Saturday, 8 February 2025

केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं पर दिल्ली की जनता ने झाड़ू फेर दी


दिल्ली विधानसभा चुनाव की मतगणना में अब तक आये रुझानों के अनुसार भाजपा 47 सीटों पर बढ़त के साथ स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने की स्थिति में आ गई है। अंतिम क्षणों में उलटफेर की उम्मीदें लगाए बैठी आम आदमी पार्टी के हाथ निराशा आई  है । अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया  जैसे बड़े चेहरे हार चुके हैं। मुख्यमंत्री आतिशी बमुश्किल 989 मतों से जीतीं । अनेक मंत्री हारने के कगार पर हैं। 2020 में 62 सीटें जीतने वाली पार्टी 23 पर सिमट गई। वहीं  कांग्रेस द्वारा शून्य का अपना रिकार्ड बरकरार रखा गया। इस पराजय ने  श्री केजरीवाल की आसमान छूती महत्वाकांक्षाओं पर झाड़ू फेर दी। राष्ट्रीय पार्टी बनने के बाद उनकी पार्टी  खुद को भाजपा का विकल्प मानने लगी थी और अरविंद अपने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कद का समझने लगे थे। बात यहीं तक सीमित नहीं रही। विपक्ष के साथ गठबंधन में रहकर भी केजरीवाल एंड कंपनी श्रेष्ठता के अहंकार में डूबकर ईमानदारी का  स्व प्रदत्त प्रमाणपत्र छाती पर चिपकाए पूरे जमाने को बेईमान बताने का षडयंत्र रचती रही। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन का सहारा लेकर सत्ता की राजनीति में आने पर अरविंद केजरीवाल अंधेरी कोठरी में रोशनदान के तौर पर उभरे। भ्रष्टाचार विहीन राजनीति के ध्वजावाहक के रूप में दिल्ली की जनता ने उनको ऐतिहासिक समर्थन दिया। लेकिन इसका श्रेय ईमानदार राजनीति के दावे को दिया जाए या आम आदमी पार्टी द्वारा किये गए मुफ्त  बिजली - पानी के वायदे को, ये गहन विश्लेषण का विषय बन गया है। सबसे बड़ी विडंबना ये हुई कि देश के तमाम भ्रष्ट  नेताओं की सूची जारी करने वाले श्री केजरीवाल भी भ्रष्टाचार के उसी गंदे नाले में डुबकी लगाने में पीछे नहीं रहे। सादगी के उनके आश्वासन विलासिता के भौंडे प्रदर्शन में बदल गए। जनता को मुफ्त के दाने फेंककर शराब घोटाले के जरिये करोड़ों की उगाही करने के खुलासे ने इस पार्टी के उजले चेहरे पर जो कालिख पोती उसी की परिणिती है आज के चुनाव परिणाम। पार्टी के संस्थापक सदस्यों को धकियाकर  बाहर करने वाले अरविंद को आज दिल्ली की जनता ने जिस तरह धकियाया वे उसी के लायक हैं। जमानत पर जेल से बाहर आने पर मुख्यमंत्री पद छोड़ते समय उन्होंने कहा था कि जनता की अदालत से बरी होने पर ही पद ग्रहण करेंगे। जनता ने अपना फैसला सुना दिया किंतु उनमें इतनी नैतिकता नहीं कि उसको स्वीकार कर अपने पापों का प्रायश्चियत करें। उल्टे वे चुनाव आयोग को बलि का बकरा बनाने की घिनौनी हरकत हार के पहले से ही करने लगे। ये चुनाव प्रधानमंत्री श्री मोदी के प्रति जनास्था का एक और प्रमाण है। लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटों के घटने पर उनका आभामण्डल धूमिल होने की उम्मीदें लगाए बैठे विघ्नसंतोषी तत्वों के चेहरे आज उतरे हुए हैं। अयोध्या की मिल्कीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद अखिलेश यादव जैसे बड़बोले नेता की भी फजीहत हो गई है। इंडिया गठबन्धन के भविष्य पर भी गहरे काले बादल मंडरा रहे हैं। 2 013 में भाजपा को रोकने के लिए  आम आदमी पार्टी की सरकार बनवाने की गलती कांग्रेस को कितनी महंगी पड़ी ये एक बार फिर सामने आ गया। राहुल गाँधी की आत्ममुग्धता ने पार्टी को इस चुनाव में भी शर्मिंदगी झेलने मजबूर कर दिया है। इस  परिणाम का राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी असर पड़ेगा क्योंकि महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे का वर्चस्व ध्वस्त करने के बाद भाजपा ने श्री केजरीवाल के अरमानों पर झाड़ू फेर दी है जिन्हें समर्थन देकर ममता बेनर्जी, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे ने राहुल गाँधी की उपेक्षा करने में संकोच नहीं किया। हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद दिल्ली की शानदार जीत ने भाजपा और श्री मोदी को और मजबूती प्रदान कर दी जिसका असर बिहार और प. बंगाल के आगामी चुनाव पर पड़ना तय है। इंडिया गठबंधन में बिखराव के साथ ही कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के अलावा अन्य विपक्षी पार्टियों में टूटन की आशंका  बढ़ गई है। उद्धव ठाकरे के 6 सांसद टूटने की खबर इसका संकेत है। मुफ्त बिजली - पानी के बावजूद केजरीवाल कुनबे का सफाया कर दिल्ली की जनता ने ये संदेश भी दे दिया कि केवल रेवड़ियां बाँटकर उसे बहलाया नहीं जा सकता।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 7 February 2025

टोल टैक्स और जीएसटी में राहत भाजपा को आगे भी जीत दिला सकती हैं


केन्द्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख किये जाने का आम तौर पर स्वागत हुआ। वेतन भोगियों के लिए यह सीमा 12.75 लाख है। असल में दिल्ली विधानसभा चुनाव में  मध्यमवर्गीय मतदाताओं को आकर्षित करने  के लिए भाजपा ने यह दांव चला । ज्यादातर एग्जिट पोल में दिखाई भाजपा सरकार बनने की संभावना सही निकली तो उक्त निर्णय ट्रम्प कार्ड साबित होगा। चर्चा है ऐसे और भी निर्णय लिए जाएंगे  क्योंकि दिल्ली का दंगल निपटते ही बिहार विधानसभा  चुनाव की रणनीति पर भाजपा काम करने लगेगी। लोकसभा चुनाव के पहले तक भाजपा इस आत्मविश्वास में थी कि राम मंदिर बनने के बाद वह 400 पार के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगी किंतु उ.प्र  के अलावा राजस्थान, हरियाणा , प. बंगाल और महाराष्ट्र में लगे झटकों से  वह 240 पर सिमट गई। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन से भले ही नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए किंतु भाजपा  समझ गई कि केवल भावनात्मक बातों से लम्बे समय तक जनता का समर्थन प्राप्त करते रहना संभव नहीं रहा। दिल्ली की चुनौती उसके लिए लोकसभा से कम नहीं थी जहाँ 1998 से वह सत्ता से बाहर थी। 2013 में सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद  स्पष्ट बहुमत के अभाव में उसे विपक्ष में बैठना पड़ा तथा कांग्रेस की बैसाखी पर आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई और अरविंद केजरीवाल नई राजनीति के महानायक बनकर उभरे। लेकिन वह सरकार अल्पजीवी रही और 2015 में दोबारा चुनाव हुए। तब तक केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन चुकी थी। ऐसे में भाजपा को विश्वास था कि वह दिल्ली  में अपनी वापसी कर लेगी किंतु आम आदमी पार्टी के मुफ्त बिजली और पानी के वायदों ने जादुई असर दिखाया और वह 70 में से 67 सीटें जीत गई। भाजपा को 3 पर संतोष करना पड़ा जबकि कांग्रेस शून्य पर आ गई। भाजपा के लिए ये बड़ा झटका था क्योंकि आम आदमी पार्टी की महत्वाकांक्षा  राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित होने की थी और देखते ही देखते वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने में कामयाब भी हो गई । 2020 में भी उसने दिल्ली में शानदार कामयाबी हासिल करते हुए 62 सीटें जीतीं । 2019 के लोकसभा चुनाव में जबरदस्त मोदी लहर के बाद आम आदमी पार्टी का दिल्ली  विधानसभा में जीतना बड़ी घटना थी। लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन से जन्मी पार्टी भी  प्रचलित ढर्रे पर चल पड़ी जिसकी वजह से   केजरीवाल एंड कंपनी का दामन जिस प्रकार दाग़दार होता चला गया। लेकिन मुफ्त की सुविधाओं के आकर्षण से दिल्लीवासी आम आदमी पार्टी के मोहपाश में फंसे हुए थे। भाजपा इसका तोड़ नहीं ढूँढ़ पा रही थी क्योंकि उसके पास श्री केजरीवाल की टक्कर का कोई चेहरा नहीं था।। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली की सातों सीटें जीतने के बाद उसको ये समझ में आ गया कि लोकसभा चुनाव में  समर्थन देने वाले अपने मतदाताओं को यदि विधानसभा में आम आदमी पार्टी के पक्ष में जाने से रोका जा सके तो वह दिल्ली की सत्ता प्राप्त कर सकती है। और यहीं से आयकर छूट की सीमा बढ़ाने का विचार जन्मा। देर से ही सही किंतु भाजपा नेतृत्व के दिमाग़ में ये बात आ ही गई कि मध्यमवर्गीय नौकरपेशा और व्यापारी को खुश करने से पूरा माहौल बदला जा सकता है। दिल्ली में भाजपा की प्रचंड जीत होने पर उसका श्रेय  काफी कुछ 12 लाख तक आय को कर मुक्त करने को ही मिलेगा। इसी क्रम में आज रिजर्व बैंक ने भी ब्याज दर घटा दी। अब जो खबर आ रही है वह भी जनता को खुश कर सकती है। इसका इशारा परिवहन मंत्री नितिन गड़करी ने टोल टैक्स में राहत देने पर विचार  के रूप में किया। उनके अनुसार कानूनी सलाह के बाद जल्द ही  टोल टैक्स संबंधी उन विसंगतियों को दूर किया जाएगा जिनसे जनता नाराज होती है। यदि ऐसा होता है तो पूरे देश को राहत मिलेगी। इसी के साथ केंद्र सरकार को चाहिए वह पेट्रोल और डीजल को भी जीएसटी के अंतर्गत लाये जिससे कि उनके दाम कम हों। महंगाई घटाने में ये फैसला क्रांतिकारी साबित होगा और  केंद्र सरकार के बारे में गैर भाजपा शासित राज्यों में भी सकारात्मक संदेश जाएगा। दिल्ली में केजरीवाल के करिश्मे को  केंद्र सरकार का महज एक फैसला यदि फुस्स करने में कामयाब हो जाता है तो ऐसे ही कुछ और फैसलों से  बिहार, प. बंगाल, तमिलनाडु और केरल के आगामी मुकाबलों में भी भाजपा बड़ी सफलता हासिल कर सकती है। छोटी - छोटी सौगातें बांटने की बजाय समाज के हर  हर वर्ग को  राहत देने वाले निर्णय लिए जाएं  तो उनका दूरगामी प्रभाव  होता है। और फिर सबका साथ, सबका विकास केंद्र सरकार का ध्येय वाक्य भी तो है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 6 February 2025

दिल्ली में झाड़ू चले या कमल खिले किंतु कांग्रेस का हाथ खाली ही रहेगा


दिल्ली विधानसभा के बहुप्रतीक्षित चुनाव हेतु  मतदान हो गया। इस बार कांग्रेस द्वारा काफी जोर लगाए जाने से  मुकाबला त्रिकोणीय प्रतीत हुआ किंतु एक बात सभी मान रहे हैं कि सत्ता आम आदमी पार्टी या भाजपा में से ही किसी एक को  मिलेगी। कांग्रेस का उद्देश्य  2015 और 2020 के चुनाव में एक भी सीट नहीं मिलने का दाग धोना मात्र रह गया। यद्यपि लगता नहीं है  कि वह उसमें सफल होगी और  इसका कारण  आम आदमी पार्टी को लेकर उसकी नीतिगत अस्पष्टता है। यदि अरविंद केजरीवाल कांग्रेस को गठबंधन का प्रस्ताव देते तब राहुल गाँधी बिना संकोच उसे स्वीकार कर लेते किंतु हरियाणा चुनाव में उत्पन्न तल्खी के कारण वह नहीं हो सका , जिसके बाद कांग्रेस ने  पूरी ताकत से उतरने का मन बनाया। हालांकि श्री गाँधी  प्रचार में देर से उतरे । यही नहीं उन्होंने अजय माकन द्वारा केजरीवाल सरकार के  विरुद्ध की जाने वाली पत्रकार वार्ता तक रद्द करवा दी। यही वजह है कि कांग्रेस को लेकर  यही सवाल उठता रहा कि  कि वह अपना मत प्रतिशत कितना बढ़ा सकेगी ? स्मरणीय है उसके परंपरागत दलित और मुस्लिम मतदाताओं ने पिछले दो चुनावों में आम आदमी पार्टी का साथ दिया था। चुनाव विश्लेषक भी इसी बहस में उलझे रहे कि क्या कांग्रेस आम आदमी पार्टी की पराजय का कारण बनेगी ? ये बात पूरी तरह सही है कि इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को चिंता में डालने का काम कांग्रेस ने बखूबी किया। नई दिल्ली सीट पर संदीप दीक्षित को उतारकर अरविंद केजरीवाल पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में भी  वह कामयाब रही । इससे अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्साह में वृद्धि हुई किंतु राष्ट्रीय नेतृत्व की प्रारंभिक उदासीनता के कारण  आम जनता को ये एहसास करवाने में नाकामयाब रही कि वह भी सत्ता की दौड़ में है। ऐसे में उसकी छवि वोट कटवा की होकर रह गई। यदि इस चुनाव में उसका मत प्रतिशत दहाई का आंकड़ा भी छू सके तो बड़ी बात होगी। यही वजह है कि मतदान के बाद  गत दिवस जितने भी एग्जिट पोल जारी हुए उनमें से 80 फीसदी भाजपा की हवा बता रहे हैं जबकि  20 प्रतिशत अभी भी आम आदमी पार्टी की सरकार बने रहने का दावा कर रहे हैं। हालांकि जिन  एजेंसियों के निष्कर्ष कल शाम प्रसारित हुए उनमें एक - दो ही जानी - पहिचानी और अनुभवी होने से भ्रम की स्थिति बनी हुई है। लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा में भी चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल की जिस तरह भद्द पिटी उसके बाद इन्हें संचालित करने वाली एजेंसियां बेहद सावधानी बरत रही हैं। कुछ ने तो सीटों का अनुमान लगाने और एग्जिट पोल से खुद को दूर ही कर लिया। सी - वोटर नामक संस्था के संचालक यशवंत देशमुख भी हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव में गलत साबित होने के बाद दिल्ली  को लेकर कोई ठोस भविष्यवाणी करने से बचते रहे।  लोकसभा चुनाव में अपना एग्जिट पोल गलत साबित होने पर विपक्षी दलों की तीखी आलोचना के कारण टीवी शो में रो पड़ने वाले एक्सिस माय इंडिया के प्रमुख प्रदीप गुप्ता ने हरियाणा में कांग्रेस की जीत का अनुमान लगाया किंतु वहाँ भाजपा की सरकार लौट आई। उसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में मतदान के एक दिन बाद एग्जिट पोल जारी किया जिसके पूरी तरह सच निकलने पर  उनकी  साख दोबारा कायम हो गई। दिल्ली चुनाव पर श्री गुप्ता गहन विश्लेषण के बाद आज शाम अपना एग्जिट पोल जारी करेंगे । वैसे भी मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल के निष्कर्ष जारी करना जल्दबाजी लगती है। तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए किंतु मतदान के क्षेत्रवार आंकड़ों को एकत्र कर उनसे किसी नतीजे पर पहुँचने के लिए कुछ घंटे अपर्याप्त होते हैं। इसीलिए कई लोग  गत दिवस जारी हुए एग्जिट पोल पर संदेह जता रहे है। चूंकि दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनावों में सर्वेक्षण बुरी तरह गलत साबित हुए थे इसलिए आम आदमी पार्टी का मानना है इस बार भी बाजी वही मारेगी। ज्यादातर विश्लेषक भी मान रहे हैं कि भाजपा और उसके बीच कड़ा मुकाबला है  किंतु एग्जिट पोल के इस निष्कर्ष पर आम सहमति है कि कांग्रेस का प्रदर्शन  इस बार भी शर्मनाक रहेगा । केजरीवाल सरकार के विरुद्ध शराब घोटाले को उजागर करने वाली पार्टी यदि जनता का भरोसा जीतने में एक बार फिर असफल होती है तो यह उसके लिए बड़ा झटका होगा क्योंकि  इंडिया गठबंधन के घटक दलों में  सपा, तृणमूल और शिवसेना (उद्धव) ने उसके बजाय आम आदमी पार्टी का समर्थन किया। इससे लगता है दिल्ली में चाहे आम आदमी पार्टी सत्ता में लौटे या भाजपा की ताजपोशी हो किंतु कांग्रेस का हाथ खाली ही रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 5 February 2025

भारत भी अवैध विदेशी नागरिकों को बाहर करे


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनावी वायदे के अनुसार अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों का निष्कासन शुरू कर दिया है। उसी क्रम में गैरकानूनी तरीके से रह रहे भारतीय नागरिकों के एक दस्ते को वायुयान से भारत भेज दिया गया जो संभवतः आज यहाँ पहुँच जायेगा। इसके पहले  ग्वाटेमाला, पेरू और होंडूरास जैसे देशों के नागरिकों को पकड़कर उनके देश भेजा जा चुका है। भारत आ रहे 200 से अधिक प्रवासियों में से लगभग 104 के बारे में जानकारी हासिल हो चुकी है ।  जो चित्र प्रसारित हुए उनमें विमान में बिठाये जा रहे उक्त प्रवासियों को हथकड़ी लगाई गई है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर तरह - तरह की टिप्पणियां देखने मिल रही हैं जिनमें प्रधानमंत्री पर तंज कसे जाने के साथ देश की प्रतिष्ठा धूमिल होने की बात है। हमारे देश के किसी नागरिक पर विदेश में मुसीबत आने पर उसकी मदद करना सरकार का कर्तव्य है। और ऐसा किया भी गया है। पश्चिम एशिया के अनेक देशों में युद्ध की स्थिति में वहाँ कार्यरत भारतीयों को सुरक्षित निकालने में केंद्र सरकार के अभियानों की सफलता की सर्वत्र प्रशंसा हुई। सबसे बड़ा अभियान तो रूस - यूक्रेन के बीच जंग शुरू होने के बाद यूक्रेन में अध्ययनरत भारतीय छात्रों को वहाँ से सुरक्षित निकालने का था।  भारत के बचाव दल ने पाकिस्तान सहित कुछ अन्य देशों के छात्रों को भी सुरक्षित निकालने में सहायता की। ऐसे में ये सवाल  बेमानी कि  अवैध रूप से रह रहे भारतीय  प्रवासियों को हथकड़ी लगाने से देश की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। किसी भी देश की यात्रा  के अलावा अध्ययन, नौकरी या कारोबार करने के लिए विधिवत अनुमति लेनी पड़ती है जो वीजा की शक्ल में होती है।अमेरिका में पढाई और नौकरी करने का आकर्षण नया नहीं है। वैसे भी उस देश को  दुनिया भर से आये प्रवासियों द्वारा ही बनाया गया।  लेकिन अब वह एक  संप्रभुता संपन्न राष्ट्र है जिसके अपने नागरिकता नियम हैं। चूंकि वहाँ संपन्नता है और जीवन यापन की गुणवत्ता बहुत ही अच्छी है इसलिए दुनिया भर के लोग इस देश में बसने को लालायित रहते हैं। वहाँ अध्ययन करने जाने वाले छात्र भी शिक्षा पूरी करने के बाद वहीं काम - धंधा तलाशकर बस जाते हैं और फिर नागरिकता हासिल करने में जुट जाते हैं। भारत में अमेरिका और कैनेडा का आकर्षण बेहिसाब है। जिन्हें वैध तरीके से वीजा मिल जाता है वे तो आसानी से वहाँ जाकर रहते हैं किंतु बिना वैध दस्तावेजों के पहुंचकर रहने वाले दलालों का सहारा लेकर पड़ोसी देशों की सीमा पार कर घुस आते हैं। ट्रम्प ने ऐसे ही लोगों को  निकाल बाहर करने की मुहिम छेड़ दी और उसी के तहत अवैध रूप से वहाँ बसे भारतीय प्रवासियों को वापिस भेजा गया है। अभी तो ये शुरुआत है। ऐसे हजारों भारतीय अवैध प्रवासी  वहाँ से वापिस भेजे जाएंगे। यदि ट्रम्प सरकार चाहे तो वह इन्हें सजा देकर जेल में डाल सकती है किंतु उस स्थिति में उस पर आर्थिक भार पड़ता। इसलिए अवैध प्रवासियों को उनके देश भेजने का निर्णय लिया गया। भारत में जिन लोगों ने इन प्रवासियों को भेजे जाने के तरीके को देश की प्रतिष्ठा से जोड़ा वे भावनात्मक दृष्टि से तो सही हैं किंतु हमारे देश का कोई व्यक्ति यदि किसी अन्य देश में अवैध तरीके से घुसे तो उसके प्रति सहानुभूति उचित नहीं लगती। जो प्रवासी भारतीय विदेशों में बसे हैं उन्होंने अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का सम्मान बढ़ाया है। ऐसे में बिना वैध दस्तावेजों के वहाँ घुसने वाले देश की प्रतिष्ठा को धूमिल करते हैं। भारत में भी बांग्लादेशी  और रोहिंग्या घुसपैठियों की समस्या लाइलाज होती जा रही है। अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर जो फैसला किया हमें उससे प्रेरणा लेकर अपने देश में घुस आये  घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के बारे में कदम उठाना चाहिए। सबसे पहले उनके नाम मतदाता सूची से हटाकर उन्हें मिल रही सरकारी सुविधाएं रोकी जाएं। जो दल इसका विरोध करें उनका पर्दाफाश जनता के सामने हो जाएगा। अमेरिका यदि किसी ऐसे भारतीय प्रवासी के साथ अपमानजनक व्यवहार करे जिसके पास वैध दस्तावेज हों तब उसका विरोध करने में कोई संकोच करने की जरूरत नहीं होना चाहिए किंतु जो लोग गलत तरीके से किसी देश में घुसें उनसे हमदर्दी रखना गलत बातों को प्रोत्साहन देना है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 4 February 2025

राहुल के मुँह से सच्चाई निकल ही गई


लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने गत दिवस राष्ट्रपति के अभिभाषण में ज्यादातर तो पुरानी बातों को ही दोहराया किंतु बेरोजगारी के मुद्दे पर वे ऐसी टिप्पणी कर गए जिसने  यूपीए सरकार को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। उल्लेखनीय है  हाल ही में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का दावा कांग्रेस हमेशा करती आई है। विशेष रूप से बेरोजगारी को लेकर वह वर्तमान मोदी सरकार पर तीखे हमले करती रही। राहुल भी अपनी सभाओं में उनकी सत्ता बनने पर नौजवानों को रोजगार की गारंटी बांटते  हैं।   विगत लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी को इंडिया गठबंधन ने बड़ा मुद्दा बनाया था जिसका कुछ - कुछ असर भी देखने मिला। लेकिन गत दिवस लोकसभा में दिये भाषण में श्री गाँधी ने युवाओं को देश का भविष्य बताते हुए कहा  उनके लिए काम करना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने मोदी सरकार द्वारा प्रारंभ किये गए मेक इन इंडिया अभियान की तो प्रशंसा की किंतु साथ ही ये भी जोड़ दिया कि वह अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका। सबसे बड़ी बात उन्होंने ये कही कि बेरोजगारी का  हल करने में यूपीए वन  और टू  के अलावा वर्तमान   सरकार भी  असफल रहीं। इसके कारणों को स्पष्ट करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि 1991 में बनी  कांग्रेस के नेतृत्व वाली पी.वी  नरसिम्हा राव सरकार द्वारा किये गए आर्थिक सुधारों में उपभोग पर तो जोर दिया गया किंतु उत्पादन बढ़ाने के प्रति उदासीनता बरती गई। और वही गलती आने वाली सरकारों के दौर में दोहराई जाती रही। उनका आशय ये था कि उत्पादन बढ़ाने से रोजगार में वृद्धि के साथ  ही विदेशों पर हमारी निर्भरता कम होगी जिससे कि देश आर्थिक और कूटनीतिक दबावों से मुक्त रहेगा। यद्यपि श्री गाँधी ने अभिभाषण के बहाने मोदी सरकार पर जमकर अपनी भड़ास निकाली। महाराष्ट्र में हुई करारी हार की कसक  भी उनके उद्बोधन में चुनाव आयोग पर निशाना साधने के रूप दिखाई दी किंतु पूरे भाषण में उन्होंने एक बात ईमानदारी से स्वीकार कर ली कि यूपीए सरकार ने भी बेरोजगारी घटाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया। उनके भाषण के इन अंशों की प्रशंसा भी हुई क्योंकि उनमें विपक्ष के नेता के साथ ही एक राष्ट्रीय सोच नजर आई।  तथ्यात्मक स्थिति का विश्लेषण करने पर ये बात सामने आयेगी कि  राव सरकार द्वारा जिस उदारीकरण और मुक्त व अर्थव्यवस्था की नीति लागू की गई उसे कमोबेश उसके बाद आई सभी केंद्र सरकारों ने जारी रखा। उस सरकार में वित्तमंत्री डाॅ. मनमोहन  सिंह ही थे जिन्हें कांग्रेस आर्थिक सुधारों का जनक मानती है। लेकिन ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस ने कभी भी राव साहब को इस बात का श्रेय नहीं दिया कि उन्होंने डाॅ. सिंह की प्रतिभा को पहिचानकर उन्हें अपनी सरकार में शामिल किया। बाद में उनको  गाँधी परिवार ने प्रधानमंत्री भी बनवाया। जिन आर्थिक सुधारों को डाॅ. सिंह ने प्रारंभ किया उनके लिए वैश्विक परिस्थितियाँ भी जिम्मेदार थीं। विश्व व्यापार संगठन के गठन के बाद नेहरू - इंदिरा युग की आर्थिक नीतियों को जारी रखने से देश अलग - थलग पड़ जाता। उदारवाद ने विदेशी पूंजी के लिए दरवाजे तो खोले किंतु उसके कारण विदेशी उत्पादों की आवाजाही भी बढ़ने लगी जिसका दुष्प्रभाव भारतीय उद्योगों के बन्द होने के रूप में आने लगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में कारोबार जमाकर एक बड़े बाजार पर कब्जा तो जमाया ही किंतु  सबसे बड़ा बदलाव हुआ उपभोक्तावाद रूपी पाश्चात्य जीवनशैली के प्रादुर्भाव के रूप में। उदारवाद ने उधारवाद की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया जिससे विदेशी कंपनियों को भरपूर मुनाफा हुआ। राहुल ने उपभोग और उत्पादन के बीच संतुलन बिगड़ने की जो बात कही तो उसके लिए डाॅ. सिंह ही जिम्मेदार माने जाएंगे क्योंकि आर्थिक सुधारों ने  रोजगार विहीन विकास को जन्म दिया। उत्पादन नहीं बढ़ा ये कहना पूर्ण सत्य नहीं है। लेकिन वैश्विक बाजारों में जिस तरह चीन छाया हुआ  है उसकी तुलना में भारत बहुत पीछे रह गया। श्री गाँधी ने रोजगार और उत्पादन बढ़ाने में यूपीए सरकारों की असफलता को स्वीकार कर निश्चित रूप से ईमानदारी दिखाई किंतु इसके बाद उन्हें और उनकी पार्टी को वर्तमान केंद्र  सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं रह जाता जिसने 10 वर्षों में भारत को दुनिया की सबसे तेज दौड़ती व्यवस्था के तौर पर प्रतिष्ठित कर दिया। यही वजह है कि भारत  विदेशी निवेशकों का मनपसंद  बन गया। हालांकि श्री गाँधी ने उपभोग और उत्पादन के बीच असंतुलन की बात छेड़कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विकास दर कितनी भी ऊपर चली जाए किंतु  वह रोजगार बढ़ाने में सहायक न हो तो उसका लाभ ही क्या? आजकल चुनाव घोषणापत्र में सत्ता संभालते ही लाखों नियुक्तियों का वायदा किया जाता है किंतु ये नौकरियां आएंगी कहाँ से ये कोई नहीं बताता। श्री गाँधी के पास भी इस समस्या का कोई हल नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 3 February 2025

संत समाज की एकता के बिना सनातन समुदाय की एकजुटता असंभव

प्रयागराज महाकुंभ में बसंत पंचमी के तीसरे और अंतिम अमृत स्नान पर 3 से 4 करोड़ लोगों के पवित्र संगम में डुबकी लगाने की संभावना है। रविवार  से ही श्रृद्धालुओं का आना शुरू हो चुका था। 13 जनवरी से अब तक 37 करोड़ लोग महाकुंभ में आ चुके हैं। महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस विराट आयोजन में 40 करोड़ लोगों के आगमन का अनुमान था जो बढ़कर 50 करोड़ हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। मौनी अमावस्या के  हादसे के बाद मेला प्रबंधन में जुटा अमला पूरी तरह मुस्तैद है। प्रयागराज में वाहनों का प्रवेश 5 तारीख तक रोक दिया गया। आवागमन अलग - अलग रास्तों से होने की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ स्थित नियंत्रण कक्ष में प्रातः 3 बजे ही आकर बैठ गए। अमावस्या पर हुई दुर्घटना के बाद  व्यवस्था के लिए तैनात अधिकारियों पर आरोप लगना तो स्वाभाविक था किंतु जिस तरह की राजनीति हो रही है वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं लगती। सबसे दुखद ये रहा कि अविमुक्तेश्वरानंद जी  नामक शंकराचार्य द्वारा अत्यंत क्रोधित अंदाज में योगी जी को अक्षम बताते हुए उनसे त्यागपत्र मांग लिया गया। उसके बाद सोशल मीडिया पर दोनों तरफ से  समर्थन और विरोध का सिलसिला शुरू हो गया। उधर चारों पीठों के शंकराचार्यों में सबसे वरिष्ट पुरी के निश्चलानंद सरस्वती जी ने अविमुक्तेश्वरानंद जी की नियुक्ति को ही फर्जी बता दिया। इसके साथ ही ये जानकारी भी प्रसारित होने लगी कि ब्रह्मलीन द्वीपीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद जी द्वारा अविमुक्तेश्वरानंद जी को ज्योतिष (बद्रीनाथ) पीठ का शंकराचार्य नियुक्त किये जाने के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है जिसका फैसला लंबित है। स्मरणीय है दो पीठों के शंकराचार्य रहे स्वरूपानंद जी की नियुक्ति पर उठा विवाद भी सर्वोच्च न्यायालय तक गया था। उनके विरोधी रहे  स्वामी वासुदेवानंद जी खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य घोषित करते आये हैं। उनके भी हजारों भक्त हैं। स्वामी स्वरूपानंद जी के निधन के बाद जब उनकी कथित वसीयत के आधार पर शारदा पीठ में स्वामी सदानंद जी और ज्योतिष पीठ में अविमुक्तेश्वरानंद जी को शंकराचार्य बनाये जाने की घोषणा हुई तब दशनामी संन्यासी  अखाड़ा सहित काशी विद्वत परिषद ने दोनों नियुक्तियों को परंपरा विरुद्ध बताते हुए कहा कि स्वरूपानंद जी की नियुक्ति का विवाद ही नहीं सुलझा तब वे अपना उत्तराधिकारी कैसे नियुक्त कर गए? उल्लेखनीय है सदानंद जी तो ज्यादा बोलते नहीं लिहाजा उन्हें लेकर उतना बवाल नहीं होता किंतु अविमुक्तेश्वरानंद जी अपने बयानों के कारण शुरुआत से ही विवादों में  फंसते चले गए? निश्चलानंद जी ने तो उनके ब्राह्मण न होने की बात तक कह डाली। उनकी नियुक्ति वैध है या अवैध ये निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय से होगा किंतु सनातन धर्म के सबसे सम्मानित पद  का निर्णय यदि अदालत करे तो यह उस पद के साथ जुड़े जगद्गुरु जैसे अति सम्मानित संबोधन का अपमान है। आद्य शंकराचार्य द्वारा चार प्रमुख पीठाधीश्वरों की नियुक्ति की जो व्यवस्था तय की गई थी उसमें दशनामी अखाड़ा और काशी विद्वत परिषद की भूमिका यदि निर्णायक है तब प्रत्येक संत - महात्मा का यह धर्म है कि उसका पालन करे। ये बात अटपटी लगती है कि शंकराचार्य पर नियुक्त व्यक्ति को दूसरे शंकराचार्य ही स्वीकार न करें। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि चारों पीठों के अधीश्वरों में मतैक्य और आपसी विश्वास  नहीं हैं तब वे सनातन धर्म के अनुयायियों को एकजुट रहने का उपदेश वे किस अधिकार से देंगे? इसका दुष्परिणाम ये है कि एक शंकराचार्य का भक्त दूसरे के प्रति असम्मानजनक टिप्पणी करने से बाज नहीं आता। महाकुंभ में अपने बयानों के कारण अविमुक्तेश्वरानंद जी संत समाज में अकेले पड़ गए जिसे अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता । सनातन धर्म से जुड़े असंख्य संतों में प्रमुख स्वामी अवधेशानंद जी ने महाकुंभ के प्रबंध को लेकर आलोचना करने वालों को जिस तरह आड़े हाथ लिया वह अप्रत्यक्ष तौर पर अविमुक्तेश्वरानंद जी पर ही निशाना है जो अपने स्वभाव विशेष की वजह से आये दिन विवादों में घिर जाते हैं। कुंभ में आयोजित होने वाली धर्म संसद  सनातन धर्म को व्यवस्थित करने हेतु निर्देश जारी करती है। अतीत में उसके द्वारा लिए गए अनेक निर्णयों का राष्ट्रीय जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। वर्तमान समय में सनातन धर्म  पर जिस प्रकार देश के भीतर और बाहर दोनों से हमले हो रहे हैं उन्हें देखते हुए संत समाज को भी अपने मतभेद दूर कर  एकजुट होना चाहिए। अन्यथा हिन्दू समाज को टुकड़ों में बांटकर देश को कमजोर करने का षडयंत्र सफल होते देर नहीं लगेगी। याद रहे संत समाज की एकता के बिना सनातनी समुदाय को एक सूत्र में बांधना असंभव है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 1 February 2025

महामंडलेश्वर और जगद्गुरु की पदवी मज़ाक बन गई


महाकुंभ से यूँ तो रोज नई - नई खबरें आ रही हैं किंतु उन सबके बीच नये महामंडलेश्वर बनाये जाने को लेकर विवाद भी सामने आये हैं। किन्नर अखाड़े द्वारा एक पूर्व अभिनेत्री ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उसमें  मतभेद पैदा हो गए तथा अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास  ने अभिनेत्री को नियुक्त करने वाले आचार्य डाॅ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को भी अखाड़े से बाहर कर दिया। ममता का फिल्मी कैरियर बहुत ही संक्षिप्त रहा। उसके बाद वे अंडरवर्ल्ड के साथ जुड़ने के आरोप में घिर गईं। अपने अश्लील फोटो शूट के लिए भी वे काफी बदनाम हुईं थीं। एक सप्ताह पहले ही उन्होंने  संन्यास लेकर महामंडलेश्वर की पदवी हासिल की थी जिसे गत दिवस छीन लिया गया। ये पहला अवसर नहीं है जब महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद किसी को हटाया जाए। कुछ वर्ष पूर्व एक साध्वी कहलाने वाली महिला को भी महामंडलेश्वर बनाये जाने के बाद उनसे जुड़े विवादों की वजह से हटाया गया था। जब भी कुंभ का आयोजन होता है तब महामंडलेश्वर की पदवी कुछ लोगों को अखाड़ों द्वारा प्रदान की जाती है। वे लोग संन्यास लेकर सांसारिक मोह  - माया से स्वयं को मुक्त करते हैं। इन पदवियों को धारण करने वाले सनातन धर्म की संत परंपरा के ध्वजावाहक होने के कारण समाज में सम्मान के पात्र होते हैं। त्याग और तपस्या इनकी पहिचान होती है। उनके आचरण के कारण लोग इन्हें अपना आदर्श मानते हैं। समाज में धर्ममय वातावरण बनाकर लोगों को सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करना  इनका कर्तव्य होता है। एक तरह से उन्हें अपना जीवन समाज और धर्म की सेवा के लिए अर्पित करना होता है। सनातन धर्म में जो व्यवस्था आद्य शंकराचार्य बनाकर गए उसमें ऐसी ही अनेक पदवियां हैं। इन पर नियुक्तियाँ आसानी से नहीं होती थीं। पदवी दिये जाने के पूर्व संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि, आध्यात्मिक ज्ञान और क्षमता का सूक्ष्म परीक्षण किया जाता था। वरिष्ट धर्माचार्य गहन विचार - विमर्श के उपरांत इस बारे में फैसले किया करते थे। इसी तरह आद्य शंकराचार्य द्वारा गठित चार प्रमुख पीठों के शंकराचार्य जो जगद्गुरु कहलाते हैं , की  चयन प्रक्रिया भी थी। लेकिन धीरे - धीरे उनके प्रति लापरवाही देखने मिलने लगी और महामंडलेश्वर तो क्या शंकराचार्य की नियुक्ति को लेकर भी विवाद बढ़ने लगे। जिन चार पीठाधीश्वरों पर सनातन धर्म के संरक्षण और संवर्धन का दायित्व है उन्हीं में आपसी मतभेद हैं। अदालतों में असली और नकली कै मामले चल रहे हैं। चार मुख्य पीठों के अलावा न जाने कितनी छोटी - छोटी पीठ सामने आने लगी हैं जिनके महंत जगद्गुरु की पदवी हासिल करते जा रहे हैं। इस कारण सनातन धर्म के इन बेहद सम्मानित पदों की प्रतिष्ठा धूमिल होती जा रही है। महामंडलेश्वर और जगद्गुरु जैसी पदवियां राजनीतिक नियुक्तियों जैसी होने लगी हैं। यही कारण है उनके प्रति आदरभाव घटता जा रहा है। जो अखाड़े या अन्य धार्मिक संस्थाएं ये पदवियां बांटती हैं उनके विवेक और ईमानदारी पर संदेह बढ़ता जा रहा है जो सनातन धर्म की प्रतिष्ठा और पवित्रता के लिए खतरा है। संन्यास कोई मजाक नहीं है कि कोई भी आकर रातों -  रात सब कुछ त्यागने का दावा करते हुए महामंडलेश्वर या जगद्गुरु जैसी पदवी हासिल कर महिमामंडित हो जाए। ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर बनाये जाने और महज सात दिनों बाद  हटाये जाने का निर्णय ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि संबंधित अखाड़े का संचालन कर रहे लोगों में आपसी सामंजस्य का नितांत अभाव है। इसी तरह जिस प्रकार थोक के भाव नये जगद्गुरु नियुक्त होते जा तरह हैं उसकी वजह से चार प्रमुख शंकराचार्यों का प्रभाव घट  रहा है क्योंकि नव नियुक्त जगद्गुरु खुद को किसी से कम नहीं समझते। जनसंख्या में वृद्धि के कारण अतीत में कुछ उप पीठें बनाई गई थीं। उनके प्रमुख को भी जगद्गुरु की पदवी दी गई किंतु जिस तेजी से  नये जगद्गुरु बन रहे हैं उससे इनके बीच भी खींचातानी शुरू होने की आशंका बढ़ रही है।  देश में अनेक ऐसे संत हैं जिन्हें उनकी विद्वता, सरलता और धर्मनिष्ठा के कारण महामंडलेश्वर अथवा जगद्गुरु की पदवी हासिल किये बिना भी सम्मान प्राप्त है। दूसरी ओर कुछ कथावाचक पांच सितारा जीवनशैली और फिल्मी सितारों जैसी चमक - दमक के कारण आम लोगों की पहुँच से बाहर हो गए हैं क्योंकि उनके आयोजन में करोड़ों का खर्च होता है। महाकुंभ के अवसर पर आयोजित होने वाली धर्म संसद में सनातन धर्म के साथ जुड़ती जा रहीं इन विसंगतियों को दूर करने पर गंभीरता से विचार - विमर्श होकर ठोस निर्णय होना चाहिए अन्यथा धर्म के नाम पर पाखंडियों का वर्चस्व बढ़ता जायेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी