Saturday, 23 August 2025

भारत, रूस और चीन की मोर्चेबंदी ने ट्रम्प की हेकड़ी निकाल दी

रिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का जोश विगत कुछ दिनों से ठण्डा पड़ता जा रहा है। 15 अगस्त को  बातचीत हेतु  रूसी राष्ट्रपति पुतिन द्वारा अलास्का आने की सहमति प्रदान करने पर ट्रम्प यह मुगालता पाल बैठे कि वे रूस और यूक्रेन के बीचयुद्ध रुकवाकर नोबल शांति पुरस्कार हेतु अपना दावा और पुख्ता कर लेंगे। हालांकि इस युद्ध की शुरुआत तो 2014 में रूस द्वारा यूक्रेन के क्रीमिया बंदरग़ाह पर जबरन कब्जे से हो गई थी किंतु फरवरी 2022 में यूक्रेन के दो प्रमुख प्रांतों पर दावा ठोंकने के बाद रूस ने बड़े पैमाने पर सैन्य कारवाई करते हुए उसके लगभग 20 फीसदी भूभाग पर आधिपत्य कायम कर लिया। ट्रम्प का दावा था वे दोनों देशों को जमीन की अदला - बदली करने के लिए राजी कर युद्ध रोकने के लिए तैयार कर लेंगे। वार्ता के पहले उनके कुछ बयानों से लगा कि वे पुतिन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में कामयाब हो जाएंगे। उन्होंने कूटनीतिक शिष्टाचार की उपेक्षा करते हुए ये धमकी तक दे डाली कि  पुतिन नहीं माने तो वे भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ  के फैसले को लागू कर देंगे। स्मरणीय है ट्रम्प  ये दबाव बनाते आ रहे हैं कि भारत  रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दे । 2022 में रूस ने यूक्रेन पर जब हमला किया तब अमेरिका और उसके समर्थक देशों ने उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिये ताकि उसका निर्यात रुक जाए किंतु पुतिन ने चीन और भारत को सस्ते दाम पर कच्चा तेल बेचना शुरू कर दिया। ट्रम्प का कहना है इससे मिलने वाले धन से ही रूस को  युद्ध लम्बा खींचने में मदद मिली। चीन पर तो अमेरिका का बस चलता नहीं इसलिये उसने भारत को कमजोर समझकर दबाने का प्रयास किया। अलास्का वार्ता के पूर्व आया उनका ये बयान काफी  चर्चित हुआ कि भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी के कारण ही पुतिन बातचीत के लिए राजी हुए। इन सब बातों से ऐसा लगने लगा कि पुतिन वाकई अमेरिका के दबाव में आकर युद्ध रोकने तैयार हो जाएंगे। लेकिन अलास्का  वार्ता के पहले  ही यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ये कहकर ट्रम्प को झटका दिया कि उनकी अनुपस्थिति में किया कोई फैसला उन्हें मंजूर नहीं। रूस के साथ जमीन की अदला - बदली के सुझाव को भी उन्होंने पूरे तौर पर खारिज कर दिया। लेकिन उनकी सबसे ज्यादा किरकिरी भारत ने कर दी। ट्रम्प ने अपने मन से ही ये कहना शुरू कर दिया कि अमेरिका के दबाव में भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया । लेकिन भारत ने  खरीदी और बढ़ाने के साथ ही खुलकर कह दिया कि उसे जहाँ से सस्ता तेल मिलेगा वह खरीदना जारी रखेगा। ट्रम्प को और बड़ा झटका तब लगा जब रूस और चीन ने  भारत के साथ व्यापार बढ़ाने के साथ ही अमेरिकी टैरिफ की आलोचना कर डाली। अलास्का वार्ता के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमले और तेज कर दिए । कुल मिलाकर इस युद्ध को रुकवाने का श्रेय लूटने के फेर में ट्रम्प अपनी भद्द पिटवा बैठे। न तो वे पुतिन को युद्ध रोकने मना सके और न ही जेलेंस्की पर ही उनका दबाव कारगर होता दिख रहा है।  टैरिफ रूपी दाँव भी बेअसर हो चुका है। चीन के मामले में तो अमेरिका पहले ही ठंडा पड़ने लगा था किंतु भारत  जिस दबंगी से  टैरिफ वृद्धि  के सामने अविचलित खड़ा रहा उसकी वजह से ट्रम्प की हेकड़ी निकल गई। रूस और चीन के अलावा दुनिया के अनेक देश भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते जोड़ने प्रयासरत हैं। चीन और रूस ने तो अपने बाजार भारतीय चीजों के लिए खोल दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  आगामी सप्ताह चीन यात्रा पर जा रहे हैं वहीं दिसंबर में पुतिन ने भारत आने की पुष्टि कर दी है। रक्षा उत्पादन का निर्यात तेजी से बढ़ने के साथ ही फ्रांस और रूस अपने सैन्य सामग्री के उत्पादन हेतु भारत में अपनी इकाइयाँ स्थापित करने तैयार हैं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि ट्रम्प के देश में ही अनेक आर्थिक विशेषज्ञ भारत पर लगाए जा रहे टैरिफ को अमेरिका के लिए आत्मघाती बता रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी पार्टी के कुछ नेता तक भारत के पक्ष में खड़े हो गए। शायद यही वजह है कि न तो आजकल ट्रम्प रूस - यूक्रेन युद्ध रुकवाने की डींग हाँक रहे हैं और न ही भारत को धमकाने की हिम्मत उनकी पड़ रही है। उल्टे उनकी बेवकूफियों के कारण  भारत, रूस और चीन ने एकजुट होकर अमेरिका के विरुद्ध तगड़ी मोर्चेबंदी खड़ी कर दी। बीते कई  दशकों बाद अमेरिका इस तरह अलग - थलग पड़ गया है। आर्थिक और सामरिक महाशक्ति होने का उसका घमंड इस बुरी तरह टूटेगा ये कोई सोच भी नहीं सकता था। ट्रम्प के दबाव का श्री मोदी ने जिस आत्मविश्वास के साथ प्रतिकार किया उससे चीन जैसा देश तक भारत के महत्व को स्वीकार करने बाध्य हो गया। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 22 August 2025

ऑन लाइन गेमिंग पर रोक : देर से उठाया गया सही कदम


लाखों लोगों को कंगाल करने, सैकड़ों की जान लेने और अनगिनत परिवारों की शान्ति छीन लेने वाली ऑन लाइन गेमिंग पर रोक लगाने वाले विधेयक का संसद में पारित होना स्वागतयोग्य है। इसके  बाद पैसे से जुड़ी सभी ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लग जाएगा। जिससे गूगल प्ले स्टोर पर ऑनलाइन गेमिंग एप  डाउनलोड नहीं हो सकेगा। मोटे अनुमान के अनुसार  ऑनलाइन गेमिंग के चक्कर में पड़े  45 करोड़ लोग सालाना 20 हजार करोड़ का नुकसान उठाते हैं, जिस वजह से उनका घर तबाह हो गया। बड़ी संख्या में लोगों ने आत्महत्या की क्योंकि उनका बैंक खाता खाली हो गया। हालांकि बिना पैसे के खेले जाने वाले ई-स्पो‌र्ट्स और सोशल गेमिंग को सरकार प्रोत्साहित करेगी। डिजिटल क्रांति के बाद से इस तरह के काम - धंधे बढ़ते जा रहे हैं। इसमें दो मत नहीं कि संचार क्रांति के बेशुमार फायदे हैं । सूचना, शिक्षा, संपर्क, व्यापार, शोध और मनोरंजन के क्षेत्र में इसके  योगदान को स्वीकार करना ही होगा। लेकिन इसी के साथ  अनेक विकृतियाँ भी आईं। अश्लीलता और अपसंस्कृति को बढ़ावा देते हुए मनोरंजन की आड़ में भारतीय सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को कमजोर करने का सुनियोजित षडयंत्र रचा गया। जाहिर है इसके लिए वे विदेशी एजेंसियां सक्रिय हैं जिनका काम ही किसी भी देश में सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाकर वहाँ स्थापित मान्यताओं और परंपराओं से लोगों को दूर करना है। अनेक देशों में इस तरीके से सामाजिक उथलपुथल उत्पन्न कर अराजकता का माहौल बनाया गया जिसकी परिणिति सत्ता परिवर्तन के तौर पर भी देखने मिली। भारत के विशाल मध्यम वर्ग की बचत संस्कृति को उपभोक्तावाद के जरिये नष्ट करने के अलावा अनेक ऐसे दिखावटी आकर्षण पैदा किये गए जिनकी चमक - दमक में लोग अपनी मेहनत की कमाई से हाथ धो बैठे। ऑन लाइन गेमिंग भी उसी षडयंत्र का हिस्सा है। विकसित देशों में भी इसका चलन है किंतु भारत की आम जनता का इसके मोहपाश में फंसना बड़ी समस्या बन गई। करोड़ों लोगों का ऑन लाइन गेमिंग में लिप्त होना उनके परिवार के लिए आर्थिक बदहाली लेकर आया। आये दिन नौजवानों की आत्महत्या की खबरें विचलित करने लगीं। कुछ लोगों ने तो परिवार सहित मौत को गले लगा लिया। संचित धन खत्म होने के बाद कर्ज लेकर इस मकड़जाल में उलझने वालों की संख्या भी अनुमान से अधिक ही होगी क्योंकि बदनामी और शर्मिंदगी से बचने के लिए बहुत से लोग अपने नुकसान की बात छिपा गए होंगे। देर से ही सही केन्द्र सरकार ने इस लूटमार को रोकने के लिए कानून बनाकर अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन किया। हालांकि ऐसा करने में  विलंब क्यों हुआ ये भी बड़ा सवाल है। इस विधेयक के पारित होने के बाद ये मुद्दा भी उठ रहा है कि जिन सुप्रसिद्ध हस्तियों ने  ऑन लाइन गेमिंग का प्रचार कर लोगों को अपना पैसा फंसाने के लिए प्रोत्साहित किया उनके विरुद्ध भी कुछ न कुछ कारवाई होनी चाहिए। अपने देश में आई. पी. एल नामक क्रिकेट प्रातियोगिता के बारे में  तो आम अवधारणा है कि यह सट्टेबाजी के लिए ही होती है। देश भर में ऑन लाइन क्रिकेट सट्टा संगठित अपराध बन चुका है। जब भी मैच होते हैं सटोरियों के यहाँ छापे पड़ने की खबरें आती हैं। हालांकि इस कारोबार में पुलिस की संगामित्ति भी बताई जाती है।  ऑन लाइन गेमिंग में खेलों के आभासी स्वरूप के अलावा तीन पत्ती और लूडो जैसे खेल भी हैं जिनके प्रति आम लोग आसानी से आकर्षित हो जाते हैं। डिजिटल प्लेटफ़ार्म पर गेमिंग की आड़ में जुआ और सट्टा समाज के बहुत बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। चिंता की बात ये है कि इसके चक्रव्यूह में फंसकर  युवा और किशोर बड़ी संख्या में  मोटी  रकम गँवा चुके हैं। इसी वर्ग में आत्महत्या जैसी  घटनाएं हुईं। मध्यमवर्गीय घरेलू महिलाओं को भी इसका चस्का लगने की जानकारी आई है। जैसे ही संसद ने उक्त विधेयक पारित किया ऑन लाइन गेमिंग का कारोबार करने वाली बड़ी कंपनियां बोरिया - बिस्तर समेटने में लग गईं। जो जानकारियां मिल रही हैं उनके मुताबिक इन कंपनियों में अनेक अभिनेताओं और खिलाड़ियों ने भी अपना धन लगाया था। शायद इसीलिए वे बतौर ब्रांड एम्बेसेडर उनके विज्ञापनों में नजर आते रहे। नये कानून के अस्तित्व में आते ही ऑन लाइन गेमिंग का  व्यवसाय गैर कानूनी हो  गया, लेकिन जिन लोगों ने इसमें पैसा और परिवार गंवाया उनके पास सिवाय पछतावे के और कुछ नहीं है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी



Thursday, 21 August 2025

संसद का न चलना जनता का अपमान



संसद के मानसून सत्र का आज अंतिम दिन है। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने भोजनावकाश के पूर्व ही सत्रावसान की घोषणा कर दी। राज्यसभा की कारवाई भी विपक्ष द्वारा हंगामे के बाद दोपहर तक स्थगित कर दी गई । जैसा सदन का माहौल है उसे देखते हुए उसका पूरे दिन चलना मुश्किल है। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र समाप्ति की घोषणा करने से पहले बताया कि एक माह चले इस सत्र में महज 37 घंटे सदन का कामकाज हुआ जबकि अधिकांश समय  होहल्ले में बर्बाद हो गया। हालांकि इस दौरान सरकार ने कई विधेयक पारित करवा लिए। वहीं कुछ संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिये जिसकी रिपोर्ट शीतकालीन सत्र में आने के बाद आगे की कार्रवाई होगी।  इस सत्र के  प्रारंभ में ही  जगदीप धनखड़  द्वारा उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दिये जाने से  राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण हो गया। साथ ही  दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग  से शुरु विवाद चुनाव आय़ोग के विरुद्ध विपक्ष के अभियान पर केंद्रित हो गया । गत दिवस गृह मंत्री अमित शाह द्वारा प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की गिरफ्तारी के एक माह बाद उन्हें पद से हटाये जाने संबंधी विधेयक पेश किये जाते समय भी अप्रिय स्थिति बनी। कुल मिलाकर इस सत्र में भी जनता के धन की बर्बादी उसी के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों  द्वारा बेरहमी से की गई। विपक्ष इसके लिए सरकार को दोषी बताएगा वहीं सत्ता पक्ष पूरा ठीकरा विपक्ष पर फोड़े बिना नहीं रहेगा। लेकिन जनता के पास ऐसी कोई ताकत नहीं है जिसके जरिये वह सदन को बाधित करने वाले अपने सांसद को दंडित और प्रताड़ित कर सके। यही कारण है कि मुफ्त के टिकिट  पर हवाई और रेल यात्रा करते हुए दिल्ली जाकर संसद की बैठक में हंगामा करने वाले सांसद सीना तान कर घूमते हैं। वैसे भी यदि कोई सांसद एक मिनिट के लिए भी सदन में प्रवेश करता है तो उसको पूरे दिन का बैठक भत्ता मिल जाता है। यही कारण है कि सदन में सामान्य तौर पर बहुत कम उपस्थिति रहती है। कुछ विशेष अवसरों को छोड़ दें तो ऐसा लगता है कि सांसद गण सदन में चेहरा दिखाने आते हैं। इस सत्र में विपक्ष ने ज्यादातर मुद्दे ऐसे उठाये जिनके बारे में उसे एहसास था कि उन पर चर्चा होना संभव ही नहीं है। जब  मंजूरी नहीं मिली तब होहल्ला कर सदन को चलने से रोका जाता रहा। ऐसा करने से उसे कोई लाभ होता हो ऐसा भी नहीं है। विपक्ष को ये समझना चाहिए कि सरकार के पास तो अपनी बात रखने के अनेक साधन हैं । कुछ बड़े नेताओं को भी समाचार माध्यमों में महत्व मिल जाता है लेकिन साधारण सदस्य के लिए संसद ही वह मंच है जिससे वह अपनी बात पूरे देश के सामने रख सकता है। उस दृष्टि से विपक्ष के जिन नेताओं ने  हंगामा करते हुए सदन को चलने से रोकने की रणनीति बनाई उन्होंने अपने ही दल के अन्य सांसदों के बोलने के हक पर डाका डालने का कार्य किया। विपक्ष के इसी आचरण के कारण सत्ता पक्ष की रुचि भी सदन चलाने में कम होती जा रही है। सदन मेें यदि बहस हो तो विपक्ष को सरकार की घेराबंदी करने के अनेक मौके मिलते हैं। इसका एक लाभ ये भी है कि वह जनता के बीच अपनी जागरूकता और सक्रियता प्रमाणित करने में सफल हो जाता है। आजकल टीवी पर कारवाई का सीधा प्रसारण होने से देश ही नहीं दुनिया भर में बैठे लोग संसद की कारवाई देखते हैं। जो सांसद सदन में होने वाली चर्चा में प्रभावशाली ढंग से  अपनी  बात प्रस्तुत करते हैं उनकी प्रसिद्धि उनके निर्वाचन क्षेत्र से बाहर सब दूर फैलती है। ये देखते हुए विपक्ष को चाहिए था वह सदन को ज्यादा से ज्यादा चलाने में सहायक बनता किंतु उसने गलतियों से सीखने के बजाय  दोहराए जाने की नासमझी दिखाई। जहाँ तक सवाल सत्ता पक्ष का है तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि बहस में उसे भी खास रुचि नहीं है। प्रतिपक्ष के तीखे आरोपों का और भी तीखे अंदाज में उत्तर देकर वह सदन के वातावरण में और उत्तेजना भर देता है। होना यह चाहिये कि दोनों पक्षों के वरिष्ट सांसद आपस में बैठकर सदन चलाने का रास्ता निकालें। वरना संसद की उपयोगिता को लेकर भी सवाल खड़े होने लगेंगे। बेहतर तो यही होगा कि हंगामा करने विशेष रूप से गर्भ गृह में घुसने वाले सांसदों को बतौर दंड पूरे माह के वेतन से वंचित किया जाए। जब तक इस तरह के प्रावधान नहीं होंगे सदन के सुचारु रूप से चलने की उम्मीद करना बेकार है। सांसद अपने सम्मान के प्रति बेहद सतर्क रहते हैं किंतु सदन को बाधित कर जनता का अपमान करने में उन्हें रत्ती भर भी शर्म नहीं आती। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 20 August 2025

विवादास्पद फैसलों से जुड़े रहे विपक्ष के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार

श में आज जो माहौल है उसमें उपराष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध होने की उम्मीद करना अर्थहीन था। इसलिये भाजपा द्वारा महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. पी . राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाकर विपक्ष से उनका समर्थन करने का अनुरोध महज रस्म अदायगी ही थी। जगदीप धनखड़ और सत्यपाल मलिक से मिले कड़वे अनुभव के बाद भाजपा ने बाहर से आये नेताओं को जरूरत से ज्यादा महत्व न दिये जाने की नीति बनाई । इसीलिए  श्री राधाकृष्णन के परिचय में रास्वसंघ से उनके जुड़ाव को प्रचारित किया गया। उसके बाद तो विपक्ष से समर्थन मिलने की गुंजाइश ही नहीं थी। लेकिन तमिलनाडु में जहाँ भाजपा अभी तक अपने पाँव जमाने में लगी है वहाँ का प्रत्याशी उतारने को आगामी वर्ष  होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा गया। ऐसे में दक्षिण भारत के ही किसी चेहरे को सामने लाना  विपक्ष की मजबूरी थी । इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी को श्री राधाकृष्णन के मुकाबले उतारा गया जो मूलतः तेलंगाना के हैं।  हालांकि उनका नाम सामने आने के बाद ये अटकलें भी लगने लगीं कि चंद्राबाबू नायडू और जगन मोहन रेड्डी तेलुगु भाषी होने के नाते उनका समर्थन करने बाध्य होंगे। लेकिन वे दोनों पहले ही श्री राधाकृष्णन के समर्थन का ऐलान कर चुके थे। ऐसे में विपक्ष द्वारा भाजपा के दक्षिण कार्ड को बेअसर करने का दाँव चल तो दिया गया किंतु उसी के साथ उठ खड़े हुए विवादों से श्री रेड्डी सहित इंडिया गठबंधन भी कठघरे में खड़ा हो गया। सबसे पहले तो न्यायपालिका से जुड़ी हस्तियों के सेवा निवृत्ति के बाद भाजपा से जुड़ने पर विपक्ष हमेशा से हल्ला मचाता रहा है। हालाँकि श्री रेड्डी  2011 में सर्वोच्च न्यायालय से सेवा निवृत्ति के बाद किसी राजनीतिक दल में नहीं आए किंतु तेलंगाना की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने उन्हें जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाले पैनल का अध्यक्ष बनाकर उनसे अपनी निकटता उजागर कर दी।  वैसे भी लोकतंत्र में चुनाव लड़ने वाले किसी भी व्यक्ति की कर्मपत्री खुलना अत्यन्त ही स्वाभाविक होता है। और इसीलिये श्री रेड्डी द्वारा  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में दिये गए कुछ विवादास्पद  फैसले सुर्खियों में आ गए। इनमें सबसे प्रमुख सलवा जुडूम को  असंवैधानिक घोषित करना था जो छत्तीसगढ़ सरकार  द्वारा माओवादी विद्रोहियों से लड़ने के लिए आदिवासी युवाओं को हथियारबंद करने की नीति थी। इसी तरह भोपाल गैस त्रासदी के मामले में दिये उनके फैसले पर आरोप लगे कि उससे मुख्य अभियुक्त वॉरेन एंडरसन को बचने में मदद मिली। इसके अलावा इजरायल को भारतीय हथियारों के निर्यात के खिलाफ दायर याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले 25 नागरिकों में  भी वे शामिल थे। इन सबसे इतना तो स्पष्ट है ही कि वे  वामपंथी रुझान वाले हैं , वरना सलवा जुडूम जैसी पहल को रद्द करने का और कोई कारण नहीं था। यूनियन कार्बाइड वाले मामले को दोबारा खोलने से इंकार करने वाला उनका निर्णय भी विवादग्रस्त हुआ। इजरायल को हथियार देने का विरोध करने वाले किस मानसिकता के होंगे ये बताने की जरूरत नहीं है। हालाँकि श्री रेड्डी के चुने जाने की  उम्मीद तो खुद उन्हें ही नहीं होगी किंतु बतौर न्यायाधीश  दिये गये उनके उक्त फैसलों से इतना तो स्पष्ट है कि वे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी हैं वरना माओवादियों से लड़ने के लिए छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को शस्त्रों से लैस करने की नीति को असंवैधानिक न बताते। इसी तरह भारत के भरोसेमंद मित्र  इजरायल को हथियार देने का विरोध करने वाले समूह में शामिल होकर श्री रेड्डी  ये जता चुके हैं कि वे तुष्टीकरण वाली मंडली से जुड़े हुए हैं। ऐसा लगता है विपक्ष के पास कोई प्रभावशाली व्यक्ति नहीं था उपराष्ट्रपति पद हेतु लड़ाने के लिए । इसीलिये श्री रेड्डी को बलि का बकरा बनाया गया है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी


Tuesday, 19 August 2025

रूस, चीन और भारत की एकजुटता से ट्रम्प की नींद गायब


कुछ महीनों पहले जिस जेलेंस्की को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस से निकल जाने कहकर अपमानित किया था उसे ही वे ससम्मान बगल में बिठाने मजबूर हो गए। यूरोपीय यूनियन के तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की बैठक में रूस - यूक्रेन युद्ध रुकवाने की जो कवायद ट्रम्प ने की उसका तात्कालिक परिणाम  जैसा वे दावा कर रहे हैं रूस के राष्ट्रपति पुतिन का जेलेंस्की के साथ बातचीत के लिए तैयार होने के तौर पर निकला है। साथ ही यूक्रेन को नाटो  सदस्य न बनाने की रूसी ज़िद को अमेरिका ने मान लिया किंतु यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी भी दे दी जिसके बदले उसे 90 अरब डॉलर ( 8 लाख करोड़ रु.) के अमेरिकी हथियार खरीदने होंगे।  विगत 15 अगस्त को अलास्का में ट्रम्प और पुतिन की मुलाकात में युद्ध युद्धविराम का फैसला नहीं हो सका था। प्राप्त जानकारी  के अनुसार पुतिन ही ट्रम्प पर हावी रहे। यूक्रेन की जो भी शर्तें ट्रम्प ने उन्हें बताईं उन्हें रूसी राष्ट्रपति ने नामंजूर कर दिया। वहीं रूस द्वारा कब्जा किये गए इलाके खाली किये बिना युद्धविराम के लिए जेलेंस्की तैयार नहीं हुए। मार्च में भी जब ट्रम्प ने उन पर युद्धविराम का दबाव बनाया तब भी इसी बात पर दोनों के बीच गरमागरम बहस हो गई थी। उस बैठक में भी जेलेंस्की ने अपने देश की सुरक्षा की गारंटी मांगी जिस ट्रम्प ने उन्हें कमरे से बाहर जाने कहकर बेइज्जत किया। जेलेंस्की और यूरोपीय यूनियन के नेताओं के साथ  ताजा बातचीत का भी उद्देश्य भी  केवल ये है कि ट्रम्प अपनी उस फजीहत से उबरना चाह रहे हैं जो अलास्का में हुई। वैसे भी युद्धविराम की कोई भी पहल पुतिन द्वारा नहीं की गई। वरना वे भारत जैसे किसी देश को मध्यस्थ बनाकर यूक्रेन के साथ शांति वार्ता करने बैठ सकते थे। गौरतलब है पुतिन और जेलेंस्की दोनों ही समय - समय पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात करते रहते हैं जो भारत के कूटनीतिक महत्व का परिचायक है। दरअसल इस विवाद में भारत के संतुलित रवैये से रूस और यूक्रेन दोनों संतुष्ट हैं। भारत ने रूस द्वारा यूक्रेन पर  हमले का न तो समर्थन किया और न ही  रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का। इसीलिए ट्रम्प, भारत से खुन्नस खाए हुए हैं और अनाप - शनाप टैरिफ लगाकर रूस से व्यापारिक सम्बन्ध तोड़ने का दबाव बना रहे हैं। लेकिन न रूस धौंस में आया और न ही भारत। चीन से तो वैसे भी वे टकराने से कतराते हैं। जब उनको लगा कि टैरिफ नामक हथियार बेअसर साबित होने लगा तब उन्होंने पुतिन की मिजाजपुर्सी शुरू कर दी। सही बात तो ये है कि ट्रम्प को खुद ही नहीं समझ आ रहा कि क्या करें ? यूक्रेन को रूस जैसी महाशक्ति से टकराने के लिए निश्चित रूप से पिछले राष्ट्रपति जो बाइडेन ने उकसाया किंतु ट्रम्प की  दोगली नीतियों से भी अमेरिका की विश्वसनीयता मिट्टी में मिल गई।  पहले तो उन्होंने यूक्रेन को अधर में छोड़ने जैसी हरकत की और अब पुतिन से मिलकर लड़ाई रोकने की कोशिश के साथ ही यूक्रेन पर रक्षा गारंटी के बदले अरबों डॉलर के हथियार खरीदने का दबाव बना रहे हैं। जबरन अकड़ दिखाने के फेर में वे पूरी दुनिया से दुश्मनी लेकर बैठ गए लेकिन जब घर में ही छीछालेदर होने लगी तब  मजबूरी में शांतिदूत बनने का स्वांग रच रहे हैं। लेकिन ऐसा करते हुए भी उनकी नीयत साफ नहीं है। इसीलिए एक तरफ वे युद्ध रुकवाने के लिए हाथ- पाँव मार रहे हैं वहीं दूसरी तरफ यूक्रेन को हथियार बेचने की फिराक में हैं। सर्वविदित है कि यूक्रेन आर्थिक दृष्टि से तबाह हो चुका है।  ऐसे में वह अरबों डॉलर के हथियार कहाँ से खरीदेगा ये बड़ा प्रश्न है। पुतिन को खलनायक साबित करने के साथ ही वे भारत पर ये आरोप लगाते रहे कि वह रूस से तेल खरीदकर उसे ताकत दे रहा है किन्तु अब उन्हीं पुतिन  के स्वागत में लाल कालीन बिछाने में लगे हुए हैं। लेकिन उनकी कोशिशों में न तो गंभीरता है और न ही दूरदर्शिता। सच तो ये है  कि रूस , चीन और भारत के एकजुट होने से ट्रम्प की नींद गायब है। टैरिफ का डर दिखाकर सभी देशों को अमेरिका का वर्चस्व स्वीकार करने की उनकी महत्वाकांक्षा उन्हीं के गले का फंदा चुकी है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 18 August 2025

जीएसटी कम होने से अर्थव्यवस्था की गति और तेज होगी



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से अपने उद्बोधन में वैसे तो बहुत सी घोषणाएं कीं किंतु आम जनता को जिसने सबसे ज्यादा खुश किया वह थी जीएसटी की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करते हुए आम उपभोक्ताओं पर सीधे असर डालने वाली चीजों पर जीएसटी कम करना। जो संकेत मिले हैं उनके अनुसार 12 और 28 प्रतिशत की दो दरें समाप्त कर दी जाएंगी। हानिकारक और रईसों के उपयोग में आने वाली महंगी कारों जैसी चीजों को 40 फीसदी की नई दर के दायरे में लाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने इसे जीएसटी सुधार का नाम दिया है। जैसी कि जानकारी है उसके अनुसार सितंबर के प्रारंभ में ही जीएसटी काउंसिल की बैठक में इन सुधारों को लागू करने पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। उल्लेखनीय है प्रधानमंत्री ने जीएसटी सुधारों के जरिये  देश की जनता को दीपावली पर उपहार देने कहा है। चूंकि दीपावली इस वर्ष अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में पड़ रही है इसलिये ये माना जा सकता है कि जीएसटी काउंसिल की बैठक के तत्काल बाद परिवर्तित दरें लागू हो जाएंगी जिससे उपभोक्ता बाजार में चीजों के दाम काफी घटेंगे और महंगाई भी कम हो जाएगी। अधिकारिक सूत्रों के अनुसार 12 फीसदी जीएसटी वाली 99 प्रतिशत चीजें 5 फीसदी में शामिल हो जाएंगी जिससे आम उपभोक्ता को जबरदस्त लाभ होगा। 18 प्रतिशत वाली कुछ वस्तुओं और सेवाओं पर भी जीएसटी घटाने की खबर है। जीवन और स्वास्थ्य बीमा को या तो जीएसटी से मुक्त कर दिया जाएगा अथवा 5 फीसदी की सूची में शामिल कर बीमा करवाने वालों को राहत दी जाएगी। वर्तमान में इन पर 18 फीसदी जीएसटी लगने का भारी विरोध होता रहा है। गत वर्ष केन्द्रीय मंत्री नितिन गड़करी ने भी वित्त मंत्री  निर्मला सीतारमण को स्वास्थ्य बीमा को जीएसटी से मुक्त रखने हेतु पत्र भी लिखा था। दोपहिया और सस्ती कारों पर जीएसटी घटने के साथ ही घरेलू उपकरणों और रोजमर्रे की चीजों पर 5 फीसदी जीएसटी लगने से इनकी मांग बढ़ेगी जिससे उनका उत्पादन करने वाली इकाइयों का व्यवसाय भी बढ़ेगा। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद आज शेयर बाजार खुलने पर सूचकांक ने जबरदस्त उछाल मारकर जीएसटी सुधारों के फैसले का स्वागत कर ये संकेत दे दिया कि इनके लागू होते ही अर्थव्यवस्था और तेज  रफ्तार से दौड़ेगी। सरकारी सूत्रों के अनुसार बीते दो साल से इस दिशा में विमर्श जारी था। रही बात जीएसटी की  एक ही दर की तो उसके लिए अभी लंबा इंतजार करना होगा। जीएसटी से होने वाली कमाई जिस तेजी से साल दर साल बढ़ती गई उसके बाद इस तरह का फैसला पूरी तरह अपेक्षित था। हालांकि इसे राजनीतिक दाँव कहना गलत नहीं होगा। हमेशा चुनाव की तैयारी करते रहने वाले श्री मोदी के निर्णयों का समय काबिले गौर होता है। स्मरणीय है दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले केन्द्रीय बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख कर दी गई वहीं 70 साल के सभी वरिष्ट नागरिकों को 5 लाख रुपये की मुफ्त स्वास्थ्य बीमा योजना में शामिल करने का ऐलान भी किया गया। इनका असर राष्ट्रीय राजधानी के मतदाताओं पर किस हद तक पड़ा ये चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया। कहा जा रहा है विपक्ष चुनाव आयोग के विरुद्ध  आंदोलन में उलझा हुआ है और इधर प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव के महीनों पहले जीएसटी सुधार के रूप में सीधे आम उपभोक्ता को खुश करने का काम कर डाला। ये ऐसा निर्णय है जिसका विरोध विपक्ष नहीं कर सकता क्योंकि वैसा करना अपने पैरों में कुल्हाड़ी  मारने जैसा होगा। लेकिन राजनीति से परे हटकर देखें तो  यह भले ही देर से लिया गया निर्णय है किंतु प्रधानमंत्री द्वारा स्वाधीनता दिवस पर जीएसटी संबंधित जो घोषणा की गई वह हर दृष्टि से जनहितैषी होने से स्वागतयोग्य है। जीएसटी को लेकर राहुल गाँधी अक्सर आलोचनात्मक टिप्पणी किया करते हैं। लेकिन प्रारंभिक अनिश्चितताओं के बाद अब ये कहा जा सकता है कि इस प्रणाली से कर व्यवस्था में अकल्पनीय सुधार हुआ जिसका प्रमाण उसकी वसूली में लगातार वृद्धि होते रहने से मिला। दरें कम होने से राजस्व की हानि की आशंका भी निराधार है क्योंकि बाजार में मांग बढ़ने से उत्पादन और खपत दोनों उसी अनुपात में बढ़ेंगे जिससे जीएसटी से आय की वर्तमान स्थिति में और सुधार ही होगा। 

- रवीन्द्र वाजपेयी



Saturday, 16 August 2025

आज की राजनीति में अटल जी की कमी बहुत खलती है



    आज पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की  पुण्य तिथि है | स्वाधीन भारत में एक से एक बढ़कर राजनेता हुए लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू और  इंदिरा गांधी के अलावा अटल जी ही एक मात्र  थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल हुई |  नेहरू जी और इंदिरा जी तो सत्ता की राजनीति से ही जुड़े रहे वहीं अटल जी ने विपक्ष में ही अपनी अधिकतर राजनीतिक यात्रा पूरी की | भले ही वे 71 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु उसके पहले  भी जनता के बीच उनका सम्मान प्रधानमन्त्री से कम नहीं था | 

     इसकी वजह उनकी सैद्धांतिक दृढ़ता और साफ़ सुथरी राजनीति थी | 1996 में जब वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे थे तब दूरदर्शन ने उनका साक्षात्कार लिया | उसमें  पूछा गया कि आपकी विशेषता क्या है ? और अटल जी ने बड़ी ही सादगी से जवाब दिया -  मैं कमर से नीचे वार नहीं करता | उनके उस उत्तर की सच्चाई पर उनके विरोधी तक संदेह नहीं  करते थे | 

     विपक्ष में रहते हुए राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर उन्होंने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर अपने विचार  व्यक्त करने में संकोच नहीं किया | इसकी वजह से उनको राजनीतिक नुकसान भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की | पं. नेहरू के निधन पर संसद में उन्होंने जो श्रद्धांजलि दी वह आज भी उद्धृत की जाती  है | नेहरू जी ने उनकी तेजस्विता को भांपते हुए ही भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाले समय में ये नौजवान देश  का प्रधानमंत्री बनेगा | 

     हिन्दी के ओजस्वी वक्ता के तौर पर वे लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष तक जा पहुंचे | उनकी जनसभाओं में विरोधी भी बतौर श्रोता देखे जाते थे | लाखों की भीड़ को लम्बे समय तक अपनी  वक्तृत्व कला से मंत्रमुग्ध करने की उनकी क्षमता भूतो न भविष्यति का पर्याय बन गई |

     बिना सत्ता हासिल किये भी लोकप्रियता और सम्मान अर्जित करने का उनसे बेहतर उदाहरण नहीं  हो सकता | 1977 में जनता सरकार में वे विदेश मंत्री बने और मात्र 27 माह के कार्यकाल में ही उन्होंने वैश्विक पटल पर भारत की छवि में जबरदस्त सुधार करते हुए अपनी क्षमता और कूटनीतिक कौशल का परिचय दिया | संरासंघ की  महासभा में हिन्दी में भाषण देने की परम्परा की शुरुवात उन्होंने ही की थी | उसकी वजह से ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकी |

     मूलतः वे एक कवि थे | अपने जीवन का प्रारंभ उन्होंने बतौर पत्रकार किया था | यद्यपि  व्यस्तताओं की वजह से वे उस विधा को पूर्णकालिक नहीं बना सके और अनेक अवसरों पर उन्होंने ये स्वीकार भी  किया कि राजनीति के मरुस्थल  में काव्यधारा सूख गयी किन्तु समय मिलते ही वे काव्य सृजन करते रहे | देश के अनेक मूर्धन्य कवि और साहित्यकार उन्हें अपना प्रेरणास्रोत मानते रहे | आज के दौर के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ.  कुमार विश्वास तो खुलकर कहते हैं कि अटल जी उनके काव्यगुरू हैं | 

      सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका संपर्क और सम्मान उनकी  विराटता का प्रमाण था | संसद में उनकी  सरकार गिराने वाली पार्टियां और नेता भी बाद में निजी तौर पर अफ़सोस व्यक्त किया करते थे | अटल जी के व्यक्तित्व की ऊंचाई का ही परिणाम था कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हा राव सार्वजनिक रूप से उन्हें अपना गुरु कहकर आदर देते थे | दो विपरीत ध्रुवों पर रहने के बाद भी इंदिरा जी अक्सर अटल जी से गम्भीर मसलों पर सलाह लिया करती थीं  |

     आपातकाल के दौरान लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद जब विपक्षी नेताओं को रिहा कर  दिया गया और दिल्ली के रामलीला मैदान में उनकी बड़ी सभा हुई तो लाखों जनता उमड़ पड़ी | लोकनायक जयप्रकाश नारायण और मोरारजी के अलावा अनेक दिग्गज नेता  मंच पर थे लेकिन अटल जी का भाषण सबसे अंत में रखा गया क्योंकि आयोजक जानते थे कि उन्हें सुनने के लिए श्रोता रुके रहेंगे | इंदिरा सरकार ने दूरदर्शन पर बॉबी फिल्म का प्रसारण करवा दिया लेकिन जनता अटल जी को सुनने के लिए रुकी रही | वे खड़े हुए और भाषण की शुरुवात करते हुए ज्योंही कहा - 
बाद मुद्दत  के मिले हैं दीवाने , 
तो पूरा मैदान करतल ध्वनि से गूँज उठा | अगली पंक्तियों में वे बोले - 
कहने सुनने को हैं बहुत अफ़साने |  
खुली हवा में चलो कुछ देर सांस ले लें ,
कब तक रहेगी आजादी कौन जानें | 

     और उसके बाद पूरे  रामलीला मैदान में विजयोल्लास छा गया |  आपातकाल का भय काफूर हो चुका था | अटल जी के  उस भाषण ने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवन दे दिया |

     भारतीय संस्कृति और जीवनमूल्यों में उनकी गहरी आस्था थी | हिन्दू तन मन , हिन्दू जीवन नामक उनकी कविता उनके व्यक्तित्व का  बेजोड़ चित्रण प्रतीत होती है | बतौर प्रधानमंत्री गठबंधन सरकार चलाकर उन्होंने जिस राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया वह भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है | भारतीय विदेश नीति को     उन्होंने नए आयाम दिए | परमाणु परीक्षण के साहसिक फैसले के बाद लगे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करने की उनकी दृढ इच्छाशक्ति के कारण देश का आत्मविश्वास बढ़ा और अंततः दुनिया को भारत के प्रति नरम होना पड़ा |

     विदेशों में बसे अप्रवासी भारतीय मूल के लोगों को अपनी मातृभूमि से भावनात्मक लगाव रखने के लिए उन्होंने जिस तरह प्रेरित किया वह भारत की प्रगति में बहुत सहायक हुआ | स्वर्णिम चतुर्भुज रूपी  राजमार्गों के विकास , विशेष  रूप से ग्रामीण सड़कों के निर्माण की  उनकी योजना देश की प्रगति  में क्रांतिकारी साबित हुई |

     जीवन के अंतिम दशक में वे बीमारी के  कारण राजनीति और सार्वजनिक जीवन से दूर चले गए थे। लेकिन उनके प्रति सम्मान में लेशमात्र कमी नहीं आई | मोदी सरकार ने उन्हें भारत रत्न से भी  विभूषित किया लेकिन देश की जनता ने तो उन्हें बहुत पहले से ही सिर आँखों पर बिठा रखा था | 

     अटल जी  भारतीय राजनीति में  एक युग के प्रवर्तक कहे जा सकते हैं | एक दलीय सत्ता के मिथक को तोड़कर उन्होंने लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत किया | यही वजह है कि उनके घोर विरोधी तक उनका जिक्र आते ही आदर  व्यक्त करना नहीं भूलते |

      उन्हें गये 7 वर्ष बीत गये | भारतीय राजनीति आज जिस मोड़ पर आ पहुंची है उसमें उनका अभाव खलता है | संसदीय राजनीति में उनका योगदान इतिहास में अमर रहेगा | देश में नेताओं की भरमार है  लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन जैसा निर्विवाद और निष्कलंक व्यक्तित्व  दूरदराज तक नजर नहीं आता | सत्ता से दूर रहकर भी जनता का विश्वास जीतने की उन जैसी क्षमता भी किसी में नहीं दिख रही |

पावन स्मृति में सादर नमन |

- आलेख : रवीन्द्र वाजपेयी