़फ़ा थे।  देखना यह है कि सेनाध्यक्ष  जनरल वकार उज जमान भी क्या पद पर रह सकेंगे क्योंकि सेना के अन्य उच्च अधिकारी उनके विरोधी  हैं।  इस संकट के लिए चीन से हसीना के रिश्ते एकाएक खराब होने को भी कारण बताया जा रहा है। अब अंतरिम सरकार सेनाध्यक्ष जमान बनाते हैं जैसा उन्होंने गत दिवस ऐलान किया या फिर बी.एन.पी और जमात ए इस्लामी उसमें हिस्सेदार बनेंगे , यह स्पष्ट होते ही  कहानी काफी हद तक साफ हो जायेगी। यद्यपि इस्लामिक देशों की राजनीति में रिश्ते मायने नहीं रखते और ऐसे में  हसीना को सुरक्षित देश से निकालने वाले सेनाध्यक्ष आगे भी उनके प्रति वफादार रहेंगे इस पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा। शायद इसीलिए कुछ लोग मान रहे हैं कि तनाव समाप्त होने पर उनकी वतन वापसी संभव हो सकेगी किन्तु छात्र आंदोलन जिस तरह हिंसक हुआ और प्रधानमंत्री के देश छोड़ने के बाद अवामी लीग कार्यकर्ताओं और नेताओं पर हमले हो रहे हैं वह उस संभावना को नकारने वाला है।  भारत के लिए निश्चित रूप से ये चिंता का कारण है क्योंकि पड़ोसी देशों में बांग्ला देश ही था जिससे हमारे संबंध अच्छे चल रहे थे। हसीना ने भारत की बजाय किसी यूरोपीय देश जाने का जो निर्णय लिया उसकी वजह ये भी हो सकती है कि भारत ने उनको आश्रय देने से असमर्थता व्यक्त की हो। कल हिंडन हवाई अड्डे पर सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ उनकी एक घंटे की मुलाकात निश्चित रूप से इसी बारे में हुई होगी। सही बात ये है कि हसीना को शरण देने  पर वहाँ रह रहे हिंदुओं पर संकट और बढ़ सकता था। आने वाले दिन निश्चित तौर पर उहापोह भरे होंगे। लेकिन चिंता का विषय ये है कि यदि ढाका में कट्टरपंथी इस्लामिक शक्तियाँ सत्ता पर काबिज हुईं तो जैसा प. बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुबेन्दु अधिकारी ने आशंका जताई, बांग्ला देश से लाखों हिंदुओं के भारत आने की संभावना है। ज़ाहिर तौर पर वह हमारे लिए चिंता का बड़ा कारण होगा क्योंकि बांग्ला देश से सटे राज्यों के सामने नई समस्या उत्पन्न हो जायेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 5 August 2024

प्रकृति अकारण रौद्र रूप धारण नहीं करती



भारत  के दक्षिणी छोर पर स्थित राज्य केरल के वायनाड में आई  विभीषिका ने पूरे देश को हिला डाला। जिस बड़े पैमाने पर वहाँ लोग मारे गए वह अकल्पनीय है। उसी के साथ पशु भी चपेट में आ गए। गाँव के गाँव बह गए। बड़ी संख्या में लोग लापता हैं । राहत और पुनर्वास चल  रहा है किन्तु भारी वर्षा की वजह से हुए भूस्खलन ने जो नुकसान किया है उसका आकलन केवल आर्थिक आधार पर करना मूर्खता होगी क्योंकि वहाँ भौगोलिक संरचना को जो क्षति पहुंची उसकी भरपाई असंभव है।  वायनाड केरल का अकेला पठारी जिला है । पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला में बसा हुआ ये जिला कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा पर है। दर्शनीय चाय बागानों वाला यह हिल स्टेशन  सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बन गया था। बीती 30 जुलाई की रात जब यहां पर लोग निद्रामग्न थे  तभी  अभूतपूर्व वर्षा के कारण  पहाड़ी ढलानों की धरती सरकने लगी । लोग सुरक्षित जगहों की ओर भागने लगे। लेकिन तब तक अनेक कस्बे भूस्खलन के कारण अस्तित्वहीन हो गए। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।  आपदा का प्रकोप रुकने के बाद जब विशेषज्ञों ने कारणों का पता लगाना चाहा तो ये बात सामने आई  कि भूस्खलन  तब होता है जब पहाड़ और  ढलान पर मिट्टी की कसावट ढीली पड़ जाती है।  केरल के तो लगभग आधे भूभाग में 20 डिग्री से अधिक ढलान है, जिसे  मिट्टी के कटाव और भूस्खलन के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता  है। वायनाड की तो पूरी बसाहट ही ऐसी ही है।  ढलान वाले ऐसे क्षेत्रों में अधिक बरसात होने पर मिट्टी गीली होकर  फिसलने लगती हैं।  वर्ष 2022 में लोकसभा में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा  प्रदत्त जानकारी के मुताबिक  2015 से 2022 के बीच देश में आए 3,782 भूस्खलनों में से 2,239 (करीब 59.2 प्रतिशत) केरल को झेलना पड़े। और उनमें से भी अधिकतर वायनाड और उसके इर्द - गिर्द के इलाकों में हुए। 30 जुलाई की प्रलयंकारी घटना का एक कारण  इस इलाके में पिछले कुछ सालों में  होटल सहित अन्य संरचनाओं का निर्माण भी है। राजनीति भी इसके लिए दोषी है। 2010 में भारत सरकार के पर्यावरण विभाग द्वारा केरल सहित  समूचे पश्चिमी घाट के भू संरक्षण हेतु रणनीति बनाने के लिए जो विशेषज्ञ समिति बनाई उसकी रिपोर्ट  में स्पष्ट था कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह की विकास परियोजनाओं के साथ ही  खनन,  ऊर्जा संयत्र और  बांध बनाने पर भी रोक लगे। लेकिन उद्योगपतियों और राज्य सरकारों के विरोध के कारण उस रिपोर्ट को  केंद्र सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इस प्रकार गुजरात से केरल तक का पूरा पश्चिमी घाट प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए खुला छोड़ दिया गया। एक समिति और बनी जिसने कम से कम खनन पर पूर्णतः रोक लगाने कहा किन्तु उसकी भी अनसुनी की गई। वायनाड  हादसे का स्वरूप बहुत विकराल होने से वह पूरे देश के ध्यान में आ गया किन्तु उसी समय हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी ऐसी ही प्राकृतिक विपदाएं आईं। इन सबका एक साथ विश्लेषण करें तो यही  निष्कर्ष निकलेगा कि सरकार चाहे किसी की हो वह प्रकृति  और पर्यावरण के संरक्षण की बातें तो खूब करती है किन्तु खनन माफिया के हाथों खेलने के साथ ही विकास के नाम पर उनको नुकसान पहुंचाने से भी बाज नहीं आती। पूरी हिमालय पर्वत माला भूकंप के  प्रति बेहद संवेदनशील है। टिहरी बाँध का इसीलिए शुरू से ही विरोध होता आया है। बावजूद इसके पूरे हिमालयी क्षेत्र में सैन्य जरूरतों के अलावा भी जिस प्रकार से सड़कें, बिजली उत्पादन संयंत्र, होटल आदि बनाने दिये गए वे खतरे का कारण हैं। प्रश्न ये है कि  विशेषज्ञों की सलाह यदि सरकार को  माननी ही नहीं होती तब उनकी सेवाएं लेने की औपचारिकता क्यों की जाती है ? यदि पश्चिमी घाट संबंधी रिपोर्ट पर अमल कर लिया जाता तो वायनाड की तबाही से काफी हद तक बचा जा सकता था। ऐसा ही हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड के बारे में कहा जा सकता है। ये तो सच है कि हर प्राकृतिक आपदा का पूर्वानुमान  संभव नहीं होता किन्तु प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते रहने से जब उसका धैर्य टूट जाता है तब ऐसी घटनाएं होती हैं। दुर्भाग्य ये है कि इसके बाद भी हम केवल राहत और बचाव को ही कर्तव्यपूर्ति समझ बैठे हैं। वायनाड में जो हुआ उसका छोटा स्वरूप अतीत में अनेक स्थानों पर देखने मिल चुका है किन्तु उनसे कोई सबक नहीं लेना गंभीर लापरवाही है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि प्रकृति अकारण रौद्र रूप धारण नहीं करती। जब मानवीय हरकतें उसकी सहनशक्ति के बाहर हो जाती हैं तब ही कोई वायनाड होता है। 

-रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 3 August 2024

योगी ने पूरे प्रदेश के गुंडों को संदेश दे दिया


उ.प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2017  में जब सत्ता संभाली तब यह राज्य कानून व्यवस्था के मामले में  बदनाम था। हत्या, अपहरण, लूटपाट, गुंडा टैक्स, महिलाओं से छेड़छाड़, रास्ते में  आभूषण छीना जाना रोजमर्रे की खबरें  थीं। 2007 में  मायावती मुख्यमंत्री बनीं तब उन्होंने भी प्रशासन को चाक - चौबंद किया था किन्तु भ्रष्टाचार की वजह से उनकी सरकार  जनता की नजरों से उतरती चली गई ।  2012 में जनता ने उनको हटाकर सपा को अवसर दिया और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। विदेश में शिक्षित स्व. मुलायम सिंह यादव के पुत्र  अखिलेश ने विकास कार्यों पर तो काफी ध्यान दिया किन्तु कानून व्यवस्था की स्थिति  बदतर होने लगी । थानों में जाति विशेष के लोग पदस्थ किये गए। जिससे सपा  कार्यकर्ता अपने को प्रदेश का मालिक समझने लग गए। पूरा प्रदेश उनकी दादागिरी से त्रस्त हो उठा। सरकारी संरक्षण में  माफिया सरगनाओं का आतंक व्याप्त होने लगा । सूरज ढलते ही महिलाओं का घर से निकलना दूभर हो गया। लड़कियाँ कोचिंग जाने से डरने लगीं। राहजनी, हत्या और बलात्कार राज्य की पहिचान बन गए । लोग उम्मीद करते थे कि मुलायम सिंह ने अपने भाई और सहयोगियों को उपेक्षित कर  जिस अनुभवहीन बेटे की ताजपोशी करवाई वे उसे सरकार चलाने के गुर भी सिखाएंगे । लेकिन  सपा से जुड़े कुछ युवकों द्वारा बलात्कार किये जाने पर उन्होंने बजाय उसकी निंदा करने के ये टिप्पणी कर डाली कि लड़के हैं इस उमर में गलती हो ही जाती है। उससे साबित हो गया कि उ.प्र को अराजकता का पर्याय बनाने के लिए पूरा मुलायम परिवार जिम्मेदार है । अंततः 2017 में उस सरकार का पतन हो गया । 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी का जो तूफान उठा उसमें उ.प्र भी शामिल था । भाजपा ने रिकार्ड तोड़ सफलता अर्जित करते हुए केंद्र में सरकार बनाई। उसके तीन साल पश्चात हुए  विधानसभा चुनाव में भी वही माहौल बना और तब सभी को चौंकाते हुए भाजपा ने गोरखपुर पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया जो उस समय  लोकसभा सदस्य  थे । चूंकि सत्ता चलाने का कोई अनुभव  उन्हें नहीं था ऐसे में उ.प्र जैसे बड़े राज्य को संभालने की उनकी क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक था ।  उनकी सफलता पर संदेह करने वाले उनकी अपनी पार्टी में भी कम नहीं थे। लेकिन इस सन्यासी ने दिखा दिया कि दृढ़ इच्छाशक्ति हो तब गुंडागर्दी रोकना बड़ी बात नहीं होती लेकिन  ईमानदारी भी उतनी ही जरूरी है।  अपने को किसी दायरे में न बांधते हुए उन्होंने पुलिस और प्रशासन को ये हिदायत दे दी कि अपराधी की पहुँच कितनी भी ऊँची क्यों न हो, उस पर  शिकंजा कसा जाना चाहिए।  उनके कुछ फैसले आलोचना का कारण भी बने किन्तु उ.प्र जैसे  सूबे की प्रशासनिक व्यवस्था को उन्होंने जिस मुस्तैदी से संभाला उसकी चर्चा पूरे देश में होने लगी। कुख्यात गुंडे जेल भेजे गए। जिन्होंने  भागने की कोशिश की वे एनकाउंटर का शिकार हुए जिस पर उनकी खूब आलोचना भी हुई किन्तु  उन्होंने अपना अभियान जारी रखा। आज़म खाँ जैसी ताकतवर राजनीतिक शख्सियत को जेल की हवा खिलाकर योगी जी ने  सफेदपोश अपराधियों को भी ये संदेश दे दिया कि नेतागिरी को ढाल बनाकर वे बच नहीं सकते।  इसीलिए वहाँ की जनता ने 2022 में उनको दोबारा सत्ता सौंप दी जिसमें महिला मतदाताओं की बड़ी भूमिका थी जो अपने को उनके राज में सुरक्षित मान बैठी थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस राज्य में भाजपा को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं और सपा - कांग्रेस गठबंधन ने बढ़त हासिल कर ली। मुस्लिम मतदाताओं के इकतरफा भाजपा विरोध तथा आरक्षण खत्म होने के मिथ्या भय के कारण दलित वर्ग के भी दूर होने से भाजपा को चोट पहुंची। हालांकि नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गये किन्तु उ.प्र में ये भ्रम फैलाया जाने लगा कि योगी जी को हटाया जाने वाला है। इसके पीछे भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी है। इस कारण अपराधियों का हौसला बढ़ने लगा। जिसका प्रमाण लखनऊ में किसी स्थान पर पानी भर जाने पर वहाँ से निकलने वाली महिलाओं के साथ की गई अभद्रता से मिला। उस घटना के वीडियो प्रसारित होने से लोगों में आतंक बढ़ने लगा किन्तु योगी जी ने न केवल संबंधित थाने के समूचे स्टाफ अपितु डीसीपी सहित अनेक उच्च पुलिस अधिकारियों को निलंबित करते हुए अपराधियों की अविलंब पहिचान कर गिरफ्तारी के निर्देश दे दिये। उसका असर हुआ। कुछ लोग पकड़े जा चुके हैं और बाकी भी जल्द जेल में होंगे। इस मुस्तैदी से  पूरे प्रदेश में संदेश चला गया कि लोकसभा चुनाव के नतीजों से गुंडा तत्वों को खुश होने की जरूरत नहीं है। और ये भी कि बुलडोजर बाबा किसी भी तरह ढीले नहीं पड़े हैं। इसमें दो मत नहीं है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद योगी जी ने उ.प्र की कानून व्यवस्था में जो अविश्वसनीय सुधार किया उससे अन्य राज्यों को भी  सीखना चाहिए। लखनऊ में महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार पर उनकी सख्त कारवाई ने निश्चित रूप से एक उदाहरण पेश किया है। थाने में बैठे स्टाफ का निलंबन तो बेहद आम है किन्तु डीसीपी सदृश अधिकारियों पर गाज गिराना साहसिक निर्णय है जिसके लिए योगी जी प्रशंसा के पात्र हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 2 August 2024

जो काम राजनेता न कर सके वह सर्वोच्च न्यायालय ने कर दिखाया

ऐसा लगता है इतिहास नई करवट लेने जा रहा है। अनु.जाति/ जनजाति  वर्ग को मिले आरक्षण के भीतर वंचित रह गई जातियों के लिए अलग से कोटा  तय करने का फैसला सुनाकर सर्वोच्च न्यायालय ने जाति की राजनीति करने वाले नेताओं की बोलती बंद कर दी। जरा सी बात पर पत्रकार वार्ता करने वाली  वाली नेताओं की जमात ने उक्त फैसले के बाद जो मौन साध रखा है उससे स्पष्ट है कि आरक्षण की आड़ में जिस नव सामंतवाद का उदय बीते सात दशक में हुआ वह खतरे में पड़ गया है। विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा निर्णय का स्वागत किया जाना भी उनकी मजबूरी है क्योंकि यदि वे विरोध करते तो अनु. जाति/ जनजाति समुदाय का वह वर्ग नाराज हो उठता जिसके पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय खड़ा हुआ है। फैसले पर जातिवादी नेताओं की तो छोड़िये कांग्रेस और भाजपा ने भी चुप्पी साध रखी है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इन दिनों जाति की राजनीति के सबसे बड़े प्रवक्ता बने हुए हैं। विषय कोई भी हो वे उसे अनु. जाति / जनजाति और ओबीसी पर ले आते हैं। जातिगत जनगणना पर उनका बहुत जोर है। संसद में उनकी टिप्पणियों के बाद सत्ता पक्ष से किये गए जवाबी हमले से राजनीतिक वातावरण गरमाया हुआ है। कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव नजदीक होने से राजनेताओं का जाति प्रेम कुछ ज्यादा ही उमड़ रहा है। लेकिन आरक्षण प्राप्त वर्ग में भी जो उसके लाभ से वंचित होकर अपने लिए अलग से कुछ किये जाने की माँग उठा रहे थे उनके प्रति जुबानी हमदर्दी दिखाने के बावजूद आरक्षण के ठेकेदार बने नेता उस वर्ग को दबाकर रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। उन नेताओं को समूचे आरक्षित समुदाय का सरगना मानकर कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दल भी उनकी चौधराहट के विरुद्ध कुछ भी बोलने से डरते हैं। यही वजह है कि अनु. जाति / जनजाति और ओबीसी वर्ग में कुछ लोग पूरे समुदाय के मुखिया बन कर बैठ गए। धीरे - धीरे उन्होंने अपने परिवार को आगे बढ़ाया । स्व. मुलायम सिंह यादव और लालू यादव इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण हैं। हालांकि गैर आरक्षित उच्च कही जाने वाली जातियों में परिवार को आगे बढ़ाने की प्रवृत्ति आजादी के बाद से ही देखने मिलने लगी थी किन्तु उस उस समय चूंकि कांग्रेस के प्रति लोगों के मन में अंध श्रद्धा थी इसलिए कोई रोकने -  टोकने वाला नहीं था। और फिर जब पंडित नेहरू ने अपनी बेटी इंदिरा गाँधी को उत्तराधिकारी के तौर पर स्थापित करने का रास्ता बनाया तब बाकी नेताओं को भी अवसर मिल गया। धीरे - धीरे सभी दलों में अपने परिवार को आगे लाने का चलन बढ़ा जिससे अनु. जाति / जनजाति और ओबीसी वर्ग भी अछूता नहीं रहा। इसका नतीजा वही हुआ जिस पर गत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने चोट की। कोटे के भीतर कोटे की व्यवस्था चूंकि राज्य सरकारों के जिम्मे दी गई है इसलिए उसमें विसंगति हो सकती है लेकिन  फैसले में  इस हेतु जो पद्धति सुझाई गई वह बेहद सटीक है। इसीलिये आरक्षण के नाम पर नव सामंतवाद को बढ़ावा देने वालों की सिट्टी- पिट्टी गुम है। सर्वोच्च न्यायालय इस बात के लिए बधाई का पात्र है जिसने वह कर दिखाया जिसके बारे में बोलने से भी राजनेता डरते थे। इससे जातिगत जनगणना की रट लगाने वाले नेताओं के सुर भी ठंडे पड़ जाएंगे क्योंकि कोटे के भीतर कोटा तय करना अब सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। लेकिन ये दुखद है कि अधिकारियों की जाति पूछने का जो खतरनाक खेल राहुल गाँधी ने शुरू किया वह अब न्यायाधीशों तक पहुँच गया। गत दिवस ज्योंही फैसला आया भीम आर्मी नेता और उ.प्र की नगीना सीट से लोकसभा में चुनकर आये चंद्रशेखर आज़ाद ने पहले तो सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करने की बात कही और फिर उक्त फैसले को पढ़ने के बाद टिप्पणी करने के साथ ये भी जोड़ दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 341 का उल्लंघन है। लेकिन सबसे खतरनाक बात उन्होंने ये कही कि ये जानना जरूरी है कि फैसला देने वाली सात सदस्यों की पीठ में अनु. जाति/ जनजाति और ओबीसी वर्ग के कितने न्यायाधीश थे?  यद्यपि श्री आजाद का प्रभाव पश्चिमी उ.प्र के एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है किन्तु उनके द्वारा कही गई बात नये वर्ग संघर्ष को जन्म दे सकती है। देखना ये है कि क्या बजट बनाने वाले अधिकारियों की जाति पूछने वाले राहुल भी भीम आर्मी नेता की तरह  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की जाति पूछने का दुस्साहस करेंगे? सर्वोच्च न्यायालय ने कोटे के भीतर कोटे संबन्धी जो फैसला दिया उसमें क्रीमी लेयर और पहली पीढ़ी के बाद आरक्षण न देने की जो बात कही है वह सही मायनों में आरक्षण की व्यवस्था में व्याप्त विसंगति दूर करने वाली है। आरक्षण से लाभान्वित राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों को भले ही ये सुनकर अच्छा न लगे किन्तु यह व्यवस्था दलित और आदिवासियों के बीच  जो विषमता बढ़ रही थी उसे दूर करने में सहायक साबित होगी। बेहतर होगा राजनीतिक दल उक्त फैसले को उसके सही परिप्रेक्ष्य में देखें क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले के जरिये सामाजिक न्याय को सही अर्थों में लागू करने का साहस दिखाया है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 1 August 2024

सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले ने आरक्षण के संपूर्ण ढांचे को हिला दिया



जाति के चौतरफा शोर के बीच आज सर्वोच्च न्यायालय का ताजा निर्णय बर्र के छत्ते में पत्थर मारने जैसा है। इसके अनुसार राज्यों को ये अधिकार दे दिया गया है कि वे अनु. जाति/ जनजाति के लिए निर्धारित आरक्षण के कोटे के भीतर ही उन जातियों के लिए अलग से कोटा तय कर सकेंगी जो विकास की दौड़ में बेहद पीछे रह गईं क्योंकि आरक्षण का समुचित लाभ उन्हें नहीं मिल सका। सात न्यायाधीशों की पीठ ने 2004 के उस फैसले को पलट दिया जिसमें राज्यों को कोटे के भीतर कोटा निर्धारित करने का अधिकार देने से साफ इंकार कर दिया गया था। आज के निर्णय में एक न्यायाधीश ने असहमति दिखाई किन्तु बाकी छह  इस बात पर राजी थे  कि अनु. जातियों को मिले आरक्षण का लाभ भी कुछ प्रभावशाली जातियों ने ही उठाया जिसके कारण उनमें भी वर्ग संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई है। सुनवाई के दौरान  कुछ न्यायाधीशों ने ऐसी जातियों को आरक्षण से बाहर करने की बात भी कही । ये भी पूछा गया कि क्या आरक्षित श्रेणी के आई.ए.एस और आई.पी.एस अधिकारियों के बच्चों को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए? प्रधान न्यायाधीश डी.वाय.चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पाँच न्यायाधीशों द्वारा बीस साल पूर्व दिये फैसले को खारिज करते हुए सुनवाई के दौरान जो टिप्पणियां कीं वे राजनीतिक जगत में हलचल मचा सकती हैं। क्रीमी लेयर की बात उठते ही आरक्षण की मलाई खा रहे नेताओं के पेट में मरोड़ होने लगता है। आज के फैसले से जुड़े कुछ न्यायाधीशों ने खुलकर कहा कि अनु. जाति श्रेणी की जिन जातियों का आरक्षण के कारण उन्नयन हो चुका है उन्हें बाहर कर देना चाहिये ताकि  जो जातियाँ अब तक वंचित वर्ग में ही हैं उनका स्तर सुधारा जा सके। हालांकि फैसले में राज्यों पर ये बंदिश लगाई गई है कि वे किसी जाति विशेष को पूरा कोटा नहीं दे सकतीं। ऐसा इसलिए किया गया ताकि कोटे के भीतर कोटे का प्रावधान जाति विशेष की बपौती न बन जाए। चूंकि संसद का सत्र चल रहा है अतः देखने वाली बात ये है कि इस फैसले पर वहाँ क्या प्रतिक्रिया होती है ? हो सकता है आरक्षण के दम पर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से ताकतवर हो चुकी कुछ अनु. जाति / जनजाति के नेता इस फैसले का विरोध करते हुए इसे पलटने के लिए दबाव बनाएं। इसका कारण ये है कि अब अनु. जाति समूहों में जो वंचित वर्ग है वह अपना हिस्सा हासिल करने के लिए जोर लगाएगा। देर सवेर ऐसी ही व्यवस्था की मांग ओबीसी आरक्षण में भी होने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा। उल्लेखनीय है बिहार में जातीय जनगणना के परिणाम आने के बाद जब ओबीसी में यादवों की 14 फीसदी संख्या होने के आंकड़े प्रसारित हुए तब गोप, अहीर, गड़रिया जातियों ने इस बात की मांग की कि उनको यादवों से अलग रखा जाए क्योंकि ओबीसी आरक्षण का सबसे ज्यादा लाभ वही ले जाते हैं। लालू प्रसाद यादव ने अपने परिवार को जिस प्रकार आगे बढ़ाया उससे उन जातियों में असंतोष है जो यादवों के वर्चस्व के आगे उपेक्षित हो गईं। उ.प्र में ऐसी ही शिकायतें सपा पर काबिज सैफई परिवार से अन्य ओबीसी जातियों को है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने परिवारवाद के आरोप से बचने के लिए कहने को तो अन्य जातियों को भी काफी टिकिटें दीं किन्तु लोकसभा में वे और उनकी पत्नी मिलाकर परिवार के छह सदस्य होना काफी कुछ कह जाता है। ये देखते हुए कोटे के भीतर कोटे की जो व्यवस्था अनु. जाति के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने आज के फैसले में की उसने आरक्षण के संपूर्ण ढांचे को हिला दिया। भले ही फैसले में क्रीमी लेयर और आई.ए.एस और आई .पी.एस अधिकारियों के बच्चों  को आरक्षण की श्रेणी से बाहर रखने विषयक कोई आदेश न हो किन्तु सुनवाई के दौरान कतिपय न्यायाधीशों ने इस बारे में जो कुछ भी कहा वह बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी वाली उक्ति को चरितार्थ कर सकती है।  हमारे देश में आरक्षण और सामाजिक न्याय अपनी मूल भावना से भटककर कुछ नेताओं और उनके परिवारों की सामंतशाही स्थापित करने का साधन बन गए हैं । इसलिए देश की सबसे बड़ी अदालत का उक्त फैसला इन छत्रपों को किस हद तक स्वीकार्य होगा और राज्य सरकारें अनु.जाति/जनजाति के आरक्षण में वंचित वर्ग के उत्थान हेतु कोटे के भीतर कोटे के प्रावधान को कितनी ईमानदारी से लागू करेगीं ये फिलहाल नहीं कहा जा सकता किन्तु इन जातियों के स्वयंभू भाग्यविधाता बने बैठे नेताओं को जरूर पसीना आ रहा होगा। इसके बाद अब ओबीसी समुदाय में भी कोटे के भीतर कोटे की मांग जोर पकड़ेगी वहीं अति दलित और अति पिछड़े जैसे शब्द  राजनीति के मंच पर ऊँची आवाज में सुनाई देंगे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी