छ समय पहले कांग्रेस नेता राहुल गाँधी सौंदर्य प्रतियोगिताओं में किसी दलित या ओबीसी युवती के विजेता न बनने का मुद्दा उठाकर हंसी का पात्र बने थे। उसके पहले केंद्रीय बजट बनाने वाले अधिकारियों के दल में जातियों के प्रतिनिधित्व का सवाल भी उन्होंने लोकसभा में उठाया था। उन बातों से जनता कितनी प्रभावित हुई इसका मोटा - मोटा अंदाज तो हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी पराजय से मिल गया। लेकिन पार्टी के एक नेता उदित राज जरूर श्री गाँधी का अनुसरण करते हुए इस तरह के बयान देकर सुर्खियों में आते रहते हैं। ऑपरेशन सिंदूर पर उन्होंने ये कहकर विवाद पैदा किया कि इसका नाम कुछ और रखा जाना चाहिए था क्योंकि सिंदूर एक खास धर्म से जुड़ा नाम है। इसी क्रम में उन्होंने गत दिवस अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से अंतरिक्ष यात्रा पर गए भारतीय अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला के चयन पर ऐतराज जताते हुए कहा कि उनकी जगह किसी दलित अथवा ओबीसी को भेजा जाना चाहिए था। उल्लेखनीय है शुभांशु मिशन पूरा कर अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से गत दिवस वापस लौट आए । उनकी सकुशल वापसी पर पूरा देश खुश है। लेकिन श्री राज ने अपने बयान में कहा कि जब राकेश शर्मा अंतरिक्ष भेजे गए थे, उस समय दलित और ओबीसी समाज के लोग उतना पढ़े-लिखे नहीं थे । इसलिए इस बार शुभांशु की जगह किसी दलित या ओबीसी व्यक्ति को अंतरिक्ष में भेजना चाहिए था। उदित राज भारतीय राजस्व सेवा में अधिकारी रहने के बाद राजनीति में आये और अपनी पार्टी बनाई। 2014 में भाजपा में शामिल होने के बाद दिल्ली की सुरक्षित सीट से लोकसभा के लिए चुने गए। लेकिन दोबारा टिकिट नहीं मिलने पर पार्टी छोड़ दी और आजकल कांग्रेस में हैं। केन्द्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते - करते अनेक अवसरों पर वे अवांछित टिप्पणी करने के कारण विवादास्पद होते रहे हैं। भाजपा यदि उनको सांसद बनाती रहती तब शायद वे प्रधानमंत्री का गुणगान करते घूमते। कांग्रेस में भी एक किनारे पड़े है इसलिए बयानों के जरिये अपनी कुंठा व्यक्त करना उनका काम रह गया है। अंतरिक्ष में शुभांशु शुक्ला के बजाय किसी दलित अथवा ओबीसी को भेजे भेजे जाने जैसा सवाल उठाकर उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी द्वारा खींची गई लकीर को ही आगे बढ़ाया है । लेकिन ऑपरेशन सिंदूर जैसे राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े विषय में भी जिस इंसान को धर्म विशेष नजर आया उसकी मानसिकता का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। अंतरिक्ष के अभियान पूरी तरह वैज्ञानिक और तकनीकी दक्षता से जुड़े होते हैं। इससे जुड़े किसी भी व्यक्ति का चयन जाति या धर्म के आधार पर करने की बात सोचना ही हास्यास्पद है। और फिर शुभांशु जिस मिशन पर गए थे वह अंतर्राष्ट्रीय था जिसमें भारत की हिस्सेदारी महज अंतरिक्ष यात्री भेजने तक सीमित थी। निकट भविष्य में जिस महत्वाकांक्षी गगन यान परियोजना पर इसरो काम कर रहा है उसके लिए शुभांशु द्वारा अंतरिक्ष में किये गए प्रयोग बेहद उपयोगी होंगे। और उनकी यह यात्रा मुफ्त में नहीं हुई। उस पर भारत ने अरबों रुपए का शुल्क चुकाया है। अच्छा होता शुभांशु की उपलब्धियों और उनसे भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को मिलने वाले लाभ की चर्चा हो जिससे अधिकतम युवा इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हों। यदि अंतरिक्ष कार्यक्रम जैसे अति तकनीकी क्षेत्र को भी जाति जैसे विवादों में उलझाया जाएगा तब उसकी दुर्गति को कोई नहीं रोक पाएगा। आज भी इसरो में तमाम ऐसे वैज्ञानिक और तकनीशियन कार्यरत हैं जो ऊँची जाति के नहीं हैं किंतु उनकी पहिचान और प्रतिष्ठा उनकी जाति से नहीं अपितु उनके काम पर आधारित है। उदित राज जैसे और भी लोग सार्वजनिक जीवन में हैं जो दलितों और पिछड़ों की आड़ लेकर अपना महत्व बढ़ाने में लगे हुए हैं। हालांकि श्री राज ने शुभांशु को शुभकामना तो दी किंतु उनकी जाति का विवाद पैदा कर दूध में नींबू निचोड़ने की हरकत भी कर डाली। बेहतर तो यही होता कि कांग्रेस उनके बयान की निंदा करते हुए हिदायत देती कि वे भविष्य में इस तरह के बयानों और टिप्पणियों से परहेज करें। लेकिन सवाल ये है कि जब श्री गाँधी खुद ही जाति को लेकर ऊलजलूल बयानबाजी किया करते हैं तब बाकी पार्टी जनों को भला कौन रोक सकेगा?
Wednesday, 16 July 2025
Tuesday, 15 July 2025
अन्य पार्टियों से आये लोगों से निपटना खंडेलवाल के लिए चुनौती
म.प्र भाजपा का सबसे पुराना गढ़ है। आज भी जिन राज्यों में पार्टी का जनाधार कमजोर है वहाँ के नेताओं को इस प्रदेश से राज्यसभा में भेजा जाता रहा। ये सिलसिला आज भी जारी है। तमिलनाडु और केरल के कुछ ऐसे नेता भी म.प्र से संसद के उच्च सदन में भेजे गए जिनका नाम भी कम ही लोगों को याद होगा। डा. वसंत कुमार पंडित, कर्नाटक केसरी जगन्नाथ राव जोशी, उद्योगपति रामनाथ गोयनका और सुषमा स्वराज तो अन्य राज्यों से आकर यहाँ लोकसभा चुनाव तक जीतकर गईं। केरल के ओ. राजगोपाल राज्यसभा पहुंचकर केन्द्र में मंत्री तक बने। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और भैरोसिंह शेखावत ने भी म.प्र के रास्ते राज्यसभा की सदस्यता हासिल की। जब लोकसभा में जनसंघ के मुट्ठी भर सांसद होते थे तब भी म.प्र की हिस्सेदारी सर्वाधिक थी। 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन कर पूरे देश को चौंका दिया। 2003 से केवल 15 माह की कमलनाथ सरकार को छोड़कर लगातार भाजपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज है। स्थानीय निकायों में भी ज्यादातर में उसका ही राज है। जाहिर है ये स्थिति इसलिए बन सकी क्योंकि पार्टी का संगठन बेहद मजबूत है। सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के बाद कोई भी पार्टी अलोकप्रिय होने लगती है। 2018 में प्रदेश की जनता ने भाजपा को भी झटका दे दिया था। हालांकि 2020 में ही पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली किंतु उसका श्रेय ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिला जिन्होंने दो दर्जन विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी। लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सत्ता पर कब्जा बरकरार रखा और उसके कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में तो सभी 29 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। इन परिस्थितियों में पार्टी संगठन के मुखिया का दायित्व जिन हेमंत खंडेलवाल के कंधों पर आया उनके शुरुआती तेवरों से ये लग रहा है कि वे संगठन में किसी भी प्रकार की सुस्ती को सहन नहीं करेंगे । गत दिवस भोपाल में पार्टी के दायित्ववान नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ परिचयात्मक सम्मेलन के दौरान उनकी हिदायतें किसी चेतावनी से कम नहीं थीं। इसे संगठन का नया ढांचा खड़ा करने की कवायद भी कहा जा सकता है। उल्लेखनीय है श्री खंडेलवाल का ये कहना भी महत्वपूर्ण है कि उनके परिवार में अकेले वही राजनीति में हैं लिहाजा उनके परिजनों के किसी दबाव में न आयें। दरअसल ऐसा कहकर उन्होंने पार्टी के नेताओं विशेष रूप से जनप्रतिनिधियों को ये संदेश दे दिया कि वे अपने परिवार वालों को शासन और संगठन के काम में अनुचित दखल देने से रोकें। आजकल पूरे प्रदेश से इस प्रकार की खबरें आ रही हैं कि भाजपा नेताओं के रिश्तेदार चाहे जहाँ रौब झाड़ते रहते हैं। मारपीट भी आम हो चली है। सरकारी दफ्तरों में आये दिन भाजपा नेताओं के नाते - रिश्तेदार अभद्रता करते देखे जाते हैं। इसके कारण सरकार और संगठन दोनों की छवि खराब हो रही है। नये प्रदेश अध्यक्ष ने ऐसे लोगों को चेतावनी दी है। लेकिन भाजपा अब जनसंघ वाले दौर से बाहर आ चुकी है। उसमें अन्य पार्टियों से भी बड़ी संख्या में लोगों की आवक हुई है। उनमें से अनेक लोगों को सत्ता और संगठन दोनों में जगह दी गई। ये लोग भाजपा की संस्कृति में रचे - बसे नहीं होने से पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर देते हैं। इन लोगों से निपटना श्री खंडेलवाल के लिए बड़ी चुनौती होगी। हालांकि अब तक उन्होंने जो संकेत दिये उनसे लगता है कि वे सख्ती से पेश आयेंगे। यदि वे जनसंघ के समय का अनुशासन लागू कर सके तो इससे कुछ लोगों को तकलीफ भले हो किंतु पार्टी के भविष्य के लिए शुभ होगा। श्री खंडेलवाल को विरासत में उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ दोनों मिली हैं। अब तक वे परदे के पीछे रहकर काम करते रहे किंतु अब संगठन के शीर्ष पद पर बैठने का अवसर उन्हें मिला है । इसका वे कैसे उपयोग करते हैं इस पर उनका और प्रदेश में पार्टी दोनों का भविष्य निर्भर करेगा।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Monday, 14 July 2025
मानसून की मेहरबानी बनी परेशानी
पूरे देश में इन दिनों अच्छी बरसात होने से मौसम खुशनुमा हो गया है। जिन इलाकों में अमूमन कम वर्षा होती थी वहाँ भी इस साल मानसून मेहरबान है। जल ही जीवन है इसलिए बरसात का सभी स्वागत करते हैं। भारत में मानसूनी बरसात न सिर्फ कृषि अपितु अगले साल बरसात आने तक पेय जल की आपूर्ति को सुनिश्चित करता है। नदियों के अलावा कुए, तालाब आदि भी मानसून के भरोसे ही रहते हैं। आजकल ट्यूब वेल का जमाना है जिसके लिए भूजल का स्तर बेहद आवश्यक होता है और वह भी अच्छी बरसात पर ही निर्भर है। बरसाती पानी को सहेजने के लिए छत के पानी का संचयन ( रूफ टॉप वाटर हार्वेस्टिंग) का प्रचलन भी बढ़ा है किंतु इसका प्रतिशत जरूरत से बहुत कम है। दूसरी तरफ बढ़ता शहरीकरण पुराने तालाब, कुए, बाग - बगीचों की बलि लेता जा रहा है। कच्ची जगहें कम होने से धरती की पानी सोखने की मात्रा भी निरंतर कम होती जा रही है। शहरों और गाँवों के बीच की दूरी घटते जाने से प्राकृतिक जंगलों की जगह कांक्रीट के विशालकाय ढांचे उग आए हैं। शहरों के साथ ही गाँव में भी घनी बसाहट दिखाई देने लगी है। इसका परिणाम अब वहाँ का खुलापन खत्म होने के कगार पर है। शहरी रहन - सहन अपनाने के कारण ग्रामीण समाज भी उन सभी बुराइयों को अपनाता जा रहा है। यही वजह है कि बरसात के आंकड़ों के साथ ही ये खबरें भी लगातार आ रही हैं कि सब दूर पानी भर रहा है। नदियों में बाढ़ है। पुल डूब रहे हैं, सड़कों पर पानी भरा होने से आवागमन बाधित हो रहा है। घरों और बस्तियों में पानी भरना आम हो गया है। पानी की निकासी के सारे प्रबंध दम तोड़ चुके हैं । ग्रामीण और कस्बों को छोड़ भी दें किंतु जिन शहरों को विकास का प्रतीक माना जाता है वे भी घंटे भर की बरसात में लबालब हो जाते हैं। देश की राजधानी दिल्ली हो या आर्थिक राजधानी मुंबई सभी में बरसात बड़ी समस्या बन जाती है। गुड़गांव और बेंगुलूरु सायबर सिटी के रूप में भले ही दुनिया भर में प्रसिद्ध हों किंतु बरसात में इन दोनों की दुर्गति हो जाती है। इस साल जो खबरें आ रही हैं उनके अनुसार तो पूरे देश की स्थिति एक जैसी है। ये देखते हुए कहा जा सकता है कि विकास की अंधी दौड़ में जल निकासी के बारे में समुचित ध्यान नहीं दिया गया। नगरीय निकायों में व्याप्त भ्रष्टाचार और भूमाफिया के साथ संगामित्ति ने स्थितियाँ चिंताजनक बना दी हैं। इस हालत के लिए राजनेताओं को भी जिम्मेदार मानना होगा क्योंकि भूमाफिया को संरक्षण के अलावा विकास कार्यों में होने वाले भ्रष्टाचार को बजाय रोकने के उल्टे वे उसे प्रोत्साहित करते हैं। आज शहरों का जो अनियोजित विकास हुआ उसमें बड़ी भूमिका राजनीतिक नेताओं की है। इस सबके कारण बरसात मुसीबत बन जाती है। इसमें कमी या विलंब जहाँ चिंता उत्पन्न करता है वहीं भरपूर बरसात भी परेशानी का सबब बन जाती है। इस वर्ष मानसून ने पूरे देश पर मेहरबानी की है। अब तक के आंकड़े दर्शाते हैं कि इस साल औसत से अधिक पानी बरसेगा जिससे जल स्रोत लबालब हो जाएंगे किंतु बाढ़ और जल प्लावन ने सोचने बाध्य कर दिया है। शहरों के साथ ही ग्रामीण विकास पर प्रति वर्ष अरबों - खरबों खर्च होते हैं। बिजली ,पानी ,सड़क जैसी सुविधाएं सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचाने का काम हो रहा है। लेकिन बरसात में उत्पन्न होने वाली इस समस्या के निदान के बारे में सोचने की फुर्सत किसी को नहीं है। जल प्लावन से जन हानि भी होती है। देश में सैकड़ों लोग डूबकर मर गए, पानी भरने से लोगों का जो नुकसान हुआ उसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता। इससे बढ़कर सड़कों आदि को जो क्षति पहुंचती है वह विकास के पहिये को उल्टी दिशा में घुमा देती है। हमारे देश में आग लगने पर कुआ खोदने की सुध आने की उक्ति काफी प्रचलित है । इसी तरह जब जल प्लावन होता है तब कुछ दिन आपदा प्रबंधन नजर आता है और बाद में सब भुला दिया जाता है। इस साल की हालत से सबक लेकर भविष्य के लिए यदि समुचित व्यवस्थाएँ की जाएं तो देश को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। साथ ही डूबने से होने वाली मौतें भी रोकी जा सकती हैं।
-रवीन्द्र वाजपेयी
Saturday, 12 July 2025
डोभाल की चुनौती एक तीर से दो निशाने
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल राजनीतिक व्यक्ति नहीं हैं। एक शासकीय अधिकारी के तौर पर उन्होंने विभिन्न दायित्वों का निर्वहन अत्यंत कुशलता के साथ किया। पाकिस्तान में राॅ के एजेंट के तौर पर भी रहे। उत्तर पूर्वी राज्यों में उग्रवादी संगठनों को शांति के रास्ते पर लाने में भी उनकी भूमिका सराहनीय रही। आम तौर पर वे बयानबाजी से दूर ही रहते हैं। जम्मू - कश्मीर से धारा 370 हटाने में उन्होंने जो जमीनी काम किया वह ऐतिहासिक कहा जाएगा। जब पूरी कश्मीर घाटी में जबरदस्त तनाव था तब वे लोगों के बीच घूमकर उस निर्णय के फायदों से लोगों को अवगत कराने का साहसिक प्रयास कर रहे थे। बीते 10 वर्षों में भारतीय सुरक्षा तंत्र जिस तरह मजबूत हुआ उसमें बतौर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया। अनेक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मिशनों पर प्रधानमंत्री के साथ उनकी उपस्थिति काफी कुछ कह जाती है। यही वजह है कि चाहे बाह्य सुरक्षा हो या आंतरिक, श्री डोभाल उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े रहते हैं। इसलिए उनकी किसी भी बात में वजन होता है। गत दिवस उन्होंने चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान विदेशी मीडिया को चुनौती दी कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की किसी भी संरचना को हुए नुकसान का एक भी चित्र दिखाएं। साथ ही उन्होंने इस दावे को दोहराया कि भारत ने पाकिस्तान में जितने भी ठिकानों पर हमला किया उनमें से एक भी निशाना नहीं चूका। श्री डोभाल के अनुसार 7 मई की रात मात्र 23 मिनिट में ही हमारी सेना अपना काम पूरा कर चुकी थी। आई.आई.टी चेन्नई के दीक्षा समारोह में दिये गये भाषण में श्री डोभाल द्वारा कही गईं उक्त बातों से पाकिस्तान को मिर्ची लग गई। उसके एक सरकारी प्रवक्ता ने संघर्ष के महिमामंडन की आलोचना भी कर डाली। दरअसल सुरक्षा सलाहकार ने उन विदेशी समाचार माध्यमों को कटघरे में खड़ा किया जिन्होंने आपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा भारत को नुकसान पहुंचाए जाने के दावों को बढ़ा - चढ़ाकर प्रचारित किया। लेकिन दुख इस बात का है कि हमारे देश में ही विपक्ष के अनेक नेता और मोदी विरोध में लिप्त कतिपय यू ट्यूबर इस बात की रट लगाए रहे कि पाकिस्तान की जवाबी कारवाई में भारत को बहुत नुकसान हुआ। ऐसे समय जब सेना का मनोबल बढ़ाने की जरूरत थी तब ये वर्ग सरकार से ऐसे सवाल पूछने में लगा रहा जो न सिर्फ अनावश्यक अपितु आपत्तिजनक भी थे। विदेशी समाचार माध्यमों की पाकिस्तान समर्थक खबरों को सही मानकर सेना और सरकार दोनों को घेरने का प्रयास अभी भी चला आ रहा है। ये देखते हुए श्री डोभाल ने विदेशी समाचार माध्यमों को जो चुनौती दी है उसका निशाना भारत में ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बजाय पाकिस्तान के झूठे दावों को सही मानने वाले उन लोगों पर भी है जिनका काम देश का मनोबल तोड़कर अपना उल्लू सीधा करना मात्र रह गया है। उनसे ये अपेक्षा कोई नहीं करता कि वे सरकार के सभी कार्यों और फैसलों का समर्थन करें किंतु जब हमारी सेना ने दुश्मन की कमर तोड़कर रख दी तब बजाय उसके पराक्रम की प्रशंसा करने के दुश्मन देश द्वारा हाँकी जा रही डीगों को सही मानकर अपनी सेना की वीरता को कमतर आंकना बेहद गैर जिम्मेदाराना है। सरकार ने ऐसे सवालों का जवाब न देकर ठीक किया क्योंकि सेना से जुड़े मामलों में सार्वजनिक चर्चा करना उचित नहीं होता। श्री डोभाल ने विदेशी समाचार माध्यमों को चुनौती देने का जो साहस दिखाया उससे पाकिस्तान का भड़कना साबित करता है कि उनकी चुनौती में दम है। लेकिन अपने देश में बैठे उस तबके पर इसका कोई असर होगा ये कहना मुश्किल है क्योंकि जो लोग सेना से सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांग सकते हैं उनसे किसी परिपक्वता की उम्मीद करना व्यर्थ है।
- रवीन्द्र वाजपेयी
Friday, 11 July 2025
विदेशी नागरिकों को मतदाता बनने से रोकना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी
Thursday, 10 July 2025
पुराने पुलों की मजबूती और भार क्षमता की जाँच जरूरी
गुजरात में बड़ौदा और आणंद को जोड़ने वाला चार दशक पुराना गंभीरा पुल ढह जाने से उस पर चल रहे कुछ वाहन नीचे बह रही नदी में गिर गए। अब तक 15 शव निकाले जा चुके हैं जबकि बाकी की तलाश जारी है। बरसात के कारण नदी में बहाव काफी तेज होने से बचाव दलों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जो जानकारी मिली उसके अनुसार इस पुराने पुल की गत वर्ष मरम्मत होने के बाद इंजीनियरों द्वारा तकनीकी तौर पर इसे पूरी तरह से दुरुस्त मान लेने पर ही दोबारा यातायात के लिए खोला गया। क्षेत्रीय विधायक के अनुसार तो पुल की मरम्मत के उपरांत उसका उपयोग शुरू करने संबंधी अनुपति बाकायदा मुख्यमंत्री कार्यालय से मिली थी। एक साल के भीतर ही पुल के बीच से टूट जाने से ये आशंका उत्पन्न हुई है कि मरम्मत का काम स्तरहीन था और जिस ठेकेदार ने वह काम किया उसकी उन इंजीनियरों से सांठगांठ थी जिन्होंने उसके काम को सही होने का प्रमाणपत्र दिया। जाँच का मुद्दा ये भी है कि चालीस साल पुराना वह पुल दोबारा उपयोग करने योग्य था भी या नहीं? बढ़ते यातायात को देखते हुए उसकी क्षमता का परीक्षण हुआ या नहीं , ये भी बड़ा सवाल है। एक - दो वर्ष पूर्व भी गुजरात के एक पर्यटन स्थल पर मरम्मत के बाद खोले गए पुल पर भीड़ बढ़ जाने से वह गिर गया जिसमें दर्जनों लोग मारे गए थे। हालांकि इस तरह के हादसे पूरे देश में होते हैं। बिहार में तो हालिया वर्षों में अनेक निर्माणाधीन पुल टूटकर गिर गए। इन घटनाओं में इक्का - दुक्का के पीछे तकनीकी या प्राकृतिक कारण हो सकता है किंतु अधिकांश में भ्रष्टाचार ही मुख्य रूप से होता है। इंजीनियरों के साथ मिलीभगत से घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग होने के अलावा डिजाइन संबंधी खामियां भी वजह बनती है। संबंधित शासकीय विभागों के अमले द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही का उदाहरण हाल ही में भोपाल में बने एक पुल से मिला जिसमें 90 अंश का मोड़ बना दिया गया। गुजरात के ताजा हादसे के बाद हालांकि सरकारी निर्माणों में होने वाला भ्रष्टाचार रुक जाएगा इसकी उम्मीद करना अपने आप को धोखे में रखना है क्योंकि राज्य कोई भी हो और सत्ता किसी भी पार्टी की हो , सरकार द्वारा करवाये जाने वाले निर्माण में गुणवत्ता का 100 फीसदी पालन होना असंभव है जिसका एकमात्र कारण है भ्रष्टाचार । सरकारी अमला और ठेकेदार की संगमित्ती को सत्ताधीशों का संरक्षण मिलता है । इसीलिए ऐसी घटनाओं के लिए दोषी करार दिये गए लोग या तो बच निकलते हैं या उन्हें दी जाने वाली सजा उनके अपराध की तुलना में बेहद मामूली होती है। इसीलिए भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्र और ठेकेदार रूपी व्यवस्था के मन में कोई खौफ नहीं रहता। हर वर्ष इस तरह के हादसों में अरबों - खरबों की आर्थिक क्षति होने के साथ ही दर्जनों लोगों को बिना किसी कसूर के जान गंवानी पड़ती है जिसकी क्षतिपूर्ति सरकार द्वारा दिये जाने वाले मुआवजे से नहीं हो सकती। गुजरात में गंभीरा पुल गिरने की जांच से दुर्घटना का सही कारण सामने आना मुश्किल है क्योंकि जाँच करने वाले दूध के धुले होंगे इसमें संदेह बना रहेगा। एक और सवाल इस हादसे के संदर्भ में उठना स्वाभाविक है कि समय - समय पर पुराने हो चुके पुलों की क्षमता का सही आकलन क्यों नहीं होता? गंभीरा पुल कहने को तो महज चार दशक पुराना बताया जा रहा है किंतु ऐसा लगता है उसकी मूल डिजाइन और मजबूती आज के यातायात का दबाव सहने में सक्षम नहीं है। ऐसे में उसकी मरम्मत होने के बाद दोबारा आवागमन के लिए खोलने से पूर्व जो जाँच हुई उसमें बेईमानी की किये जाने की आशंका है। इसलिए इस हादसे की जाँच किसी ऐसी एजेंसी से करवाया जाना चाहिए जिसकी पेशेवर ईमानदारी पर उंगली न उठ सके। केन्द्र सरकार को इस मामले में पहल करनी चाहिए। इस दुर्घटना से सबक लेकर देश भर में उन छोटे - बड़े पुलों की जाँच करवाई जाए जो दो - तीन दशक पुराने हो चले हैं और बढ़ते यातायात का बोझ सहने में अक्षम प्रतीत होते हैं।
- रवीन्द्र वाजपेयी