Tuesday, 16 September 2025

सर्वोच्च न्यायालय ने वक़्फ़ संशोधन के विरोधियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया

 जब वक्फ संशोधन पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया तब शुरुआत में कथित सेकुलर जमात ने जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया। लेकिन फैसले को पूरा पढ़ने के बाद उनकी खुशी पर पानी फिर गया। मुख्य न्यायाधीश बी.आर .गवई और न्यायमूर्ति ए.जी मसीह की पीठ ने कहा कि पूरे कानून पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता, लेकिन कुछ धाराओं को संरक्षण दिए जाने की जरूरत है। उन्होंने साफ किया कि संशोधित वक्फ कानून की वैधता पर यह फैसला नहीं है। वक्फ संशोधन के विरोधियों को निराश करते हुए  फैसले में कहा गया कि  बेहद दुर्लभ मामलों में ही पूरे कानून पर रोक लगाई जा सकती है। उल्लेखनीय है  वक्फ संशोधन के विरुद्ध  याचिकाकर्ताओं ने पूरे कानून को ही रद्द करने की मांग की थी परंतु सर्वोच्च न्यायालय  उनके तर्कों से  सहमत नहीं हुआ। इसीलिये कहा जा रहा है कि  इस फैसले से पुराने वक्फ का अंत हो गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता और मुस्लिम वोट बैंक के सौदागर हाथ मलने को बाध्य हो गए हैं। फैसले में कहा गया गया है  कि वक्फ संशोधन कानून में यह प्रावधान सुरक्षित रहेगा जो सरकार की ओर से नियुक्त अधिकारी को यह निर्धारित करने का अधिकार देता है कि क्या वक्फ संपत्ति ने सरकारी संपत्ति में अतिक्रमण किया है। रोचक बात ये रही कि न्यायालय  ने वक्फ बोर्ड में गैरमुस्लिम को सीईओ नियुक्त करने संबंधी संशोधन पर रोक लगाने से मना कर दिया हालांकि ये समझाईश दी कि जहां तक संभव हो वक्फ बोर्ड का सीईओ मुस्लिम होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश श्री गवई  का ये कहना महत्वपूर्ण है कि याचिका में पंजीकरण सम्बन्धी आपत्ति उचित नहीं है क्योंकि यह प्रावधान 1995 से 2013 तक अस्तित्व में रहा और अब फिर से है और पंजीकरण कोई नया प्रावधान नहीं है। यद्यपि श्री गवई ने माना कि कि कलेक्टर को व्यक्तिगत नागरिकों के अधिकारों का निर्णय करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है क्योंकि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। इसलिए जब तक  ट्रिब्यूनल का निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी पक्ष के विरुद्ध किसी तीसरे पक्ष का अधिकार निर्मित नहीं किया जा सकता।  अदालत ने  यह भी माना  कि वक्फ बोर्ड में 3 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं हो सकते और कुल मिलाकर 4 से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य नहीं होंगे। इस प्रकार ये फैसला मुस्लिम समाज के कट्टरपंथियों के लिए बड़ा धक्का है लेकिन इससे गरीब और बेसहारा मुस्लिम पुरुषों और महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी जिनके कल्याण के लिए  वक़्फ़ नामक व्यवस्था बनाई गई । वक़्फ़ की अंतर्निहित भावना बहुत ही पवित्र है। समाज में दानशीलता का संस्कार मानवीय संवेदनाओं का परिचायक है। भारत में मुस्लिम समुदाय अशिक्षा के कारण सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से मुख्य धारा से दूर रह गया। इसका लाभ उठाकर इस्लामिक धर्मगुरुओं ने  भावनात्मक शोषण करते हुए उन्हें कट्टरता में बांधकर रखा । वक़्फ़ में निहित संपत्तियों में भारी भ्रष्टाचार हुआ। बेशकीमती  संपत्ति  को समाज के प्रभावशाली लोगों ने मिट्टी के मोल हथिया लिया या मामूली किराया देकर कब्जा लिया। यही कारण है कि मुस्लिम समाज के निचले वर्ग में दुष्प्रचार किया गया कि वक़्फ़ संशोधन लागू होते ही मस्जिद जैसे धार्मिक स्थल भी हाथ से निकल जाएंगे किंतु ओवैसी सहित मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बड़बोले सदस्यों के उकसाने के बाद भी आम मुसलमान शांत बना हुआ है क्योंकि उसे वक़्फ़ की अब तक प्रचलित व्यवस्था से उम्मीद के मुताबिक  सहायता नहीं मिली ।  तलाकशुदा हजारों मुस्लिम महिलाएं अपने बच्चों के साथ बदहाली में जी रही हैं। लेकिन वक़्फ़ बोर्ड ने उनके पुनर्वास और राहत पर समुचित  ध्यान नहीं दिया। अशिक्षित युवाओं की शिक्षा और कौशल विकास की दिशा में भी वक़्फ़ बोर्ड ऐसा कुछ विशेष नहीं कर सके । 2013 तक वक़्फ़ की जो व्यवस्था थी उसे तत्कालीन  मनमोहन सरकार ने 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने बदल दिया। अब जाकर उसमें जो सुधार हुआ उसके कारण अब किसी भी संपत्ति को वक्फ की बताकर जबरिया कब्जा करने के षडयंत्रों पर जो लगाम लगेगी उसी से मुल्ला - मौलवी और तुष्टीकरण की राजनीति करने वालों के पेट में मरोड़ हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जिन प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई उन पर बहस के बाद हो सकता है वे भी मान्य हो जाएं। लेकिन गत दिवस उसने जो फैसला दिया उसमें वक्फ संशोधन के आधार को मंजूरी देकर नये कानून को किसी भी कीमत पर मंजूर न करने की डींग हांकने वालों के मुँह बन्द कर दिये।


- रवीन्द्र वाजपेयी


Monday, 15 September 2025

मतदाता सूचियाँ नहीं सुधरीं तो घुसपैठियों के सांसद - विधायक बनने का खतरा


चुनाव आयोग द्वारा पूरे देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (S.I.R) का निर्णय लिए जाने के बाद  शीघ्र ही राज्यवार काम शुरू हो जाएगा। उल्लेखनीय है बिहार में किये गए विशेष गहन पुनरीक्षण का विरोध सर्वोच्च न्यायालय तक जा पहुंचा जिसने अनेक याचिकाओं की सुनवाई करने के उपरांत चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं की पहचान हेतु निर्धारित दस्तावेजों में आधार कार्ड को शामिल करने के साथ ही  काटे गए नामों की जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया ।  इसे विपक्ष अपनी जीत मान बैठा लेकिन उसकी उम्मीदों पर तब पानी फिर गया जब न्यायालय ने पुनरीक्षण पर रोक लगाने से स्पष्ट इंकार कर दिया।  पुनरीक्षण का विरोध कर रही पार्टियों को इससे भी निराशा हुई कि जिन 65 लाख मतदाताओं के नाम चुनाव आयोग ने काट दिये थे उनमें से बहुत कम आपत्ति दर्ज करवाने आयोग के पास पहुंचे। इस कारण ये आरोप गंभीरता खो बैठा कि आयोग ने सरकार के दबाव पर भाजपा विरोधी मतदाताओं के नाम कटवा दिये। हालांकि पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतरिम मतदाता सूचियों में भी गड़बड़ियां सामने आईं किंतु इसके लिए राजनीतिक दल भी दोषी है जो मतदाता सूचियाँ तैयार करने के दौरान शासकीय मशीनरी के साथ सामंजस्य नहीं बिठाते जो कि उनका अधिकार और कर्तव्य दोनों हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूचियों का विशेष गहन परीक्षण बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले करना गलत है क्योंकि इसके जरिये सत्तारूढ़ पार्टी उन मतदाताओं के नाम कटवा देगी जिनका झुकाव विपक्ष की तरफ है। यद्यपि इस समूची प्रक्रिया का उद्देश्य विदेशी नागरिकों ( बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों) को मताधिकार से वंचित करना है जो फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मतदाता बन बैठे। चूंकि इनमें ज्यादातर  मुस्लिम हैं इसलिए गैर भाजपा दलों को लगता है कि उनके नाम कट जाने से उन्हें नुकसान होगा। ये बात पूरी तरह प्रमाणित है कि चूंकि भाजपा इन घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिए प्रयासरत है इसलिए ये उसकी विरोधी पार्टी के पक्ष में गोलबंद हो जाते हैं। स्मरणीय है कि भाजपा विरोधी सभी दल नागरिकता संशोधन कानून (सी. ए. ए) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर ( एन. आर. सी) का विरोध भी इसी कारण से कर रहे थे। आधार कार्ड और राशन कार्ड हासिल कर सरकारी कल्याण योजनाओं का लाभ उठाकर ये घुसपैठिए देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ बने हुए हैं। लेकिन मतदाता सूची में नाम दर्ज होने के कारण इनको केंद्र और राज्य की सरकार को चुनने का जो अधिकार मिल जाता है वह राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने वाला है। जनसंख्या का संतुलन बिगड़ने से कुछ इलाकों में गैर मुस्लिम उम्मीदवार का  जीतना असंभव हो गया है। ऐसे में यदि मतदाता सूचियों का बारीकी से पुनरीक्षण कर घुसपैठियों के नाम नहीं काटे जाते तो वह दिन दूर नहीं जब संसद और विधानसभाओं में बांग्ला देशी और रोहिंग्या मूल के लोग बतौर सांसद और विधायक नजर आयेंगे। इस बारे में हमें ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों में उत्पन्न स्थिति से सबक लेना चाहिए जो शरणार्थियों को अपने यहाँ बसाने का दंश भोग रहे हैं। ब्रिटेन तो पूरी तरह मुस्लिम अतिवाद के शिकंजे में आ गया है , वहीं फ़्रांस में भी मुस्लिम आबादी  अराजक वातावरण बनाने में जुटी है। यूरोप के तमाम छोटे - देश  मुस्लिम शरणार्थियों को पनाह देकर खून के आँसू रो रहे हैं। अब तो अमेरिका भी इसी गलती पर पछता रहा है। इन सब बातों के परिप्रेक्ष्य में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का विशेष गहन परीक्षण करने का फैसला देश के हित में है। मानवीय आधार पर शरण देना गलत नहीं है किंतु उसको हमारी नीति निर्धारण प्रक्रिया को नियंत्रित करने का अधिकार देना आत्मघाती होगा। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि विदेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें मतदाता सूची से बाहर किया जाए और ऐसा करने के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण सबसे कारगर उपाय है। आश्चर्य इस बात का है कि प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अभी से पुनरीक्षण के विरोध में उतर आई हैं जबकि वहाँ विधानसभा चुनाव 2026 की गर्मियों में होना है। इससे साबित होता है कि उनके राज्य में बांग्ला देशी और रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में होने का आरोप सही है। विपक्षी दल इस मुद्दे पर जनता का समर्थन बटोरना चाह रहे हैं किंतु बिहार से जो संकेत मिले उनसे स्पष्ट है कि कांग्रेस और राजद द्वारा  मचाये हो-हल्ले का जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 13 September 2025

चीन और अमेरिका की रस्साकशी में नेपाल बन सकता है दूसरा अफ़ग़ानिस्तान

खिरकार सुशीला कार्की नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री बन गईं। पहली महिला प्रधानमंत्री बनने के  अलावा वे पहली महिला मुख्य न्यायाधीश भी रह चुकी हैं।  उनका नाम एक बार सुर्खियों में आने के बाद पीछे चला गया था क्योंकि वे भारत समर्थक मानी जाती हैं। लेकिन अन्य  नामों पर आम सहमति नहीं बनने की वजह से अंततः फैसला उनके पक्ष में हुआ और कल रात ही उन्होंने अकेले ही शपथ भी ले ली। मंत्रियों का चयन बाद में होगा। दरअसल सत्ता परिवर्तन के  आंदोलन में शामिल विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि अंतरिम प्रधानमंत्री के नाम पर एकमत नहीं थे। लेकिन राजतंत्र की वापसी की आशंका के कारण श्रीमती कार्की के नाम पर रजामंद हो गए। वे इस  बात से भी परेशान थे  कि माओवादी सरकार के प्रधानमंत्री तथा अन्य मंत्रियों ने तो त्यागपत्र दे दिये थे किंतु राष्ट्रपति ने  न तो त्यागपत्र दिया और न ही संसद भंग की । चर्चा है कि शपथ लेने के पहले श्रीमती कार्की ने संसद भंग करने की शर्त रख दी थी। उनके दबाव में आख़िरकार राष्ट्रपति को संसद भंग कर नये चुनाव का रास्ता साफ करना पड़ा। श्रीमती कार्की के लिए  लिए अपनी सरकार में मंत्रियों का चयन करना भी आसान नहीं होगा। दरअसल ओली सरकार के विरुद्ध आंदोलन गैर राजनीतिक होने से राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सरकार में हिस्सा देना संभव नहीं है। अपदस्थ प्रधानमंत्री ओली के अलावा अन्य बड़े दल संसद भंग करने का विरोध कर रहे थे क्योंकि मौजूदा वातावरण में उनका जीतकर आना कठिन है। यदि सेना ने न बचाया होता तो बड़ी बात नहीं ओली के साथ ही अन्य माओवादी नेता भी हिंसा की चपेट में आ जाते। सच तो ये है कि इस आंदोलन का चूंकि कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। बीते दिनों जो  हिंसा हुई उसमें कुछ ऐसी शक्तियों का हाथ बताया जा रहा है जिनका आंदोलन से कोई संबंध ही नहीं रहा। माना जाता है  कि अल्पसंख्यक गुटों के अलावा असामाजिक तत्वों ने मौके का लाभ लेते हुए अपने मकसद पूरे कर लिए। भारतीय मूल के व्यापारियों के प्रतिष्ठानों को चुन - चुनकर निशाना बनाये जाने से भी   कई  सवाल खड़े हो गए हैं। इन हालातों में श्रीमती कार्की के लिए चुनाव करवाना आसान नहीं होगा। बड़ी बात नहीं नेपाल को भी बांग्ला देश की तरह लंबे समय तक अंतरिम व्यवस्था से  काम चलाना पड़े। चूंकि युवाओं की अपेक्षाओं का पहाड़ भी बहुत बड़ा है जिनके पूरे नहीं होने पर वे फिर सड़कों पर उतर सकते हैं। और भले ही माओवादी सरकार का तख्ता पलट दिया गया हो किंतु चीन अपनी जड़ें इतनी आसानी से उखड़ने नहीं देगा। राष्ट्रपति के रूप में अभी भी उसका वफादार  ही सत्ता के शिखर पर है। उन्होंने संसद भले ही भंग कर दी किंतु  संविधान अभी भी जारी है। माओवादी नेताओं को  सेना लंबे समय अपने संरक्षण में  रख सकेगी ये भी नहीं लगता। तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि नेपाल में हुई उठापटक के पीछे जिस अमेरिका का हाथ माना जा रहा है वह माओवादियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए पूरी ताकत लगा देगा। इन दो महाशक्तियों के निहित स्वार्थों की टकराहट में देश के दूसरे अफगानिस्तान बनने का खतरा भी बढ़ गया है। ऐसे में देखने वाली बात ये होगी कि माओवादियों द्वारा सत्ता से हटा दिया गये राजघराने की भूमिका बदली हुई स्थितियों में क्या रहेगी?  कुछ माह पूर्व राजतंत्र की वापसी के साथ ही नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के लिए आंदोलन हुआ था जिसे ओली सरकार ने कुचल तो दिया किंतु माओवादी सत्ता के हटते ही  राजतंत्र और हिन्दू राष्ट्र की वापसी फिर चर्चा में आ गई। ये भी कहा जा रहा है कि अंतरिम सरकार बनने के बाद नये चुनाव के पहले अमेरिका खुलकर सामने आयेगा और बड़ी बात नहीं वह राजशाही की पुनर्स्थापना का रास्ता साफ करे। दरअसल अफगानिस्तान से डेरा उठ जाने के बाद से अमेरिका को नेपाल में अपने लिए अनुकूलता दिख रही है। जहाँ  से वह चीन और भारत दोनों के सिर पर बैठने में सफल हो जाएगा जो  उसके लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। इन सबके कारण नेपाल में जल्द राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद करना व्यर्थ है क्योंकि युवा आंदोलन के चेहरे भले ही स्थानीय हों किंतु उनकी लगाम देश के बाहर है। राजशाही के पतन के बाद माओवादियों की सत्ता का रिमोट चीन में था। अमेरिका चाहेगा कि वह स्थिति न लौटे और  नई सत्ता उसके प्रभाव में रहे। आने वाले कुछ महीने  समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए उथलपुथल भरे होंगे। भारत के लिए चिंता का विषय ये है कि नेपाल  चाहे चीन के नियंत्रण में रहे अथवा अमेरिका के इशारों पर चले दोनों स्थितियाँ हमारे लिए हानिकारक हैं। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 12 September 2025

सुरक्षा एजेंसियों की शिकायत को गंभीरता से लें राहुल

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की विदेश यात्राएँ राजनीतिक जगत में चर्चा के साथ ही बहस का मुद्दा बनती रही हैं। अनेक बार वे किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के लिए भी  विदेश जाते हैं जो सामान्य बात है। लेकिन जब वे इन यात्राओं को गोपनीय रखते हैं तब जो सवाल उठते हैं वे स्वाभाविक हैं। वैसे किसी व्यक्ति की निजता में दखलंदाजी अनुचित है किंतु  ये बात भी विचारणीय है कि श्री गाँधी अति विशिष्ट श्रेणी में आते हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष तो वे 2024 के चुनाव उपरांत बने किंतु उसके पहले वे कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे । सबसे महत्वपूर्ण ये है कि उनके पिता स्व. राजीव गाँधी की हत्या के बाद से पूरे गाँधी परिवार को उच्चस्तरीय सुरक्षा प्रदान की गई। नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होने से वे वैसे भी वीआईपी हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन केवल विशिष्ट व्यक्ति के नाते ही नहीं बल्कि उनके परिवार को आतंकवादियों से खतरे के परिप्रेक्ष्य में सुरक्षा घेरा दिया गया है। सर्वविदित है राहुल की दादी इंदिरा गाँधी और पिता राजीव गाँधी  आतंकवाद का शिकार होकर प्राणों से हाथ धो बैठे। इंदिरा जी को तो उनके सुरक्षा कर्मियों ने ही गोलियों से भून दिया था। उल्लेखनीय है अमृतसर के सुप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सिख समुदाय की नाराजगी के चलते श्रीमती गाँधी को सलाह दी गई थी कि वे सिख अंगरक्षकों की सेवाएं न लें किंतु उन्होंने उसे हल्के में लिया जिसका दुष्परिणाम उनकी नृशंस हत्या के रूप में देखने मिला। इसी तरह राजीव गाँधी की सरकार द्वारा श्रीलंका में सेना भेजने के निर्णय से नाराज लिट्टे नामक संगठन ने एक महिला आतंकवादी के जरिये आत्मघाती हमले में उनको विस्फोट का शिकार बनाया । उसके बाद सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पूरे गाँधी परिवार को अति विशिष्ट श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करवाई गई । उन घटनाओं के बाद से केंद्र में सरकारें बदलती गईं किंतु गाँधी परिवार की सुरक्षा यथावत रही। यद्यपि श्रेणी में कुछ बदलाव हुए किंतु श्री गाँधी ,उनकी माँ सोनिया गाँधी और बहन प्रियंका वाड्रा के परिजनों को सुरक्षा घेरा उपलब्ध  है। सुरक्षा कर्मी तो अपने कर्तव्य का निर्वहन करते ही हैं किंतु  सुरक्षा प्राप्त हस्तियों का भी फर्ज है कि वे सुरक्षा एजेंसियों की व्यवस्था में पूर्ण सहयोग दें। श्री गाँधी देश के मुख्य विपक्षी दल के शीर्ष नेता हैं। उन्हें आये दिन जनता के बीच जाना पड़ता है। विशेष रूप से चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा करना  जरूरी होता है किंतु ऐसे अवसरों पर सुरक्षा कर्मियों को जो दिक्कत आती है उसका ध्यान भी नेताओं को रखना चाहिए। वर्तमान संदर्भ श्री गाँधी की विदेश यात्राओं को लेकर सुरक्षा एजेंसियों द्वारा उठाई गई आपत्ति का  है। उल्लेखनीय है वे हाल ही में मलेशिया की यात्रा पर गए थे जिसकी जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं  थी। लेकिन अचानक सोशल मीडिया पर उनका एक चित्र प्रसारित हो गया जिसमें वे  एक पर्यटन स्थल पर दिखाई दिये। उसके बाद भाजपा ने उनकी विदेश यात्राओं पर तंज कसना शुरू कर दिया। श्री गाँधी के समर्थन में  ये कहा गया कि उन्हें भी  छुट्टी मनाने का अधिकार है। इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता कि उनको अपनी निजता बनाए रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ ही श्री गाँधी को भी पत्र लिखकर शिकायत की है कि वे उन्हें सूचित किये बिना विदेश चले जाते हैं जिससे उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि श्री खरगे और श्री गाँधी ने उन पत्रों का क्या जवाब दिया किंतु उनमें व्यक्त चिन्ता पूरी तरह वाजिब है क्योंकि श्री गाँधी की सुरक्षा में किसी भी चूक का ठीकरा तो आखिर एजेंसियों  पर ही फूटेगा। बेहतर हो श्री गाँधी उनकी शिकायत पर सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचय दें। उन्हें  निजी कार्य से विदेश जाने का पूरा अधिकार है किंतु उसकी जानकारी रहे तो सुरक्षा एजेंसियां विदेशों में भी उनकी हिफ़ाजत का जिम्मा उठा  सकेंगी। श्री गाँधी को ये याद रखना चाहिए कि आतंकवादियों का जाल देश ही नहीं अपितु अन्य देशों में भी फैला हुआ है।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Thursday, 11 September 2025

नेपाल की वर्तमान स्थिति से भारत को लाभ उठाना चाहिए


दो दिन पहले हुए हिंसक घटनाक्रम के बाद नेपाल   सेना के नियंत्रण में है। प्रधानमंत्री ओली के त्यागपत्र  के बाद आंदोलन तो शांत हुआ किंतु कर्फ्यू जारी है। सेना की मध्यस्थता में नई सरकार के गठन की कवायद चल रही  है। पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने  के संकेत मिले थे किंतु अब कुलमान घीसिंग का नाम तेजी से उछला है। यद्यपि आंदोलन के  कुछ नेता इस बात से नाराज हैं कि सेनाध्यक्ष  अशोक राज सिंगडेल द्वारा  देश को संबोधित करते समय उनके पीछे नेपाल के पूर्व महाराजा का चित्र लगा था। इसका आशय ये लगाया गया कि  राजतंत्र की वापसी का प्रयास किया जा रहा है। सेनाध्यक्ष द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल कुछ लोगों ने  नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग भी की ।  जिस बड़े पैमाने पर हिंसा , आगजनी, मारपीट हुई उससे  स्पष्ट है  कि आंदोलन में अराजक तत्व भी घुस आये थे। सर्वोच्च न्यायालय जलाये जाने से न्याय प्रक्रिया पूरी तरह तहस - नहस हो चुकी है। जेलों के ताले टूटने से हजारों कैदी  बाहर आकर फरार हो गए जिनमें कुख्यात अपराधी भी हैं। सैकड़ों  सरकारी दफ्तर फूंक दिये गए। कुल मिलाकर महज दो - तीन दिनों के भीतर इस देश में शासन - प्रशासन, परिवहन, पर्यटन तबाह हो गए। पहले से ही  चौपट अर्थव्यवस्था और भी बुरी स्थिति में आ गई। संभवतः एक - दो दिनों में अंतरिम सरकार की तस्वीर साफ हो जाएगी।लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि जिस तरह से माओवादियों  को सत्ता से उखाड़ फेंका गया वह महज राजनीतिक व्यूहरचना न  होकर किसी अंतर्राष्ट्रीय कार्य योजना का हिस्सा है। चूंकि सत्ता में बैठे लोग चीन के पिट्ठू रहे इसलिए संदेह की सुई घूम - फिरकर अमेरिका पर जाकर टिकती है जो नेपाल को चीन के प्रभावक्षेत्र से निकालना चाहता था। आंदोलन से जुड़े कुछ नेताओं का अमेरिका से जुड़ाव सामने आया है। लेकिन ओली सरकार के पतन के बाद सड़कों पर खुशी मना  रहे अनेक युवाओं द्वारा नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री होने की बात कही जो नेपाल को बदहाली से निकाल सके। वैसे भारत और नेपाल के बीच रिश्तों में खटास तो महाराजा के समय ही आ चुकी थी किंतु जबसे माओवादी सत्ता पर काबिज हुए तबसे तो नौबत सीमा विवाद को लेकर सैन्य टकराव तक आ गई। लेकिन जिस हिंसा के सहारे माओवादियों ने  राजशाही को उखाड़ फेंका उसी शैली में उनको बेदखल किये जाने से साम्यवादी शासन व्यवस्था की विफलता भी सामने आ चुकी है। चीन जैसा शातिर देश तक नेपाल में सत्ता विरोधी ज्वार का अनुमान नहीं लगा सका। ऐसे में वहाँ के भावी राजनीतिक स्वरूप का अंदाजा लगाना फिलहाल मुश्किल है। अंतरिम सरकार के सामने चुनौतियों का अंबार है। जिन युवाओं ने हिंसा के जरिये सत्ता पलट दी , वे अपनी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए नये चुनाव तक शांत रहेंगे ये बड़ा सवाल है। माओवादियों के विकल्प के तौर पर किसी नये राजनीतिक समीकरण की संभावना भी अधर में है। यदि सेनाध्यक्ष पुराने राजपरिवार को आगे लाकर नेपाल को दोबारा हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में मददगार बनते हैं तब अलग स्थिति बनेगी। भारत के लिहाज से देखें तो इस पड़ोसी देश में उत्पन्न अस्थिरता हमारे लिए अनेक समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं। रोजगार की तलाश में भारत आने वाले युवाओं की संख्या बढ़ने के साथ ही जेलों से फरार अपराधियों के भी आने का खतरा बढ़ा है। इसीलिए नेपाल से सटी सीमा वाले राज्यों में सतर्कता बढ़ाई गई है। सेना भी स्थिति पर निगाह रख रही है।  आज की स्थिति में नेपाल में जो भी सरकार बने वह माओवादियों की विरोधी ही होगी। जाहिर है उसे भारत से सहयोग लेना पड़ेगा क्योंकि इस देश को होने वाली आपूर्ति भारत के रास्ते से ही होती है। ऐसे में भारत को नई सरकार के साथ  बजाय भावनात्मक बातें करने के स्पष्ट रूप से बता  देना चाहिए कि यदि सहयोग और संरक्षण चाहिए तो भारत विरोध की मानसिकता से निकलना होगा। श्रीलंका और मालदीव भी चीन के दबाव से निकलकर भारत के महत्व को स्वीकार करने लगे हैं। अफ़ग़ानिस्तान की तालिबानी सत्ता भी पाकिस्तान को छोड़ भारत से रिश्ते बना रही है। नेपाल की  जनता द्वारा माओवादी कुशासन के विरुद्ध विद्रोह किये जाने से वहाँ चीन का प्रभाव घटा है। भारत को इस स्थिति का लाभ उठाना चाहिए। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Wednesday, 10 September 2025

राधाकृष्णन की जीत से कांग्रेस की वजनदारी घटी : राहुल की क्षमता सवालों के घेरे में

पराष्ट्रपति के चुनाव में आखिर वही हुआ जिसकी उम्मीद थी। भाजपा से जुड़े  एनडीए प्रत्याशी सी.पी राधाकृष्णन ने इंडिया गठबंधन उम्मीदवार पूर्व न्यायाधीश सुदर्शन रेड्डी को 152 मतों के भारी अंतर से पटकनी दे दी। सत्ता पक्ष ने  मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए कुछ विपक्षी दलों को साथ आने  के लिए भी मना लिया वहीं कुछ ने मतदान में अनुपस्थित रहकर परोक्ष समर्थन दिया। नतीजे के बाद विपक्ष इस बात से भौचक रह गया कि 15 मत जहाँ अवैध हो गए वहीं कुछ विपक्षी सांसदों ने क्रॉस वोटिंग की। कांग्रेस की ओर से ये कहा जा रहा है कि इस बार विपक्षी प्रत्याशी को पिछले चुनाव से ज्यादा मत मिले जो विपक्ष की नैतिक विजय है। लेकिन वह भूल रही हैं कि तब तृणमूल कांग्रेस अनुपस्थित रही थी। वहीं लोकसभा में भाजपा के 300 से ज्यादा सदस्य थे जो आज घटकर 240 रह गए। यद्यपि इंडिया गठबंधन ने अपनी एकजुटता काफी हद तक बनाये रखी जिसके बल पर वह अंतिम क्षणों तक हवा उड़ाता रहा कि श्री रेड्डी के तेलुगु  भाषी होने से  चंद्राबाबू नायडू उनकी तरफ झुक सकते हैं। जदयू की भी  भाजपा से नाराजगी का प्रचार किया गया। बिहार चुनाव को लेकर चिराग पासवान और भाजपा के बीच मतभेदों को लेकर भी विपक्ष को काफी उम्मीद थी। श्री धनखड़ द्वारा पर्दे के पीछे रहकर एनडीए उम्मीदवार का खेल बिगाड़ने की अटकलें भी लगाई गईं।  मोदी विरोधी कुछ यू ट्यूबर तो केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी द्वारा भीतरघात की खबर भी चलाते रहे। लेकिन जब परिणाम आये तो पूरा विमर्श विपक्ष की कमजोरी पर केंद्रित हो गया। भाजपा ने जहाँ तयशुदा जीत को और वजनदार बनाने के लिये सार्थक प्रयास किये वहीं इंडिया गठबंधन की अगुआई करने वाली कांग्रेस जो कि संसद के दोनों सदनों में मुख्य विपक्षी दल है, हवाबाजी करती रही। भाजपा ने अपने सांसदों को दिल्ली में एकत्र कर उन्हें मतदान प्रक्रिया का समुचित प्रशिक्षण देने के साथ ही पार्टी की एकता को सुनिश्चित किया। दूसरी तरफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बिहार में निकाली गई यात्रा के बाद थकान उतारने गोपनीय तरीके से मलेशिया जा पहुंचे और  मतदान की पूर्व संध्या पर ही वापस आये जिससे विपक्ष की कोई  रणनीति नहीं बन पायी। जिन पार्टियों ने  मतदान से दूर रहने का फैसला किया उन्हें मनाने के प्रयास हुए हों , ऐसा भी नजर नहीं आया जबकि बीजद, बीआरएस और अकाली दल की भाजपा से दूरियाँ जगजाहिर हैं। हालांकि श्री राधाकृष्णन के तमिल होने के बाद भी सत्तारूढ़ द्रमुक ने उन्हें समर्थन नहीं दिया क्योंकि वे भाजपा और रास्वसंघ से सीधे जुड़े रहे । विपक्ष का सोचना था कि श्री रेड्डी पूर्व न्यायाधीश होने से गैर राजनीतिक शख्सियत हैं लिहाजा चंद्रबाबू नायडू, जगन मोहन रेड्डी और के .सी रेड्डी तेलुगू होने से उनके पक्ष में खड़े हो जाएंगे किंतु श्री नायडू  एनडीए के साथ बने रहे जबकि तेलुगु देशम  के साथ खुले मतभेद के बाद भी जगन मोहन ने श्री राधाकृष्णन के साथ जाने का फैसला किया । वहीं केसीआर ने मतदान में हिस्सा नहीं लेकर विपक्ष को झटका दे दिया। इसके बाद भी  भाजपा ने अतिविश्वास से बचते हुए अतिरिक्त मत जुटाने के प्रयास जारी रखे जिससे विपक्ष के लगभग 15 सांसदों ने श्री रेड्डी के विरोध में मतदान किया वहीं 15  मत रद्द होने से श्री राधाकृष्णन की जीत का अंतर  बढ़ गया। इस प्रकार श्री धनखड़ के अचानक त्यागपत्र देने से उत्पन्न राजनीतिक संकट से एनडीए सफलतापूर्वक बाहर आ गया। वहीं महीने भर से भाजपा पर दबाव बना रहे राहुल गाँधी बुरी तरह विफल साबित हुए। उनकी नेतृत्व क्षमता और रणनीति बनाने की काबलियत एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई। सत्ता पक्ष के पास  पर्याप्त संख्याबल होने के बाद भी उसके रणनीतिकार खुशफहमी में नहीं रहे। लेकिन श्री गाँधी  व्यूह रचना बनाने की बजाय छुट्टियां मनाने विदेश चले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर तंज कसने वाले विपक्षी नेता श्री गाँधी की रहस्यमयी विदेश यात्राओं पर चुप क्यों रहते हैं ये भी बड़ा सवाल है।  बिहार विधानसभा चुनाव के एन पहले अपनी ताकत से ज्यादा मत हासिल होने से एनडीए का हौसला जहाँ बुलंद हुआ वहीं कांग्रेस के साथ जुड़े विपक्षी दलों में निराशा आई है। भाजपा ने विपक्ष में जो सेंध लगाई उससे इंडिया गठबंधन में आपसी अविश्वास बढ़ेगा।  जिसका प्रभाव अप्रत्यक्ष रूप से ही सही बिहार में देखने मिलेगा। श्री राधाकृष्णन को मिली बड़ी जीत ने कांग्रेस की वजनदारी भी कम कर दी जिसके लिए राहुल गाँधी की लापरवाही को पूरी तरह से जिम्मेदार माना जाएगा। 

Tuesday, 9 September 2025

नेपाल की आग से हमारे हाथ झुलसने का खतरा

पड़ोसी देश में होने वाली अशांति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे लिए भी समस्या उत्पन्न कर देती है। आजादी के बाद जब चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा किया तब दलाई लामा सहित हजारों तिब्बती भारत आ गये । अब तो उनकी तीसरी - चौथी पीढ़ी भी यहीं की होकर रह गई। म्यांमार (बर्मा) से भी राजनीतिक अस्थिरता के चलते अवैध रूप से आये प्रवासी उत्तर पूर्वी राज्यों में बसते गए। रोहिंग्या मुसलमानों की बढ़ती संख्या हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुकी है। बांग्ला देश से  आये करोड़ों शरणार्थी भी प. बंगाल और असम सहित अनेक उत्तर पूर्वी राज्यों के चुनाव में निर्णायक बन गए हैं। श्रीलंका में तमिल आंदोलन के दौरान गृहयुद्ध के दौर में भी तमिल मूल के हजारों श्रीलंकाई  तमिलनाडु में आ गये । इस प्रकार भारत अवैध रूप से आये विदेशी नागरिकों की सराय बनता चला गया। जनसंख्या असंतुलन का जो मुद्दा रा.स्व.संघ एवं कुछ अन्य राष्ट्रवादी संगठन उठाया करते हैं उसके पीछे घुसपैठिये भी हैं। आम तौर पर घुसपैठिये अपने देश में असामान्य स्थितियां उत्पन्न होने पर ही आते हैं। लेकिन उनके अलावा भी लगातार अवैध रूप से पड़ोसी देशों से लोगों की आवक जारी रहती है। बिहार में  मतदाता सूचियों का सघन  पुनरीक्षण किये जाने के पीछे भी विदेशी नागरिकों द्वारा अवैध रूप से नागरिकता हासिल करना ही है। इस संदर्भ में ताजा खतरा नेपाल में सरकार विरोधी छात्र आंदोलन के कारण राजनीतिक अस्थिरता के कारण पैदा हो गया है। पड़ोसी देशों में श्री लंका के बाद बांग्ला देश में हुए जनांदोलन के कारण सत्ता परिवर्तन हुआ। सत्ता में बैठे नेताओं को देश छोड़कर भागना पड़ा। जनता ने राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री निवास जैसे सुरक्षित स्थानों में घुसकर लूटपाट और तोडफोड़ की वह चौंकाने वाला था। गत दिवस नेपाल में भी ऐसे ही नजारे दिखाई दिये जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कर रहे छात्र संसद भवन की दीवार तक पहुँच गए। नेपाल के अंदरूनी हालात अचानक खराब नहीं हुए। जब राजशाही को हटाकर माओवादी सत्ता में आये तब उसमें चीन का हाथ स्पष्ट था किंतु उनके बीच भी सत्ता के लिए टकराहट होने से राजनीतिक अस्थिरता ने इस पहाड़ी देश को घेर लिया । कभी यह एकमात्र हिन्दू देश था किंतु चीन ने रणनीति बनाकर राजतंत्र के विरुद्ध माओवादी आंदोलन के जरिये  अपनी पिट्ठू सरकार बनवाकर भारत और नेपाल के सदियों पुराने संबंधों में दरार उत्पन्न कर दी। हाल ही के वर्षों में सीमा विवाद  सैन्य संघर्ष के कगार तक जा पहुंचा।  भारत ने भी नाकेबंदी करते हुए नेपाल की आपूर्ति रोक दी जिससे वहाँ आर्थिक संकट हो गया। लेकिन इस दौरान भी दोनों देशों के बीच मुक्त आवजाही जारी रही। भारत के व्यापारी बड़ी संख्या में नेपाल में व्यवसाय करते हैं। बीच - बीच में उन पर हमले भी होते रहे। वहीं भारत में बसे नेपालियों की संख्या तो लाखों में हैं। देश के हर हिस्से में नेपाली मिल जाएंगे। यहाँ तक कि सेना में भी उन्हें भर्ती किया जाता है। उ.प्र  और बिहार से गए हजारों परिवार नेपाल की तराई में बसे हुए हैं जिन्हें मधेसी कहा जाता है। इन लोगों के अपने मूल राज्यों में शादी - विवाह के सम्बन्ध आज भी हैं। नेपाल के मूल नागरिक इन्हें दोयम दर्जे का समझते हैं। सत्ता में समुचित भागीदारी के लिए मधेसी समुदाय भी आंदोलन करता रहता है। वर्तमान आंदोलन के मास्टर माइंड के तौर पर काठमांडू के जिस महापौर को जिम्मेदार माना जा  रहा है वह भी मधेसी बताया जाता है। इस आंदोलन के कारण नेपाल में अराजक परिस्थितियाँ बन गई हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घरों में तोडफोड़ के अलावा अतीत में सत्ता में रहे नेताओं के घरों पर भी हमले हो रहे हैं। जिन मंत्रियों ने त्यागपत्र दे दिया उन पर भी गुस्सा उतर रहा है। उल्लेखनीय है हाल ही में नेपाल में राजशाही की वापसी के लिए भी आंदोलन हुए थे। सरकार विरोधी युवाओं के पीछे पूर्व राजघराने का हाथ होने की आशंका से इंकार नहीं किया  जा सकता। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही। लेकिन सत्ता पर बैठे लोग चूंकि वामपंथी हैं और चीन के इशारे पर भारत से लड़ने का दुस्साहस तक कर बैठते हैं इसलिए चीन की भूमिका पर भी नजर रखनी होगी। लेकिन नेपाल में गृहयुद्ध जैसी इस स्थिति में वहाँ से लोगों का पलायन हुआ हुआ तब भारत के सामने बड़ी समस्या आ खड़ी होगी  जो पहले से ही शरणार्थियों के बोझ से त्रस्त है। सरकार को चाहिए नेपाल के हालात पर पैनी नजर रखे जिससे वहाँ लगी आग में हमारे हाथ न झुलसें। भारत के वामपंथियों की भी निगरानी जरूरी है जिनके नेपाल के माओवादियों से गहरे सम्बन्ध हैं।


 - रवीन्द्र वाजपेयी