Saturday, 15 February 2025

बांग्ला देश पर ट्रम्प की टिप्पणी भारत के लिए अच्छा संकेत


अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर दोबारा आसीन होते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से काम शुरू किया उससे पूरी दुनिया में खलबली है। मुख्य रूप से  किसी देश से होने वाले आयात पर लगने वाले टैरिफ ( शुल्क ) में वे जिस तरह से वृद्धि करते जा रहे हैं उससे विश्व व्यापार गड़बड़ा गया है। अपने पड़ोसी मेक्सिको और ब्राज़ील के अलावा ट्रम्प ने चीनी वस्तुओं पर भी आयात शुल्क बढ़ाकर अपने इरादे जता दिये हैं। भारत के साथ भी उनका यही रवैया देखने मिल रहा है। यूरोप के तमाम देश उनकी इस आक्रामक नीति से नाराज हैं। जिन देशों पर ट्रम्प प्रशासन ने बढ़े हुए आयात शुल्क का बोझ बढ़ाया उनसे आयात अधिक हो रहा था किंतु उसकी तुलना में अमेरिका निर्यात कम कर रहा था। इसे व्यापार घाटा कहते हैं। चीन के साथ होने वाले व्यापार में भारत इसे झेल भी रहा है। वैसे हर देश ये कोशिश करता है कि आयात की तुलना में उसका निर्यात अधिक हो क्योंकि इसी से उसकी मुद्रा का मूल्य तय होता है। अमेरिका की चिंता यह है कि  आयात की अधिकता की वजह से  डॉलर की मजबूती पर असर पड़ सकता है। यूक्रेन संकट के बाद जब अमेरिका ने रूस पर आर्थिक प्रतिबंध थोपे तब चीन और भारत जिस मुस्तैदी से उसके साथ खड़े हुए तथा उससे कच्चा तेल और गैस इत्यादि की खरीदी जारी रखी उसकी वजह से अमेरिका काफी नाराज हुआ। लेकिन उसकी मजबूरी है कि वह इन दोनों देशों से पूरी तरह नाराजगी भी  मोल नहीं ले सकता। चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पूंजी फंसी है और  चीन के दबाव को कम करने के लिए  अमेरिका को भारत की जरूरत है। इसीलिए ट्रम्प ने आयात शुल्क बढ़ाने के मामले में सख्ती के बावजूद काफी सतर्कता बरती।  इस सबके बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की ताजा अमेरिका यात्रा कूटनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रही। ट्रम्प के शपथ ग्रहण में उनको आमंत्रित नहीं किये जाने पर देश में विपक्षी दलों ने काफी टीका - टिप्पणी की और दोनों नेताओं के बीच दोस्ती के दावे पर कटाक्ष भी किया किंतु  ट्रम्प के आमंत्रण पर प्रधानमंत्री की वाॅशिंगटन यात्रा के दौरान उनका जिस तरह से स्वागत हुआ उसके बाद उन आलोचकों के मुँह बंद हो गए। यद्यपि  श्री मोदी से भेंट के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत  पर आयात शुल्क बढ़ाते हुए इसे जैसे को तैसा बताया। उल्लेखनीय है भारत ने अमेरिकी वस्तुओं पर काफी अधिक आयात शुल्क लगा रखा है। ट्रम्प ने उस असंतुलन को दूर करने का फैसला किया जो उनके राष्ट्रीय हित के लिहाज से गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन श्री मोदी के साथ बातचीत के बाद ट्रम्प ने उन्हें बेहतर मोलभाव करने वाला बताकर कुछ संकेत जरूर दिये।  इससे अलग हटकर इस मुलाकात से जो बातें निकलकर सामने आईं वे भारत के प्रति ट्रम्प  के झुकाव का परिचायक हैं। मसलन अमेरिका द्वारा भारत को अत्याधुनिक एफ. 35 लड़ाकू जेट देने पर सहमति जो वह अपने अति विश्वस्त और करीबी देशों को ही देता है। इसके साथ ही भारत के साथ रक्षा क्षेत्र में सहभागिता बढ़ाने का जो फैसला हुआ वह चीन पर दबाव बनाने में मददगार होगा। उल्लेखनीय है क्वाड नामक संगठन में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत भी शामिल है। दक्षिण एशिया और प्रशांत क्षेत्र में  चीन के विस्तारवादी रवैये पर नियंत्रण स्थापित करने में क्वाड काफी कारगर साबित हुआ है। यद्यपि ट्रम्प  ब्रिक्स नामक संगठन के विरुद्ध भी काफी हमलावर हैं जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और  द.अफ्रीका शामिल हैं। हाल ही में इस संगठन ने डॉलर के वर्चस्व को तोड़ने एक साझा मुद्रा बनाने की पहल भी की थी जिसने अमेरिका को नाराज कर दिया । बावजूद उसके ट्रम्प का भारत पर ब्रिक्स से अलग होने का दबाव न बनाकर क्वाड में उसे साथ रखना ये दर्शाता है कि  व्यापारिक मामलों में  सख्ती के बाद भी कूटनीतिक दृष्टि से भारत के प्रति नर्म रवैया रखना अमेरिका की मजबूरी है क्योंकि द. एशिया में चीन के बढ़ते आधिपत्य को रोकने में  वही सक्षम है। श्री मोदी के अमेरिका दौरे की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि रही ट्रम्प की ये टिप्पणी कि बांग्ला देश को  मैं प्रधानमंत्री मोदी पर छोड़ता हूँ। ये निश्चित रूप से बड़ी बात है क्योंकि ये माना जाता है कि इस पड़ोसी देश में सत्ता पलट अमेरिका द्वारा करवाया गया था। लेकिन ट्रम्प ने आते ही उसकी आर्थिक मदद रोक दी। हालांकि श्री मोदी की यह यात्रा संक्षिप्त रही किंतु ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही दोनों  के बीच व्यक्तिगत गर्मजोशी अच्छा संकेत है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनको जिस प्रकार से सम्मान दिया  वह आश्वस्त करता है। इस बारे में एक बात और महत्वपूर्ण है कि श्री मोदी विश्व के संभवतः अकेले नेता हैं जिनके अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति पुतिन दोनों से बेहद नजदीकी संबंध हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Friday, 14 February 2025

आयकर के विकल्प की तलाश समय की मांग


वित्त मंत्री निर्मला  सीतारमण द्वारा  नया आयकर विधेयक संसद में प्रस्तुत किये जाने के बाद प्रवर समिति को भेज दिया गया जो मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट देगी। बजट में आयकर छूट की सीमा 12 लाख किये जाने के समय ही उन्होंने इसके संकेत दे दिये थे। तभी से इसको लेकर अनुमान लगाए जाने लगे थे। प्रस्तुत विधेयक में बहुत सारे अनुपयोगी प्रावधान हटा दिये गए हैं। कुछ नियमों को जोड़कर उनकी संख्या कम कर दी गई वहीं  कुछ प्रावधानों को सरलीकृत किया गया है। 1961 के अधिनियम के आकार को आधा कर दिया गया है। जो जानकारी आई उसके अनुसार नये विधेयक में मौजूदा कानून की अनेक जटिलताओं को दूर किया गया है जिससे कर दाताओं  के साथ ही कर सलाहकारों को भी सुविधा होगी। इस विधेयक को इस तरह तैयार किया गया है जिससे ये अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो। मोदी सरकार  इसके पूर्व भी अनेक कानूनों का सरलीकरण करने के साथ ही अनुपयोगी कानूनों को विलोपित कर चुकी है जो दरअसल प्रशासनिक सुधारों की प्रक्रिया का हिस्सा है। ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि आयकर कानून में जो पेचीदगियां थीं उनकी वजह से करदाता को बहुत परेशानी होती थी। उसका परिणाम भ्रष्टाचार और कर चोरी के रूप में देखने मिलता रहा। बीते दो - तीन दशकों में आयकर के ढांचे में काफी सुधार हुए जिससे विवरणी भरना आसान हुआ। सबसे बड़ी राहत रिफंड के बारे में हुई जो काफी देर से आता था और उसका भुगतान हासिल करने के लिए घूस भी देनी पड़ती थी। इसी तरह कर निर्धारण की प्रक्रिया को  व्यक्तिगत संपर्क की बजाय ऑन लाइन  किये जाने से भी क्रांतिकारी सुधार हुआ। पहले छोटे - छोटे करदाता को भी  पेशी का सिर दर्द झेलना पड़ता था। लेकिन अब सब काम ऑन लाइन होने से उससे मुक्ति मिल गई। 90 फीसदी से अधिक विवरणी महीने भर से भी कम समय में स्वीकार हो जाती हैं। जिनमें पूछताछ होती है उनमें भी अधिकारी और विवरणी भरने वाले का आमना - सामना नहीं होता। इस प्रकार  मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम हो गया जो भ्रष्टाचार की जड़ था। यही वजह है कि लघु और मध्यमवर्गीय करदाताओं के अलावा भी जो बड़े कारोबारी हैं उनके मन में आयकर को लेकर पहले जैसा खौफ नहीं रहा। बीते कुछ वर्षों में आयकर दाता जिस तेजी से बढ़े उसके कारण सरकार को उससे होने वाली कमाई भी   आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। इससे प्रमाणित होता है कि कानून और प्रक्रिया सरल होने से व्यवस्था में नागरिकों  का विश्वास बढ़ता है और  वे उत्साहित होकर  उसमें सहयोग  करते हैं। लेकिन इसके साथ ही अब ये विचार भी सामने आ रहा है कि आयकर की मौजूदा व्यवस्था में सुधार से एक कदम आगे बढ़कर उसके विकल्प के बारे में सोचा जाए। कहा जाता है मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी इसी दिशा में बढ़ाया कदम था किंतु उसे लागू  किये जाने में जो गड़बड़ियां हुईं उनकी वजह से अगला कदम उठाने से सरकार पीछे हट गई। ये आरोप भी लगे कि नोटबंदी  की गोपनीयता बनाये रखने के फेर में सरकार समुचित तैयारी नहीं कर सकी । उसके कारण जनता को जो परेशानी हुई उसने एक अच्छे निर्णय को आलोचना का पात्र बना दिया। यद्यपि प्रधानमंत्री नोटबंदी के अगले चरण के प्रति गंभीर बताये जाते हैं किंतु इस बार जो भी होगा वह सोच - समझकर किया जाएगा। अनेक अर्थशास्त्रियों का मानना है कि प्रत्यक्ष कर की ऐसी प्रणाली लागू की जाए जिससे लोगों में आय छिपाकर कर चोरी करने की प्रवृत्ति समाप्त हो। वह खर्च पर कर ( एकस्पेंडीचर टैक्स ) हो या बैंक में जमा होने वाली नगद राशि कर ( ट्रांजेक्शन टैक्स) ये विश्लेषण का विषय है किंतु जिस तरह जीएसटी में व्याप्त जटिलताएं खत्म होने से उसका संग्रह लगातार नई ऊंचाइयां छू रहा है उसी तरह यदि काले धन की समानांतर अर्थ व्यवस्था पर लगाम कसनी है तब लोगों को अपनी आय उजागर करने में लगने वाले डर को पूरी तरह दूर करने की जरूरत है। नया आयकर विधेयक तो अपनी जगह ठीक है क्योंकि उसका मकसद प्रचलित कानून को सरल और संक्षिप्त बनाना है । लेकिन आयकर को समाप्त कर किसी ऐसी व्यवस्था  की जरूरत है जिससे लोग  अपनी पूरी आय उजागर करें। यदि काले धन से चलने वाली समानांतर अर्थ व्यवस्था  बन्द की जा सके तो भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Thursday, 13 February 2025

सर्वोच्च न्यायालय ही लगा सकता है रेवड़ियों पर रोक


सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव के समय  राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली मुफ्त योजनाओं की घोषणा पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि लोग काम नहीं करना चाहते क्योंकि आप उन्हें मुफ्त अनाज दे रहे हैं। उसने पूछा कि लोगों को मुख्य धारा में शामिल करने की बजाय मुफ्त की योजनाएं लागू कर क्या परजीवियों की जमात खड़ी नहीं की जा रही है? और ये भी कि क्या उनको मुख्यधारा में शामिल कर देश के विकास का हिस्सा बनाना अच्छा नहीं होगा? इसके पहले भी  न्यायालय मुफ्त योजनाओं पर दायर  याचिकाओं पर सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर चुका है। लेकिन चुनाव आयोग गेंद न्यायालय के पाले में खिसका कर अपना पल्ला झाड़ लेता है और सर्वोच्च न्यायालय  टिप्पणी और सवाल पूछकर बात आगे बढ़ा देता है। जहाँ तक बात सरकार की है तो वह किसी भी पार्टी की हो मुफ्त योजनाओं को बंद करने का साहस नहीं जुटा सकती । दिल्ली के हालिया चुनाव में प्रधानमंत्री  ने आदमी पार्टी सरकार  की मुफ्त योजनाओं को रेवड़ी कहकर  उनकी आलोचना की। जवाब में अरविंद केजरीवाल ने  ये प्रचार शुरू कर दिया कि भाजपा सत्ता में आई तो वह मुफ्त बिजली, पानी और महिलाओं को बस यात्रा पर रोक लगा देगी और झुग्गियों को तोड़ दिया जाएगा। इस प्रचार से घबराई भाजपा ने  आश्वासन दिया कि सभी मुफ्त सुविधाएं जारी रहेंगी और झुग्गी वासियों को पक्के मकान दिये जाएंगे। भाजपा ने आम आदमी पार्टी द्वारा महिलाओं को प्रति माह 2100 रु. के वायदे से आगे बढ़कर 2500 रु. देने का वायदा कर दिया।  विडंबना ये है कि सभी दल एक  - दूसरे पर खैरात बाँटकर चुनाव जीत लेने का आरोप लगाते हैं किंतु  खुद  उससे परहेज नहीं करते। आशय ये है कि खेल सब एक जैसे  रहे हैं किंतु हारने वाला विजेता पर बेईमानी  का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ये पूछ चुका है कि सरकार मुफ्त अनाज कब तक बांटेगी? कांग्रेस भी मोदी सरकार के आर्थिक प्रगति के दावे का मजाक उड़ाते हुए कहती है कि ऐसा है तो 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज क्यों देना पड़ रहा है ? लेकिन  मुफ्त अनाज वितरण जिस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किया जा रहा है वह सोनिया गाँधी की पहल पर मनमोहन सिंह सरकार द्वारा ही  पारित करवाया गया था। कुछ साल पहले  सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी गोदामों में अनाज के सड़ने की शिकायतों पर कहा था कि इससे बेहतर है वह गरीबों में बाँट दिया जाए। मोदी सरकार ने कोरोना काल में जब निःशुल्क अनाज वितरण शुरू किया तब वह समय की मांग थी किंतु अब वह चाहकर भी उसे बंद नहीं कर पायेगी क्योंकि  मुफ्त योजनाओं को बंद करना  किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्महत्या करने जैसा होगा। चुनाव आयोग कह चुका है कि ऐसा करना उसके लिए तभी संभव होगा यदि संसद उसके लिए कोई कानून बनाए जिसके कोई आसार नजर नहीं आते। सवाल ये है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वतः संज्ञान लेकर चुनाव के समय मुफ्त योजनाओं के वायदे किये जाने पर रोक क्यों नहीं लगाता? अनेक मामलों में वह ऐसा कर भी चुका है। ये मुद्दा भी विचारणीय है कि आर्थिक संसाधनों की कमी के बाद भी इस तरह के वायदे करने का क्या औचित्य है जिनके कारण विकास सहित अन्य महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की ये टिप्पणी  बहुत ही सटीक है कि राज्यों न के पास न्यायाधीशों के वेतन और पेंशन के लिए पैसों की कमी है किंतु उन लोगों को रेवड़ियां बाँटने के लिए धन की कमी नहीं जो कुछ नहीं करते।  चुनाव आयोग ने गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय से ही कह दिया कि वह मुफ्त योजनाओं को परिभाषित करे जिसके बिना वह कोई कदम नहीं उठा सकता। लोक कल्याणकारी राज्य में  वंचित वर्ग का आर्थिक संरक्षण सरकार का दायित्व है। भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जहाँ सब्सिडी के जरिये लोगों की मदद की जाती है। लेकिन संपन्न देशों के पास इतनी हैसियत होती है कि अपनी जनता को इस तरह की सहायता करें किंतु भारत जैसे  विशाल आबादी वाले देश में  मुफ्त योजनाओं को  हमेशा जारी रखना न तो व्यवहारिक है और न ही आर्थिक दृष्टि से संभव।  चूंकि संसद में बैठे देश के भाग्य विधाताओं को मुफ्त योजनाओं के भरोसे चुनाव जीतना आसान लगता है इसलिए उनसे कोई उम्मीद  करना व्यर्थ है। चुनाव आयोग में बैठे नौकरशाहों में  भी बिल्ली के गले में घंटी बांधने का साहस नहीं है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय को ही आगे आकर कुछ करना चाहिए वरना ये सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 12 February 2025

महाकुंभ बना सनातन की संगठित महाशक्ति का जीवंत प्रमाण


प्रयागराज महाकुंभ में माघ पूर्णिमा पर दोपहर तक ही डेढ़ करोड़ श्रद्धालु डुबकी लगा चुके थे। रात तक यह संख्या ढाई से तीन करोड़ जा सकती है। वैसे  माघ माह की समाप्ति को कुंभ का भी समापन माना जाता है। लेकिन  ऐसा लगता है इस बार  महाशिवरात्रि तक श्रृद्धालुओं का आना लगा रहेगा। 40 करोड़ की अनुमानित संख्या तो पहले ही पार हो चुकी है और अब यह आंकड़ा 50 करोड़ को पार करता नजर आ रहा है। पूरा विश्व इस अद्भुत मानव समागम से अचंभित है। मौनी अमावस्या को हुए हादसे के अलावा पूरा आयोजन अपनी विशालता और भव्यता के कारण ऐतिहासिक स्वरूप ग्रह करचुका है। अतीत में  मुख्य अमृत स्नान संपन्न हो जाने के बाद श्रृद्धालुओं की आवक कम होने लगती थी । लेकिन इस बार महाकुंभ का  देश ही नहीं दुनिया भर में जो आकर्षण देखने मिला वह अकल्पनीय है। इसके चलते  आने वालों की संख्या अनुमान से कहीं ज्यादा हो गई। ऐसे में यातायात की समस्या पैदा होना स्वाभाविक था। बीते कुछ दिनों में लाखों श्रृद्धालुओं को प्रयागराज पहुँचने में भारी परेशानियाँ हुईं। हजारों लोग तो बीच रास्ते से ही लौट गये जो निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है। महाकुंभ में की गई व्यवस्थाओं की प्रशंसा और निंदा दोनों हो रही हैं जो इतने विराट आयोजन में नितांत स्वाभाविक है।  साधु - सन्तों  से जुड़े विवाद भी सुनाई दिये। थोक के भाव जगद्गुरु और महामंडलेश्वर बनाये जाने की भी चर्चा हुई। धर्माचार्यों द्वारा भक्तों के आवास और भोजन की जो व्यवस्था की गई वह सनातन धर्म की ताकत का परिचायक है। महाकुंभ में आने वाले लाखों श्रृद्धालुओं को देश के कुछ बड़े उद्योगपतियों द्वारा निःशुल्क भोजन की व्यवस्था भी इस आयोजन की विशेषता बनी। हजारों लोगों ने इस महाकुंभ में  संन्यास लिया जिनमें विदेशी भी रहे। बड़ी संख्या में महिलाएं भी  सांसारिक जीवन छोड़कर साध्वी बनीं। सनातन धर्म की विराटता और समरसता का जो दिव्य अनुभव इस महाकुंभ में हुआ वह अविस्मरणीय बन गया। इसकी वजह से भारत के प्रति समूचे विश्व में रुचि उत्पन्न हुई। इसीलिए अनेक नामी - गिरामी हस्तियां प्रयागराज पहुंचीं। लेकिन देश में कुछ लोग हैं जो  इस अभूतपूर्व आयोजन के बारे में नकारात्मक अवधारणा फैलाने में जुटे हुए हैं। ये कहना सच्चाई से मुँह मोड़ लेना होगा कि महाकुंभ में सब कुछ चाक - चौबंद था। बहुत सी ऐसी कमियां हैं जिनकी आलोचना की जा सकती है। भीड़ का अनुमान  लगाने में भी चूक हुई जिसके कारण प्रयागराज पहुँचने वाले रास्तों पर घंटों जाम लगा रहा। संगम स्नान हेतु लोगों को लंबी दूरी तक पैदल चलने का कष्ट उठाना पड़ा। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे उस वजह से काफी परेशान हुए। मौनी अमावस्या पर हुए हादसे में मारे गए लोगों की सही संख्या उजागर नहीं करने का आरोप भी शासन - प्रशासन पर लगा। महाकुंभ संपन्न होने के बाद और भी ऐसी बातें सामने आयेंगीं जिन्हें लेकर व्यवस्था से जुड़े अमले की आलोचना होगी किंतु  इस विराट आयोजन की खूबियों की सूची बहुत लम्बी है। सबसे बड़ी बात ये है कि यह  हिन्दू नव जागरण का शुभारंभ बन गया। हालांकि प्रयागराज के अलावा भी जहां - जहां कुंभ आयोजित होता है सनातन धर्मावलंबी बड़ी संख्या में  वहाँ पहुँचते हैं ।  ये भी सच है कि हर आयोजन पहले से बड़ा और बेहतर होता है। लेकिन इस बार का महाकुंभ जिन राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक वातावरण के बीच हो रहा है वे काफी अलग हैं। लोकसभा चुनाव के पहले से ही सनातन धर्म के विरुद्ध जहर उगला जाने लगा था। कुछ ताकतें जातियों के नाम पर हिन्दू समाज को खंड - खंड करने का खतरनाक षडयंत्र  विदेशी ताकतों के इशारे पर रच रही हैं। वोटों की लालच में अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण में राष्ट्रीय हितों को उपेक्षित करने में भी संकोच नहीं किया जा रहा। लोकसभा चुनाव में आये जनादेश को राष्ट्रवादी शक्तियों के विरुद्ध आक्रोश का नाम देकर ये प्रचार किया जाने लगा कि जनता ने  हिंदुत्व की अवधारणा को ठुकरा दिया। अयोध्या  सहित हिंदुओं के अनेक पवित्र केंद्रों में भाजपा की हार का जिस हल्केपन से मजाक उड़ाया गया उसकी देश भर में जो प्रतिक्रिया हुई वह इस महाकुंभ के प्रति  सनातन धर्मावलंबियों द्वारा व्यक्त आस्था के रूप में सामने आई है। सनातन विरोधी ताकतें इस आयोजन के  विराट स्वरूप से विचलित हो उठी हैं। कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के जो परिणाम आये उनसे ये स्पष्ट हो गया कि लोकसभा चुनाव में लगे झटके से हिन्दू समाज ने सीख ली है। इसीलिए प्रयागराज महाकुंभ में उमड़ा जनसैलाब महज भीड़ नहीं अपितु  सनातन की संगठित महाशक्ति का जीवंत प्रमाण है। इस आयोजन ने बता दिया कि सनातन इस देश की आत्मा है और इसीलिए वह अमर है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 11 February 2025

शर्मिंदगी छिपाने केजरीवाल की हार पर खुश हो रही कांग्रेस


दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय  दुनिया भर में चर्चित हुई। मुफ्त बिजली - पानी, मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी विद्यालयों के उन्नयन जैसे कार्यक्रमों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिली। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल देखते - देखते नई राजनीतिक संस्कृति के प्रतीक बन गए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की  प्रतिबद्धता की वजह से उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन गई जो व्यवस्था बदलने सुविधा भरी ज़िंदगी छोड़ राजनीति की पथरीली राहों पर चल पड़ा। अन्ना हजारे जैसे  समर्पित व्यक्तित्व से जनसेवा की दीक्षा लेने वाले श्री केजरीवाल ने उनकी इच्छा के विरुद्ध सत्ता की दौड़ में शामिल होकर राजगद्दी भी हासिल कर ली। लगातार दो चुनावों में दिल्ली के मतदाताओं ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया और वह भी प्रचंड बहुमत के साथ। लेकिन लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं दी जो इस बात का संकेत थी कि दिल्ली की जनता को  राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रवेश  पसन्द नहीं था।लेकिन अरविंद के साथ परेशानी ये है कि वे अपने अलावा बाकी सभी को मूर्ख समझते हैं। और इसी सोच ने उन्हें  उस स्थिति में ला दिया जिसमें उनके राजनीतिक भविष्य पर ही आशंका व्यक्त की जाने लगी है। महत्वाकांक्षी होना बुरा नहीं किंतु अति हर चीज की बुरी होती है और वे अति महत्वाकांक्षा का शिकार हो गए। जनता से किये आसमानी वायदों को पूरा करने के प्रति ईमानदार रहने के बजाय उन्होंने राष्ट्रीय नेता बनने की इच्छा पाल ली । शराब नीति, मुख्यमंत्री के शासकीय निवास में करोड़ों रु. खर्च करना, यमुना की सफाई की अनदेखी जैसे तमाम मुद्दे उनके विरुद्ध होते गए किंतु उन्हें लगता रहा कि मुफ्त  बिजली - पानी और महिलाओं को निःशुल्क बस यात्रा जैसी सुविधाएं उनका बड़ा पार लगा देंगी। बीते दो चुनावों से वे इन्हीं के नाम पर जीत दर्ज करते रहे । इसलिए जब भाजपा और कांग्रेस ने भी वही सब बांटने का ऐलान किया तो जनता ने आम आदमी पार्टी से किनारा कर लिया। चुनाव में उसकी करारी हार का विश्लेषण करते हुए वे तमाम यू ट्यूबर पत्रकार भी उक्त कारण ही गिना रहे हैं, जो मतगणना  के एक दिन पहले तक कड़ी टक्कर के बावजूद आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी बताते नहीं थक रहे थे। सही बात तो ये है कि श्री केजरीवाल की राजनीति को चमकाने में उक्त यू ट्यूबरों की ही भूमिका रही। अब वही तबका उनकी गलतियों को प्रचारित कर निष्पक्ष होने का ढोंग कर रहा है। दिल्ली के चुनाव परिणाम को लेकर ये भी कहा जा रहा है कि केजरीवाल सरकार को सत्ता से हटवाकर कांग्रेस ने गोवा, गुजरात और हरियाणा की हार का बदला ले लिया। लेकिन ये प्रचार राहुल गाँधी को किरकिरी से बचाने के लिए किया जा रहा है। यदि निष्पक्ष विश्लेषण करें तो ये बात सामने आती है कि आम आदमी पार्टी सरकार तो अपनी विफलताओं और श्री केजरीवाल सहित कुछ अन्य  नेताओं के दामन पर लगे भ्रष्टाचार के कारण जनता का विश्वास खो बैठी किंतु श्री गाँधी के खुलकर मैदान में आने के बाद भी दिल्ली की जनता ने कांग्रेस को एक सीट लायक भी नहीं समझा । उसे उम्मीद थी कि वह अपने परंपरागत दलित और मुस्लिम वोट बैंक को दोबारा हासिल कर दिल्ली विधानसभा में अपना खाता खोल सकेगी। इस चुनाव का ये रोचक पहलू था कि तीन बार कांग्रेस सरकार की  मुख्यमंत्री रहीं स्व. शीला दीक्षित के कार्यकाल को हर किसी ने दिल्ली के विकास का  स्वर्णिम काल बताया। ऐसे में ये उम्मीद जागी कि उनके बेटे संदीप दीक्षित नई दिल्ली सीट पर श्री केजरीवाल को पराजित कर कांग्रेस को संजीवनी प्रदान करेंगे । उन्होंने  लगभग 4500 मत प्राप्त कर उनको हरवा तो दिया किंतु जीत का सेहरा भाजपा प्रत्याशी प्रवेश वर्मा के सिर बंधा। कहा जा रहा है कांग्रेस द्वारा काटे गए मतों के कारण आम आदमी पार्टी 14 सीटें हार गई परंतु इससे कांग्रेस को  तो कुछ हासिल नहीं हुआ। इस प्रकार इस चुनाव में केवल श्री केजरीवाल की पराजय ही नहीं हुई कांग्रेस भी चारों खाने चित्त हुई है। जम्मू कश्मीर  में श्री गाँधी के ढीले - ढाले रवैये पर उमर अब्दुल्ला की नाराजगी चुनाव के दौरान ही सुनाई दी थी। उसके बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भी वे मतदाताओं को कांग्रेस की तरफ आकर्षित नहीं कर सके। महाराष्ट्र में तो पार्टी का प्रदर्शन अब तक का सबसे दयनीय रहा। लेकिन दिल्ली में श्री गाँधी ने जिन तीखे तेवरों के साथ प्रचार शुरू किया उससे ऐसा लगा कि कांग्रेस शून्य की शर्मनाक स्थिति से उबरेगी । उन्होंने मुस्लिम बहुल सीटों में बड़ी सभाएँ भी कीं लेकिन वहाँ भी कांग्रेस को कुछ हासिल नहीं हुआ। कहने का आशय ये है कि लोकसभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के दम पर  नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद भी वे जनता के मन पर छाप छोड़ने में विफल रहे हैं। दिल्ली की सत्ता आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से छीनी थी किंतु बीते 12 साल में उसने कभी इस बात की इच्छा शक्ति नहीं दिखाई कि वह उसे दोबारा हासिल करना चाहती है। इस बार वोट काटकर आम आदमी पार्टी को हरवाने पर वह जिस तरह खुश हो रही है उससे तो यही लगता है उसमें जीतने का आत्मविश्वास ही खत्म हो चुका है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 10 February 2025

बीरेन का त्यागपत्र किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा


मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे ही दिया। पार्टी  नेतृत्व  पर बीरेन सिंह को हटाने का दबाव लंबे समय से  था किंतु  वह निर्णय को टालता रहा । भले ही बीरेन सिंह मैतेयी और कूकी समुदाय के बीच भड़की हिंसा को रोक पाने में विफल रहे हों किंतु जो हालात उच्च न्यायालय के एक  फैसले से उत्पन्न हुए उनमें अचानक मुख्यमंत्री को हटाये जाने से नई समस्याएं उत्पन्न हो सकती थीं। स्मरणीय है मार्च 2023 में  उच्च न्यायालय द्वारा मैतेई समुदाय को अनु. जनजाति का दर्जा देने की मांग पर जल्द विचार करने की अनुशंसा की गई। मैतेई  राज्य का बहुसंख्यक समुदाय है जो इंफाल घाटी सहित मैदानी इलाकों में बसा हुआ है। उसकी 90 फीसदी आबादी हिन्दू धर्मावलंबी है जिसे अनु.जनजाति में नहीं होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों रहने की अनुमति नहीं है जहाँ कुकी और नगा समुदाय का बाहुल्य है जो अनु. जनजाति में हैं। इनकी ज्यादातर आबादी बीते अनेक दशकों में ईसाई बन चुकी है। पड़ोसी म्यांमार से भी यहाँ आकर काफी लोग बसते गए। कुकी और नगा लोगों की ये शिकायत रही है कि मणिपुर में राजनीतिक दृष्टि से चूंकि मैतेई ताकतवर हैं इसलिए नौकरियों आदि में भी उन्हीं को प्राथमिकता मिलती है। उधर मैतेई समुदाय ये दबाव बनाता रहा है कि मणिपुर का अधिकांश क्षेत्र पहाड़ी है जहाँ उनके बसने पर रोक है जबकि कुकी और नगा आबादी कम है। मैदानी इलाकों में आबादी बढ़ने से मैतेई समुदाय जगह की कमी से जूझ रहा था । अनु. जनजाति में शामिल होने की मांग के पीछे पहाड़ी इलाकों में रहने की अनुमति मिलना ही मुख्य था। लेकिन कुकी और नगा इसका विरोध इसलिए करते आये थे क्योंकि हिन्दू धर्मावलंबी मैतेई यदि पहाड़ी क्षेत्रों में बसने लगे तो वहाँ ईसाई  मिशनरियों की गतिविधियों पर रोक लग जायेगी।  इसके अलावा ये इलाका ड्रग्स की तस्करी का बड़ा अड्डा है। उत्तर पूर्व के जिन  राज्यों में अलगावादी ताकतें सक्रिय हैं उन्हें म्यांमार से  हथियार और धन की आपूर्ति भी इसी रास्ते से होना बताया जाता है। यही वजह है कि उच्च न्यायालय का फैसला आते ही कुकी और नगा समुदाय उग्र विरोध पर आमादा हो गए । जिसकी प्रतिक्रिया मैतेई समुदाय द्वारा जवाबी कारवाई से हुई और देखते - देखते मणिपुर जातीय संघर्ष में इस हद तक विभाजित हो गया कि मैतेई और कुकी ने अपने - अपने प्रभावक्षेत्र बना लिए और  दूसरे समुदाय के व्यक्ति के अपने क्षेत्र में आते ही उसकी नृशंस हत्या करने तथा महिलाओं पर अमानुषिक अत्याचार करने में भी संकोच नहीं किया गया। इसमें  कौन सा पक्ष कितना दोषी था ये तय कर पाना बेहद कठिन है। यद्यपि लगभग एक वर्ष बाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले के उस हिस्से को अलग कर दिया जिसमें मैतेई समुदाय को अनु. जनजाति में शामिल करने की अनुशंसा थी। लेकिन तब तक मणिपुर पूरी तरह जातीय  हिंसा की चपेट में आ चुका था। मुख्यमंत्री पर ये आरोप लगता रहा कि उन्होंने मैतेई समुदाय को संरक्षण प्रदान किया ।सरकार के सामने सेना के जरिये हालात काबू करने का विकल्प था किंतु जिस  कारण से छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के विरुद्ध सैन्य ऑपरेशन से परहेज किया गया उसी नीति के तहत कुकी और नगा बाहुल्य वाले पहाड़ी क्षेत्र में सैन्य कारवाई करने से बचा गया। जो जानकारी आ रही है उसके अनुसार भारत में अस्थिरता फैलाने की इच्छुक विदेशी ताकतें मणिपुर के घने जंगलों से घिरे पहाड़ी इलाके को ड्रग कारोबार का अंतर्राष्ट्रीय केंद्र बनाने की कोशिश में जुटी हुई हैं। अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता आने के बाद  ड्रग कारोबारियों को नये अड्डे की जरूरत थी। ऐसे में कुकी और नगा भी अपने प्रभाव वाले इलाकों में मैतेई आबादी के बसने का वैसे ही विरोध करने लगे जैसे कश्मीर घाटी में भारत के अन्य हिस्सों के लोगों का किया जाता रहा । ये देखते हुए मणिपुर की समस्या केवल मुख्यमंत्री बदलने से हल होने वाली नहीं थी। इसीलिए केंद्र सरकार ने  अब तक धैर्य रखा क्योंकि लोकसभा चुनाव के पहले कोई बड़ा कदम उठाने से वह बचना चाह रही थी। तीसरी पारी में  बहुमत से वंचित रह जाने के कारण  नरेंद्र मोदी ने कुछ राज्यों के चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के बाद मणिपुर की समस्या हल करने की तैयारी की जिसके पहले चरण के तौर पर दिसंबर 2024 में राज्यपाल पद पर किसी राजनेता की नियुक्ति की बजाय पूर्व गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को तैनात किया जो इस राज्य में जातीय हिंसा भड़कने के समय भी केंद्र में गृह सचिव थे और गृह मंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। उस नियुक्ति के चंद महीनों के भीतर ही मुख्यमंत्री का त्यागपत्र किसी बड़ी कार्य योजना का हिस्सा प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री इस समय राजनीतिक तौर पर पुरानी स्थिति में लौट आये हैं और आगामी अनेक महीनों तक किसी राज्य में चुनाव भी नहीं है। इसलिए मणिपुर के बारे में  किसी बड़े फैसले की उम्मीद की जा सकती है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Sunday, 9 February 2025

दिल्ली के नतीजों के बाद इंडिया गठबंधन का भविष्य अधर में

      दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार विजय के बाद राष्ट्रीय राजनीति में नये समीकरण बनने के आसार हैं। आम आदमी पार्टी से सहानुभूति रखने वाले ये रोना रो रहे हैं कि कांग्रेस ने उसे 14 सीटें हरवा दीं जिनमें अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे दिग्गज भी हैं। वहीं कांग्रेस ये प्रचार करवा रही है कि आम आदमी पार्टी अपने गिरेबान में झांके जिसने गोवा, गुजरात और हरियाणा में अपने  उम्मीदवार उतारकर उसको जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। ये बात भी कही जा रही है कि आम आदमी पार्टी के हारने से दिल्ली में कांग्रेस के दोबारा खड़े होने की संभावना बढ़ गई है। यद्यपि किरकिरी कांग्रेस की भी जमकर हुई क्योंकि राहुल गाँधी के खुलकर मैदान में उतरने के बाद भी 2015 और 2020 की तरह इस बार भी वह शून्य पर ही अटकी रही।

        रोचक बात ये रही कि दिल्ली के चुनाव ने इंडिया गठबंधन की अंतर्कलह को भी सार्वजनिक कर दिया। तृणमूल कांग्रेस, सपा और शिवसेना ( उद्धव) ने ऐलनिया आम आदमी पार्टी का समर्थन किया जबकि लालू यादव की राजग कांग्रेस के साथ खड़ी नजर आई। हालांकि लोकसभा चुनाव में दिल्ली में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ी आम आदमी ने नतीजे आते ही विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की इकतरफा घोषणा कर दी। इसके बाद हरियाणा में उसने प्रत्याशी अड़ाकर कांग्रेस की उम्मीदों पर झाड़ू फेर दी और जम्मू कश्मीर में भी   एकला चलो की नीति अपनाई। महाराष्ट्र चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन में नेतृत्व का विवाद खड़ा हो गया। उमर अब्दुल्ला ने उसे भंग करने जैसा तंज तक कसा। तेजस्वी यादव भी बोल उठे वह तो लोकसभा चुनाव तक ही था।

     इधर दिल्ली चुनाव में राहुल और अरविंद ने एक दूसरे पर  जो जहर बुझे तीर छोड़े उनकी वजह से कटुता चरम पर जा पहुंची । अब सत्ता हाथ से खिसक जाने के बाद श्री केजरीवाल दोबारा कांग्रेस के साथ बैठेंगे या नहीं ये बड़ा सवाल है। इसके अलावा  इंडिया गठबंधन में अन्य घटक दलों के सामने भी ये  दुविधा है कि वे आम आदमी पार्टी को साथ रखें या कांग्रेस को? हरियाणा और महाराष्ट्र की पराजय के बाद जहाँ राहुल गाँधी की लोकप्रियता और चुनाव जिताऊ क्षमता पर उंगलियाँ उठीं वहीं दिल्ली में सूपड़ा साफ होने के बाद वही स्थिति अरविंद केजरीवाल की हो गई। ये दोनों इंडिया गठबंधन में एक साथ रहेंगे ये बेहद मुश्किल होगा क्योंकि कांग्रेस के मन  में ये बात घर कर चुकी है कि दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने ही उसे सत्ता से बेदखल किया था । साथ ही कुछ दूसरे राज्यों में वह कांग्रेस की पराजय का कारण बनी।

दिल्ली के बाद अब बिहार विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। वहाँ मुख्य रूप से तो लालू की राजग और कांग्रेस का गठबंधन है किंतु सपा तथा वामपंथियों सहित अन्य विपक्षी पार्टियां भी अपनी हिस्सेदारी मांगेगी। कांग्रेस वहाँ लालू के सहारे है। चूंकि हरियाणा , महाराष्ट्र और दिल्ली में उसका प्रदर्शन बेहद दयनीय रहा इसलिए तेजस्वी भी राहुल को कितना भाव देंगे ये कहना मुश्किल है। प. बंगाल में तो ममता बैनर्जी किसी को पाँव तक रखने नहीं देतीं।

      उ.प्र के मिल्कीपुर विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल कर अखिलेश यादव की भी फजीहत कर दी। कुछ समय पूर्व हुए 9 विधानसभा उपचुनावों में 7 जीतकर योगी आदित्यनाथ अपना जलवा बिखेर चुके हैं। मिल्कीपुर की विजय ने राज्य में उनकी पकड़ और मजबूत कर दी जिससे अखिलेश का कद बौना हुआ है।

      ये देखते हुए इंडिया गठबंधन का भविष्य भी अधर में है क्योंकि शरद पवार और उद्धव ठाकरे की चिंता अपनी बची हुई पार्टी को बिखरने से बचाना है। वहीं दिल्ली के परिणाम ने  श्री केजरीवाल के पर कतर दिये जिसके बाद वे अपने घर को संभालने में जुटेंगे क्योंकि कल दोपहर से ही पंजाब में आदमी पार्टी में टूटन की आशंका व्यक्त होने लगी है।

  सबसे बड़ी बात लोकसभा चुनाव के बाद हुए राज्यों के चुनावों में  कांग्रेस के घटिया प्रदर्शन के बाद गठबंधन में  राहुल का दबदबा कम हो जाना है जिसके कारण कांग्रेस मुखिया की हैसियत खो बैठी है।

    आने वाले कुछ महीने विपक्ष की राजनीति में बड़े बदलाव के साक्षी बनेंगे क्योंकि भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व लोकसभा में बहुमत से चूक जाने के बाद बेहद सवधानी से आगे बढ़ रहा है। तीन राज्यों में बड़ी जीत हासिल करने के बाद अब एनडीए में मोदी - शाह की वजनदारी और बढ़ गई है। बिहार में नीतीश कुमार भी अब ज्यादा सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं हैं। लालू कुनबे को भी भय है उसे   भी श्री केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे जेल न जाना पड़े। 


- रवीन्द्र वाजपेयी