Monday, 9 September 2024

पैरालिंपिक्स में जीतने वालों की उपलब्धि अधिक सम्माननीय और मूल्यवान है


विश्व ओलम्पिक के बाद उसी स्थान पर विकलांग या दिव्यांग कहे  जाने वाले खिलाड़ियों की विश्व प्रतियोगिता आयोजित की जाती है जिसे        पैरालिंपिक्स कहते हैं | इस वर्ष पेरिस में संपन्न मुख्य ओलम्पिक खेलों के बाद आयोजित  पैरालिंपिक्स  का गत दिवस समापन हुआ | ये आयोजन भारतीय संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इसमें भारतीय खिलाड़ियों ने पहली बार ढेर सारे पदक हासिल कर मुख्य ओलम्पिक की खुशी को दोगुना  कर दिया | 1968 से अब तक भारत ने पैरालिंपिक्स में जितने पदक जीते उसका सबसे बड़ा हिस्सा इस बार का है | 2016 के रियो पैरालिंपिक्स  में भारत को कुल 5 पदक हासिल हुए थे । उसके बाद टोक्यो में भारतीय दस्ते ने 19 पदक जीतकर पूरे विश्व का ध्यान खींचा | लेकिन पेरिस  पैरालिंपिक्स का समापन रिकॉर्ड सात स्वर्ण, नौ रजत और 13 कांस्य मिलाकर कुल 29 पदकों के साथ हुआ और पदक तालिका में भारत 18वें स्थान पर रहा।  इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने के लिए बजट लगातार बढ़ाये जाने के साथ ही विश्वस्तरीय सुविधाएं भी  उपलब्ध कराई गईं। पेरिस में प्राप्त सफलता इसी का परिणाम है। प्रधानमंत्री सहित तमाम बड़ी हस्तियाँ समय - समय पर जिस तरह इन दिव्यांग खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करती रहीं वह निश्चित रूप से स्वागत योग्य है | भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ ही दक्षिण एशिया में मजबूत सामरिक शक्ति के रूप में उभर रहा है | हमारा देश दूध उत्पादन के साथ सबसे ज्यादा फिल्में बनाने के लिए भी प्रसिद्ध  है |  ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में भी हम वैश्विक बाजारों में अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं | वैक्सीन दवाइयां बनाने में तो भारत का अग्रणी स्थान है ही | मोबाइल और साफ्टवेयर के उत्पादन में भी देश  बहुत प्रभावशाली तरीके से आगे बढ़ रहा है | रक्षा उत्पादन के अलावा अन्तरिक्ष विज्ञान जैसे बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिक एवं तकनीशियनों ने विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा हासिल की है | इसे  देखते हुए यह उम्मीद  करना गलत नहीं होता कि खेलों में भी हमारा देश अग्रणी हो | एक दौर था जब भारत और हॉकी एक दूसरे के पर्याय हुआ करते थे किन्तु 1968 के मांट्रियल ओलम्पिक में वह गौरव हमसे छिन गया और तबसे केवल एक मर्तबा हमने  मास्को में स्वर्ण पदक जीता और वह भी तब , जब  नाटो देश उससे बाहर रहे | टोक्यो के बाद हालिया पेरिस ओलम्पिक में भी कांस्य जीतने से सूखा तो खत्म हुआ लेकिन पुराना रुतबा बरकरार न रह सका | अन्य मैदानी खेलों में भी  भारतीय खिलाड़ी जिस तेजी से उभर रहे हैं वह उत्साहवर्धक  है | ये भी अच्छा है कि अब क्रिकेट के अलावा भी दूसरे खेलों के विजेताओं को नायक जैसा सम्मान मिलने लगा है | यही वजह रही कि पेरिस पैरालिंपिक्स  में भारत के खिलाड़ियों द्वारा किये गए प्रदर्शन का हर खेल प्रेमी ने संज्ञान लिया और पदक जीतने वालों को जमकर प्रशंसा मिल रही है।  उनके हौसले और हिम्मत को हर देशवासी सलाम कर रहा है क्योंकि उनकी उपलब्धि सामान्य खिलाड़ियों की  तुलना में अधिक सम्माननीय और मूल्यवान है | इससे ये भी साबित होता है कि यदि शासन और खेल संघों द्वारा शारीरिक विकलांगता के शिकार वर्ग में से उदीयमान खेल प्रतिभाओं का चयन कर उनके भरण – पोषण और प्रशिक्षण पर समुचित ध्यान दिया जावे तो इस बार पदक संख्या में जिस तरह वृद्धि हुई उससे भी बेहतर नतीजे आगामी  पैरालिंपिक्स में देखने मिल सकते हैं | आजकल हर मामले में भारत की तुलना चीन से की  जाती है । इस पैरालिंपिक्स में भी चीन ने सर्वाधिक  पदक जीते | इसकी ख़ास वजह ये है कि उसने आर्थिक प्रगति के साथ ही खेल जगत में भी अपनी धाक  ज़माने के लिए पुरजोर कोशिश की | ये कहने में भी कुछ भी गलती नहीं है कि खेल भी उद्योग का स्वरूप बनता जा रहा है | पदक जीतने वालों को शासकीय और निजी क्षेत्र से जिस तरह प्रोत्साहन मिलने लगा है उससे  खिलाड़ी बनने का आकर्षण बढ़ा है | इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने की जरूरत है क्योंकि ये खिलाड़ी हमारे  देश के वैश्विक  राजदूत हैं । विशेष रूप से शारीरिक दृष्टि से विकलांग खिलाड़ियों ने साबित कर दिया कि वे अब दया के पात्र नहीं वरन राष्ट्रीय गौरव के ध्वजावाहक हैं । 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 7 September 2024

जाटों की एकजुटता पर टिका है हरियाणा चुनाव का दारोमदार

याणा के विधानसभा चुनाव में इन दिनों आयाराम - गयाराम का दौर जमकर चल रहा है। जिनकी टिकिट कटती है वे दूसरी पार्टी में मत्था टेकने पहुँच जाते हैं। भाजपा  सांसद नवीन जिंदल की माँ सावित्री जिंदल को पार्टी ने टिकिट नहीं दी तो वे निर्दलीय लड़ने पर आमादा हैं। कुछ मंत्री और विधायक भी पत्ता कट जाने पर बगावत का झंडा उठाये घूम रहे हैं।  भाजपा में इस बात से  ज्यादा नाराजगी है कि बाहर से आये लोगों को उम्मीदवार बनाकर पार्टी के लिए बरसों से खून पसीना बहा रहे लोगों को दरकिनार कर दिया गया। दूसरी तरफ कांग्रेस में भी बड़े नेताओं के बीच खींचातानी खुलकर सामने आ गई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंदर पार्टी के चुनाव अभियान पर पूरी तरह हावी हैं किंतु दलित समुदाय की सांसद शैलजा उनके विरुद्ध लामबंदी करते हुए विधानसभा चुनाव लड़ना चाह रही हैं। तीसरा मोर्चा है रणदीप सुरजेवाला का जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने की इच्छा खुलकर व्यक्त कर दी। हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद से हीआम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया था किंतु कांग्रेस नेता राहुल गाँधी उसके साथ गठजोड़ के लिए लालायित हैं। इसे लेकर उनके श्री हुड्डा सहित राज्य के अन्य कांग्रेस नेताओं के साथ मतभेद भी उजागर हुए । श्री हुड्डा ने दबी जुबान आम आदमी पार्टी के साथ हाथ मिलाने का विरोध किया किंतु श्री सुरजेवाला ने खुलकर गठबंधन की मुखालफत कर डाली।  लोकसभा चुनाव के बाद श्री गाँधी की वजनदारी जिस प्रकार बढ़ी उसे देखते हुए उनकी बात को सिरे से नामंजूर कर देना चौंकाने वाला है। कांग्रेस के भीतर चल रही इस खींचातानी के बीच गत दिवस आम आदमी पार्टी ने अपने 50 उम्मीदवारों की सूची जारी कर राहुल की उम्मीदों पर पानी फेर  दिया जो भाजपा विरोधी मतों के विभाजन को रोकने के लिए  उससे हाथ मिलाना चाह रहे थे।  इस प्रकार  हरियाणा में बहुकोणीय संघर्ष की स्थिति बन गई है। पूर्व उप प्रधानमंत्री स्व. देवीलाल का कुनबा भी कई  टुकड़ों में बँट गया है। पिछली सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे दुष्यंत चौटाला की पार्टी ने उ.प्र के दलित सांसद चंद्रशेखर आजाद की पार्टी के साथ गठबंधन कर जाट- दलित समीकरण बिठाने का  दांव चला है। किसान आंदोलन के अलावा जाट मुख्यमंत्री नहीं बनाये जाने से जाट समुदाय भाजपा से नाराज बताया जा रहा है। लोकसभा चुनाव में इसीलिए उसकी सीटें आधी रह गईं।  अतः शुरू से ये माना जा रहा था कि इस बार कांग्रेस यहाँ सरकार बना ले जायेगी। टिकिट वितरण  से भाजपा में जिस प्रकार से असंतोष उजागर हुआ उससे कांग्रेस का उत्साह और बढ़ गया। लेकिन बीते कुछ दिनों में आये श्री हुड्डा, सुश्री शैलजा और श्री सुरजेवाला के बयानों ने  पार्टी की छवि धूमिल की है। गलती श्री गाँधी की भी मामूली नहीं कही जायेगी जिन्होंने ऐन वक्त पर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन का शिगूफा छोड़ दिया जबकि ये काम काफी पहले हो जाना चाहिए था। हरियाणा में जाटों की जनसंख्या 25 फीसदी मानी जाती है। यदि  ये एकजुट होकर किसी का समर्थन कर दें तो उसकी  सरकार बनना तय हो जाता है किंतु वर्तमान में जाटों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। देवीलाल का कुटुंब बिखरा हुआ है, बंशीलाल की बहू भाजपा में आकर  राज्यसभा पहुँच गई। समय के साथ स्थानीय  स्तर पर भी युवा जाट नेताओं का उभार देखने मिल रहा है। इस प्रकार सबसे बड़े मतदाता समूह में ही सबसे  अधिक बिखराव है। यद्यपि श्री हुड्डा जाटों के सबसे बड़े नेता माने जाते हैं किंतु उनकी अपनी पार्टी में ही उनकी चौधराहट को चुनौती मिल रही है। चर्चा तो ये भी है कि  उनकी जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी श्री गाँधी को भी नागवार गुजर रही है। यही महसूस कर शैलजा और रणदीप ने अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी। हालांकि अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि इसका लाभ भाजपा उठाने में सफल हो जायेगी क्योंकि आम आदमी पार्टी यदि पूरी ताकत से लड़ गई तब वह दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का खेल बिगाड़ सकती है। उसके सबसे बड़े नेता अरविंद केजरीवाल मूल रूप से हरियाणा के ही हैं। कुल मिलाकर जो चुनाव इकतरफा नजर आ रहा था वह अनिश्चित होता जा रहा है। कांग्रेस को अभी भी अपने आसार अच्छे नजर आ रहे हैं किंतु भाजपा अपने संगठन के बल पर ब्राह्मण, वैश्य  और पिछड़ी जातियों के समर्थन से तिकड़ी बनाने की सोच रही है। बहुकोणीय मुकाबले में  त्रिशंकु की स्थिति से भी इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि यदि कांग्रेस जाटों को  एकमुश्त अपने पक्ष में रख सकी तभी उसकी राह आसान होगी। 

 

-  रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 6 September 2024

सिंगापुर जैसे विश्व व्यापार के अनेक केंद्र भारत में भी बन सकते हैं


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासमूलक सोच निश्चित  तौर पर प्रशंसनीय है। देश को  विश्वस्तरीय पहिचान दिलवाने के लिए वे निरंतर प्रयासरत रहते हैं। जब गुजरात में उन्होंने सरदार पटेल की मूर्ति जो संसार में सबसे ऊँची है  बनवाने की शुरुआत की तो  तरह - तरह के सवाल उठाये गए। उसकी लागत और निकटवर्ती क्षेत्रों को विकसित करने पर प्रस्तावित धनराशि को फिजूल खर्ची निरूपित किया गया। लेकिन कुछ ही वर्षों में वह पूरा खर्च वसूल हो गया । उस क्षेत्र की अर्थव्यस्था में भी जबरदस्त सुधार देखने मिला। वाराणसी में विश्वनाथ और उज्जैन में महाकाल परिसर के नवीनीकरण पर खर्च किये गए अरबों रूपयों की सार्थकता भी साबित हो चुकी है। बुलेट ट्रेन का प्रकल्प भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये सब विकसित और समृद्ध भारत के प्रमाण पत्र हैं। मुंबई में समुद्र पर बनाई गई लिंक रोड से भी लोगों का समय बचने लगा तथा जाम में भी कमी आई। राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास के कारण सड़क यातायात में हुई वृद्धि बदलते भारत की तस्वीर पेश करती है। कहने का आशय यह है कि विकसित होने का अर्थ केवल विदेशी मुद्रा भंडार का भरा होना नहीं बल्कि विकास का दिखना भी है। उस दृष्टि से स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की दूरगामी सोच  की दाद देनी होगी जिन्होंने स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी विराट परियोजना के साथ ही पक्की ग्रामीण सड़कें बनवाने का भागीरथी प्रयास किया। 2014 में देश की सत्ता संभालने के  साथ ही श्री मोदी ने अटल जी से भी एक कदम आगे बढ़ाते हुए अनेक नये काम प्रारम्भ करवाये जिनमें शौचालय जैसे मामूली नजर आने वाले कार्यों को प्राथमिकता दी  गई वहीं दूसरी ओर हवाई अड्डे और बंदरगाह भी बनाये। देश को आत्मनिर्भर बनाने हेतु रक्षा उपकरणों का उत्पादन बढ़ाने के अभियान के कारण देश उनका निर्यात करने की क्षमता अर्जित कर सका। इसीलिए अपनी सिंगापुर यात्रा में उन्होंने भारत में भी कई सिंगापुर बनाने की चर्चा छेड़ दी। उल्लेखनीय है कि कभी मलेशिया का हिस्सा रहा सिंगापुर शहर अब एक स्वतन्त्र देश है और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसकी गणना विकसित देशों के बराबर होती है। क्षेत्रफल की दृष्टि से बेहद छोटा सिंगापुर भारत जैसे विशाल देश को वित्तीय और तकनीकी सहायता देने की हैसियत रखता है। श्री मोदी ने अपनी इस यात्रा में उसके साथ सेमी कंडक्टर सम्बन्धी जो समझौता किया वह इसका प्रमाण है। सिंगापुर की तरह एक ज़माने में हाँगकाँग भी इसी तरह चर्चित हुआ करता था। जिसे ब्रिटेन ने चीन से लीज पर लेकर मुक्त अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाया। हालांकि वह लीज खत्म हो गई और उस पर चीन का आधिपत्य दोबारा हो गया किंतु वह शहर आज भी विश्व व्यापार का प्रमुख केंद्र है। एक और उदाहरण दुबई का है जो बीते कुछ दशकों में ही निवेशकों का स्वर्ग बन गया। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा भारत में कई सिंगापुर जैसी बात कहकर जो संकेत दिया वह देश को नया स्वरूप दे सकता है। कुछ समय पहले ही उन्होंने भारत के पास अनेकानेक द्वीप होने की बात कही थी। मालदीव से तनातनी के बाद जब उन्होंने भारतीय पर्यटकों को  लक्षद्वीप भ्रमण की सलाह दी तो  मालदीव के माथे पर पसीना आने लगा वहीं लक्षद्वीप में निवेश करने की होड़ लग गई। प्रधानमंत्री ने देश में कई सिंगापुर की संभावना किन स्थानों को सोचकर बताई ये तो स्पष्ट नहीं है किंतु वे बिना सोचे - समझे ऐसी बातें नहीं कहते , लिहाजा ये मानकर चला जा सकता है कि उनके मन में इसे लेकर कोई कार्ययोजना जरूर आकार ले चुकी होगी। हालांकि सिंगापुर एक दो बरस में नहीं बन सकता और फिर हमारे देश की भ्रष्ट नौकरशाही के चलते किसी भी काम में अड़ंगेबाजी होने लगती है। राजनीति भी आये दिन रुकावटें पैदा करने से नहीं चूकती। लेकिन इस सबकी उपेक्षा करते हुए इस तरह की सोच को कार्य रूप में परिणित करना वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े रहने के लिए जरूरी है। श्री मोदी से उम्मीद है वे भारत में सिंगापुर की तर्ज पर कुछ क्षेत्रों को विश्व व्यापार का केंद्र बनाने के अभियान की शुरुआत जल्द करेंगे। ऐसे कार्यों में संसाधनों की कोई कमी नहीं पड़ती क्योंकि दुनिया भर से निवेशक वहाँ दौड़े - दौड़े चले आते हैं। दुबई इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। गौरतलब है वहाँ भारत के हजारों लोगों ने भी संपत्ति और अन्य कार्यों में अरबों रुपये लगा रखे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 5 September 2024

फारुख ने तो 370 पर अपनी नीति बता दी अब कांग्रेस भी रुख स्पष्ट करे


नेशनल काँफ्रेंस के वरिष्ट नेता डाॅ. फारुख अब्दुल्ला का साफ कहना है कि उनकी पार्टी  धारा 370 को जम्मू कश्मीर के आगामी  विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनायेगी। उन्होंने माना कि  अदालती फैसले उसको हटाने के पक्ष में आये किंतु पूर्व में हुए कुछ निर्णयों ने उसे स्थायी माना था। ये पूछे जाने पर कि उनकी चुनावी भागीदार कांग्रेस धारा 370 पर गोलमाल रवैये का प्रदर्शन करती है , डाॅ. अब्दुल्ला ने  बचाव करते हुए कहा कि वह राष्ट्रीय पार्टी है जिसे पूरा देश देखना है। उनके उत्तर से स्पष्ट है कि  राहुल गाँधी जम्मू कश्मीर के दौरे पर राज्यपाल शासन और केंद्र शासित प्रदेश बनाये जाने जैसे मुद्दे तो उठाते हैं किंतु धारा 370 को हटाये जाने के बारे में मौन क्यों साधे रहते हैं ? निश्चित रूप से मंहगाई, बेरोजगारी, कानून - व्यवस्था , स्वास्थ्य सेवाएं अन्य राज्यों की तरह से ही जम्मू कश्मीर में भी पूरी तरह प्रासंगिक मुद्दे हैं । लेकिन 2019 में केंद्र सरकार ने जिस तरह से राज्य का विशेष दर्जा समाप्त कर  लद्दाख़ को अलग करते हुए जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य की बजाय केंद्र शासित राज्य बना दिया उससे घाटी के लोग नाराज बताये जाते हैं। लेकिन हिन्दू बहुल जम्मू में धारा 370  हटाये जाने का विरोध इसलिए कम दिखाई दिया क्योंकि इसके रहते घाटी में अलगाववाद का बोलबाला था। वहाँ लोगों के मन में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के साथ ही कुकुरमुत्ते जैसे पनप उठे अन्य पाकिस्तान समर्थक संगठनों द्वारा यह बात बिठाई जाती रही कि  धारा 370 के रहने से उनको देर - सवेर जनमत संग्रह द्वारा ये फैसला करने का अवसर मिलेगा कि यह राज्य भारत के साथ रहेगा या पाकिस्तान में मिलना पसंद करेगा। लेकिन ये सच्चाई लोगों से छिपाई गई कि जिस सं. रा. संघ के निरीक्षण में जनमत संग्रह का प्रावधान था उसी ने ये निर्णय कर लिया कि कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान का आपसी मामला है जिसमें  तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की कोई आवश्यता नहीं है। उसी के बाद श्रीनगर स्थित सं. रा. संघ के कार्यालय को बन्द कर दिया गया। जो अमेरिका और ब्रिटेन लंबे समय तक  पाकिस्तान के  पक्ष में बोलते रहे वे भी किनारा कर गए।  ऐसे में जम्मू कश्मीर के पाकिस्तान जाने की संभावना लेश मात्र भी नहीं बची। पंडित नेहरू की सरकार ने जब स्व. शेख अब्दुल्ला को गद्दी से हटाकर नजरबंदी में रखा तब ही उन्हें धारा 370 खत्म करने का साहस दिखाना था। लेकिन बाद में उनकी बेटी इंदिरा गाँधी ने ही शेख को राज्य की सत्ता सौंप दी। उनके दोबारा ताकतवर होते ही घाटी में अलगाववाद के बीज पुनः अंकुरित होने लगे। वरना फारूक अपनी विदेशी पत्नी के साथ इंग्लैंड वासी हो चले थे। धारा 370 स्थायी थी या नहीं ये विवाद भी अब अर्थहीन हो चला है क्योंकि हर देश अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार समयानुकूल नीतियाँ बनाता है। आजादी के बाद जिन परिथितियों में धारा 370 का प्रावधान किया गया उनमें भारत विरोधी ताकतें तो सिर उठा रही थीं किंतु जैसा आतंकवाद नब्बे के दशक से वहाँ  पनपा उसे रोकने के लिए उसे हटाया जाना निहायत जरूरी था क्योंकि सीमा पार से मिलने वाली सहायता ने आतंकवाद को घाटी में कुटीर उद्योग की शक्ल में विकसित कर दिया था। ऐसे में डाॅ. अब्दुल्ला जिस तरह की बातें धारा 370 को लेकर कह रहे हैं उसके बारे में राहुल गाँधी को अपनी नीति स्पष्ट करनी चाहिए क्योंकि जैसी संभावना सर्वेक्षण एजेंसियां जता रही हैं उसके अनुसार नेशनल काँफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन के सत्ता में आने के आसार हैं। उसकी बागडोर  निश्चित रूप से फ़ारुक या उनके बेटे उमर अब्दुल्ला के हाथ में होगी। यदि वे विधानसभा में धारा 370 और जनमत संग्रह पर अपना पुराना रवैया दोहराएंगे तब क्या कांग्रेस उनके साथ खड़ी होगी ? उल्लेखनीय है निकट भविष्य में अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव होना हैं। जिनमें धारा 370 को लेकर कांग्रेस को अपना रुख स्पष्ट करना होगा क्योंकि राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर वह जम्मू कश्मीर में अलग नीति पर चले और उसके बाहर उसके उलट ये संभव नहीं क्योंकि संचार क्रांति के इस युग में मतदाता से ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं। और ये भी सब जानते हैं कि फारुख अब्दुल्ला अपने मरहूम पिता की तरह ऊपर से कितना भी दिखावा करें किंतु उनके मन में  भारत से जरा सा भी प्रेम नहीं है। 

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 4 September 2024

रा.स्व.संघ का संदेश राष्ट्रीय विमर्श की दिशा मोड़ने में सहायक होगा


केरल में संपन्न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की समन्वय बैठक में जातिगत जनगणना और आरक्षण में क्रीमी लेयर जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जो दृष्टिकोण सामने आया है उसने कांग्रेस के उस आरोप की जमीन, खिसका दी कि संघ आरक्षण के विरोध में है। जाति आधारित जनगणना के बारे में उसका यह कहना पूरी तरह सही है कि सरकार को सामाजिक कल्याण के लिए इस तरह के आंकड़ों की आवश्यकता होती है जिनका उपयोग राजनीति अथवा चुनाव जीतने के लिए नहीं होना चाहिए। क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित करने के बारे में भी संघ ने स्पष्ट किया कि इस बारे में संबंधित  जातियों को विश्वास में लेकर ही  निर्णय लेना उचित रहेगा। उल्लेखनीय है श्री गाँधी रोजाना जाति आधारित जनगणना के साथ ही जाति की संख्यानुसार हिस्सेदारी तय करने का राग अलापते हैं। यहाँ तक कि बजट बनाने वाली टीम में दलित और आदिवासी  अधिकारी न होने पर भी उन्होंने लोकसभा में  सवाल उठाया था। हाल ही में श्री गाँधी प्रयागराज में ये कहने के बाद हंसी का पात्र बन गए कि आज तक मिस इंडिया प्रतियोगिता में आरक्षित वर्ग की कोई लड़की विजेता नहीं बनी। हालांकि कांग्रेस की कर्नाटक सरकार उसके द्वारा करवाई गई जाति आधारित जनगणना  के आंकड़े सार्वजनिक करने का साहस नहीं जुटा पा रही क्योंकि जैसे ही उसका विवरण सामने आयेगा वैसे ही  लिंगायत और वोक्कालिंगा जैसे ताकतवर समुदाय सरकार के लिए खतरा बन जायेंगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी जातिगत जनगणना करवाई थी । उसके आंकड़े भी जारी कर दिये गए जिससे  पता चला कि ओबीसी वर्ग में यादवों की सबसे बड़ी संख्या है। इस रिपोर्ट के आने के बाद लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार फूला नहीं समा रहा था किंतु जल्द ही गोप, गड़रिया, अहीर उपजातियों ने उनको यादवों से अलग दर्जा देने की माँग उछाल दी क्योंकि ओबीसी आरक्षण का बड़ा  लाभ यादव उठा लेते हैं। लोकसभा चुनाव में लालू  की पार्टी को बिहार में  कम सफलता मिलने के पीछे जातिगत जनगणना के आंकड़ों से विभिन्न उपजातियों में  उत्पन्न गुस्सा ही था। इसीलिए राहुल गाँधी के लगातार बोलते रहने के बावजूद कर्नाटक की कांग्रेस सरकार जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर कुंडली मारकर बैठी हुई है। इंडिया गठबंधन की प्रमुख स्तंभ ममता बैनर्जी ने भी राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित जनगणना की मांग को सिरे से नकार दिया। उनकी सरकार द्वारा नियम विरुद्ध जो ओबीसी आरक्षण किया गया वह भी कानूनी मकड़जाल में फंसा हुआ है। कांग्रेस 2018 से पाँच वर्ष तक छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सत्ता में रही। फिलहाल  कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में उसकी सरकार है किंतु उनकी ओर से इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया गया क्योंकि उससे होने वाले राजनीतिक नुकसान का अंदेशा उनको है। राहुल भी इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं। लेकिन सही बात ये है कि जिस जातिवादी राजनीति के लिए कांग्रेस दूसरों को  कठघरे में खड़ा करती रही वे उसे उसी राह पर घसीट रहे हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि 1990 में भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने पर मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव की राज्य सरकारों को गिरने से बचाने की जो गलती स्व. राजीव गाँधी द्वारा की गई थी उसका खामियाजा   कांग्रेस आज तक भुगत रही है। भाजपा खुद भी लम्बे समय से सोशल इंजीनियरिंग रूपी दांव खेलने लगी है लेकिन वह  दिखावे से बचते हुए समरसता बनाये रखने का प्रयास करती रही जिसमें संघ का पूरा समर्थन मिला। लोकसभा चुनाव के परिणामों से उत्साहित श्री गाँधी जाति आधारित जनगणना को राम बाण औषधि  मान रहे हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से वंचित करने संबंधी टिप्पणी किये जाने से केंद्र सरकार और भाजपा दोनों असमंजस में थीं। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत द्वारा आरक्षण की समीक्षा किये जाने संबंधी सुझाव को भाजपा विरोधी पार्टियों ने जमकर भुनाया था। इसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष द्वारा  आरक्षण खत्म करने के प्रचार से उ.प्र में भाजपा को जबरदस्त नुकसान पहुंचा। लेकिन केरल से रा.स्व.संघ द्वारा दिये गए संदेश के बाद अब राष्ट्रीय विमर्श इस बात पर केंद्रित हो जाएगा आरक्षण, क्रीमी लेयर और जाति आधारित जनगणना चुनाव के मुद्दे हैं या सामाजिक कल्याण के जरिये। जिस तरह हिंदुत्व के चुनावीकरण पर विपक्ष उंगली उठाता रहा है उसी तरह श्री गाँधी सहित जाति की सियासत करने वाले नेता संघ  के निर्णय के बाद पिछले कदम पर आने बाध्य होंगे क्योंकि संघ किसी मुद्दे पर केवल प्रस्ताव पारित नहीं करता अपितु उसे घर - घर तक पहुंचाने के लिए भी हर संभव प्रयास करता है। 


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 3 September 2024

मालदीव की तरह बांग्ला देश को भी रास्ते पर लाना जरूरी है


मालदीव में नई सरकार बनने के बाद उसने भारत से पंगा लेना शुरू कर दिया। राष्ट्रपति मुइज्जू ने चुनाव प्रचार में ही  कह दिया था कि जो भारतीय सैनिक वहाँ थे उनको वापस जाना होगा। भारतीय हैलीकाप्टरों के संचालन के लिए जो सैनिक टुकड़ी थी वह उनको बर्दाश्त नहीं थी। उनकी सरकार ने  भारतीय हितों  के विरुद्ध खुलकर बोलना शुरू कर दिया। इसका कारण मुइज्जू का चीन  समर्थक होना था। इस छोटे से टापू नुमा देश का इस तरह से आँखे तरेरना चौंकाने वाला था। हालांकि वह भारत का कुछ बिगाड़ सकने में सक्षम नहीं है किंतु पहले श्रीलंका और फिर मालदीव के चीन के प्रभावक्षेत्र में आ जाने से मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवालिया निशान लगने लगे , क्योंकि जो देश महाशक्ति बनने की राह पर हो उसके  छोटे - छोटे पड़ोसी देश भी उसके प्रभाव में न हों ये बात कुछ जमती नहीं।  पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार से भी हमारे रिश्ते सामान्य नहीं हैं। श्रीलंका में चीन ने अनेक बड़े प्रकल्पों का निर्माण कर 90 साल तक उनके उपयोग का  अनुबंध कर लिया।  हालांकि जब श्रीलंका में कंगाली के हालात बने तब भारत ने  उसकी हर संभव सहायता करते हुए संबंधों को पुनः मजबूत किया। उसके बाद मालदीव भी चीन की शह पर ऐंठने लगा। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लक्षद्वीप के समुद्रतट पर बैठकर उसके सौंदर्य की प्रशंसा कर मालदीव की रीढ़ पर जबरदस्त प्रहार किया। उनकी सांकेतिक कूटनीति रंग लाई। भारत से  सैलानियों ने वहाँ जाना रद्द कर दिया।  इससे मालदीव के  पर्यटन व्यवसाय  पर बुरा असर पड़ने लगा। मुइज्जू सरकार तो अपराधबोध के कारण कुछ बोलने में हिचकी किंतु वहाँ पर्यटन उद्योग से जुड़े लोग दौड़े - दौडे़ भारत की पर्यटन एजेंसियों के पास आकर गिड़गिड़ाने लगे। उधर केंद्र सरकार के इशारे पर लक्षद्वीप में  निवेश करने वाले उमड़ पड़े। थोड़े दिनों में ही मालदीव की अकड़ कम होने लगी। पहले तो मुइज्जू ने  भारत से अच्छे रिश्तों का बखान करना शुरू किया और फिर मौका मिलते ही दिल्ली आकर भारतीय नेताओं की मिजाजपुर्सी में लगे रहे।  श्रीलंका भी काफी कुछ रास्ते पर लौट आया है । नेपाल अपनी राजनीतिक अनिश्चितता में फंसा होने से फिलहाल ठण्डा है। वहीं म्यांमार के साथ झगड़ा केवल अवैध घुसपैठ को लेकर है। रही बात पाकिस्तान की तो वह अपने घरेलू मामलों में इतना उलझ गया है कि भारत से सीधे लड़ने की स्थिति उसकी है नहीं। चीन भी समझ गया है कि सैनिक मोर्चे पर भारत को दबाना असंभव होगा। बच रहा बांग्ला देश जिससे विगत 15 सालों में भारत के रिश्ते हर स्तर पर सबसे अच्छे दौर में थे। लेकिन अचानक  हालात उलट पुलट हो गए। शेख हसीना को सत्ता छोड़ भागकर भारत आना पड़ा। उनके स्थान पर जो अंतरिम सरकार बनी उसमें बैठे लोग ऐलानिया भारत विरोधी हैं। वहाँ रह रहे हिंदुओं को जिस प्रकार  से हमलों और लूटपाट का शिकार होना पड़ा उसके कारण भारत के सामने दोहरा संकट उपस्थित हो गया। सीमा पार से शरणार्थियों के आगमन को रोकने के अलावा वहाँ  रहने वाले हिंदुओं की सुरक्षा की चिंता करना भी जरूरी है। शेख हसीना को शरण देने के बारे में भी अब तक सरकार कुछ तय नहीं कर सकी। बांग्ला देश उनको दिल्ली में पनाह दिये जाने से नाराज है । ऐसे में कूटनीतिक, आर्थिक और मानवीय तीन मोर्चों पर भारत को निपटना पड़ रहा है। चूंकि बांग्ला देश में हालात सामान्य होने के संकेत मिलने लगे हैं और वैश्विक दबाव के कारण  हिंदुओं पर हमले भी कम होने लगे हैं इसलिए अब जरूरी है ढाका में बैठे नये हुक्मरानों से दो टूक  पूछा जावे कि उनको भारत से रिश्ते रखने हैं या नहीं और रखने हैं तो कैसे ? क्योंकि वहाँ हुआ सत्ता पलट चीन की बजाय अमेरिका के इशारे पर हुआ है। भारत को वहाँ की अंतरिम सरकार को  समझाना होगा कि यदि हम चीन के दबाव में नहीं आते और अमेरिका की नाराजगी के बाद भी यूक्रेन युद्ध में रूस का विरोध करने से बचे तब बांग्ला देश से डरने का सवाल ही नहीं  उठता। श्रीलंका और मालदीव  के बारे में भारतीय कूटनीति असरकारी साबित हुई है। आर्थिक नाकाबंदी ने नेपाल की अक्ल भी ठिकाने लगा दी। पाकिस्तान इस बात के लिए परेशान है कि भारत के साथ बातचीत शुरू हो। हालांकि बांग्ला देश के सुर भी कुछ नरम हुए हैं लेकिन वहाँ के कुछ नेता ज़हर बुझे तीर छोड़ने से बाज नहीं आते। ऐसे में कुछ न कुछ ऐसा किया जाना जरूरी है जिससे अंतरिम सरकार को ये चेतावनी  मिले कि भारत से रिश्ते बिगाड़ने पर उनका हर मोर्चे पर नुकसान होना तय है। हालांकि किसी देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप उचित नहीं होता किंतु इस देश का तो जन्म ही भारत के खुले हस्तक्षेप से हुआ था। आज फिर यदि वहाँ की स्थिति हमारे हितों के विरुद्ध हो तो इतिहास  द्वारा अपने आप को  दोहराए जाने की कहावत को चरितार्थ करने में संकोच नहीं करना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 2 September 2024

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाओं का कोई असर नहीं होने वाला


राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का ये कहना पूरी तरह सही है कि ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब न्यायालय जाने से हिचकते हैं क्योंकि उनके मन में ये बात बैठ गई है कि अदालत जाने के बाद उनका जीवन तनाव पूर्ण हो जायेगा। जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र  में बोलते हुए उन्होंने कहा कि दुष्कर्म जैसे अपराधों में जब दशकों तक न्याय नहीं होता तो लोगों में ये अवधारणा प्रबल होती है कि  न्यायपालिका में  संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है। उन्होंने सुनवाई टालते रहने की प्रवृत्ति को समाप्त करने की अपेक्षा भी व्यक्त की। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भी इसी आशय के विचार व्यक्त कर चुके थे। देश की दो सबसे बड़ी संवैधानिक हस्तियों द्वारा कही गई उक्त बातों में कुछ भी नया नहीं है क्योंकि आम नागरिक के मन में न्यायपालिका की ऐसी ही छवि बन चुकी है। हाल ही में कुछ चर्चित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों को फटकार लगाते हुए कहा गया था कि वे अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए मामला ऊपरी अदालतों के लिए छोड़ देते हैं। मुख्य न्यायाधीश डी. वाय. चंद्रचूड़ तो इस बारे में खुलकर बोलते आ रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय पर भी ये तोहमत लगती रही है कि कुछ दिग्गज अधिवक्ताओं को वहाँ विशेष महत्व मिलता है। राजनेता और धनवान लोग उन अधिवताओं की मोटी फीस चुकाकर अपने पक्ष के मामले में तो जल्द  सुनवाई करवा लेते हैं वहीं  विरुद्ध चल रहे प्रकरणों में पेशियाँ बढ़वाकर न्याय प्रक्रिया को विलंबित करते हैं। इससे न्यायपालिका की छवि को तो बट्टा लग ही रहा है न्यायाधीशों के प्रति भी आम जनता के मन में जो सम्मान का भाव था उसमें कमी आ रही है। वकीलों की बढ़ती फीस भी न्याय प्राप्ति में बड़ी बाधा है। दीवानी प्रकरणों के निपटारे की कोई समय सीमा नहीं है और फौजदारी में जमानत हासिल करने के लिए  मुँह मांगी फीस चुकाना हर किसी के बस में नहीं। किसी वी. आई. पी की गिरफ्तारी में निचली अदालत से जमानत रद्द होते ही ऊपरी अदालत में फौरन तारीख मिल जाती है जबकि साधारण व्यक्ति को महीनों इंतजार करना होता है। यही वजह है कि कानून के रास्ते  पर चलने वाले साधारण नागरिक की न्यायपालिका में आस्था कम हो रही है वहीं कानून तोड़ने का दुस्साहस करने वालों के मन में उसके प्रति खौफ बचा ही नहीं । इस स्थिति के लिए वकील ज्यादा जिम्मेदार हैं या न्यायाधीश इस पर बहस हो सकती है किंतु कुछ हद तक दोनों की जिम्मेदारी बनती है। बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के लिए मृत्यदंड का प्रावधान होने के बाद भी वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। प. बंगाल में ममता बैनर्जी की सरकार दुष्कर्म के विरुद्ध कोई नया कानून विधानसभा में लाने जा रही है । विपक्षी दल भाजपा ने भी उसको समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके पहले ममता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बलात्कार पर मृत्युदंड   देने संबंधी कानून बनाने की मांग भी की थी। लेकिन इस तरह की कोशिशें भी महज दिखावा है जो दुष्कर्म की हर बड़ी वारदात के बाद किया जाता है। कोलकाता में हाल ही में एक महिला चिकित्सक की बलात्कार के बाद हत्या  देश भर में चर्चा का विषय बन गई। उसे लेकर वैसा ही गुस्सा फूट पडा जैसा बरसों पहले दिल्ली में निर्भया काण्ड के बाद देखने मिला था। उस काण्ड के बाद  बलात्कार के मामलों में निचली अदालतों ने बिजली जैसी फुर्ती से निपटारे किये। कुछ में तो  एक महीने के भीतर ही मृत्यदंड तक दे दिया गया। लेकिन वह उत्साह  क्षणिक ही था। न तो दुष्कर्म  रुके और न ही अदालतों की वह तेजी बरकरार रही। ये देखते हुए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका को जो नसीहत दी गई वह भी उस सम्मेलन में उपस्थित  प्रतिनिधियों के एक कान से घुसने के बाद दूसरे से निकल गई होगी। कोलकाता कांड से राज्य सरकार की छवि पर लगे धब्बे  प्रस्तावित कानून के पारित होने पर भी नहीं साफ होने वाले। सही बात तो ये है कि जनता को सस्ता और जल्द न्याय दिलवाने के प्रति सबंधित कोई भी पक्ष ईमानदार नहीं है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका तीनों अपने आप में मस्त हैं। उन्हें न्याय व्यवस्था में कमी और खामी तभी नजर आती है जब उससे उनका कोई अहित हो रहा हो। जहाँ तक बात जनता  की है तो उसकी तकलीफ सुनने की फुर्सत किसी के पास नहीं। इस आधार पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा न्यायपालिका से की गई अपेक्षाएं कुछ दिन के बुद्धिविलास के उपरांत हवा - हवाई होकर रह जाएंगी क्योंकि पहले भी ऐसा होता रहा है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी