Friday, 4 October 2024

इजरायल और ईरान सीधे भिड़े तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जायेगी


पश्चिम एशिया में एक बार फिर महायुद्ध की आशंका  बढ़ने लगी है। जब तक बात इजरायल और गाज़ा पर काबिज हमास के बीच विवाद की थी तब तक तो गनीमत रही किंतु धीरे - धीरे लड़ाई का दायरा लेबनान और यमन तक बढ़ने के बाद  अब ईरान तक फैलने के कगार पर है । सर्वविदित है कि हमास और हिज़बुल्लाह जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों को अस्त्र, शस्त्र और धन ईरान ही उपलब्ध करवाता है।  अरब देशों के बीच अमेरिका का खुलकर विरोध करने वाला ईरान ही है। उसके पास परमाणु बम होने के कारण ही अमेरिका उसके प्रति द्वेष भाव रखता है। शाह पहलवी के हटने के बाद जब अयातुल्ला खोमैनी ईरान की सत्ता पर काबिज हुए तो पूरा माहौल बदल गया। शाह के दौर की आधुनिकता  पलक झपकते लुप्त होने लगी । खोमैनी के शासन में ईरान पूरी तरह कट्टर इस्लामिक देश बन गया। अपार तेल संपदा के बल पर वह अमेरिका को चुनौती देने का दुस्साहस करने से भी बाज नहीं आता जिनके कारण उसने ईरान पर जबरदस्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये। परिणास्वरूप वह रूस की तरफ झुक गया। गत वर्ष हमास द्वारा इजरायल पर अचानक किये गए हमले के पीछे भी ईरान ही था। बीच - बीच में उसके और इजरायल के बीच भी मिसाइलों का आदान - प्रदान होता रहा किंतु सीधे युद्ध की स्थिति नहीं बनी। लेकिन बीते कुछ दिनों में हालात उसी ओर बढ़ रहे हैं।  गत सप्ताह ईरान ने सैकड़ों मिसाइलें इजरायल पर बरसाकर आग में घी डाल दिया जिससे  इजरायल को भी ईरान पर आक्रमण का वाजिब बहाना मिल गया। वह जिस तरह से आक्रामक है उससे लगता है अमेरिका ने उसे पूरी शह दे रखी है। लेकिन इस समूचे घटनाक्रम में दो सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं। पहली तो ये कि ईरान का सरपरस्त रूस खुद यूक्रेन के साथ ऐसे युद्ध में फंसा हुआ है जिसका अंत समझ में नहीं आ रहा। यूक्रेन की पीठ पर  अमेरिका का पूरा - पूरा हाथ होने से वह रूस जैसी महाशक्ति का मुकाबला कर रहा है। दूसरी उल्लेखनीय बात ये है कि अरब के इस्लामिक देशों के बीच पहले जैसी एकता नहीं रही। ईरान और ईराक के बीच  एक दशक तक चले युद्ध ने इसकी शुरुआत की थी। फिर ईराक द्वारा कुवैत पर कब्जा किये जाने के बाद अमेरिका ने जो सैन्य कारवाई की उसने भी इस अंचल के शक्ति संतुलन को उलट -  पुलट दिया। सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफ़ी जैसे जो  घोर अमेरिका विरोधी राष्ट्राध्यक्ष  थे उन दोनों को अमेरिका ने दुनिया से ही हटा दिया। एक और बात जो इस दौरान देखने मिल रही है वह है सऊदी अरब और इजरायल में बढ़ती नजदीकी। भले ही पश्चिम एशिया के इस्लामिक देशों पर  सऊदी अरब की चौधराहट पहले जैसी नहीं रही किंतु अपनी बेशुमार तेल संपदा और संपन्नता के कारण वही ऐसा देश है जो अमेरिका के साथ बराबरी से बैठता है। चूंकि उसने भी इजरायल का विरोध बंद कर दिया वहीं  अन्य अरबी देशों में एक भी कद्दावर नेता नहीं बचा जो सबको इजरायल के विरुद्ध लामबंद कर सके। जहाँ तक बात फिलीस्तीनियों की है तो यासर अराफात के बाद  उनका कोई प्रभावशाली नेतृत्व है नहीं। हमास और हिजबुल्लाह जैसे आतँकवादी संगठनों ने उनकी लड़ाई अपने हाथ में लेकर उसकी गंभीरता खत्म कर दी। अराफात की छवि भी  शुरू में तो आतँकवादी की ही थी किंतु जीवन के उत्तरार्ध में वे वैश्विक स्तर के नेता बनकर उभरे जिसे तीसरे विश्व के देशों का समर्थन और सहयोग मिला। इजरायल के साथ हुए ऐतिहासिक शांति समझौते के बाद तो उनकी प्रशंसा होने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि पश्चिम एशिया में शान्ति का सूर्योदय हो चुका है लेकिन उनके निधन के बाद स्थितियाँ कुत्ते की पूँछ की तरह फिर से पुराने स्वरूप में लौट आईं। इजरायल पूरी तरह सही है और उसका हर कदम न्यायोचित है यह मान लेना अनुचित होगा किंतु वर्तमान तनाव हमास के हमले से शुरू हुआ और हिजबुल्लाह के कूदने से उसमें और वृद्धि हो गई। रही - सही कसर ईरान पूरी किये दे रहा है। ये बात पूर्णतः सत्य है कि जिस तरह हमास और हिजबुल्लाह बिना ईरान के संरक्षण के इजरायल से नहीं टकरा सकते वैसे ही इजरायल भी बिना अमेरिका की सहमति और सहयोग से एक साथ कई मोर्चे नहीं खोल सकता। इजरायल के जो तेवर हैं वे किसी बड़ी घटना का संकेत जरूर दे रहे हैं। अमेरिका ईरान को झुकाने का जो अवसर बरसों से तलाश रहा था वह उसे अनायास मिल गया है साथ ही रूस के यूक्रेन में उलझे रहने से फिलहाल किसी बड़े प्रतिरोध की संभावना भी नहीं है। लेकिन  इजरायल और ईरान सीधे भिड़े तो इससे पूरी दुनिया हिल उठेगी। कोरोना के बाद यूक्रेन संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो नुकसान पहुंचाया उससे वह धीरे - धीरे उबरने की स्थिति में आ ही रही थी की ये संकट आ गया। चिंता का विषय ये है कि जिनको इसे रोकना चाहिए वे ही उसे भड़का रहे हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 3 October 2024

धर्मनिरपेक्षता का पालन केवल हिंदुओं की जिम्मेदारी नहीं


म.प्र के बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने बेबाक बयानों के लिए चर्चित रहते हैं। भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में वे लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। बिहार के बोधगया में दिया उनका वह ताजा  बयान चर्चा के साथ ही विवाद में भी घिर गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हिन्दू अपने धर्मगुरुओं को अपमानित करने में आगे - आगे रहते हैं जबकि मुसलमान कभी मौलवियों के विरुद्ध कुछ नहीं बोलते। उन्होंने इस बात पर भी ऐतराज जताया कि  हवस के पुजारी जैसी टिप्पणी आम तौर पर सुनाई देती है लेकिन हवस का मौलवी या पादरी नहीं कहा जाता। उनका कहना है कि हिंदुओं के दिमाग में इस तरह के शब्द प्रायोजित तरीके से भरे गए हैं। उनके इस बयान पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की आपत्ति आने पर उनका कहना है कि पुजारी हिन्दू धर्म में अत्यंत सम्मानित होता है और उनके बयान का उद्देश्य हिंदुओं को जगाना था। उनकी उक्त  टिप्पणियों से राजनीतिक हल्कों में भी  हलचल है। लेकिन बिना पूर्वाग्रह के सोचा जाए तो श्री शास्त्री की बातों में काफी वजनदारी है। उनमें सांप्रदायिकता खोजने वाले निश्चित रूप से बिलबिला रहे होंगे किंतु यक्ष प्रश्न ये है कि इस तरह की टिप्पणियों का केंद्र  सनातन धर्म और उससे जुड़े चरित्र ही क्यों होते हैं? भारतीय फिल्मों में भी पंडित और पुजारी सामान्यतः  उपहास का पात्र होता है या उसे चरित्रहीन बताया जाता है। इसके विपरीत मौलवी और पादरियों को ज्यादातर दयावान , परोपकारी और सहृदय दिखाने का चलन है। बागेश्वर धाम प्रमुख का ये कहना बिल्कुल सही है कि हिंदुओं में अपने धर्म से जुड़े सम्माननीय व्यक्तित्वों के अपमान को चुपचाप देखने की प्रवृत्ति है जबकि मुस्लिम समाज अपने धर्म गुरुओं के विरुद्ध एक बात भी न कहता और न सुनता है। ये आरोप भी सच्चाई के काफी करीब है कि हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता को ढोने का दायित्व केवल हिंदुओं के कंधों पर है। सहिष्णुता और सर्व धर्म सद्भाव की भावना भी उन्हीं से अपेक्षित है। वैसे ये बात बिल्कुल जायज है कि बहुसंख्यक होने से हिंदुओं का फर्ज है कि वे  अल्पसंख्यक समुदाय पर अपनी मर्जी न थोपें परंतु उसी के साथ  ही अल्पसंख्यकों को भी चाहिए कि वे हिंदुओं की  भावनाओं का सम्मान करें और बजाय  टकराव के रास्ते पर चलने के उनके साथ समन्वय स्थापित करें। हमारा देश  बहुधर्मी है जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध , पारसी और ईसाई सभी  रहते हैं। इनमें हिंदुओं की संख्या 82 प्रतिशत है। ऐसे में इसे भले ही सरकारी तौर पर  हिन्दू राष्ट्र घोषित न किया गया हो किंतु बागेश्वर धाम प्रमुख द्वारा भारत को हिन्दू राष्ट्र कहे जाने पर कांग्रेस के वरिष्ट नेता कमलनाथ ने भी ये कहकर उनका समर्थन किया था कि 80 फीसदी से ज्यादा हिन्दू जिस देश में रहते हों उसे हिन्दू राष्ट्र नहीं तो और क्या कहेंगे ? रही बात धर्मनिरपेक्षता की तो वामपंथी विचारधारा से ओतप्रोत सुप्रसिद्ध शायर जावेद अख्तर को दिये एक साक्षात्कार में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने दो टूक कहा था कि भारत संविधान के कारण धर्म निरपेक्ष नहीं है बल्कि इसलिए क्योंकि यहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं। वे एक पुस्तक या ईश्वर से बंधे नहीं हैं। हिन्दू धर्म की सोच इतनी उदार है कि वह नास्तिक व्यक्ति को भी अपने भीतर समाहित कर लेती है। इसके उलट मुस्लिम बहुल देशों में धर्मनिरपेक्षता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। ज्यादा दूर क्यों जाएं हमारे पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्ला देश को ही देखें तो वहाँ रहने वाले हिंदुओं और ईसाइयों  की  दयनीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इंडोनेशिया ही संभवतः अपवाद होगा जो मुस्लिम बहुल होने के बावजूद भारतीय संस्कृति से अपना जुड़ाव बनाये हुए है। समूचे अरब जगत में एक भी मुस्लिम बहुल देश सिवाय इस्लाम के अन्य किसी धर्म को प्रोत्साहित नहीं करता। हमारे देश में रहने वाले गैर हिंदुओं को प्राप्त धार्मिक आजादी पर किसी को आपत्ति नहीं है किंतु इसके चलते हिंदुओं के धार्मिक रीति रिवाजों और  व्यक्तित्वों का अपमान किया जाना धर्मनिरपेक्षता के खोखलेपन को उजागर करता है। ये बात पूरी तरह सच है कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने हिंदुओं के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर किया है। आजादी के बाद गंगा - जमुनी संस्कृति का जो स्वांग रचा गया उसने भी बहुत नुकसान पहुंचाया। ऐसे में धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने जो मुद्दा छेड़ा उस पर हिन्दू समाज  तो मंथन करे ही  किंतु उनकी बात का विरोध कर रहे लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता का पालन अकेले  बहुसंख्यक समुदाय की जिम्मेदारी ही नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 1 October 2024

राज्य माता का दर्जा देने मात्र से गाय पालने के प्रति उत्साह नहीं जाग सकता

 

चुनाव से पहले सत्ता में बैठे लोगों द्वारा लोक लुभावन घोषणाएं करना एक परिपाटी है । इसी के चलते महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने म.प्र की लाड़ली बहना की नकल करते हुए लड़की बहिन योजना प्रारंभ की जिसमें प्रति माह 1500 रु. दिये जा रहे हैं। इस योजना का असर भी दिखाई देने लगा है । और भी ऐसे ऐलान राज्य सरकार की तरफ से किये जा रहे हैं जो मतदाता को आकर्षित कर सकें। इसी क्रम में गत दिवस देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देने के  साथ ही उसे पालने पर प्रतिदिन 50 रु. अनुदान देने की घोषणा भी की गई। देशी नस्ल की गायों को पालने के लिए राज्य सरकार की ओर से की गई पहल सतही तौर पर तो काफी अच्छी प्रतीत होती है। लेकिन गो पालन को प्रोत्साहित करने की सरकारी योजनाओं का जो हश्र अन्य राज्यों में हुआ उसे देखते हुए महाराष्ट्र सरकार की इस घोषणा से देशी गाय पालने के लिए लोगों को आकर्षित करने का उद्देश्य पूरा होने पर संदेह करना गलत नहीं होगा। म.प्र सहित अनेक राज्यों ने गोशालाओं हेतु अनुदान देने की नीति बना रखी है किंतु उनमें गायों की दुर्दशा  किसी से छिपी नहीं है। भोपाल के निकट एक गोशाला में तो सैकड़ों गायें मर गईं। सरकार उनके रखरखाव और भरण - पोषण हेतु जो अनुदान देती है वह भी किसी मजाक से कम नहीं। पहले  शहरों के निकट पर्याप्त  खुली जगह होती थीं उनमें  गाय - भैंस को चरने भेजा जाता था। शहरों के असीमित विस्तार ने वह सुविधा  छीन ली जिससे गाय के लिए आहार का खर्च भी बढ़ गया। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि दुग्ध व्यवसाय में भैंस का उपयोग ज्यादा होने से भी गाय पालने से लोग बचने लगे। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले कृषि के साथ गाय पालना आम था। कुछ लोग भैंस भी रखते थे किंतु जब तक बैलों से खेती होती रही तब तक गाय का पालन अनिवार्यता थी क्योंकि बछड़ा ही आगे चलकर बैल बनता था। हालाँकि खेती में मशीनों का उपयोग बढ़ने के बाद भी  ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरों में रहने वाले हिन्दू भी गाय के प्रति श्रद्धा रखते हैं । ज्यादातर घरों में गाय की रोटी आज भी बनती है। उसको माँ कहा जाता है। गो हत्या को पाप की श्रेणी में माना गया है। बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं का  सम्मान करते हुए देश के 28 में से 20 राज्यों में गो वध प्रतिबंधित है। हालाँकि प. बंगाल सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में उस पर रोक नहीं है और वहाँ गोमांस खाया भी जाता है। भारत में हिंदुओं के अलावा जैन, सिख बौद्ध और पारसी भी गोमांस से परहेज करते हैं। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग भी धर्म गुरुओं द्वारा उठाई जाती रही किंतु उस पर किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। कुल मिलाकर गोपाल ( श्रीकृष्ण) की आराधना करने वाले देश में गाय के प्रति श्रद्धा के बावजूद उपेक्षा भाव बढ़ता गया जिससे धीरे - धीरे उसके पालन के प्रति रुचि भी घट गई। इसका सबसे ज्वलंत प्रमाण है शहरों और राजमार्गों पर बैठे गायों के झुंड। जो लोग गाय रखे हुए हैं वे भी दूध निकालने  के बाद उसे छोड़ देते हैं । जो गाय दूध देना बंद कर देती हैं वे भी बेसहारा हो जाती हैं । इसीलिए प्रति माह देश भर में हजारों गायें राजमार्गों पर ट्रकों से कुचलकर मारी जाती हैं जिनका शव वहीं सड़ता रहता है। ये सब देखते हुए महाराष्ट्र सरकार द्वारा देशी गाय को राज्य माता का दर्जा देना उसके पालन के प्रति लोगों में उत्साह का सृजन कर सकेगा ये कहना मुश्किल है। और फिर 50 रु. प्रतिदिन का अनुदान भी ऊँट के मुँह में जीरा समान ही है। वैसे गाय के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास हर दृष्टि से स्वागत योग्य हैं। गाय का दूध औषधि तुल्य माना जाता है। भैंस की तुलना में उसका रखरखाव भी कम खर्चीला है किंतु वह व्यवसायिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं मानी जाती। इसीलिए अधिकतर डेरियों में भैंसे ही होती हैं। वैसे कुछ बड़े शहरों में गाय के दूध और उससे बने घी आदि की अच्छी कीमत मिलती है किंतु ग्रामीण इलाकों और मध्यम श्रेणी के शहरों में लोगों की क्रय शक्ति उतनी नहीं होती। गुजरात जैसे राज्य में अमूल ने दुग्ध उत्पादकों को जिस तरह आर्थिक संबल प्रदान किया वह व्यवस्था  मार्गदर्शक का काम कर सकती है। सही बात ये है कि अर्थ प्रधान इस युग में आस्था पर व्यवसायिकता हावी है। जिस प्रकार हिन्दी को राजभाषा बनाये जाने के बाद भी वह अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव को कम नहीं कर पा रही क्योंकि रोजगार प्राप्ति में वह उसके जितनी सहायक नहीं है। उसी तरह गाय को राज्य माता क्या राष्ट्र माता का  दर्जा दे दिया जाए तब भी उसके पालन के प्रति रुचि तब तक नहीं बढ़ेगी जब तक वह आर्थिक तौर पर  लाभदायी न हो। और भला 50 रु. रोजाना के अनुदान के लिए कौन गाय पालेगा? 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 September 2024

इजरायल के साथ रिश्ते सुधारने में ही अरब देशों का फायदा

 अक्तूबर 2023 को इजरायल पर हमास ने बड़ा हमला बोला जिसमें 1200 इजरायली नागरिकों की जान गई और 251 को बंधक बना लिया गया। इसी के साथ इजरायल ने हमास के खिलाफ जंग का एलान किया। इस बीच गाजा में इजरायली हमलों के विरोध में हिजबुल्लाह ने भी उत्तरी इजरायल को निशाना बनाना शुरू किया। उस हमले को एक साल पूरा होने में सप्ताह भर बाकी है। इस अवधि में इजरायल ने जो रौद्र रूप दिखाया उसके कारण रूस और यूक्रेन युद्ध की खबरें फीकी पड़ गईं। हमास द्वारा अचानक किये गये  मिसाइल हमलों ने इजरायल की अचूक मानी जाने वाली एयर डिफेंस प्रणाली  पर सवाल उठा दिये। हमास के लड़ाके जिस तरह इजरायली नागरिकों का अपहरण करने में कामयाब हुए उससे पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। यहाँ तक कि अमेरिका भी आश्चर्य में डूब गया।  वह हमला इजरायल की गुप्तचर एजेंसियों के गाल पर भी बड़ा तमाचा था जो  दुनिया भर में धाक जमा चुकी थीं। हमास के हमले के पीछे ईरान का हाथ बताया गया जो अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन है और इजरायल को मिटाने आमादा  है। असल में अमेरिका के प्रयासों से सऊदी अरब और इजरायल के बीच दोस्ती की शुरुआत स्वरूप एक समझौता अंतिम स्थिति में आ गया था जिसके बाद अरब जगत का समूचा शक्ति संतुलन बदल जाता। सं. अरब अमीरात के  देशों से इजरायल के व्यापारिक संबंध कायम होने के बाद ईरान परेशानी में था। उसे लगा कि सऊदी अरब और इजरायल में दोस्ताना कायम होने पर इस्लामिक जगत में इजरायल विरोधी भावना मंद पड़ जायेगी। वैसे भी लगातार युद्ध करते - करते  अनेक  देश हताश हो चुके हैं। अन्य कुछ देश भी इजरायल के विरोधी तो हैं किंतु सीधे टकराव से बचने लगे हैं। लेबनान  और यमन ही हैं जो ईरान की तरह अभी भी उसके प्रति नफरत से भरे हुए हैं। गत वर्ष जब हमास ने  इजरायल पर सैकड़ों मिसाइलें दागकर उसका मनोबल तोड़ने की कोशिश की तब उसने दोगुनी ताकत से पलटवार किया और हमास को समूल नष्ट करने के संकल्प के साथ गाजा पट्टी की आपूर्ति रोक दी। स्मरणीय है अतीत में हुए समझौते में गाजा और पश्चिमी हिस्से के रूप में  फिलीस्तीन के दो टुकड़े कर दिये गए।  बीच में इजरायल है। दोनों को बिजली , पानी सहित अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की आपूर्ति वही करता है। हमास का हमला गाजा की तरफ से हुआ जिसकी सीमाएं मिस्र और लेबनान से मिलती हैं। इजरायल का जवाबी आक्रमण गाजा वासियों के लिए बरबादी लेकर आया। लाखों लोग बेघर हो गए  । पूरी दुनिया इजरायल पर युद्ध विराम के लिए दबाव डालती रही किंतु वह रुकने तैयार नहीं। लेकिन इस युद्ध का केंद्र अचानक गाजा के साथ ही लेबनान भी बन गया। इसका कारण वहाँ बैठा हिज़बुल्लाह नामक  संगठन है जो इस्लामिक आतंकवाद का मुखिया बना हुआ था। लेकिन बीते कुछ दिनों में ही इजरायल ने उसके सभी शीर्ष नेताओं को मार डाला। लेबनान की राजधानी बेरुत आधे से ज्यादा मलबे में तब्दील हो चुकी है। हिजबुल्लाह की पीठ पर ईरान का हाथ होने से अब ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि इजरायल का अगला निशाना वही होगा। इसके डर से ईरान के सर्वोच्च नेता को अति सुरक्षित स्थान पर छुपना पड़ा। कहा जा रहा है पश्चिम एशिया लंबे युद्ध में फंसने जा रहा है। इजरायल के प्रधानमंत्री  नेतन्याहू ने संरासंघ महासभा को संबोधित करते हुए जो तेवर दिखाये उनसे लगता है वह इस बार इस्लामिक आतंकवाद की कमर तोड़ने पर आमादा है। ईरान भी उससे सीधे टकराने का साहस नहीं कर पा रहा। अमेरिका चूंकि इजरायल के साथ खुलकर खड़ा है इसलिए वह कदम पीछे खींचने तैयार नहीं है। लेकिन इस संकट में जो सबसे बड़ी बात सामने आई वह ये कि अरब राष्ट्रों को इजरायल के साथ संबंध सुधारकर पश्चिम एशिया को आग में जलने से बचाने की अकलमंदी दिखानी चाहिए। इजरायल विज्ञान और तकनीक में जितना आगे है उसके सामने  तेल संपदा संपन्न तमाम अरब देश भी कहीं ठहरते नहीं हैं। सं. अरब अमीरात इस बात को समझ चुका है और सऊदी अरब के नये शासक भी इजरायल के साथ अच्छे रिश्तों का फ़ायदा समझकर उससे निकटता स्थापित करना चाह रहे हैं  जिसमें ईरान रोड़े अटका रहा है। इस्लामिक देशों को अपने यहाँ बैठे आतंकवादियों को संरक्षण देना बंद करना होगा जिनके कारण उनकी छवि भी खराब होती है। इसमें दो राय नहीं कि बीते कुछ दशकों से इस्लाम के नाम पर फैलाई जा रही दहशतगर्दी ने पूरी दुनिया को अशांत  कर रखा है। अरब राष्ट्रों से लाखों लोग जान बचाकर यूरोपीय देशों में शरण लेने पहुंचे लेकिन वहाँ भी उन्होंने आंतक के बीज बो दिये। इजरायल ने हमास पर जो हमला किया वह आक्रमण का जवाब था। इसी तरह हिजबुल्लाह के विरुद्ध उसकी कारवाई भी तब हुई जब उसने हमास के समर्थन में इजरायल पर मिसाइलें दागीं। कुल मिलाकर इजरायल जो कर रहा है उसके लिए उसे हमास ने उकसाया। उसकी जगह कोई और देश होता तो वह भी ऐसा ही करता। 


-  रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 28 September 2024

पेट्रोल - डीजल : कम से कम 10 रु. सस्ते हों


दो दिनों से पेट्रोल - डीजल सस्ता किये जाने की खबरें आ रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में आई गिरावट के चलते बीते कुछ महीनों में भारत की तेल कंपनियों ने भरपूर मुनाफा कमाया। कहने को तो पेट्रोल - डीजल की कीमतों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया है किंतु ये केवल दिखावे के लिए है। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपना पूरा नियंत्रण उन पर बना रखा है। इसीलिए दुनिया भर में कीमतें कम होने के बावजूद भारत में पेट्रोल - डीजल महंगा बेचा जा रहा है। ज्यादातर तेल कंपनियां सरकार का उपक्रम होने से उन पर पूरा नियंत्रण उसी का है। बीते सालों में एक या दो मर्तबा दाम घटाए भी गए तो बेहद कम। हालाँकि काफी समय से उनमें स्थिरता का बना रहना ही सरकारी मेहरबानी रही। दो वर्ष पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दीपावली के पहले कीमतें घटने का ऐलान कर जनता को उपहार देने की बात कही। कोरोना की विभीषिका से उबरकर दुनिया यूक्रेन संकट में फंस गई। ऐसी स्थिति में आम तौर पर कच्चा तेल महंगा हो जाता है। लेकिन रूस से हुए सौदे के तहत भारत को सस्ते दामों पर कच्चा तेल मिलने से हम बड़े घाटे से बचे रहे। यही वजह है कि भारत की तेल कंपनियां भारी मुनाफा कमाने में सफल रहीं। जो खबरें अधिकृत तौर पर प्रसारित हुईं उनके अनुसार आज की स्थिति में उनको प्रति लीटर पर 15 रु. का मुनाफा है। ऐसे में यदि पिछली बार की तरह मात्र 2 से 3 रु. प्रति लीटर कीमतें घटाई जाती हैं तो इसे ऊँट के मुँह में जीरा कहा जाएगा। युद्द या किसी अन्य आपातकालीन स्थिति में जनता से अपेक्षा होती है सरकार का साथ दे किंतु  आये दिन ये दावा किया जाता है कि अर्थव्यवस्था बेहद सुखद स्थिति में है और मेक इन इंडिया की 10 वर्षीय मुहिम के कारण देश  निर्यात के क्षेत्र में भी तेजी से आगे  बढ़ रहा है । भारत में बने रक्षा उपकरणों की दुनिया भर में भारी मांग होने से व्यापार संतुलन की स्थिति सुधरी है। कूटनीतिक मंचों पर भारत को विश्व की महाशक्तियों के बराबर बिठाया जाता है। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता  के लिए हमारे दावे का समर्थन वे देश भी करने लगे हैं जो अब तक भारत को हेय दृष्टि से देखा करते थे। देश में वैकल्पिक ईंधन का उपयोग बढ़ने से पेट्रोल डीजल की खपत कम करने का प्रयास भी रंग ला रहा है। जीएसटी और टोल टेक्स से होने वाली कमाई उम्मीद से ज्यादा होने लगी है। आयकर संग्रह   भी लक्ष्य से अधिक होना शुभ संकेत है। ये देखते हुए सबसे अच्छा तो यही होगा कि जीएसटी काउंसिल की आगामी बैठक में पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी में शामिल किया जावे। हालाँकि इसके लिए राज्यों की असहमति का बहाना बना दिया जाता है। लेकिन यदि किसी विशेष परिस्थितिवश ऐसा करना संभव न हो तब भी केंद्र सरकार पेट्रोल डीजल के दामों में कम से कम 10 रु. प्रति लीटर की कमी करे। इसके साथ ही रसोई गैस सिलेंडर के दाम  भी 150 से 200 रु. कम किये जाएं, तभी इसे सही मायनों में दीपावली उपहार माना जाएगा। यदि इसमें भी सरकार के वित्तीय सलाहकार टांग फंसाएं तो फिर ईमानदारी इसी में है कि पेट्रोलियम उत्पादों को बाजार के उतार - चढ़ाव पर छोड़ दिया जावे। काफी समय तक पेट्रोल - डीजल की कीमतों में ये प्रयोग चलता रहा जिसके कारण दैनिक स्तर पर कीमतें घटती - बढ़ती रहीं और जनता भी उसे सहज भाव से लेने लगी थी किंतु निजी क्षेत्र को आर्थिक सुधारों को अपनाने की नसीहत देने वाला सरकारी तंत्र पेट्रोल - डीजल के दामों को अपनी मुट्ठी में कैद करने  पर आमादा है। मोदी सरकार से मंहगाई को लेकर उसके प्रतिबद्ध समर्थक भी नाराज हैं। जिसमें पेट्रोल - डीजल की कीमतें बड़ा कारण है। ऐसे में जब दक्षिण एशिया के छोटे - छोटे देशों में इन चीजों के दाम भारत की तुलना में बेहद कम हैं तब हमारे यहाँ उनका 100 रु. प्रति लीटर से ज्यादा होना मुनाफाखोरी नहीं तो और क्या है? दाम घटाने की जो खबरें उड़ रही हैं उनके पीछे कुछ राज्यों के विधानसभा  चुनाव  भी हैं। खास तौर पर महाराष्ट्र को लेकर भाजपा काफी चिंतित है। ऐसे में यदि दाम घटाना ही है तो कम से कम उतने तो हों जिनसे लोग राहत का अनुभव करें। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 27 September 2024

हिमाचल के शांत माहौल में आग लगाने वालों के मंसूबों को कुचलना जरूरी


प्राकृतिक सुंदरता के साथ ही शांतिप्रियता के लिए प्रसिद्ध  हिमाचल प्रदेश इन दिनों अशांत  है। राजधानी शिमला की एक मस्जिद के अवैध निर्माण का हिन्दू संगठनों ने जब विरोध किया तब उसे तोड़ने की कवायद शुरू हुई। मस्जिद के मौलवी की ये सफाई किसी के गले नहीं उतरी कि उसे नहीं पता मस्जिद में हुआ अवैध निर्माण किसने करवाया। वह विवाद जैसे - तैसे सुलझा तो मंडी जिले की एक मस्जिद में अवैध निर्माण के विरोध में शुरू हुआ हिंदुओं का आंदोलन देखते - देखते  पूरे प्रदेश में फैल गया। हिमाचल  में मुस्लिम आबादी उंगलियों पर गिनने लायक है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में वहाँ उ.प्र से मुसलमानों के  आकर बसने का सिलसिला शुरू हुआ और उसी के साथ  तनाव की नींव पड़ गई। ये लोग यहाँ किस कारण से बसे ये स्पष्ट नहीं है। हिमाचल  में  कोई मुस्लिम धार्मिक केंद्र भी नहीं है। अवैध रूप से दुकानें खोलने और सड़कों पर रेहड़ी लगाने वालों में मुस्लिमों की बढ़ती संख्या के बीच जब उनमें  से कुछ के दस्तावेजों की जाँच हुई तब पता चला कि  ज्यादातर की जन्मतिथि 1 जनवरी है। ये जानकारी भी उजागर हुई कि राज्य के अनेक शहरों में दशकों  से  वीरान पड़ी मस्जिदों में अचानक नमाज  की शुरुआत हो गई जिसमें अन्य राज्यों से आये लोगों की बड़ी संख्या नजर आई। हिन्दू संगठनों का आरोप है कि मुस्लिम  आबादी जिस रहस्यमय तरीके से बढ़ी वह किसी बड़े षडयंत्र का हिस्सा लगता है। बहुसंख्यक आबादी को ये भी महसूस होने लगा कि अन्य राज्यों से आ रहे मुस्लिम माहौल को  तनाव ग्रस्त बना रहे हैं। मस्जिदों के इर्द गिर्द रहने वाले हिन्दू परिवारों की महिलाएं इन बाहरी तत्वों की अश्लील हरकतों  से असहज महसूस करने लगीं। जब इसकी शिकायत की गई तो जवाब मिला आप अपनी आँखें बंद कर लीजिये। हिन्दू व्यापारियों के प्रतिष्ठानों के सामने जबरन अपना कारोबार शुरू करने से भी विवाद पैदा हो रहे हैं। बड़ी मंडियों में अचानक अपरिचित व्यापारियों की आमद होने से स्थानीय व्यवसायी परेशानी में हैं।   शिमला की मस्जिद के अवैध निर्माण को तोड़ने के लिए सख्त कदम उठाये जाने का सकारात्मक असर भी हुआ। इसी क्रम में गत दिवस राज्य के एक मंत्री विक्रमादित्य सिंह द्वारा कहा गया कि उ.प्र की तरह ही  हिमाचल में भी खाद्य सामग्री बेचने वालों को अपनी आईडी और नाम लिखना होगा। इस हेतु एक समिति विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बनाये जाने की बात भी कही गई । विक्रमादित्य पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह के पुत्र हैं ।  उनकी माँ प्रतिभा देवी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थीं और विधानसभा  चुनाव में पार्टी की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदार रहीं । लेकिन हाईकमान ने सुखविंदर सिंह सुक्खू की ताजपोशी करवा दी।  विक्रमादित्य मंत्री बन तो  गए किंतु कुछ विधायकों के इस्तीफे के बाद उत्पन्न राजनीतिक संकट के दौरान उन्होंने पद छोड़ दिया। यद्यपि बाद में त्यागपत्र वापस ले लिया लेकिन मुख्यमंत्री से उनके  मतभेद बने हुए हैं। इसलिए जब खाद्य सामग्री विक्रेताओं को अपनी पहिचान के साथ कर्मचारियों का नाम प्रदर्शित करने के फैसले की खबर उनके हवाले से आई तो लोग चौंक गए क्योंकि ऐसा ही आदेश उ.प्र की योगी सरकार द्वारा जारी किये जाने पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। लेकिन कुछ घंटों बाद ही खबर आ गई कि कांग्रेस हाईकमान इस आदेश से बहुत नाराज है और विक्रमादित्य को दिल्ली तलब किया गया है। मुख्यमंत्री श्री सुक्खू ने भी स्पष्टीकरण दिया कि अभी उक्त निर्णय लागू नहीं किया गया। लेकिन इस सबसे कांग्रेस का अधकचरापन एक बार फिर सामने आ गया। दुकान के मालिक का नाम या पहिचान प्रदर्शित करना धर्मनिरपेक्षता के लिए कौन सा खतरा है ये समझ से परे है। असली मुद्दा हिमाचल प्रदेश में आ रहे बाहरी लोगों की पहिचान उजागर करना है। मैदानी इलाकों से पहाड़ी राज्य में आकर बसने वालों का सत्यापन जरूरी है। हिमाचल के कुछ इलाके सीमावर्ती होने से सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी हैं। उस लिहाज से संदर्भित निर्णय  रोककर राज्य सरकार और कांग्रेस हाईकमान इस राज्य के सामाजिक ताने - बाने को नष्ट करने में सहायक बन  रही है। जिन इलाकों में दूर - दूर तक मुस्लिम आबादी न हो वहाँ अचानक मस्जिद बनने लगे तो संदेह होना स्वाभाविक है। उत्तराखंड  पहले से ही इस समस्या से जूझ रहा है और अब एक और पहाड़ी राज्य में वैसे ही हालात बन रहे हैं । संयोग से दोनों की सीमाएं चीन से मिलती हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 26 September 2024

राहुल के बयान से कश्मीर घाटी के अलगाववादियों का हौसला बढ़ेगा



कांग्रेस समर्थक प्रचार माध्यम लगातार ये दावा कर रहे हैं  कि राहुल गाँधी काफी परिपक्व हो गए हैं। संसद में उनके भाषणों के आधार पर ये अवधारणा बनाने का प्रयास भी जारी है कि  वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर  स्थापित हो गए हैं। उनकी हालिया अमेरिका यात्रा में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने भारतीय श्रोताओं के सामने कहा कि राहुल पप्पू  नहीं अपितु एक कुशल रणनीतिकार हैं। कोई पार्टी अपने नेता को महिमामंडित करे तो आश्चर्य नहीं होता। लेकिन ये नेता पर निर्भर है कि वह अपने को उस कसौटी पर साबित करे।  लोकसभा चुनाव में मिली 99 सीटों को लेकर श्री गाँधी में जो  उत्साह उत्पन्न हुआ वह पूरी तरह सही है किंतु अभी भी वे कुछ न कुछ ऐसा कह जाते हैं जिससे उनकी छवि तो खराब होती ही है , कांग्रेस को भी रक्षात्मक हो जाना पड़ता है। अमेरिका यात्रा में भी उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और जातिगत जनगणना के मुद्दे पर जो टिप्पणियाँ कीं वे बेहद गैर जिम्मेदाराना थीं। वहाँ से लौटने के बाद भी वे जिस तरह से  बयानबाजी कर रहे हैं उससे उनके परिपक्व होने पर संदेह होता है। गत दिवस जम्मू कश्मीर चुनाव  में कांग्रेस का प्रचार करते हुए उन्होंने कह दिया कि भाजपा ने जम्मू कश्मीर से पूर्ण राज्य का दर्जा इसलिए छीना क्योंकि वह उप राज्यपाल के जरिये बाहरी लोगों से राज्य को चलाना चाहती थी। जब तक वे यहाँ रहेंगे जम्मू कश्मीर के खर्चे पर बाहरी लोगों को लाभ मिलता रहेगा। उनका यह कथन कश्मीर घाटी के अलगाववादियों के बयानों का समर्थन करने वाला है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के नाते उनको  इतना ज्ञान तो होना ही चाहिए कि देश के हर राज्य में राज्यपाल और  केंद्र शासित प्रदेश में उपराज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति शासन लगने पर विधानसभा के अधिकार भी संसद में निहित हो जाते हैं।  श्री गाँधी ने उपराज्यपाल के बाहरी होने का मुद्दा छेड़कर व्यर्थ की बहस को जन्म दे दिया। राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल की नियुक्ति करते समय जाहिर तौर पर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी अपने अनुकूल व्यक्तियों का चयन करती है। लेकिन वे उसी राज्य के हों ये न तो संवैधानिक तौर पर जरूरी है और न ही संघीय ढांचे की मजबूती के लिये। कांग्रेस जब - जब केंद्र की सत्ता में रही तब उसने जम्मू कश्मीर में जिन राज्यपालों को पदस्थ किया उनमें डाॅ. कर्णसिंह को छोड़कर सभी अन्य राज्यों के थे। श्री गाँधी द्वारा जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए केंद्र पर दबाव बनाने की जो बात कही उस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। वह इस चुनाव का वह प्रमुख मुद्दा भी  है किंतु उपराज्यपाल को बाहरी व्यक्ति बताना संघीय ढाँचे की व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास माना जायेगा। उनके ऐसे ही बयानों के कारण उनकी राजनीतिक समझ पर संदेह होने लगता है। ऐसा कहते समय वे भूल गए कि जम्मू कश्मीर में सबसे लंबा राष्ट्रपति शासन 1990 से 96 तक लगा था। 6 वर्ष 264 दिन की उस अवधि के दौरान केंद्र में  5 साल कांग्रेस और शेष समय उसके समर्थन वाली सरकार थी। तब कश्मीर के अलगाववादी नेता और संगठन जो बातें कहते थे उन्हीं को श्री गाँधी ने एक तरह से दोहरा दिया। इस चुनाव में भी अनेक नेता जम्मू कश्मीर के भविष्य का फैसला वहीं की जनता की मर्जी पर छोड़ने की बात बोल रहे हैं। कांग्रेस की गठबंधन सहयोगी नेशनल काँफ्रेंस खुलकर धारा 370 की वापसी का वायदा कर रही है। कांग्रेस भले ही इस मुद्दे पर शांत है किंतु उसमें इस वायदे का विरोध करने का साहस भी नहीं है। शायद इसीलिए नेशनल काँफ्रेंस को वह बोझ लगने लगी। इसका प्रमाण उसके नेता उमर अब्दुल्ला द्वारा राहुल गाँधी को कश्मीर घाटी की बजाय जम्मू अंचल में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दिये जाने  से मिला। उन्होंने ये आरोप भी लगाया कि कांग्रेस को जम्मू क्षेत्र में ज्यादा सीटें दी गईं थीं किंतु उसने वहाँ काम शुरू ही नहीं किया जबकि मतदान को कुछ दिन ही शेष हैं। श्री अब्दुल्ला के इस बयान को गठबंधन में दरार  के तौर पर देखा जा रहा है। उल्लेखनीय है अब्दुल्ला परिवार इस बार गठबंधन के पक्ष में नहीं था किंतु राहुल पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर श्रीनगर गए और उसके लिए दबाव बनाया। लेकिन दूसरे चरण तक अब्दुल्ला परिवार को गलती का एहसास होने लगा जिसकी बानगी उमर द्वारा  नाराजगी व्यक्त किये जाने से मिली। इसके बाद भी यदि कांग्रेस को समझ नहीं आ रही तो ये उसकी इच्छा किंतु श्री गाँधी यदि इसी तरह के गैर जिम्मेदराना बयान देते रहे तो इससे उन्हें और उनकी पार्टी दोनों को नुकसान होगा।

- रवीन्द्र वाजपेयी