Thursday, 15 August 2024
अटल जी जैसा निर्विवाद और निष्कलंक नेता कोई नहीं :आज की राजनीति में उनकी कमी बहुत खलती है
देश को तोड़ने का खेल देश के भीतर से ही चल रहा
Wednesday, 14 August 2024
ढाका के नये हुक्मरान ये न भूलें कि भारत के दखल से ही बांग्ला देश बना था
1947 में आज के ही दिन भारत का विभाजन हुआ था। पाकिस्तान के रूप में देश के पश्चिमी और पूर्वी सिरे पर एक इस्लामिक देश का जन्म हुआ। यह दुनिया का पहला ऐसा देश था जिसके दो हिस्सों के बीच में 2000 कि.मी से ज्यादा की दूरी और बीच में भारत जैसा विशाल देश था। सांस्कृतिक और भाषायी दृष्टि से भी दोनों पूर्णतः भिन्न थे। पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना जब 1948 में पूर्वी पाकिस्तान गए तभी ये कहकर आ गए थे कि देश की राष्ट्रभाषा उर्दू ही होगी। उनका वह कथन वह पहली ईंट थी जिस पर पाकिस्तान के विभाजन की नींव रखी गई थी। आखिरकार 1971 में वह आशंका सही साबित हुई और पूर्वी पाकिस्तान के स्थान पर बांग्ला देश नामक नया मुल्क अस्तित्व में आया जहाँ बंगला भाषा और संस्कृति का बोलबाला था। रवीन्द्र संगीत जितना कोलकाता में प्रचलित था उतना ही ढाका में। इस देश के जन्म में भारत का योगदान इतिहास में दर्ज है जिसे पाकिस्तान और बांग्ला देश ही नहीं पूरी दुनिया को स्वीकार करना पड़ेगा। भारतीय सेना यदि वहाँ घुसकर पाकिस्तान की सेना द्वारा किये जा रहे अत्याचार को न रोकती तो बांग्ला देश की कल्पना करना ही असंभव था। 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्म समर्पण सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी घटना बन गई। बांग्ला देश के राष्ट्रपिता शेख मुजीब पाकिस्तानी कैद से रिहा हुए और विश्व के नक्शे पर नये देश का उदय हुआ । शुरुआत में वह भारत को अपना बड़ा भाई मानता रहा। लेकिन चार साल बाद ही मुजीब परिवार के 18 सदस्यों सहित मार दिये गए। वह भी 15 अगस्त को भोर के समय। उसी दिन भारत का स्वाधीनता दिवस था। उस घटना के बाद बांग्ला देश में भी पाकिस्तान की तरह से ही भारत विरोधी भावनाएं भड़कने लगीं। यहाँ तक कि जिस पाकिस्तान ने वहाँ के लोगों पर आमानुषिक अत्याचार किये उसी के आतंकवादियों को बांग्ला देश अपनी जमीन से भारत विरोधी हरकतें करने की सुविधा और संसाधन उपलब्ध करवाने लगा। लेकिन जब मुजीब की बेटी शेख हसीना सत्ता में आईं तबसे भारत के साथ उसके रिश्ते सुधरने लगे। हालांकि हिन्दू समुदाय पर हमले और मंदिरों में तोडफ़ोड़ तब भी जारी रही। हसीना के 15 साला राज का गत 5 अगस्त को अंत हो गया। छात्रों की आड़ में कट्टरपंथियों ने उनके विरुद्ध जो आंदोलन किया उसके बाद वे भागकर भारत आ गईं। देखते - देखते ढाका में भारत विरोधी तत्व सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज हो गए। हसीना विरोधी जो लोग विदेशों में निर्वासित जीवन जी रहे थे वे लौटने लगे। उन्हीं में से एक मो. यूनुस को अंतरिम सरकार का मुखिया बना दिया गया। उधर हसीना के अपदस्थ होते ही पूरे देश में हिंदुओं पर जो कहर टूटा उसने 1947 में हुए रक्तपात की दुखद स्मृतियों को ताजा कर दिया। मुस्लिम गुंडों ने हिंदुओं की हत्या, महिलाओं से दुष्कर्म, मंदिरों पर हमले, और लूटपाट शुरू कर दी। अंतरिम सरकार के गृह मंत्री की हैसियत वाले सेवा निवृत्त फौजी अधिकारी सनावद हुसैन ने हालांकि हिंदुओं पर हुए हमलों के लिए माफी मांगी किंतु उसी के साथ ये हिदायत भी दे डाली कि भारत हमारे यहाँ दखल न दे। उन्होंने भारत को व्यापारिक हितों पर आंच आने की चेतावनी भी दी। उनके अलावा मो. यूनुस भी भारत के प्रति अपनी नफरत को व्यक्त करने में पीछे नहीं हैं। दरअसल बांग्ला देश के नये हुक्मरानों को ये बात बर्दाश्त नहीं हो रही कि जब दुनिया के किसी भी देश में उनको पनाह नहीं मिल रही थी तब भारत ने शेख हसीना को अपने यहाँ आने की न सिर्फ अनुमति दी अपितु उनके पूरी तरह से सुरक्षित रहने का प्रबंध भी किया। बीते 10 दिनों से वे यहीं हैं। वे आगे भी भारत में ही रहेंगी या किसी और देश में ठिकाना तलाशेंगी यह अनिश्चित है किंतु बांग्लादेश के नये शासक जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं वह एहसान फ़रामोशी है। भारत को उसकी हद समझाने वाले बांग्ला देश के नये हुक्मरान भूल रहे हैं कि भारत यदि दखल न देता तो बांग्ला देश का बनना नामुमकिन था। पश्चिमी पाकिस्तान के फौजी शासक इस इलाके की भाषा और संस्कृति ही नहीं बंगाली मुसलमानों की नस्ल खत्म करने तक में सफल हो जाते। लाखों लड़कियों को पाकिस्तानी फौजियों द्वारा गर्भवती किया जाना उसी कार्य योजना का हिस्सा था । 1 करोड़ शरणार्थियों को अपने यहाँ शरण देकर भारत ने जो मानवीयता दिखाई उसका नुकसान आज तक वह भुगत रहा है। यदि नये शासकों में जरा भी स्वाभिमान है तो उनको वापस बुलाने का साहस दिखाएं। भारत ने बांग्ला देश के मौजूदा घटनाक्रम पर अब तक बड़ी ही सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। लेकिन वहाँ की अंतरिम सरकार के कुछ सदस्य जिस तरह का बड़बोलापन दिखा रहे हैं उसके मद्देनजर हमको उंगली टेढ़ी करनी चाहिए। जिस तरह मालदीव के चीन समर्थक शासक की ऐंठ केंद्र सरकार ने खत्म की वैसा ही ढाका के नये हुक्मरानों के साथ करना जरूरी है। जब भारत चीन जैसी महाशक्ति की नाराजगी के बावजूद दलाई लामा को शरण देने में नहीं डरा तो शेख हसीना को पनाह देने में कैसा डर?
- रवीन्द्र वाजपेयी
Tuesday, 13 August 2024
बांग्ला देश में हिंदुओं पर अत्याचार का विरोध करने में हिचक क्यों
Monday, 12 August 2024
सेबी प्रमुख ने तो मुँह खोल दिया किंतु राहुल क्यों चुप हैं
विदेशी सूत्रों से दो सनसनीखेज खबरें आई। पहली में अमेरिका की हिंडनबर्ग नामक संस्था द्वारा भारत के विख्यात अडानी समूह से जुड़ी कंपनियों में सेबी प्रमुख माधवी बुच और उनके पति द्वारा किये गए निवेश का खुलासा है। गत वर्ष भी उक्त संस्था ने अडानी समूह द्वारा निवेशकों के साथ धोखाधड़ी किये जाने का खुलासा किया था। परिणाम स्वरूप उसके शेयर धराशायी हो गए और निवेशकों को जबरदस्त नुकसान हुआ। ऐसा लगा कि गौतम अडानी का आर्थिक साम्राज्य तहस - नहस हो जायेगा। वैश्विक पूंजी बाजारों में उनकी प्रतिष्ठा बुरी तरह प्रभावित हुई। उस खुलासे को आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहा गया। विपक्ष के हाथ में लोकसभा चुनाव के पहले एक बड़ा हथियार लग गया जिसके जरिये उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कठघरे में खड़ा करने का अभियान छेड़ दिया। संसद का सत्र ठप्प हो गया। विपक्ष जेपीसी से जाँच करवाने पर अड़ गया। लेकिन उसमें तब फूट पड़ गई जब शरद पवार और ममता बैनर्जी ने जेपीसी का विरोध कर दिया। दरअसल राहुल गाँधी चूंकि प्रधानमंत्री की गौतम अडानी से निकटता को जमकर उछालते थे इसलिए उनको हमलावर होने का बेहतरीन अवसर मिल गया। बात सर्वोच्च न्यायालय तक भी गई। हालांकि हिंडनबर्ग के ज्यादातर आरोप फुस्स निकले। इधर अडानी समूह ने निवेशकों के पैसे लौटाने का प्रबंध करते हुए अपनी साख संभाल ली। जिससे उसके शेयरों के भाव फिर चढ़ने लगे और समूह का कारोबार पूर्ववत चलने लगा। हिंडनबर्ग के ताजा खुलासे में निशाना सेबी प्रमुख और उनके पति पर होने से सेबी की निष्पक्षता पर आंच आ सकती है। लेकिन बुच दंपत्ति ने जिस तत्परता से आरोपों का खंडन करते हुए हिँडनबर्ग से स्पष्टीकरण मांग लिया उससे लगता है पिछले खुलासे की तरह ही इसका भी अंत होगा। हालांकि हिंडनबर्ग ने आरोपों की दूसरी किश्त भी जारी कर दी है किंतु सेबी प्रमुख जिस तरह से प्रत्युत्तर दे रही हैं उससे लगता है वे रक्षात्मक होने की बजाय आक्रामक हैं। लेकिन इसी के साथ एक और खुलासा हुआ है। बांग्ला देश के एक पत्रकार ने एक भारतीय टीवी चैनल पर बताया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी लंदन में बांग्ला देश के प्रमुख विपक्षी दल बी.एन.पी की अध्यक्ष खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान से मिले थे और उस मुलाकात में शेख हसीना की तख्ता पलट योजना पर भी चर्चा हुई थी। उनकी माँ खालिदा भ्रष्टाचार के मामले में जेल में थीं किंतु जैसे ही हसीना प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देकर ढाका छोड़कर भारत आईं त्योंही वहाँ के राष्ट्रपति ने उनकी रिहाई के आदेश दे दिये। खालिदा के बेटे को देश का नया प्रधानमंत्री माना जा रहा है। तारिक भी हसीना सरकार के समय विभिन्न आरोपों से घिरने के बाद लंदन में शरण लेकर रह रहे थे। उनकी और श्री गाँधी की मुलाकात की बात बांग्ला देश के पत्रकार द्वारा उजागर किये जाते ही भाजपा ने राहुल पर उक्त खबर पर स्पष्टीकरण देने की मांग उठा दी। बांग्ला देश में हुए सत्ता परिवर्तन के बारे में जानकारी हासिल करने श्री गाँधी विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मिले थे। सर्वदलीय बैठक में भी उन्होंने शिरकत की किंतु उस घटनाचक्र पर उनकी और कांग्रेस की प्रतिक्रिया संतोषजनक नहीं रही जबकि शेख हसीना और गाँधी परिवार में निकट रिश्ते रहे हैं। लेकिन ऐसे वक़्त में जब उस परिवार पर इतना बड़ा संकट आया हुआ है तब कांग्रेस उसके प्रति उदासीन है। केंद्र सरकार की भूमिका तो कूटनीतिक शिष्टाचार से निर्देशित होती है किंतु विपक्ष के पास खुलकर बोलने का अवसर है। कम से कम बांग्ला देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध तो श्री गाँधी को खुलकर बोलना चाहिए था जो इन दिनों भाजपा से हिंदुत्व का मुद्दा छीनने में जुटे हुए हैं। लेकिन बांग्ला देशी पत्रकार द्वारा किये गए खुलासे के बारे में वे मौन क्यों हैं ये बड़ा सवाल है। श्री गाँधी अक्सर विदेश यात्रा पर जाते रहते हैं। कुछ के कार्यक्रम तो सार्वजनिक कर दिये जाते हैं वहीं कुछ पूरी तरह गोपनीय होती हैं। अपनी निजता बनाये रखना उनका अधिकार है किंतु बांग्ला देशी पत्रकार द्वारा जो खुलासा किया गया उसके बारे में श्री गाँधी को अपना स्पष्टीकरण अविलंब देना चाहिए। यदि उन्होंने इसकी जानकारी विदेश मंत्री को दी तो वे यह बताकर भी संदेह से बच सकते हैं। लेकिन चुप्पी उनको संदिग्ध बना देगी। गौरतलब है अपनी मानसरोवर यात्रा से लौटते समय वे बीजिंग में चीन सरकार के नेताओं से मिले थे। सीमा पर चल रहे तनाव के बीच उनका दिल्ली स्थित चीनी दूतावास में जाना भी विवाद का विषय बना था। लेकिन ताजा मामला बांग्ला देश में सत्ता पलट से जुड़ा है इसलिए इसमें उनका स्पष्टीकरण बेहद जरूरी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 10 August 2024
प्रकृति लगातार चेतावनी दे रही है कि अब भी संभल जाओ वरना....
बांग्ला देश की उथल - पुथल, संसद में सत्ता और विपक्ष के बीच रस्साकशी, ओलंपिक में विनेश फोगाट को फाइनल खेलने न मिलना, वक़्फ़ बोर्ड संशोधन विधेयक, राज्यसभा में जया बच्चन और सभापति के बीच विवाद आदि विषयों पर पूरा देश चर्चा करता है। टीवी चैनलों में बैठे अखाड़ची भी जोर आजमाइश करते देखे जा सकते हैं। क्रिकेट सीरीज भी कुछ लोगों को बुद्धिविलास का अवसर प्रदान करती है। और फिर टीवी के परदे में ओ.टी.टी पर गाली गलौच सुनने का शौक भी पूरा हो जाता है। वरना सोशल मीडिया तो है ही जो 24 X 7 आपको व्यस्त रखने में सक्षम है । लेकिन दुख और चिंता का विषय है कि प्रकृति और पर्यावरण के बदलते स्वभाव के प्रति आम जन में जो बेफिक्री का भाव है उसके दुष्परिणाम हमारे जीवनकाल में ही देखने मिलने लगे हैं। देश के दक्षिणी सिरे केरल के पठारी जिले वायनाड में भारी वर्षा के बाद हुए भूस्खलन से जो तबाही हुई उसने ये बता दिया कि प्रकृति प्रदत्त भौगोलिक रचना के साथ जरूरत से ज्यादा छेड़छाड़ करने से आपदा कहीं भी आ सकती है। उत्तर भारत के उत्तराखंड इलाके से तो ऐसी खबरें साल भर आया करती हैं। विशेष तौर पर गढ़वाल अंचल में चार धाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए किये गए विकास कार्य विनाश का कारण बनने लगे हैं। केदारनाथ में आये जल प्रलय की यादें आज भी भयभीत कर देती हैं। बद्रीनाथ के रास्ते में जोशीमठ नगर तो धंसने के कगार पर है । उत्तरकाशी आदि में छुटपुट भूस्खलन रोजमर्रे का किस्सा हो गया है। उधर हिमाचल प्रदेश में शिमला का रास्ता साल दर साल खतरनाक होता जा रहा है। मनाली में भी पर्यटकों के बढ़ने से पर्यावरण का संतुलन गड़बड़ा गया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली खबर आई लद्दाख़ से जहाँ पहली बार तापमान 40 डिग्री तक पहुँचने से हाहाकार मच गया। तापमान अधिक होने से उत्पन्न स्थिति के चलते लद्दाख़ हवाई अड्डे से विमान उड़ान नहीं भर सके। कई दिनों तक हवाई सेवाएं बाधित रहीं। इसकी वजह वहाँ पर्यटकों की बढ़ती संख्या है। जिन दुर्गम इलाकों तक यदाकदा कोई जाता था वहाँ प्रतिवर्ष लाखों सैलानी मौज - मस्ती के लिए जाने लगे। पहले इस क्षेत्र में केवल सैन्य वाहन ही नजर आते थे। लेकिन अब तो खारडूंगला जैसे उच्च शिखर और नुब्रा घाटी तक लाखों पर्यटक जाने लगे हैं। इस कारण इस पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की आय में वृद्धि तो हुई किंतु वहाँ के जिम्मेदार नागरिक इस बात से चिंतित हैं कि लद्दाख़ में भी मैदान जैसी गर्मी पड़ने लगी है। हाल ही में उत्तराखंड के लोकप्रिय पर्यटन स्थल नैनीताल की टिफिन टॉप नामक पहाड़ी रात के समय धसक गई। गत वर्ष नैनी झील का जल भी असामान्य तरीके से उछलने लगा जिससे निचली बस्तियों में जल प्लावन का खतरा उत्पन्न हो गया। ये सब बताने का आशय यह है कि प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकार और इस विषय पर कार्य रहे व्यक्तियों तथा संगठनों के जिम्मे छोड़कर निश्चिंत हो जाएं तो हम भी सह अभियुक्त कहलाएंगे । लगातार जिस तरह की खबरें आ रही हैं उन्हें देख - सुनकर अब ये कहना पड़ रहा है कि प्रकृति और पर्यावरण को बचाने में हर नागरिक को अपना योगदान देना होगा। भारतीय जीवन शैली में इसके संस्कार बचपन से दिये जाते थे। घास के तिनके से लेकर वट वृक्ष तक पूजित माना गया। नदी, तालाब, कुए सभी को गंगा का प्रतीक मानकर उनको संरक्षित करने की परंपरा है। पर्वत भी देव तुल्य माने गए। और ऐसे क्षेत्र जो प्रकृति के मूल स्वरूप को बनाये रखने के लिए उपयोगी थे उन्हें निर्जन छोड़ दिया जाता था । लेकिन विकास की वासना ने सब कुछ उलट - पुलट कर दिया। परिणाम सामने है। ऐसा नहीं है कि हम आने वाले खतरे से अनजान हों। लेकिन जीवन की आपाधापी में उलझे रहने से इस बारे में सोचने की प्रवृत्ति लुप्त होने लगी है। पहाड़ी पर्यटन केन्द्र की सैर करने वाले वहाँ के खुशनुमा एहसास से तो सबको परिचित कराते हैं किंतु उनके लिए उत्पन्न खतरों के प्रति आगाह नहीं करते। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि प्रकृति का चेतावनी तंत्र लगातार संभल जाने के संकेत दे रहा है किंतु हम उसकी उपेक्षा करने से बाज नहीं आ रहे। इसके पहले कि वायनाड, लद्दाख़ और नैनीताल जैसे हादसे जगह - जगह होने लगें , हमें सतर्क हो जाना चाहिए वरना उससे होने वाले नुकसान के लिए सरकार से ज्यादा हम कसूरवार माने जायेंगे। कुछ और न सही अपनी संतानों की चिंता तो कर लें।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 9 August 2024
वक़्फ़ संशोधन विधेयक के विरोध का कोई औचित्य नहीं
केंद्र सरकार ने गत दिवस लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक पेश किया। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्ति पर अवैध कब्जे को रोकने के साथ ही वक़्फ़ बोर्ड में पूर्व न्यायाधीश सहित 2 महिलाओं और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि को रखा जाना है जो गैर इस्लामिक भी हो सकता है। मौजूदा कानून के अनुसार वक्फ द्वारा किसी भी संपत्ति पर अधिकार जताने से वह उसकी हो जाती है । उसके विरुद्ध अपील भी वक़्फ़ बोर्ड और उसके द्वारा बनाये गए ट्रिब्यूनल के समक्ष की जा सकेगी जिसका फैसला अंतिम होगा। संशोधन पारित हो जाने पर ऐसे विवाद अदालत के क्षेत्राधिकार में आ जाएंगे। ये भी शिकायतें आने लगी थीं कि वक़्फ़ के अंतर्गत आने वाली संपत्ति पर प्रभावशाली मुस्लिम ही कब्जा कर लेते थे जिनमें उ.प्र के कुख्यात माफिया सरगना अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी भी थे। और भी ऐसी विसंगतियाँ हैं जिन्हें दूर कर इन संपत्तियों का सही उपयोग करना समय की मांग है। दुर्भाग्य से 21 वीं सदी में भी भारत का मुस्लिम समाज मध्ययुगीन सोच से प्रभावित और संचालित है। किसी भी सुधार को इस्लाम विरोधी बताकर आसमान सिर पर उठा लेना आम बात है। समाज के शिक्षित वर्ग में भी इतना साहस नहीं है कि वह मुल्ला - मौलवियों के फरमान पर सवाल उठा सके। मसलन तीन तलाक़ भले ही अवैध हो गया हो लेकिन अपवाद स्वरूप ही कोई मुस्लिम महिला सार्वजनिक तौर पर उसका स्वागत करने का साहस जुटा पाती है। वक़्फ़ की संपत्ति का उपयोग धार्मिक और सामाजिक हित के कार्यों के लिए किये जाने का प्रावधान है। देश में सेना और रेल्वे के बाद सबसे अधिक भूमि वक़्फ़ की है। जिसका आकार देश की राजधानी दिल्ली से भी तीन गुना अधिक है। लेकिन इतनी विशाल संपत्ति का सही उपयोग न होने से वक़्फ़ का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है। मुस्लिम समाज में अशिक्षा के बोलबाले की वजह से मुल्ला - मौलवियों का वर्चस्व कायम है। जो किसी भी तरह की सुधार प्रक्रिया को इस्लाम और शरीयत विरोधी प्रचारित करने लगते हैं। मुस्लिम वोट बैंक का दोहन करने वाले राजनीतिक दल भी ऐसी बातों का समर्थन करते हुए खुद को मुसलमानों का हमदर्द साबित करते हैं। ऐसे नेताओं के कारण ही आजादी के 77 सालों बाद भी मुसलमान मुख्यधारा में शामिल होने से वंचित हैं। धर्म के प्रति निष्ठा और समर्पण अच्छी बात है किंतु उसको तालाब का ठहरा हुआ पानी बना देना अधकचरापन और अज्ञानता है। भारत में सभी धर्मों का प्रचलन है। सबके अपने कायदे -कानून और रीति - रिवाज हैं किंतु देश के संविधान के साथ उनकी टकराहट यदि होती भी है तो उसे शांति से दूर कर लिया जाता है। इसके विपरीत मुस्लिम समाज के किसी भी रीति - रिवाज में सुधारात्मक कदम उठाये जाने पर इस्लाम खतरे में है का शोर मचने लगता है। वक़्फ़ संबंधी संशोधन पर भी यही देखने मिल रहा है। गत दिवस लोकसभा में ज्योंही सरकार विधेयक लेकर आई समूचा विपक्ष विरोध में खड़ा हो गया। आश्चर्य की बात ये है कि उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना भी मुस्लिम मतों के फेर में विधेयक का विरोध करने लगी। ये आरोप भी उछाला कि ये संशोधन भाजपा द्वारा महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से लाया जा गया है। विपक्षी बेंचों से ये भी कहा गया कि विधेयक की प्रति विपक्षी सांसदों को देर से दी गई जिसके कारण वे उसे पढ़ नहीं सके। सर्वदलीय बैठक बुलाकर विधेयक के मसौदे पर चर्चा नहीं किये जाने की शिकायत के साथ उसे वापस लेने का दबाव भी बनाया गया। लेकिन सरकार ने चतुराई दिखाते हुए उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया। पहले ये आशंका थी कि जनता दल (यू) और तेलुगू देशम विधेयक का समर्थन नहीं करेंगी और उस स्थिति में भाजपा उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं उठायेगी। लेकिन उक्त दोनों दलों द्वारा विधेयक का समर्थन करने से लोकसभा में उसका पारित होना सुनिश्चित हो गया। राज्यसभा में अवश्य सत्ता पक्ष को परेशानी हो सकती है क्योंकि बीजू जनता दल और वाई.एस.आर कांग्रेस अब भाजपा से दूरी बनाने का ऐलान कर चुके हैं। लेकिन बीते 10 वर्षों की तरह आगे भी भाजपा नेतृत्व उच्च सदन में बहुमत का प्रबंध कर लेगा ऐसा लगता है। हो सकता है अभी विधेयक समिति के पास विचाराधीन ही रहे किंतु राजनीतिक मंचों पर तो वह विमर्श का विषय बन ही गया। दरअसल विपक्ष भाजपा को हिन्दू कार्ड खेलने से रोकना चाहता है। लेकिन उसने जिस तरह से विधेयक का विरोध किया उसकी हिन्दू समाज में विपरीत प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है जो बांग्ला देश में हिंदुओं के उत्पीड़न से गुस्से में है। लेकिन राजनीति से हटकर देखें तो वक़्फ़ की अपार सम्पत्ति का सही उपयोग मुस्लिम समाज के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान के लिए होने का रास्ता साफ करने में गलत क्या है ? दुर्भाग्य इस बात का है कि मुसलमानों के बीच एक भी ऐसा नेता या बुद्धिजीवी नहीं है जो सुधारवादी सोच रखता हो। और यदि हैं भी तो उनकी स्थिति दांतों के भीतर जीभ जैसी है।
- रवीन्द्र वाजपेयी