Saturday, 4 January 2025

शहरी चश्मे से देखने पर गाँवों का विकास असंभव है


आज ग्रामीण भारत महोत्सव 2025 के शुभारंभ के पूर्व  सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है कि  हमारे गाँव जितने समृद्ध होंगे, विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में उनकी भूमिका उतनी ही बड़ी होगी। 9  जनवरी तक चलने वाला यह महोत्सव विकसित भारत 2047 के लिए एक लचीले ग्रामीण भारत का निर्माण विषय पर केंद्रित ही। इस महोत्सव के दौरान ग्रामीण भारत की उद्यमशीलता की भावना और सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाया जाएगा। ये बात तो हर कोई जानता और मानता है कि भारत कृषि प्रधान देश है और अंधाधुंध शहरीकरण के बावजूद आज भी  लगभग तीन चौथाई जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है। हालांकि शहरी क्षेत्रों का विस्तार होते जाने के साथ ही सड़क और बिजली पहुँचने के कारण ग्रामीण भारत में भी जबरदस्त बदलाव हुआ है।  जनता के रहन - सहन के तौर - तरीकों में आया परिवर्तन  आश्चर्यचकित करने वाला वाला है। सड़क और बिजली के बाद ग्रामीण जीवन को  जिस चीज ने सबसे अधिक प्रभावित किया वह है संचार माध्यम। टीवी, और मोबाइल के साथ इंटरनेट सुविधा की उपलब्धता ने भारत के गाँवों में बीते 20 वर्षों में जितना बदलाव किया उतना आजादी के बाद के 50 सालों में देखने नहीं मिला। और इसीलिए तमाम उपभोक्ता कंपनियों ने शहरों के समानांतर ग्रामीण उपभोक्ता पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। परिणाम  वहाँ से पूर्वापेक्षा ज्यादा मांग आ रही है। टीवी, फ्रिज के बाद अब गाँवों में एयर कंडीशनर भी देखने मिल जाते हैं। वो जमाने लद गए जब वहाँ केवल मोटर साइकिल, जीप और ट्रैक्टर की मांग थी। उससे आगे बढ़कर अब ग्रामीण भारत में स्कूटी और  महंगी लग्जरी कारें भी जमकर बिक रही हैं। निजी अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों को भी गाँवों में कमाई का स्रोत नजर आया तो उन्होंने भी शहरों के बाहर अपने संस्थान खोलकर ग्रामीण जनता को आकर्षित करने का दांव चला। उसके चलते  वहाँ एंबुलेंस और स्कूल बसों की आवाजाही नजर आने लगी है। हालांकि ये स्थिति उन गाँवों की ही है जो शहरों के निकट हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में स्थित कम  आबादी वाले  हजारों गाँवों के लिए विकास एक सपने जैसा है। आजादी के बाद से ही गाँवों, के विकास के लिए अनगिनत योजनाएं बनीं। ग्रामीण विकास के लिए हर सरकार भारी -  भरकम बजट का प्रावधान करती है। लेकिन भ्रष्टाचार के कारण उसका सही लाभ गाँवों को नहीं  मिल सका। शहरों की तरफ भागने की प्रवृत्ति के पीछे विकास की कमी ही बड़ा कारण है। ग्रामीण भारत महोत्सव उस दिशा में एक अच्छा  प्रयास कहा जायेगा बशर्ते वह सरकारी कर्मकांड से परे ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को गहराई से समझकर उन्हें पूरा करने पर ध्यान दे। इस दिशा में  सबसे बड़ा विचारणीय मुद्दा है खेती के प्रति ग्रामीण युवाओं की घटती रुचि। केवल  बाजार के विकास और ग्रामीण जनता को उपभोक्तावाद के शिकंजे में जकड़ लेना विकास का सही पैमाना नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की कल्पना बिना कृषि के असंभव है। तमाम विसंगतियों के बाद भी खेती रोजगार के आधारभूत स्रोतों में है। इसीलिए मशीनीकरण के बाद भी बुवाई और कटाई के मौसम में शहरी इलाकों में कार्यरत श्रमिक गाँवों में चले जाते हैं। लेकिन बाकी समय खेतिहर मजदूरों की कमी के चलते कृषि करने वाले परेशान होते हैं। ग्रामीण भारत का नौजवान शहरी आकर्षण के वशीभूत जिस प्रकार गाँव छोड़ देता है उसकी वजह से पीढ़ियों से खेती करते आ रहे लोग अपनी जमीनें बेचने मजबूर  हैं। विकास कार्यों के लिए भूमि का अधिगृहण भी खेती के रकबे में कमी का कारण है। खेती को लाभ का व्यवसाय तभी बनाया जा सकेगा जब किसान का पूरा परिवार उसमें संलग्न हो। इसके लिए जरूरी है ग्रामीण और शहरी इलाकों  के विकास में  विषमता दूर की जाए। शिक्षा के प्रसार के कारण ग्राम छोड़ने की परिस्थिति उत्पन्न होना अलग बात है किंतु रोजगार की तलाश में  गांवों से पलायन होना देश के कृषि प्रधान होने के दावे पर संदेह उत्पन्न करता है। किसानों की आत्महत्या, न्यूनतम समर्थन मूल्य, गाँवों से पलायन जैसे अनेक मुद्दे  लंबे समय से राष्ट्रीय विमर्श  में हैं किंतु कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाने के कारण  व्यर्थ का तनाव बना हुआ है। हालांकि इसके पीछे सक्रिय ताकतों का  उद्देश्य गाँवों और किसानों का हित न होकर अपनी राजनीति चमकाने के अलावा अराजकता को प्रश्रय देना है। लेकिन गाँवों के विकास को शहरी चश्मे से देखने की बजाय वहाँ की जमीनी जरूरत के मुताबिक किये जाने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन रोके बिना उनके विकास की बात सोचना बेमानी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 January 2025

अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव भारत के लिए लाभदायक


जब अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी फ़ौजें काबिज थीं तब पाकिस्तान की नीति दोगलेपन की थी। एक तरफ तो उसने तालिबानी लड़ाकों पर हवाई हमले के लिए अपने हवाई अड्डे अमेरिकी  को उपलब्ध करवाए वहीं दूसरी  तरफ अमेरिकी फौजों से लड़ने के लिए तालिबानियों को अपनी सीमा के भीतर अड्डे बनाने की अनुमति दी।  जब अमेरिकी सेना ने अपना डेरा समेट कर तालिबानियों को सत्ता सौंप दी तब पाकिस्तान  ने जमकर जश्न मनाया जिसमें उसका आका  चीन भी शामिल हुआ। भारत में भी वामपंथी तबके सहित अन्य विपक्षी दल बल्लियों उछल रहे थे। चूंकि मुल्ला - मौलवी अमेरिका को अपना दुश्मन मानते हैं इसलिए उनको खुश करने के लिए धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार विजयोल्लास में डूबे थे। भारत सरकार के चूंकि अमेरिका से रिश्ते सुधार पर थे इसलिए तालिबानियों की जीत पर भारत की विदेश नीति पर भी सवाल उठाये जाने लगे। वहाँ रह रहे हिन्दू और सिखों की सुरक्षा की चिंता भी होने लगी। जो भारतीय कंपनियां वहाँ ठेका लिए हुई थीं उनके कारोबार पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे। तालिबानी हुकूमत को भारत ने  मान्यता भी नहीं दी। इसलिए जो माहौल बना उसमें ये चिंता तैर  रही थी कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान की जुगलबंदी भारत के लिए बड़ी समस्या बनेगी।  इस पहाड़ी देश की सीमा ईरान के अलावा मध्य एशिया के उन देशों से भी मिलती है जो सोवियत संघ के हिस्से हुआ करते थे। इसलिए चीन इस समूचे क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की फ़िराक में था। लेकिन चार साल बाद उन तमाम कयासों पर विराम लग गया। जो पाकिस्तान तालिबानियों की जीत पर ढोल पीट रहा था वही आज अफ़ग़ानिस्तान के हमलों का सामना करने मजबूर है। पश्चिमी सीमांत के जिस  इलाके में उसने  तालिबानी  अड्डे बनाने की छूट दी थी उन्होंने उन्हें खाली करने से न सिर्फ  इंकार कर दिया बल्कि वे पाकिस्तानी सीमा में और भी भीतर घुसकर अपनी चौकियाँ बना रहे हैं। दोनों देशों के बीच सीमा का जो निर्धारण अंग्रेजों द्वारा किया गया था उसे तालिबानियों ने मानने से साफ मना कर दिया। उनके हमलों से त्रस्त होने के बाद पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा हवाई हमले कर लगभग 50 अफगानी मार दिये गए तो तालिबानियों ने दोगुनी ताकत दिखाकर पाकिस्तान की अनेक सैनिक चौकियाँ छीन लीं। काबुल में बैठे शासक जिस तरह से पाकिस्तान के प्रति आक्रामक हो उठे वह चौंकाने वाला है। उससे भी बड़ी बात ये है कि कूटनीतिक रिश्ते न होने के बाद भी तालिबानी सत्ता का रुख भारत के प्रसि नर्म हुआ है। भारतीय कंपनियों को वहाँ किये जा रहे विकास कार्यों में भाग लेने का विधिवत प्रस्ताव मिलने के साथ भारत से खाद्यान्न एवं अन्य जरूरी चीजें वहाँ भेजे जाने से सम्बन्ध काफी सुधरे हैं। हालांकि कश्मीर में आतंकी घटनाओं में अफगानिस्तान का हाथ भी रहा है किंतु इस बार का तालिबानी शासन भारत से दोस्ती का पक्षधर होने के साथ ही पाकिस्तान से दुश्मनी पाल बैठा है जो इस क्षेत्र के शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव कहा जाएगा। भारत के लिए ये स्थिति बेहद सुखद है। क्योंकि बांग्ला देश में शेख हसीना की सत्ता के पतन के बाद जो अंतरिम सरकार काबिज हुई उसने पाकिस्तान से जिस तरह का दोस्ताना बढ़ाया वह भारत के लिए बड़े खतरे की शुरुआत मानी जा रही थी। ये भी कहा जाने लगा था कि पाकिस्तान एक बार फिर  युद्ध की परिस्थिति पैदा कर सकता है जिससे भारत दोहरे संकट में फंसे। लेकिन बलूचिस्तान में पहले से चल रहे विद्रोह को दबाने में तो उसे पसीने छूट ही रहे थे ऊपर से तालिबानी लड़ाकों के हमलों से मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। कश्मीर के जिस हिस्से को उसने कब्जा रखा है वहाँ भी  बगावत का माहौल है। चीन की जो परियोजनाएं चल रही हैं उनका भी विरोध स्थानीय निवासी कर रहे हैं जिससे चीन नाराज है। राजनीतिक तौर भी अंदरूनी हालात इतने दयनीय कभी नहीं नहीं रहे। भारत के विरुद्ध जनता के मन में नफरत पैदा करने का दाँव भी काम नहीं कर रहा। इसका प्रमाण वहाँ से आने वाले वीडियो हैं जिनमें आम नागरिक विशेष तौर पर युवा अपने देश की दुर्दशा के लिए हुकूमत को कोसने के साथ भारत की प्रगति की प्रशंसा करते देखे जा सकते हैं। टीवी चैनलों में होने वाली बहस में भी भारत के पक्ष में बोलने वाले बढ़ रहे हैं जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिका और उसके पिछलग्गू देश तो पाकिस्तान से दूरी बना ही रहे हैं किंतु अब तो चीन भी उसके भिखमंगेपन से त्रस्त होकर उसे खाली हाथ लौटाने लगा है। यद्यपि ये कहना तो जल्दबाजी होगी कि पाकिस्तान टूट जायेगा क्योंकि बलूचिस्तान की आजादी बिना विदेशी मदद के संभव  नहीं किंतु अफ़ग़ानिस्तान ने पाकिस्तान के भीतर घुसकर सीमांत क्षेत्र में जिस तरह से कब्जा करना शुरू किया वह उसके लिए लाईलाज मर्ज बन सकता है क्योंकि तालिबानियों से पार पाना उसके बस के बाहर है। सियासी अनिश्चितता के कारण सेना भी असमंजस में फंसी है। इमरान खान की गिरफ्तारी  सरकार के लिए गले की फांस साबित हो रही है। ये हालात भारत के लिए पूरी तरह अनुकूल हैं क्योंकि कहाँ तो तालिबानी हुकूमत के साथ मिलकर पाकिस्तान कश्मीर में गड़बड़ी पैदा करने का मंसूबा पाल रहा था  और कहाँ तालिबान उसी के लिए मुसीबत बन बैठे। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 2 January 2025

आर्थिक विकास में धर्म स्थल भी निभा सकते हैं महत्वपूर्ण भूमिका


जो लोग मंदिर बनाने अथवा तीर्थस्थलों के विकास की आलोचना करते हुए उस पैसे का उपयोग विद्यालय, शौचालय और ऐसे ही अन्य कार्यों पर खर्च करने की वकालत करते हैं उनको गत दिवस देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं  की संख्या देखकर अपनी सोच की समीक्षा करनी चाहिए। जो समाचार आये हैं उनके अनुसार देश के जितने भी बड़े मंदिर और गुरुद्वारे हैं उनमें वर्ष 2025   के प्रथम दिवस अभूतपूर्व जनसैलाब नजर आया  । बावजूद इसके कि 1 जनवरी से प्रारंभ होने वाला नव वर्ष मूलतः ईसाई काल गणना से जुड़ा हुआ है और अंतर्राष्ट्रीय कैलेंडर भी इसी पर आधारित है। गत दिवस न सिर्फ हिन्दू मंदिरों अपितु अमृतसर के सुप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में भी अयोध्या के राम मंदिर के बराबर दर्शनार्थी पहुंचे। वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर और उज्जैन के महाकाल परिसर में भी यही नजारा दिखा। इसके अलावा नदियों के तट पर भी उत्सव का माहौल देखने मिला। यद्यपि नये साल का स्वागत शराब - कबाब से करने वाले भी कम नहीं थे किंतु उनकी दुनिया अलग है। आशय ये है कि धार्मिक पर्यटन भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। अयोध्या में गत वर्ष राम मंदिर के निर्माण के बाद से ही वहाँ दर्शनार्थियों की दैनिक संख्या औसतन 50 हजार है जो किसी भी विशिष्ट अवसर पर लाखों का आंकड़ा पार कर जाती है। 2025  शुरू होने के पूर्व ही अयोध्या के सारे होटल , धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस भर चुके थे। लगभग यही स्थिति वाराणसी, उज्जैन, शिरडी, तिरुपति आदि की रही। अयोध्या के पहले काशी विश्वनाथ और महाकाल परिसर को विकसित स्वरूप प्रदान करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जाने के साथ ही पुराने निर्माण हटाये गए जिससे आवागमन सुलभ हो। उसका विरोध भी हुआ , राजनीति की दुकानें भी सजीं। लेकिन जब विकास पूरा हुआ तब विरोधियों  के मुँह ये देखकर बंद हो गए कि उक्त मंदिरों में आने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई, जिनमें ज्यादातर लोग बाहरी थे। अर्थात इन मंदिरों के कारण वाराणसी और उज्जैन में होटल और टैक्सी जैसे व्यवसाय में तो बढ़ोत्तरी हुई ही किंतु  पूजा सामग्री विक्रेताओं का भी कारोबार जमकर चलने लगा। यहाँ तक कि साइकिल और ऑटो रिक्शा चालकों की कमाई भी बढ़ी। वाराणसी में साड़ियों के अलावा गलीचों के कारोबारी भी विश्वनाथ परिसर के विकास के बाद अपने व्यवसाय में वृद्धि से प्रसन्न हैं। उज्जैन में महाकाल परिसर इलाके में जिनके मकान हैं उनमें से बहुतों ने होम स्टे की व्यवस्था कर अतिरिक्त  आय का स्रोत पैदा कर लिया। एक मोटे अनुमान के अनुसार उज्जैन में फूल -  माला बेचने वालों की संख्या में 25 हजार की वृद्धि हुई है। म.प्र में ही महाकाल के साथ ओंकारेश्वर को भी नया स्वरूप दिये जाने के बाद वहाँ श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। यही सब देखकर केंद्र सरकार ने देश के अन्य प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का विकास करने की योजना बनाई है जिनमें गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर भी है। वृंदावन में बिहारी जी का मंदिर बेहद संकरे स्थान में होने से श्रद्धालुओं को बहुत तकलीफ होती है। एक - दो  बड़े हादसों के बाद उ.प्र सरकार ने उसके भी समुचित विकास का निर्णय किया है। भारत में धार्मिक आस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद नई पीढ़ी  में धर्म के प्रति रुझान बढ़ता जा रहा है। लेकिन धर्मस्थलों पर बाबा आदम के जमाने की लचर व्यवस्थाओं की वजह से  युवा वहाँ जाने से कतराते थे। लेकिन जिन धार्मिक स्थलों को नया स्वरूप दिया गया उनमें आने वालों में युवा दर्शनार्थियों की संख्या में वृद्धि  विकास  पर किये गए खर्च का औचित्य सिद्ध कर रही है। हालांकि इसका एक पक्ष ये भी है कि धार्मिक यात्रा को पर्यटन का स्वरूप दिये जाने से धर्मस्थलों की पवित्रता और काफी हद तक मर्यादा नष्ट होती है। उत्तराखंड के चार धामों की सड़कें विकसित होने के बाद वहाँ तीर्थयात्रियों की संख्या साल दर साल बढती जाने से पर्यावरण की समस्या भी उत्पन्न हो रही है। लेकिन इन यात्राओं का पेशेवर तरीके से प्रबंध किया जाए तो उसका हल हो सकता है। जमीनी सच्चाई ये है कि सदियों पहले से चली आ रही व्यवस्थाओं को समय के साथ यदि दुरुस्त किया जाए तो धार्मिक स्थलों के जरिये रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास संभव है। भारत सरकार को चाहिए सभी राज्यों से प्रमुख धर्मस्थलों की सूची लेकर उनको विकसित करने की कार्य योजना इस प्रकार बनाई जाए जिससे  मूल स्वरूप को छेड़े बिना वहाँ आने वालों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। हालिया अनुभव बताते हैं जिन भी धार्मिक स्थलों को विकसित किया गया वहाँ दर्शनार्थियों की संख्या में आशातीत वृद्धि होने से अर्थव्यवस्था को जबरदस्त सहारा मिला। घरेलू पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में भी ये कदम सहायक साबित होगा इसमें दो मत नहीं हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 1 January 2025

हर हाल में साथ रहे मध्यम वर्ग की उपेक्षा उचित नहीं


21 वीं सदी का 25 वां साल आज से शुरू हो रहा है। बीते 24 वर्षों का सफर बेहद उतार -  चढ़ाव भरा रहा। देश नये - नये अनुभवों से गुजरा। जिनमें सुखद और दुखद दोनों रहे। कोरोना जैसी महामारी के सामने समूची  मानवता असहाय खड़ी नजर आई।  बड़ी आर्थिक महाशक्तियाँ भी उस संकट का सामना करने में विफल नजर आईं। जिन देशों की स्वास्थ्य सेवाएं वैश्विक स्तर पर श्रेष्ठतम मानी जाती थीं उनमें लाशों के ढेर लग गए। लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। ऐसे में भारत ने  एक अभूतपूर्व ऊर्जा के साथ उस संकट का मुकाबला सफलतापूर्वक किया। 140 करोड़ लोगों का निःशुल्क टीकाकरण  साधारण कार्य नहीं था । यही नहीं तो  दुनिया भर ने हमारे यहाँ बने टीके हासिल किये। अनेक गरीब देशों को करोड़ों टीके मुफ़्त देकर भारत ने उनकी सद्भावना अर्जित की। घरेलू मोर्चे पर 80 करोड़ लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न देकर अराजकता की स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी। जरूरतमंदों के खाते में नकद राशि पहुँचाई गई। जब सब कुछ बंद था तब भारत के किसानों ने रिकार्ड उत्पादन कर देश को  मुसीबत में फंसने से बचाया। औद्योगिक उत्पादन भी  होता रहा जिससे जरूरी चीजों की आपूर्ति नहीं रुकी। हालांकि सब कुछ अच्छा हुआ, ऐसा नहीं है। कुछ विफलताएं भी देखने मिलीं किंतु कोरोना संकट  में एक नये भारत का उदय हुआ जो आत्मविश्वास से भरा है और जिसमें आत्मनिर्भर होने की लगन हिलोरें मार रही है। विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का गौरव  हमारे साथ जुड़ा है। संकट के समय भी जनता ने अनुशासन का परिचय देते हुए दायित्वबोध  प्रदर्शित किया। चुनाव प्रक्रिया के जरिये प्रजातंत्र में  अखंड विश्वास व्यक्त  करते हुए भारत की जनता ने विश्व के समक्ष उदाहरण पेश किया। इन्हीं सबसे हमारी प्रतिष्ठा विश्व मंचों पर बढ़ी है। कोरोना के बाद रूस -  यूक्रेन और इजरायल - फिलीस्तीन संघर्ष में भारत की भूमिका ने कूटनीतिक जगत में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। देश के भीतर राजनीतिक स्थिरता होने से आर्थिक मोर्चे पर भी बड़े फैसले हो रहे हैं। भारत दुनिया भर के निवेशकों  को आकर्षित करने में सफल हो रहा है। लोगों का जीवन स्तर निरंतर उठ रहा है। आयुष्मान योजना का विस्तार होने से सभी वर्गों के बुजुर्गों को निःशुल्क चिकित्सा का लाभ मिलना एक क्रांतिकारी कदम है। राजमार्गों सहित अधो - संरचना के अन्य प्रकल्पों पर तेजी से हो रहे काम विकास के जीवंत प्रतीक हैं। बड़े उद्योगों के अलावा लाखों स्टार्ट अप देश में उद्यमशीलता और स्व - रोजगार की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रमाण हैं। देश रक्षा सामग्री का आयात करने के साथ ही निर्यात भी कर रहा है। उच्च शिक्षा के नये केंद्र खुल रहे हैं। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम वैश्विक  प्रतिस्पर्धा में मुस्तैदी से खड़ा है। लेकिन अभी  बड़े - बड़े लक्ष्य हमें प्राप्त करना है। अनेक क्षेत्रों में अभी विकास की जरूरत है। भ्रष्टाचार लाइलाज  होता जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाने को लुटाने की जो होड़ राजनीतिक दलों में मची है वह आर्थिक नियोजन पर भारी पड़े बिना नहीं रहेगी। इस पर चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को ही बंदिश लगानी होगी क्योंकि राजनीतिक दलों से कोई अपेक्षा  फिजूल है। लेकिन एक बात और जिस पर आगामी बजट के पहले विमर्श होना चाहिए  वह है देश के विशाल मध्यम वर्ग के हितों का संरक्षण। ये वह तबका है जो समूची अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाये रखता है। यदि दुनिया भर के लिए भारत  एक बड़े बाजार के तौर पर उभरा है तो उसका श्रेय इसी वर्ग को है। विदेशों में बसे ज्यादातर  भारतीय मध्यम वर्ग के ही हैं जिनका  भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन इस वर्ग को बजट में  कोई खास रियायत नहीं दी जाती। आयकर की व्यवस्था में बेशक उल्लेखनीय सुधार हुआ है किंतु उसके बोझ में जितनी कमी होनी चाहिए थी उतनी नहीं होने से मध्यम वर्ग में असंतोष है। उसके मन में ये भावना  घर बना चुकी है कि उद्योगपतियों के लिए तो केंद्र और राज्य सरकारें लाल कालीन बिछाती हैं वहीं गरीबों पर सौगातों की बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही। लेकिन मध्यमवर्ग कर चुकाते - चुकाते परेशान है। ये देखते हुए केंद्र सरकार से अपेक्षा है आगामी बजट में आयकर छूट की सीमा में वृद्धि के साथ ही जीएसटी की दरें घटाई जाएं। इस बारे में ये बात समझने वाली है कि करों की कम दरें लोगों की क्रय शक्ति में जो वृद्धि करती हैं उसका लाभ अंततः सरकारी खजाने को ही होता है। मौजूदा केंद्र सरकार जिस भाजपा के नेतृत्व में चल रही है उसका जनाधार आज भले सभी वर्गों में फैल गया हो किंतु शुरुआत में  मध्यम वर्ग  ही उसका समर्थक रहा है। ऐसे में जब भाजपा के अच्छे दिन आये तब उसे चाहिए उस मध्यम वर्ग को उपेक्षित न करे  जिसने हर हाल में उसका साथ दिया।


-रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 31 December 2024

दिल्ली चुनाव : घबराहट में है आम आदमी पार्टी

    

    चूंकि  कांग्रेस , भाजपा और क्षेत्रीय दल भी इस फार्मूले को अपनाकर चुनाव जीतने की कोशिश करते हैं इसलिए आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले जिस तरह से सौगातें बाँटने में जुटी है उसमें कुछ भी नया  नहीं लगता। लेकिन इससे  अरविंद केजरीवाल की घबराहट जरूर सामने आ गई है। जो यू ट्यूबर पत्रकार अभी तक उनके गुणगान किया करते थे वे भी कहने लगे हैं कि आगामी चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए बेहद कठिन है। इसका एक कारण 10 साल के बाद स्वाभाविक  रूप से उत्पन्न होने वाली सत्ता विरोधी भावना है और दूसरा श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया सहित कुछ मंत्रियों के विरुद्ध  भ्रष्टाचार के प्रक्ररण दर्ज होना है। लेकिन तीसरी और सबसे बड़ी वजह है उनकी सरकार द्वारा किये गए तमाम वायदे पूरे न होना। मुफ्त बिजली और पानी  ने श्री केजरीवाल को दो बार विशाल बहुमत दिलवाया। सरकारी शालाओं के स्तर में सुधार और मोहल्ला क्लीनिक जैसे कार्यों से पहले कार्यकाल में आम आदमी पार्टी सरकार ने जो साख कमाई उसके कारण ही उसे न सिर्फ दूसरा कार्यकाल मिला बल्कि नगर निगम भी उसके कब्जे में आ गई। दिल्ली की हवा ने पंजाब में भी असर दिखाया और वहाँ भी इस पार्टी ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल कर सरकार बना ली। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि विधानसभा में मिली इकतरफा जीत के बावजूद आम आदमी पार्टी दिल्ली में लगातार दो लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी। 2014 में तो वह नई नवेली थी किंतु 2019 में दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बावजूद उसकी लुटिया डूब गई और वह सातों सीटों पर पटकनी खा गई। 2024 में उसने कांग्रेस से समझौता करते हुए सीटों का बंटवारा किया किंतु नतीजा वही रहा। यहाँ तक कि पंजाब में भी उसे उम्मीद के मुताबिक लोकसभा सीटें नहीं मिलना ये दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि जनता उसे राष्ट्रीय राजनीति के योग्य नहीं  मानती जो श्री केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं को बड़ा झटका है। उन्हें उम्मीद रही कि जेल भेजे जाने से उनके प्रति सहानुभूति का सैलाब उमड़ पड़ेगा किंतु जनता ने लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बुरी तरह हराकर उस पर तुषारापात कर दिया। उनके पद छोड़ने और आतिशी मर्लेना को अपनी जगह बिठाने के फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि श्री केजरीवाल का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा गया है। उनके अनेक निकट साथी पार्टी छोड़ चुके हैं। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद पार्टी के भीतर विरोध की जो आवाजें उठीं वे भी इस बात का संकेत हैं कि उनके दबदबे में कमी आई है। यद्यपि उनके समर्थक मानकर चल रहे हैं कि दिल्ली के मतदाता उन्हें तीसरी बार सत्ता सौंपेंगे किंतु  राजनीतिक विश्लेषक ये कहने में संकोच नहीं कर रहे कि इस बार कांग्रेस जिस तरह जोर आजमाइश कर रही है उससे आम आदमी पार्टी के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है। स्मरणीय है  लोकसभा चुनाव के बाद ही पार्टी ने दिल्ली के दंगल में अकेले उतरने का ऐलान कर कांग्रेस को ठेंगा दिखा दिया था। हरियाणा चुनाव में दोनों अलग - अलग लड़े और सत्ता भाजपा के हाथ चली गई। दिल्ली में कांग्रेस उसी का बदला लेने आमादा है। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि 2015 में आम आदमी पार्टी को मिली सफलता कांग्रेस के मतों में सेंध लगने की वजह से थी। हालांकि मध्यमवर्गीय मतदाता भाजपा के भी छिटके किंतु कांग्रेस तो शून्य की शर्मनाक स्थिति तक पहुँच गई। अल्पसंख्यकों और गऱीबों का वोट बैंक खिसक जाने से उसकी स्थिति दिल्ली में दयनीय होकर रह गई किंतु इस बार वह जो दमखम दिखा रही है उसके कारण वह जीते न जीते किंतु आम आदमी पार्टी की राह में रुकावट अवश्य पैदा कर सकती है। दूसरी ओर हरियाणा और महाराष्ट्र में जीतने के बाद भाजपा लोकसभा चुनाव के झटके से उबर चुकी है। इन्हीं सब कारणों से आम आदमी पार्टी सौगातों का पिटारा खोलने में जुट गई है। महिलाओं और बुजुर्गो के बाद उसकी ओर से मंदिरों के पुजारियों और गुरुद्वारों के ग्रंथियों को 18 हजार प्रति माह देने का वायदा कर दिया गया। लेकिन पिछले कार्यकाल में मौलवियों को स्वीकृत मासिक राशि का भुगतान 17 महीनों से नहीं होने और महिलाओं को दी जाने वाली राशि का वायदा पंजाब में पूरा न होने से पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। म.प्र और महाराष्ट्र में भाजपा ने महिलाओं को हर महीने राशि देकर मुकाबला अपने पक्ष कर लिया किंतु श्री केजरीवाल को ये सब देर से याद आया। ऊपर से दिल्ली सरकार के विभागों ने उनके वायदों के विरुद्ध विज्ञापन देकर उनकी किरकिरी करवा दी। ऐसे में आम आदमी पार्टी जिस तरह बदहवासी में नई घोषणाएं करती जा रही है वह उसकी घबराहट का संकेत है। और ये भी कि वह अपनी उपलब्धियों को लेकर खुद भी आश्वस्त नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 30 December 2024

मौत पर सियासत अशोभनीय : स्मारक संबंधी स्थायी नीति जरूरी

किसी की मृत्यु पर दलगत राजनीति से जुड़े मतभेदों  का उठना शोभा नहीं देता। दुर्भाग्य से हमारे देश की राजनीति में वह मर्यादा टूटने से सौजन्यता, सद्भावना और संवेदनशीलता जैसे शब्द अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। यही वजह है कि शोक के अवसर पर भी राजनीतिक नफे - नुकसान का बही खाता खोल दिया जाता है। दिवंगत  हस्ती की चिता सुलगने के पहले ही नफरत की आग भड़कने लगती है। इसके लिये किसी एक व्यक्ति या दल को कसूरवार ठहराना तो अन्याय होगा क्योंकि निष्पक्ष आकलन करें तो समूची राजनीतिक बिरादरी  इसके लिए जिम्मेदार है। हाँ, किसी का दोष अधिक और किसी का कम हो सकता है। ताजा संदर्भ पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार  राजघाट परिसर में करने की बजाय निगम बोध घाट में किये जाने से उत्पन्न विवाद है। अंत्येष्टि की पूर्व रात्रि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर  दाह संस्कार राजघाट में किये जाने का अनुरोध किया ताकि उनका स्मारक भी वहीं बन सके। इस पर सरकार ने  सूचित किया कि स्मारक हेतु स्थान आवंटन में समय लगेगा । साथ ही आश्वासन भी दिया गया कि शीघ्र ही इसकी प्रक्रिया पूर्ण कर न्यास गठित करने के बाद  उनका भव्य स्मारक बनवाया जाएगा। लेकिन कांग्रेस इससे संतुष्ट नहीं हुई। इसके बाद अंत्येष्टि में बदइंतजामी की शिकायतें की गईं। जवाब में भाजपा ने भी कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया। और तो और उनके पार्थिव शरीर को  लोगों के  दर्शनार्थ कांग्रेस मुख्यालय तक में नहीं रखने दिया। आरोप तो ये भी है कि डाॅ. सिंह उनकी अंत्येष्टि में जाने के इच्छुक थे किंतु उनको रोक दिया गया। इस सबके बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी का एक बयान चर्चा में है जिसमें उन्होंने  अपने  पिता की मृत्यु के बाद  कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर श्रद्धांजलि न दिये जाने की आलोचना की थी। डाॅ. सिंह के अंतिम  संस्कार संबंधी विवाद में आम आदमी पार्टी भी कूद पड़ी और दिल्ली विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सिखों के अपमान का मुद्दा छेड़ दिया। इन सब विवादों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो ये बात सामने आये बिना नहीं रहेगी कि राजनीतिक पार्टियां किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की मृत्यु का राजनीतिकरण करने में भी संकोच नहीं करतीं। कांग्रेस की ओर से इस बात का प्रचार किया गया कि राहुल गाँधी डाॅ. सिंह की मृत्यु पर उनके परिजनों के साथ रहे और उनके पार्थिव शरीर को कंधा भी दिया। अब भाजपा ने कटाक्ष किया है कि गत दिवस उनकी अस्थियाँ यमुना में प्रवाहित किये जाने के समय न तो श्री गाँधी तथा उनके परिवार का कोई सदस्य उपस्थित था और न ही अन्य कोई कांग्रेस जन । आज खबर आ गई कि केंद्र सरकार ने डाॅ. सिंह के स्मारक हेतु स्थान चयन हेतु कारवाई प्रारंभ कर दी है और जल्द ही उसके लिए न्यास का गठन कर दिया जाएगा। इतनी जल्दी हरकत में आने के पीछे भी राजनीति है क्योंकि भाजपा भी दिल्ली विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए किसी सिख नेता की मौत पर राजनीतिक विद्वेष के आरोप से बचना चाह रही है। इन विवादों के साथ ही  राजधानी दिल्ली  में दिवंगत राष्ट्रीय नेताओं के स्मारक  हेतु स्थान की उपलब्धता का मुद्दा गर्माने लगा है। ये जानकारी भी आई है कि डाॅ. सिंह के प्रधानमंत्री काल में  ही राजघाट परिसर में नया स्मारक बनाने पर रोक लगाई गई थी। धीरे - धीरे और भी बातें सामने आयेंगी किंतु सवाल ये है कि जिन नेताओं के स्मारक दिल्ली में बने हैं उन पर उन्हीं की पार्टी के लोग कितनी बार जाते हैं ? महात्मा गाँधी की समाधि भी सरकारी कर्मकांड का अनिवार्य हिस्सा है। यदि इन स्मारकों के रखरखाव का जिम्मा उस पार्टी को दे दिया जाए जिसके लिए वे  जीवन पर भर खपते रहे तब उनकी कैसी दुर्गति होगी इसका अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। ये सब देखते हुए ऐसे मामलों में कोई स्थायी नीति बनना जरूरी है। देश के लिए योगदान देने वाली विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से भावी पीढ़ी को अवगत करवाने के लिए उनसे जुड़ी स्मृतियाँ अक्षुण्ण रखना आवश्यक है किंतु कई एकड़ जमीन घेरकर ईंट - पत्थरों से बने बेजान स्मारक इस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। इसी तरह जिन बंगलों में वे रहे उनको स्मारक बनाने की परिपाटी भी लोकतांत्रिक समाज में अटपटी लगती है। बेहतर हो उन विभूतियों की स्मृति को सम्मान के साथ सुरक्षित रखते हुए कुछ ऐसा किया जाए जिससे उनके प्रति श्रद्धा  का भाव किसी दल विशेष तक सीमित न रहकर पूरे समाज में  कायम  रहे। आश्चर्य है जो नेतागण भगवान राम के मंदिर निर्माण को फिजूलखर्ची बताकर उतनी राशि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करने की वकालत करते हैं वे ऐसे स्मारकों पर होने वाले खर्च पर खामोश हो जाते हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Saturday, 28 December 2024

मनमोहन को लाने वाले राव साहब को भी भुलाया नहीं जा सकता


परसों रात जैसे ही पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के निधन की  खबर आई उनके बारे में जो विचार सुनने और पढ़ने मिले उनमें अधिकतर उनकी प्रशंसा से भरे हुए थे। यद्यपि किसी दिवंगत व्यक्ति की आलोचना से लोग बचते हैं। लेकिन घोर विरोधी भी जब तारीफों के पुल बांधे तो फिर ये बात माननी होती है कि दुनिया से गए व्यक्ति  ने अपनी ज़िंदगी में कुछ अच्छे कार्य करने के अलावा किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया होगा। स्व. डाॅ. सिंह  बतौर नौकरशाह ऐसे पदों पर रहे जिनमें नीतियों को बनाने और लागू करने का काम था इसलिए उनका आम जनता से प्रत्यक्ष संपर्क नहीं था। लेकिन उनके पास  देश - विदेश में कार्य करने का व्यापक अनुभव था। दूसरी तरफ  स्व. पी. वी. नरसिम्हा राव हालांकि पूरी तरह राजनेता थे किंतु वे भी काफी अध्ययनशील थे। उन्हें भी राज्य और केन्द्र सरकार में काम का पर्याप्त अनुभव हो चुका था। प्रधानमंत्री बनने के पहले तक किसी ने उनको कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से असहमत होते हुए नहीं सुना था। जब वे प्रधानमंत्री बने उस समय गाँधी परिवार राजनीतिक तौर पर काफी कमजोर था।  सोनिया गाँधी को राजनीति में रुचि थी नहीं और राहुल - प्रियंका की उम्र भी इतनी नहीं थी कि राजनीतिक विरासत संभाल पाते। ऐसे में आर्थिक नीतियों को पं. नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवादी मॉडल के बजाय दुनिया के बदलते वातावरण के अनुरूप ढालने का अवसर तो था किंतु कांग्रेस में ऐसा कोई शख्स नहीं था जो उनकी सोच को अमल में ला सके।  प्रणव मुखर्जी जैसे अनुभवी व्यक्ति को वरिष्ट होने से  निर्देशित करना कठिन था। दूसरे थे पी. चिदंबरम किन्तु उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ भी आगे जाकर खतरा हो सकती थीं। लिहाजा राव साहब ने डाॅ. सिंह जैसे नौकरशाह को चुना जो सरकार के आदेश का पालन करने का अभ्यस्थ होता है। स्मरणीय है योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहते उनके एक प्रस्तुतीकरण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने योजना आयोग को जोकरों का समूह कह दिया था। बताते हैं डाॅ. सिंह उससे क्षुब्ध होकर त्यागपत्र देने का मन बना बैठे थे किंतु एक निकटस्थ   के समझाने पर अपमान सहकर भी शान्त रहे। उनकी वह बात राव साहब को याद रही। प्रणव दा और श्री चिदंबरम को कांग्रेस की परंपरागत आर्थिक नीतियों को पूरी तरह उलट- पुलट करने के लिए राजी करना मुश्किल होता। ये सब सोचकर ही स्व. राव ने डाॅ. सिंह को वित्त मंत्री बनाकर पर्याप्त छूट देते हुए आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया का शुभारंभ किया जिससे पहली बार कांग्रेस नेहरू - गाँधी प्रभाव से मुक्त नजर  आई। डाॅ. सिंह चूंकि विशुद्ध नौकरशाह थे इसलिए उन्होंने पेशेवर कार्यशैली अपनाते हुए अर्थव्यवस्था को वैश्विक माहौल के अनुरूप ढालने का दुस्साहस किया। वरना उसके पूर्व तक  सरकार की आर्थिक नीतियाँ समाजवाद और साम्यवाद का मिश्रण थीं तथा  शासन के नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था पसंद की जाती थी। ऐसे में राव साहब और मनमोहन की जोड़ी को खुलकर खेलने का अवसर मिला । नेहरू युग में  सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया। इंदिरा जी ने उस नीति को और सख्त किया। बैंक, बीमा, कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण जैसे कदम उठाये गए। ये भी  कहा जाने लगा कि भारत की आर्थिक नीतियां साम्यवाद से प्रभावित हो चली थीं।  इंदिरा जी पूरी तरह सोवियत संघ के साथ जुड़ चुकी थीं। उनके सलाहकारों में साम्यवादी मानसिकता के लोग भरे थे।  राव साहब के सामने ये चुनौती थी कि वे अपनी सरकार को उस  ढर्रे से कैसे निकालें ? और इस काम में उनको साथ मिला डाॅ. मनमोहन सिंह का जो राजनीतिक हसरतों से परे केवल अपने काम  से ही वास्ता रखते थे ।  और सिवाय प्रधानमंत्री के उनकी जवाबदेही किसी के प्रति नहीं थी। परसों रात से डाॅ. सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का बखान जोर - शोर से हो रहा है। सोनिया जी ने उन्हें मार्गदर्शक और राहुल ने  अपना गुरु कहकर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की किंतु उनकी पीठ पर यदि राव साहब का हाथ न होता तब ये देश उदारीकरण की बजाय राष्ट्रीयकरण के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पाता। उस दृष्टि से राव साहब और मनमोहन सिंह जी को उन साहसियों के रूप में याद किया जाना चाहिए जिन्होंने देश को नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों से मुक्ति दिलवाकर उसमें नया आत्मविश्वास भरा। डाॅ. सिंह को तो गाँधी परिवार ने उपकृत किया जिसके वे सुपात्र थे किंतु राव साहब को मरने के बाद भी अपमानित करने का काम हुआ। उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस मुख्यालय तक नहीं लाने दिया गया और परिजनों को उनका अंतिम संस्कार दिल्ली की बजाय हैदराबाद में करने बाध्य किया गया। ये बात इसलिए इसलिए प्रासंगिक हो उठी क्योंकि कल रात कांग्रेस अध्यक्ष ने केंद्र सरकार से डाॅ. सिंह के अन्येष्टि स्थल पर ही उनका स्मारक बनाने की मांग कर डाली। ऐसी कोई मांग राव साहब के लिए कभी हुई हो ये शायद ही कोई बता सकेगा। आखिर वे भी तो पूर्व प्रधानमंत्री थे जिन्होंने डाॅ. मनमोहन सिंह की प्रतिभा को पहिचान दिलाई।


 - रवीन्द्र वाजपेयी