Thursday, 15 August 2024

अटल जी जैसा निर्विवाद और निष्कलंक नेता कोई नहीं :आज की राजनीति में उनकी कमी बहुत खलती है





    आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की  पुण्य तिथि है | स्वाधीन भारत में एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र  थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल हुई |  नेहरू जी और इंदिरा जी तो सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनका सम्मान प्रधानमन्त्री से कम नहीं था | 

     इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीति थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें  पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही सादगी से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | 

     विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि दी वह आज भी उद्धृत की जाती  है | नेहरू जी ने उनकी तेजस्विता को भांपते हुए ही भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | 

     हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में उनके  विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी  वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

     बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान अर्जित करने का उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

     मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि  व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | 

      सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह लिया करती थीं  |

     आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - 
बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने , 
तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - 
कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  
खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें ,
कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | 

     और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चूका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

     भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को     उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

     विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

     जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए थे। लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | 

     अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

      उन्हें गये 6 वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |

चित्र:-1996 में जबलपुर के पत्रकारों के साथ अटल जी का यादगार चित्र।

- आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी

देश को तोड़ने का खेल देश के भीतर से ही चल रहा





यह स्वाधीनता दिवस कई मायनों में महत्वपूर्ण है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव में मिली - जुली सरकार के साथ ही मजबूत विपक्ष का जनादेश आया। यद्यपि सत्ता में लौटने पर भी भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलना चौंकाने वाला रहा जो अपने लिए 350 से अधिक और  एन.डी.ए नामक गठबंधन के 400 से अधिक सांसद जीतने के आत्मविश्वास से भरी हुई थी। लेकिन उसे 240 और गठबंधन को 292 सीटें मिलने को भाजपा की पराजय के तौर पर देखा गया। विशेष रूप से  उ.प्र में भाजपा की सीटें सपा और कांग्रेस के गठजोड़ से  कम होना आश्चर्यचकित कर गया। उसका मुख्य कारण विपक्ष द्वारा  आरक्षण खत्म किये जाने का खतरा दिखाना रहा। लेकिन उससे भी बड़ा कारण बना मुस्लिम समुदाय का भाजपा के विरुद्ध  ध्रुवीकृत होना। इस प्रकार दलित और मुस्लिमों के विरोध ने भाजपा को बहुमत  से पहले ही रोक दिया। उ.प्र जैसा ही खेल महाराष्ट्र में हुआ। हालांकि विपक्ष का प्रदर्शन  2014 और 19 की तुलना में बेहतर रहा परंतु मतदाताओं ने उसे भी सत्ता संभालने योग्य नहीं माना। इसीलिए कांग्रेस भाजपा के आसपास भी नहीं पहुँच सकी । इसे ऐसे भी देखा जा सकता है कि न तो भाजपा को मनमाने फैसले करने की छूट मिली और न ही विपक्ष को सत्ता का स्वाद चखने का अवसर । लेकिन चुनाव बाद जिस तरह से जाति के नाम पर समाज को टुकड़ों में बाँटने का कुचक्र रचा जा रहा है उससे  लगने लगा है कि हम निजी स्वार्थों को राष्ट्रहित से ज्यादा प्राथमिकता देने की वही भूल दोहराने से बाज नहीं आ रहे जिसने हमें सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रखा। उस दृष्टि से आज के दिन हमें इतिहास के उन पन्नों को उलटना चाहिए जिनमें आपसी फूट की गाथाएँ भरी पड़ी हैं। दुर्भाग्य से हमारे राजनेता उनको अनदेखा कर रहे हैं तभी  पहले प्रांत और भाषा के नाम पर बाँटने का कुकृत्य किया गया और अब धर्म और जाति के नाम पर समाज को टुकड़ों में  बांटने का पाप किया जा रहा है। राजनीति  का मकसद यदि देश और जनता का हित हो तभी उसकी सार्थकता है किंतु हमारे देश में वह सत्ता हासिल कर अपने और अपनों के हितों की पूर्ति करने का माध्यम बन गई है।  इसीलिए जनमानस में उसके प्रति वह सम्मान नहीं रहा जो आज़ादी की लड़ाई और उसके बाद के प्रारंभिक वर्षों में दिखाई देता था। आज देश की  स्थिति  देख कर ये चिंता होने लगी है कि  प्रांतीय और केंद्रीय सत्ता के बीच होने वाला टकराव कहीं देश को दूसरे विभाजन की ओर न धकेल दे। प्रांतीय भावनाओं की कद्र अवश्य होना चाहिए। उनकी सांस्कृतिक विविधता और भाषायी विशिष्टता की भी रक्षा होनी चाहिए। लेकिन इस विविधता में एकता बनाये रखना तभी संभव होगा जब राष्ट्रीयता की भावना सबसे ऊपर हो। आज़ादी के बाद से ही एक तबका इस बात को प्रचारित करने पर तुला हुआ है कि भारत के मूल निवासी दक्षिण में रहने वाले द्रविड़ हैं जबकि आर्य बाहर से आये। भारत के इतिहास को भी बेहद विकृत तरीके से पेश किया जाता रहा । दुष्परिणाम यह हुआ कि नई पीढ़ी को अकबर की  महानता का पाठ महाराणा प्रताप की वीरता और त्याग से कहीं ज्यादा पढ़ाया गया। राष्ट्रवाद को फ़ासिज्म से जोड़ दिया गया और भारतीय संस्कृति को पिछड़ेपन से। जब ये प्रयास भी सफलीभूत नहीं हुए तब जातिवाद का जिन्न बोतल से बाहर निकालकर भारतीय समाज के ढांचे को तहस - नहस करने का ताना - बाना बुना जाने लगा। लोकसभा चुनाव में तमाम हथकंडों के बावजूद सत्ता से वंचित रह गईं ताकतें जाति नामक हथियार का उपयोग कर सत्ता हासिल करने जिस प्रकार जुटी हुई हैं वह बेहद खतरनाक है। लेकिन वे भूल रही हैं कि विभिन्न जातियों के बीच शत्रुता पैदा कर एक - दो चुनाव भले जीत लिए जाएं किंतु कालांतर में ये तरीका आत्मघाती साबित हुए बिना नहीं रहेगा। जो क्षेत्रीय या पारिवारिक  पार्टियां जाति के नाम पर सियासत कर रही हैं  , उनका प्रभावक्षेत्र सीमित है परंतु किसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा जाति को अपना एजेंडा बनाया जाए तो इससे समूचा देश संकट में फंस जायेगा। आज का दिन इन्हीं बातों को सोचने का है। हाल ही में हमारे एक पड़ोसी देश में जिस प्रकार का वातावरण है वैसा  ही भारत में बन जाने की आशंका  किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता द्वारा जताया जाना ये दर्शाता है कि देश को कमजोर करने का खेल देश के भीतर ही चल रहा है।  जनता को इसके विरोध में खुलकर सामने आना होगा क्योंकि सब कुछ सरकार और नेताओं के भरोसे छोड़ना अपने दायित्व से भागना होगा। जिस तरह इस देश की आजादी के संग्राम में हर नागरिक की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी थी उससे अधिक आज आज़ादी की रक्षा के लिए आवश्यक है। हमारे पूर्वजों ने हमें स्वाधीन देश की विरासत सौंपी थी। अब हमें अपनी भावी पीढी़ को एक सुरक्षित, सुविकसित और समृद्ध भारत सौंपने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। 

स्वाधीनता दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। 

-रवीन्द्र वाजपेयी






Wednesday, 14 August 2024

ढाका के नये हुक्मरान ये न भूलें कि भारत के दखल से ही बांग्ला देश बना था

1947 में आज के ही दिन भारत का विभाजन हुआ था। पाकिस्तान के रूप में देश के पश्चिमी और पूर्वी सिरे पर एक इस्लामिक देश का जन्म हुआ। यह दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसके दो हिस्सों के बीच में 2000 कि.मी से ज्यादा की दूरी और बीच में भारत जैसा विशाल देश था। सांस्कृतिक और भाषायी दृष्टि से भी दोनों पूर्णतः भिन्न थे। पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना जब 1948 में पूर्वी पाकिस्तान गए तभी ये कहकर आ गए थे कि देश की राष्ट्रभाषा उर्दू ही होगी। उनका वह कथन वह पहली ईंट थी जिस पर पाकिस्तान के विभाजन की नींव रखी गई थी। आखिरकार 1971 में वह आशंका सही साबित हुई और पूर्वी पाकिस्तान के स्थान पर बांग्ला देश नामक नया मुल्क अस्तित्व में आया जहाँ बंगला भाषा और संस्कृति का बोलबाला था। रवीन्द्र संगीत जितना कोलकाता में प्रचलित था उतना ही ढाका में। इस देश के जन्म में भारत का योगदान इतिहास में दर्ज है जिसे पाकिस्तान और बांग्ला देश ही नहीं पूरी दुनिया को स्वीकार करना पड़ेगा। भारतीय सेना यदि वहाँ घुसकर पाकिस्तान की सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचार को न रोकती तो बांग्ला देश की कल्पना करना ही असंभव था। 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्म समर्पण सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी घटना बन गई। बांग्ला देश के राष्ट्रपिता शेख मुजीब पाकिस्तानी कैद से रिहा हुए और विश्व के नक्शे पर नये देश का उदय हुआ । शुरुआत में वह भारत को अपना बड़ा भाई मानता रहा। लेकिन चार साल बाद ही मुजीब परिवार के 18 सदस्यों सहित मार दिये गए। वह भी 15 अगस्त को भोर के समय। उसी दिन भारत का स्वाधीनता दिवस था। उस घटना के बाद बांग्ला देश में भी पाकिस्तान की तरह से ही भारत विरोधी भावनाएं भड़कने लगीं। यहाँ तक कि जिस पाकिस्तान ने वहाँ के लोगों पर आमानुषिक अत्याचार किये उसी के आतंकवादियों को बांग्ला देश अपनी जमीन से भारत विरोधी हरकतें करने की सुविधा और संसाधन उपलब्ध करवाने लगा। लेकिन  जब मुजीब की बेटी शेख हसीना सत्ता में आईं तबसे भारत के साथ उसके रिश्ते सुधरने लगे। हालांकि हिन्दू समुदाय पर हमले और मंदिरों में तोडफ़ोड़ तब भी जारी रही। हसीना के 15 साला राज का गत 5 अगस्त को अंत हो गया। छात्रों की आड़ में कट्टरपंथियों ने उनके विरुद्ध जो आंदोलन किया उसके बाद वे भागकर भारत आ गईं। देखते - देखते  ढाका में भारत विरोधी तत्व सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज हो गए। हसीना विरोधी जो लोग विदेशों में निर्वासित जीवन जी रहे थे वे लौटने लगे। उन्हीं में से एक मो. यूनुस को अंतरिम सरकार का मुखिया बना दिया गया। उधर हसीना के अपदस्थ होते ही पूरे देश में हिंदुओं पर जो कहर टूटा उसने 1947 में हुए रक्तपात की दुखद स्मृतियों को ताजा कर दिया। मुस्लिम गुंडों ने हिंदुओं की हत्या, महिलाओं से दुष्कर्म, मंदिरों पर हमले, और लूटपाट शुरू कर दी। अंतरिम सरकार के गृह मंत्री की हैसियत वाले सेवा निवृत्त फौजी  अधिकारी सनावद हुसैन ने हालांकि हिंदुओं पर हुए हमलों के लिए माफी मांगी किंतु उसी के साथ ये हिदायत भी दे डाली कि भारत हमारे यहाँ दखल न दे। उन्होंने भारत  को व्यापारिक हितों पर आंच आने की चेतावनी भी दी। उनके अलावा मो. यूनुस भी भारत के प्रति अपनी नफरत को व्यक्त करने में पीछे नहीं हैं। दरअसल बांग्ला देश के नये हुक्मरानों को ये बात बर्दाश्त नहीं हो रही कि जब दुनिया के किसी भी देश में उनको पनाह नहीं मिल रही थी तब भारत ने शेख हसीना को अपने यहाँ आने की न सिर्फ अनुमति दी अपितु उनके पूरी तरह से सुरक्षित रहने का प्रबंध भी किया। बीते 10 दिनों से वे यहीं हैं। वे आगे भी भारत में ही रहेंगी या किसी और देश में ठिकाना तलाशेंगी यह अनिश्चित है किंतु बांग्लादेश के नये शासक जिस भाषा  का इस्तेमाल कर रहे हैं वह एहसान फ़रामोशी  है। भारत को उसकी हद समझाने वाले बांग्ला देश के नये हुक्मरान भूल रहे हैं कि भारत यदि दखल न देता तो बांग्ला देश का बनना नामुमकिन था। पश्चिमी पाकिस्तान के फौजी शासक इस इलाके की भाषा  और संस्कृति ही नहीं बंगाली मुसलमानों की नस्ल खत्म करने तक में सफल हो जाते। लाखों लड़कियों को  पाकिस्तानी फौजियों द्वारा गर्भवती किया जाना उसी कार्य योजना का हिस्सा था । 1 करोड़ शरणार्थियों को अपने यहाँ शरण देकर भारत ने जो मानवीयता दिखाई उसका नुकसान आज तक वह भुगत रहा है। यदि नये शासकों में जरा भी स्वाभिमान है तो उनको वापस बुलाने का साहस दिखाएं। भारत ने बांग्ला देश के मौजूदा घटनाक्रम पर अब तक बड़ी ही सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। लेकिन वहाँ की अंतरिम सरकार के कुछ सदस्य जिस तरह का बड़बोलापन दिखा रहे हैं उसके मद्देनजर हमको उंगली टेढ़ी करनी चाहिए। जिस तरह मालदीव के चीन समर्थक शासक की ऐंठ  केंद्र सरकार ने खत्म की वैसा ही ढाका के नये हुक्मरानों के साथ करना जरूरी है। जब भारत चीन जैसी महाशक्ति की नाराजगी के बावजूद दलाई लामा को शरण देने में नहीं डरा तो शेख हसीना को पनाह देने में कैसा डर? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 13 August 2024

बांग्ला देश में हिंदुओं पर अत्याचार का विरोध करने में हिचक क्यों



बांग्ला देश बनने के 4 साल के भीतर उसके राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान की सपरिवार हत्या कर दी गई। उसका कारण आज तक स्पष्ट नहीं है। उनकी दो बेटियां हसीना और रेहाना विदेश में रहने से बच गईं। वर्षों बाद  हसीना ने देश लौटकर पिता की विरासत संभाली। बीच में दो बार और फौजी बगावत हुई किंतु बीते 15 साल से हसीना के शासन के रूप में वहाँ लोकतंत्र था। जिसके बारे में कहा जाता है कि वे तानाशाह बन बैठी थीं। विपक्षी पार्टी बी.एन.पी की नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया भ्रष्टाचार के आरोप में जेल चली गईं। उनके बेटे ताहिर रहमान भी वतन से दूर  रह रहे थे। 5 अगस्त के बाद  जिन  मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया वे भी उनके राज में विदेश चले गए थे। 2024 के आम चुनाव में बी.एन.पी के बहिष्कार के कारण हसीना की अवामी लीग आसानी से जीत गई। लेकिन अमेरिका सहित अनेक देशों ने चुनाव में धाँधली का आरोप लगाना शुरू कर दिया। हसीना ने इस पर अमेरिका के विरोध में कड़े बयान जारी किये। वहीं जुलाई में वे चीन की यात्रा पर गईं किंतु कुछ मतभेदों के चलते एक दिन पहले लौट आईं। तब तक देश में आरक्षण विरोधी छात्रों का आंदोलन शुरू हो चुका था। जिसमें 500 लोगों की जानें चली गईं। हालात यहाँ तक बिगड़ गए कि हसीना को भागकर भारत आना पड़ा। ढाका छोड़ने के पहले उनसे त्यागपत्र लिखवा लिया गया। बजाय उनकी रक्षा करने के सेनाध्यक्ष ने उन्हें  कहा कि यदि  देश नहीं छोड़ा तो उनके आवास की ओर बढ़ रही भीड़ उनकी हत्या कर देगी। मजबूर हसीना ने अपने सबसे अच्छे मित्र भारत का रुख किया और दिल्ली आ गईं। यद्यपि अभी भी यह अनिश्चित है कि वे कहाँ रहेंगी क्योंकि अमेरिका और ब्रिटेन ने उन्हें वीजा देने से इंकार कर दिया। उनके और  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कूटनीतिक  रिश्ते बेहद मजबूत होने से बीते डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सहित अनेक ऐसे मुद्दों पर सहमति बनी जो लंबे समय से उलझे थे। आपसी व्यापार भी खासा बढ़ा।  अपने आपको एशिया का चौधरी समझने वाले चीन को यह बर्दाश्त नहीं था। पाकिस्तान तो शुरुआत से ही बांग्ला देश को अस्थिर करने के लिए वहाँ के इस्लामिक कट्टर पंथियों को मदद देता रहा। लेकिन हसीना से अमेरिका भी नाराज हो उठा। मोहम्मद यूनुस काफी समय वहाँ रहे भी। उनको नोबेल और रमन मैगेसेसे से पुरस्कार मिलने के पीछे भी अमेरिकी लॉबी का खेल बताया जाता है। चुनावी धांधली और विपक्ष का दमन तो  पाकिस्तान में भी खुलकर होता है किंतु अमेरिका और चीन आँख बंद किये रहते हैं। ज़ाहिर है छात्र आंदोलन के पीछे बड़ी विदेशी साजिश थी वरना जिस आरक्षण को लेकर उसकी शुरुआत हुई थी वह तो सर्वोच्च न्यायालय रद्द कर चुका था। हसीना का त्यागपत्र होते ही  वहाँ शेख मुजीब की मूर्ति गिराए जाने के साथ ही हिंदुओं की हत्या, उनकी महिलाओं के साथ दुष्कर्म और मंदिरों के विध्वंस जैसी जो वारदातें हुईं, उनका मुख्य उद्देश्य भारत का विरोध ही है। गत दिवस 1971 का विजय स्मारक भी तोड़ दिया गया क्योंकि उसमें भारतीय सेना की गौरवगाथा थी। भले ही वहाँ के नये शासक और कतिपय छात्र नेता हिंदुओं की सुरक्षा के आश्वसन दे  रहे हों किंतु असलियत इसके ठीक विपरीत है। अंतरिम सरकार के गृह मामलों के सलाहकार का माफीनामा अपने आप में काफी कुछ कह जाता है। भारत से सहयोग की अपेक्षा किंतु दखल न देने की समझाइश भारत के प्रति नई सरकार के बदलते रुख का संकेत है। लेकिन  चौंकाने वाली बात ये है कि भारत के विपक्षी दल बांग्ला देश में हिंदुओं के दमन का विरोध करने के बजाय इस बात पर खुशी मना रहे हैं कि वहाँ धर्मनिरपेक्ष सत्ता बन गई। वहीं असहिष्णुता का ढोल पीटने वाले कथित बुद्धिजीवी यह  प्रचार करने में जुटे हैं कि शेख मुजीब तानाशाह थे और उन्होंने एक दलीय प्रणाली को बढ़ावा दिया। दरअसल हसीना की भारत से निकटता चीन के तरफदारों को सहन नहीं थी। इसी के साथ जिन विदेशी शक्तियों ने लोकसभा चुनाव में मोदी विरोधी मुहिम चलाई उनसे उपकृत लॉबी भी हसीना को खलनायिका साबित करने में जुट गई। उल्लेखनीय है 1975 में  मुजीब की हत्या के समय हसीना पति और बच्चों के साथ जर्मनी में थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें दिल्ली बुलाकर शरण दी और 1981 में ढाका लौटने तक वे दिल्ली में रहीं। लेकिन आज उनके प्रति सहानुभूति महज इसलिए नहीं दिखाई जा रही है क्योंकि उनका तख्ता पलट करने में अमेरिका , चीन और पाकिस्तान का हाथ  माना जा रहा है। श्री मोदी से अच्छे सम्बन्धों के कारण भी विपक्ष हसीना से ख़फ़ा है। बांग्ला देश के निर्माण का श्रेय निश्चित रूप से इंदिरा जी को है लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत के दावेदार वहाँ के ताजा घटनाक्रम के प्रति जिस प्रकार से उदासीन हैं वह हतप्रभ करने वाला है। रही बात केंद्र सरकार के रुख की तो हसीना को भारत आने की अनुमति देना और किसी देश में शरण मिलने तक यहाँ सुरक्षित रहने की सुविधा देकर उसने उनके प्रति मित्रता का निर्वहन कर दिया। विपक्षी दलों से  सरकार के समर्थन की उम्मीद तो नहीं थी किंतु भारत में भी बांग्ला देश जैसे हालात बन जाने की धमकियाँ देने वाले नेताओं की निंदा तो अपेक्षित थी ही। वहाँ रह रहे हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध यदि सभी राजनीतिक दल आवाज उठाते तो उसका दबाव वहाँ के शासकों पर पड़ता किंतु ऐसा करने से इसलिए बचा गया ताकि भारत में मुस्लिम वोट हाथ से न खिसक जाए। गत दिवस प्रियंका वाड्रा ने जरूर सोशल मीडिया पर वहाँ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की है किंतु वह महज औपचारिकता प्रतीत होती है।

-रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 12 August 2024

सेबी प्रमुख ने तो मुँह खोल दिया किंतु राहुल क्यों चुप हैं


विदेशी सूत्रों से दो सनसनीखेज खबरें आई। पहली में अमेरिका की हिंडनबर्ग नामक संस्था द्वारा भारत के विख्यात अडानी  समूह से जुड़ी कंपनियों में सेबी प्रमुख माधवी बुच और उनके पति  द्वारा किये गए निवेश का खुलासा है। गत वर्ष भी उक्त संस्था ने अडानी समूह द्वारा निवेशकों के साथ धोखाधड़ी किये जाने का खुलासा किया था। परिणाम स्वरूप उसके शेयर धराशायी हो गए और निवेशकों को जबरदस्त नुकसान हुआ। ऐसा लगा कि गौतम अडानी का आर्थिक साम्राज्य तहस - नहस हो जायेगा। वैश्विक  पूंजी बाजारों में  उनकी प्रतिष्ठा बुरी तरह प्रभावित हुई। उस खुलासे को आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहा गया। विपक्ष के हाथ में लोकसभा चुनाव के पहले एक बड़ा हथियार लग गया जिसके जरिये उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ दिया। संसद का सत्र ठप्प हो गया। विपक्ष जेपीसी से जाँच करवाने पर अड़ गया।  लेकिन उसमें तब फूट पड़ गई जब शरद पवार और ममता बैनर्जी ने जेपीसी का विरोध कर दिया। दरअसल राहुल गाँधी चूंकि प्रधानमंत्री की  गौतम अडानी से निकटता को जमकर उछालते थे इसलिए उनको हमलावर होने का बेहतरीन अवसर मिल गया। बात सर्वोच्च न्यायालय तक भी गई। हालांकि  हिंडनबर्ग के ज्यादातर आरोप फुस्स निकले। इधर अडानी समूह ने निवेशकों के पैसे लौटाने का प्रबंध करते हुए अपनी  साख संभाल ली। जिससे उसके शेयरों के भाव फिर चढ़ने लगे और समूह का कारोबार पूर्ववत चलने लगा। हिंडनबर्ग के ताजा खुलासे में निशाना सेबी प्रमुख और उनके पति पर होने से सेबी की निष्पक्षता पर आंच आ सकती है। लेकिन बुच दंपत्ति ने जिस तत्परता से आरोपों का खंडन करते हुए हिँडनबर्ग से स्पष्टीकरण मांग लिया उससे लगता है पिछले खुलासे  की तरह ही इसका भी अंत होगा। हालांकि हिंडनबर्ग ने आरोपों की दूसरी किश्त भी जारी कर दी है किंतु सेबी प्रमुख जिस तरह से प्रत्युत्तर दे रही हैं उससे लगता है वे रक्षात्मक होने की बजाय आक्रामक हैं। लेकिन इसी के साथ एक और खुलासा हुआ है। बांग्ला देश के एक पत्रकार ने एक भारतीय टीवी चैनल पर बताया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी  लंदन में बांग्ला देश के प्रमुख विपक्षी दल   बी.एन.पी की अध्यक्ष खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान से मिले थे और उस मुलाकात में शेख हसीना की तख्ता पलट योजना पर भी चर्चा हुई थी। उनकी माँ खालिदा भ्रष्टाचार के मामले में जेल में थीं किंतु जैसे ही हसीना प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देकर ढाका छोड़कर भारत आईं त्योंही वहाँ के राष्ट्रपति ने उनकी रिहाई के आदेश दे दिये। खालिदा के बेटे को देश का नया प्रधानमंत्री माना जा रहा है। तारिक भी हसीना सरकार के समय विभिन्न आरोपों से घिरने के बाद लंदन में शरण लेकर रह रहे थे। उनकी और श्री गाँधी की मुलाकात की बात बांग्ला देश के पत्रकार द्वारा उजागर किये जाते ही भाजपा ने राहुल पर उक्त खबर पर स्पष्टीकरण देने की मांग उठा दी। बांग्ला देश में हुए सत्ता परिवर्तन के बारे में जानकारी हासिल करने श्री गाँधी  विदेश मंत्री एस. जयशंकर  से मिले थे। सर्वदलीय बैठक में भी उन्होंने शिरकत की किंतु उस घटनाचक्र पर उनकी और कांग्रेस की प्रतिक्रिया संतोषजनक नहीं रही जबकि शेख हसीना और गाँधी परिवार में निकट रिश्ते रहे हैं। लेकिन ऐसे वक़्त में जब उस परिवार पर इतना बड़ा संकट आया हुआ है तब कांग्रेस  उसके प्रति उदासीन है। केंद्र सरकार की भूमिका तो कूटनीतिक शिष्टाचार से निर्देशित होती है किंतु विपक्ष के पास खुलकर बोलने का अवसर है। कम से कम बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध तो श्री गाँधी को खुलकर बोलना चाहिए था जो इन दिनों भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीनने में जुटे हुए हैं। लेकिन बांग्ला देशी पत्रकार द्वारा किये गए खुलासे के बारे में वे मौन क्यों हैं ये बड़ा सवाल है। श्री गाँधी अक्सर विदेश यात्रा पर जाते रहते हैं। कुछ के कार्यक्रम तो सार्वजनिक कर दिये जाते हैं वहीं कुछ पूरी तरह गोपनीय होती हैं। अपनी निजता बनाये रखना उनका अधिकार है किंतु बांग्ला देशी पत्रकार द्वारा जो खुलासा किया गया उसके बारे में श्री गाँधी को अपना स्पष्टीकरण अविलंब देना चाहिए। यदि उन्होंने इसकी जानकारी विदेश मंत्री को दी तो वे यह बताकर भी संदेह से बच सकते हैं। लेकिन  चुप्पी उनको संदिग्ध बना देगी। गौरतलब है अपनी मानसरोवर यात्रा से लौटते समय वे बीजिंग में चीन सरकार के नेताओं से मिले थे। सीमा पर चल रहे तनाव के बीच उनका दिल्ली स्थित चीनी दूतावास में जाना भी विवाद का विषय बना था। लेकिन ताजा मामला बांग्ला देश में सत्ता पलट से जुड़ा है इसलिए इसमें उनका स्पष्टीकरण बेहद जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 10 August 2024

प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है कि अब भी संभल जाओ वरना....


बांग्ला देश की उथल - पुथल, संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच रस्साकशी, ओलंपिक में विनेश फोगाट को फाइनल खेलने न मिलना, वक़्फ़ बोर्ड संशोधन विधेयक, राज्यसभा में जया बच्चन और सभापति के बीच विवाद आदि विषयों पर पूरा देश चर्चा करता है। टीवी चैनलों में बैठे अखाड़ची भी जोर  आजमाइश करते देखे जा सकते हैं। क्रिकेट सीरीज भी कुछ लोगों को बुद्धिविलास का अवसर प्रदान करती है। और फिर टीवी के परदे में ओ.टी.टी पर गाली गलौच सुनने का शौक भी पूरा हो जाता है। वरना सोशल मीडिया तो है ही जो  24 X 7 आपको व्यस्त रखने में सक्षम है । लेकिन दुख और चिंता का विषय है कि प्रकृति और पर्यावरण के बदलते स्वभाव के प्रति आम जन में जो बेफिक्री का भाव है उसके दुष्परिणाम हमारे जीवनकाल में ही देखने मिलने लगे हैं। देश के दक्षिणी सिरे केरल के पठारी जिले वायनाड में भारी वर्षा के बाद हुए भूस्खलन से जो तबाही हुई उसने ये बता दिया कि प्रकृति प्रदत्त भौगोलिक रचना के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ करने से आपदा कहीं भी आ सकती है। उत्तर भारत के उत्तराखंड इलाके से तो ऐसी खबरें साल भर आया करती हैं। विशेष तौर पर गढ़वाल अंचल में चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए किये गए विकास कार्य विनाश का कारण बनने लगे हैं। केदारनाथ में आये जल प्रलय की यादें आज भी भयभीत कर देती हैं। बद्रीनाथ के रास्ते में जोशीमठ नगर तो धंसने के कगार पर है । उत्तरकाशी आदि में छुटपुट भूस्खलन रोजमर्रे का किस्सा हो गया है। उधर हिमाचल प्रदेश में शिमला का रास्ता साल दर साल खतरनाक होता जा रहा है। मनाली में भी पर्यटकों के बढ़ने से पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली खबर आई लद्दाख़ से जहाँ पहली बार तापमान 40 डिग्री तक पहुँचने से हाहाकार मच गया।  तापमान अधिक होने से उत्पन्न स्थिति के चलते लद्दाख़ हवाई अड्डे से विमान उड़ान नहीं भर सके। कई दिनों तक हवाई सेवाएं बाधित रहीं। इसकी वजह वहाँ पर्यटकों की बढ़ती संख्या है। जिन दुर्गम इलाकों तक यदाकदा कोई जाता था वहाँ प्रतिवर्ष लाखों सैलानी मौज - मस्ती के लिए जाने लगे। पहले इस क्षेत्र में केवल सैन्य वाहन ही नजर आते थे। लेकिन अब तो खारडूंगला जैसे उच्च शिखर और नुब्रा घाटी  तक लाखों पर्यटक जाने लगे हैं। इस कारण इस पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की आय में वृद्धि तो हुई किंतु वहाँ के जिम्मेदार नागरिक इस बात से चिंतित हैं कि लद्दाख़ में भी मैदान जैसी गर्मी पड़ने लगी है। हाल ही में उत्तराखंड के लोकप्रिय पर्यटन स्थल नैनीताल की टिफिन टॉप नामक पहाड़ी रात के समय धसक गई। गत वर्ष  नैनी झील का जल भी असामान्य तरीके से उछलने लगा जिससे निचली बस्तियों में जल प्लावन का खतरा उत्पन्न हो गया। ये सब बताने का आशय यह है कि प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकार और इस विषय पर कार्य रहे व्यक्तियों तथा संगठनों के जिम्मे छोड़कर निश्चिंत हो जाएं तो हम भी सह अभियुक्त कहलाएंगे । लगातार जिस तरह की खबरें आ रही हैं उन्हें देख - सुनकर अब ये कहना पड़ रहा है कि प्रकृति और पर्यावरण को बचाने में हर नागरिक को अपना योगदान देना होगा। भारतीय जीवन शैली में इसके संस्कार बचपन से दिये जाते थे। घास के तिनके से लेकर वट वृक्ष तक पूजित माना गया। नदी, तालाब, कुए सभी को गंगा का प्रतीक मानकर उनको संरक्षित करने की परंपरा है। पर्वत भी देव तुल्य माने गए। और ऐसे क्षेत्र जो प्रकृति के मूल स्वरूप को बनाये रखने के लिए उपयोगी थे उन्हें निर्जन छोड़ दिया जाता था । लेकिन विकास की वासना  ने सब कुछ उलट - पुलट कर दिया। परिणाम सामने है। ऐसा नहीं है कि हम  आने वाले खतरे से अनजान हों। लेकिन जीवन की आपाधापी में उलझे रहने से इस बारे में सोचने की प्रवृत्ति लुप्त होने लगी है। पहाड़ी पर्यटन केन्द्र की सैर करने वाले वहाँ के खुशनुमा एहसास से  तो सबको परिचित कराते हैं किंतु उनके लिए उत्पन्न खतरों के प्रति आगाह नहीं करते। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि प्रकृति का चेतावनी तंत्र लगातार  संभल जाने के संकेत दे रहा है किंतु हम उसकी उपेक्षा करने से बाज नहीं आ रहे। इसके पहले कि वायनाड, लद्दाख़ और नैनीताल  जैसे हादसे जगह - जगह होने लगें , हमें सतर्क हो जाना चाहिए वरना उससे होने वाले नुकसान के लिए सरकार से ज्यादा हम कसूरवार माने जायेंगे। कुछ और न सही अपनी संतानों की चिंता तो कर लें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 9 August 2024

वक़्फ़ संशोधन विधेयक के विरोध का कोई औचित्य नहीं


केंद्र सरकार ने गत दिवस लोकसभा में वक्फ  संशोधन विधेयक पेश किया। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्ति पर अवैध कब्जे को रोकने के साथ ही वक़्फ़ बोर्ड में पूर्व न्यायाधीश सहित 2 महिलाओं और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि को रखा जाना है जो गैर इस्लामिक भी हो सकता है। मौजूदा कानून के अनुसार  वक्फ द्वारा किसी भी संपत्ति पर अधिकार जताने से वह उसकी हो जाती है । उसके विरुद्ध अपील भी वक़्फ़ बोर्ड और उसके द्वारा बनाये गए ट्रिब्यूनल के समक्ष की जा सकेगी जिसका फैसला अंतिम होगा। संशोधन पारित हो जाने पर ऐसे विवाद अदालत के क्षेत्राधिकार में आ जाएंगे। ये भी शिकायतें  आने लगी थीं कि वक़्फ़ के अंतर्गत आने वाली संपत्ति पर प्रभावशाली मुस्लिम ही कब्जा कर लेते थे जिनमें  उ.प्र के कुख्यात माफिया सरगना अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी भी थे। और भी ऐसी विसंगतियाँ हैं जिन्हें दूर कर  इन संपत्तियों का सही उपयोग करना समय की मांग है। दुर्भाग्य से 21 वीं सदी में भी भारत का मुस्लिम समाज  मध्ययुगीन सोच से प्रभावित और संचालित है। किसी भी  सुधार को इस्लाम विरोधी बताकर आसमान सिर पर उठा लेना आम बात है। समाज के शिक्षित वर्ग में भी इतना साहस नहीं है कि वह मुल्ला - मौलवियों के फरमान पर सवाल उठा सके। मसलन  तीन तलाक़ भले ही अवैध हो गया हो लेकिन अपवाद स्वरूप ही कोई मुस्लिम महिला सार्वजनिक तौर पर उसका स्वागत करने का साहस जुटा पाती है। वक़्फ़ की संपत्ति का उपयोग धार्मिक और सामाजिक हित के कार्यों के लिए किये जाने का प्रावधान है। देश में सेना और रेल्वे के बाद सबसे अधिक भूमि वक़्फ़ की है। जिसका आकार देश की राजधानी दिल्ली से भी तीन गुना अधिक है। लेकिन इतनी विशाल संपत्ति का सही उपयोग न होने से वक़्फ़ का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है। मुस्लिम समाज में अशिक्षा के बोलबाले की वजह से मुल्ला - मौलवियों का वर्चस्व कायम है। जो किसी भी तरह की सुधार प्रक्रिया को इस्लाम और शरीयत  विरोधी प्रचारित करने लगते हैं। मुस्लिम वोट बैंक का दोहन करने वाले राजनीतिक दल भी ऐसी बातों का समर्थन करते हुए खुद को मुसलमानों का हमदर्द साबित करते हैं।  ऐसे नेताओं के कारण ही आजादी के 77 सालों बाद भी मुसलमान मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित हैं। धर्म के प्रति निष्ठा और समर्पण अच्छी बात है किंतु उसको तालाब का ठहरा हुआ पानी बना देना अधकचरापन और अज्ञानता है। भारत में  सभी धर्मों का प्रचलन है। सबके अपने कायदे -कानून और रीति - रिवाज हैं किंतु देश के संविधान के साथ उनकी टकराहट यदि होती भी है तो उसे शांति से दूर कर लिया जाता है। इसके विपरीत मुस्लिम समाज के किसी भी रीति - रिवाज में सुधारात्मक कदम उठाये जाने पर इस्लाम खतरे में है का शोर मचने लगता है। वक़्फ़ संबंधी संशोधन पर भी यही देखने मिल रहा  है। गत दिवस लोकसभा में ज्योंही सरकार विधेयक लेकर आई समूचा  विपक्ष विरोध में खड़ा हो गया। आश्चर्य की बात ये है कि उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना भी मुस्लिम मतों के फेर में विधेयक का विरोध करने लगी।  ये आरोप भी उछाला कि ये संशोधन भाजपा द्वारा महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से लाया जा गया है। विपक्षी बेंचों से ये भी कहा गया कि विधेयक की प्रति विपक्षी सांसदों को देर से दी गई जिसके कारण वे उसे पढ़ नहीं सके।  सर्वदलीय बैठक बुलाकर विधेयक के मसौदे पर चर्चा नहीं किये जाने की शिकायत के साथ उसे वापस लेने का दबाव भी बनाया गया। लेकिन सरकार ने चतुराई दिखाते हुए उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया। पहले ये आशंका थी कि जनता दल (यू) और तेलुगू देशम विधेयक का समर्थन नहीं करेंगी और उस स्थिति में भाजपा उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं उठायेगी। लेकिन उक्त दोनों दलों द्वारा विधेयक का समर्थन करने से लोकसभा में उसका पारित होना सुनिश्चित हो गया। राज्यसभा में अवश्य सत्ता पक्ष को परेशानी हो सकती है क्योंकि बीजू जनता दल और वाई.एस.आर कांग्रेस अब भाजपा से दूरी बनाने का ऐलान कर चुके हैं। लेकिन बीते 10 वर्षों की तरह आगे भी भाजपा नेतृत्व उच्च सदन में बहुमत का प्रबंध कर लेगा ऐसा लगता है। हो सकता है अभी विधेयक समिति के पास विचाराधीन ही रहे किंतु राजनीतिक मंचों पर तो वह विमर्श का विषय बन ही गया। दरअसल विपक्ष भाजपा को हिन्दू कार्ड खेलने से रोकना चाहता है। लेकिन उसने जिस तरह से विधेयक का विरोध किया उसकी  हिन्दू समाज में विपरीत प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है जो बांग्ला देश में हिंदुओं के उत्पीड़न से गुस्से में है। लेकिन राजनीति से हटकर देखें तो वक़्फ़ की अपार सम्पत्ति का सही उपयोग मुस्लिम समाज के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान के लिए होने का रास्ता साफ करने में गलत क्या है ? दुर्भाग्य इस बात का है कि मुसलमानों के बीच एक भी ऐसा नेता या बुद्धिजीवी नहीं है जो सुधारवादी सोच रखता हो। और यदि हैं भी तो उनकी स्थिति दांतों के भीतर जीभ जैसी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी