Wednesday, 8 October 2025

विश्व बैंक का अनुमान अर्थव्यवस्था की मज़बूती का संकेत


विश्व बैंक ने इस वर्ष भारत की जीडीपी 6.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई है।  इस वृद्धि का कारण जीएसटी  में किया गया सुधार माना जा रहा है। हालांकि अमेरिका द्वारा बढ़ाए टैरिफ के परिप्रेक्ष्य में उसने विकास दर 6.3 रहने कीआशंका भी व्यक्त की है। दूसरी तरफ भारतीय रिजर्व बैंक ने सितंबर माह के अंत में आयोजित बैठक के बाद जीडीपी के 6.8 प्रतिशत तक  जाने की बात कही है। किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन अनेक मापदंडों पर होता है। उनमें उपभोक्ता बाजार की हलचल के साथ ही लोगों की बचत करने की क्षमता भी कसौटी पर रहती है। अन्य बातों पर भी गौर किया जाता है। उस लिहाज से देश का आर्थिक वातावरण आश्वस्त करने वाला है। जीएसटी की दरों में कमी ने उपभोक्ता और उत्पादक दोनों को उत्साहित किया जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण नवरात्रि के दौरान बाजारों में टूटी  ग्राहकों की भीड़ से मिला। जीएसटी की दरों में कमी के बावजूद सितंबर माह की वसूली का आंकड़ा गत वर्ष से 9 प्रतिशत बढ़कर 1.89 लाख करोड़ पहुँच गया जिससे स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार के उक्त निर्णय का सकारात्मक असर हुआ। अर्थव्यवस्था की मजबूती का दूसरा बड़ा पैमाना है किसी देश के लोगों की घरेलू बचत और निवेश की क्षमता। उस लिहाज से भी स्थिति आशाजनक प्रतीत होती है। कोविड के बाद आम भारतीय द्वारा की जाने वाली घरेलू बचत में जबरदस्त गिरावट आ गई। विशेष रूप से मध्यमवर्गीय नौकरपेशा वर्ग परेशानी महसूस करने लगा था। कोविड काल में केंद्र सरकार ने रेलवे  टिकिट में मिलने वाली वरिष्ट नागरिकों की छूट भी बंद कर दी। उद्योग - व्यापार जगत भी लॉक डाउन के दौरान हुए घाटे से नहीं उबर पा रहा था। केंद्र सरकार के  कर संग्रह में काफी कमी आ गई जिसके कारण वह राहत देने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। लोकसभा चुनाव के बाद  मोदी सरकार ने जब अपनी तीसरी पारी शुरू की तब तक जीएसटी संग्रह रफ्तार पकड़ चुका था। प्रत्यक्ष करों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होने से खजाना भरने लगा। इसी का परिणाम इस साल के बजट में आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 12 लाख किये जाने के रूप में देखने मिला । जिसकी वजह से मध्यमवर्गीय नौकरपेशा और व्यापारी वर्ग को राहत मिली।  अगली सौगात मिली जीएसटी दरों में कटौती से। ये कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 50 फीसदी का भारी -  भरकम टैरिफ थोपकर भारतीय उद्योगों की कमर तोड़ने का जो दांव चला उससे हमारे निर्यात को बड़े नुकसान का खतरा पैदा हो गया। लेकिन जीएसटी कटौती से वह डर कम होने लगा । सितंबर खत्म होते ही दीपावली की खरीदी शुरू होने के साथ ही विवाह सीजन का असर भी बाजार में दिखने लगा। सबसे ज्यादा चर्चा में है शेयर बाजार की गतिविधियां जो ट्रम्प टैरिफ की मार से सहमा - सहमा नजर आ रहा था।  विदेशी निवेशकों की बिकवाली से अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट का खतरा महसूस किया जाने लगा। लेकिन जल्द ही उसने अपनी पुरानी रफ्तार पकड़ ली। इसका कारण भारतीय निवेशकों द्वारा अपनी बचत को पूँजी बाजार में लगाना है। म्यूचल फंड के प्रति बढ़ता आकर्षण इस बात का प्रमाण है कि मध्यम वर्ग में बचत की क्षमता बढ़ी है। हालांकि ये मान लेना जल्दबाजी होगी कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे काले बादल छँट गए हैं ।  ट्रम्प ने जो चक्रव्यूह रचा उससे बाहर निकलना और अमेरिका के विकल्प के तौर पर  भारतीय उत्पादों के लिए नये बाजार ढूँढना आसान नहीं है । लेकिन धैर्य और बुद्धिमत्ता के समन्वय से इसमें सफलता मिली। शेयर बाजार में बीते कुछ दिनों से आ रही उछाल इसका प्रमाण है। यही वजह है कि विश्व बैंक जैसी अमेरिकी प्रभाव वाली संस्था तक भारत की विकास दर के बारे में उत्साहजनक अनुमान लगाने के लिए बाध्य हुई। जाहिर है ट्रम्प को ये अनुमान रास नहीं आयेगा जो कि हमारी अर्थव्यवस्था को मरी हुई बताने की मूर्खता कर बैठे। यदि अनिश्चित वैश्विक हालातों में हमारी जीडीपी यदि 6 प्रतिशत के आसपास भी रही तब भी वह अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों से अधिक ही रहेगी। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Tuesday, 7 October 2025

बिहार का फैसला जातिगत समीकरण ही करेंगे


आखिरकार बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो गई। 6 और 11 नवम्बर को मतदान के बाद 14 नवम्बर को मतगणना होगी।  इस चुनाव पर पूरे देश की नजर लगी है क्योंकि  लोकसभा चुनाव में आशानुरूप नतीजे नहीं मिलने के कारण भाजपा का उत्साह ठंडा हो गया। अबकी बार 400 पार का नारा कारगर नहीं हो पाया और भाजपा 240 पर सिमटकर रह गई। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर भी अटकलें लगने लगीं। हालांकि चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के समर्थन की वजह से उनकी ताजपोशी तो हो गई किंतु विपक्ष को ये कहने का मौका मिल गया कि प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है। वाराणसी में उनकी जीत के अंतर में भारी कमी आने से भी विपक्ष का हौसला बुलन्द था। केंद्र सरकार के स्थायित्व पर भी संदेह व्यक्त किया जाने लगा। लेकिन कुछ माह बाद हुए जम्मू कश्मीर और हरियाणा में विधानसभा चुनाव में समीकरण उलट गए। जम्मू कश्मीर में तो खैर भाजपा को सत्ता मिलने की संभावना नहीं थी । बावजूद इसके  जम्मू अंचल में अच्छी खासी सफलता हासिल कर वह मुख्य विपक्ष की भूमिका में स्थापित हो गई। लेकिन हरियाणा में उसने सभी अनुमानों को झुठलाते हुए लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर कांग्रेस को मात दे दी। लोकसभा चुनाव के झटके से उबरने में भाजपा को इस जीत ने काफी मदद की। और यही वजह रही कि उसके कुछ माह बाद हुए महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में वह जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी जहाँ  लोकसभा चुनाव में उसे बड़ा झटका लगा था। लेकिन विधानसभा चुनाव में वह अकेले ही बहुमत के करीब जा पहुंची और अपना मुख्यमंत्री भी बनवाने में सफल रही। यद्यपि उसी के साथ हुए झारखंड के चुनाव में बाजी उसके हाथ नहीं आई किंतु महाराष्ट्र की धमाकेदार जीत ने श्री मोदी को एक बार फिर सर्वाधिक लोकप्रिय नेता साबित कर दिया। भाजपा के सामने अगली चुनौती दिल्ली की थी जो आम आदमी पार्टी  का मजबूत किला बन चुकी थी। उसने दिल्ली में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए अरविंद केजरीवाल के वर्चस्व को ध्वस्त कर दिया। कांग्रेस को लगातार तीसरी बार शून्य की शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली की जीत से भाजपा का खोया हुआ आत्मविश्वास लौट आया। और इसीलिए बिहार में भी वह आक्रामक होकर मुकाबला करने तैयार है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि पर कोई दाग नहीं होने के बाद भी उनका आकर्षण पहले जैसा नहीं रहा। बीते एक दशक में उन्होंने जिस तरह पाला बदलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाए रखी उसकी वजह से उनकी विश्वसनीयता खत्म हो चुकी थी। लेकिन उनके मुकाबले में विपक्ष  द्वारा चूंकि लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव को पेश किया जा रहा है इसलिए कमजोर दिख रहे नीतीश की स्वीकार्यता फिर से कायम होने लगी। भाजपा ने भी उन्हीं को आगे रखने की रणनीति अपनाकर अनिश्चितता को खत्म कर दिया। हालांकि राजनीति के जानकार खुलकर कह रहे हैं कि एनडीए को बहुमत मिलने पर भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनायेगी  और नीतीश को केंद्र सरकार में स्थान दिया जाएगा। इस चुनाव को रोचक बना दिया है पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने। बीते दो - तीन साल से वे जन सुराज पार्टी बनाकर बिहार में गाँव - गाँव घूमकर बिहार की बदहाली के लिए लालू प्रसाद यादव के साथ ही नीतीश को भी आड़े हाथ ले रहे हैं। तेजस्वी को नौ वीं फेल प्रचारित करने का उनका दांव काफी लोकप्रिय हो चला है। लेकिन वे भाजपा और काँग्रेस को भी नहीं बख्श रहे। उनकी प्रचार शैली में नयापन है। सुशिक्षित वर्ग में उनके व्यक्तित्व की चर्चा तो तो बहुत है लेकिन उनकी कोशिशें वोट में कितनी परिवर्तित होंगी इस पर सभी की निगाहें हैं क्योंकि बिहार की जमीनी हकीकत के जानकार अभी भी इस बात के प्रति आश्वस्त हैं कि अंततः बिहार का चुनाव जातिगत समीकरणों में ही उलझा रहेगा। इसी आधार पर जो ताजा संकेत आ रहे हैं उनके अनुसार तो एनडीए दिन ब दिन मजबूत हो रहा है। नीतीश की पार्टी जनता दल ( यू ) भी 2020 से बेहतर प्रदर्शन करेगी ।  वहीं भाजपा ने बिहार में अपना जनाधार तेजी से बढ़ाया है। जहाँ तक बात महागठबंधन की है तो लालू राज की भयावह यादों के अलावा कांग्रेस का कमजोर संगठन उसके लिए समस्या बने हुए हैं। ऊपर से प्रशांत किशोर ने तेजस्वी  की छवि को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है। हालांकि वे भाजपा और नीतीश के मतों में भी सेंध लगाकर उलटफेर  करने के प्रयास में हैं किंतु अंततः बिहार का फैसला जातिगत वोटबैंक से ही होगा। महागठबंधन को अपने मुस्लिम - यादव गठजोड़ पर भरोसा है तो एनडीए को सवर्ण और अन्य पिछड़ी जातियों सहित दलितों का।  प्रत्याशियों के नाम सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी। इस चुनाव में राहुल गाँधी की नेतृत्व क्षमता भी कसौटी पर है  जिनके वोट चोरी अभियान का फिलहाल तो असर नहीं दिख रहा। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Monday, 6 October 2025

ज़हर ही शुद्ध बचा बाकी सभी में ज़हर की मिलावट


आम बोलचाल में दवा और दारू का उल्लेख एक साथ होता है। शायद इसीलिए हमारे देश में धन कमाने की वासना में डूबे कतिपय नरपिशाच दवा और दारू दोनों में ज़हर घोलने से बाज नहीं आते। ज़हरीली शराब पीकर हजारों नशैलची दोबारा होश में नहीं आ सके। किसी का मरना निःसंदेह दुखद होता है। और यदि वह अनजाने में जहर खाकर मौत के मुँह में चला जाए तो दुख और भी बढ़ जाता है। लेकिन कोई उसे बिना बताये ज़हर देकर मरने को मजबूर करे तो ऐसा करने वाला हत्यारा ही कहलाएगा। हालांकि कड़वी सच्चाई ये है कि जहरीली शराब पीकर मरने वालों के प्रति समाज में अपेक्षाकृत कम सहानुभूति देखने मिलती है। इसका कारण शराबखोरी के प्रति सम्मान न होना है। लेकिन इसके उलट जब जहरीली दवाई से लोगों की जान जाती है तब दुख, चिंता और गुस्सा खुलकर सामने आता है। उस पर भी यदि जहरीली दवाई मासूम बच्चों की ज़िंदगी छीन ले तब हर उस व्यक्ति अथवा व्यवस्था के प्रति घृणा उत्पन्न होती है जो उसके लिए जिम्मेदार हो। इसका ताजा उदाहरण म.प्र में ज़हरीले कफ सिरप से 16 बच्चों की मौत है।  राजस्थान में भी 3 बच्चों के मरने की जानकारी आई है। तमिलनाडु की निजी दवा कंपनी द्वारा बनाये गए कफ सिरप का उपयोग जिस चिकित्सक के पर्चे के आधार पर हुआ वह शासकीय सेवा में रहते हुए  निजी दवाखाना भी चलाता है जिसके साथ संलग्न दवा दुकान उसी के परिजन (शायद बेटे) की है। म.प्र में जिन 16 बच्चों की मृत्यु हुई वे छिंदवाड़ा और उसके निकटवर्ती इलाकों के थे। मौतों का कारण उजागर होते  ही सरकारी तंत्र कुंभकर्णी निद्रा से जागा। कफ सिरप के ज़हरीले होने की जाँच रिपोर्ट भी म.प्र के पहले तमिलनाडु से आने से संदेह हुआ कि प्रदेश में बैठे भ्रष्ट लोगों ने प्राथमिक स्तर पर दोषियों को बचाने का भरसक प्रयास किया। हालांकि हल्ला मचने पर  दवा और दोषी कंपनी पर प्रतिबंध लग गया।  केंद्र सरकार ने  देश भर में बिक रहे  कफ सिरप  की जाँच हेतु कहा है । छिंदवाड़ा के आरोपी चिकित्सक की गिरफ्तारी और निलंबन जैसे कदम भी उठा लिए गए। जाँच की प्रक्रिया भी चल पड़ी है जिसकी रिपोर्ट आते  तक लोग इस दर्दनाक घटना को या तो भूल चुके होंगे या ऐसे ही किसी और हादसे के हो जाने से इस कांड पर विस्मृति की धूल जम जाएगी। दुख के  साथ ही आश्चर्य का विषय है कि जो दवा इंसान को  बीमारी से राहत देकर स्वस्थ करने के लिए बनाई जाती हो,  वही उसकी मौत का कारण बन जाए। और ऐसा यदि समय - समय पर होता रहे तो फिर ये मान लेने में कुछ भी गलत नहीं है कि जिन लोगों को मौत के इस व्यापार को रोकने का दायित्व सौंपा गया  वे या तो पूरी तरह लापरवाह हैं या खुद भी उसमें हिस्सेदार । वरना क्या कारण था कि कफ सिरप में जानलेवा पदार्थ निर्धारित मात्रा से कई गुना अधिक मिला होने के बावजूद उसकी जांच का  ध्यान नहीं रखा गया। बहरहाल 16 नौनिहालों के प्राण लेने के बाद म.प्र से लेकर तमिलनाडु तक में हड़कंप है। सरकारी तंत्र अपनी चिर परिचित  मुस्तैदी का दिखावा कर रहा है। दोषियों को कड़ा दंड दिये जाने की घोषणाओं के जरिये जनता के गुस्से को शांत करने का प्रयास भी हो रहा है। इसी के समानांतर दोषियों को बचाने की व्यूह रचना भी  सरकारी तंत्र के भीतर रची जा रही होगी क्योंकि ज़हर के कारोबार में केवल एक या कुछ लोग नहीं बल्कि बहुत सारे लोगों की अघोषित हिस्सेदारी होगी। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि  खाने पीने की चीजों के अलावा दवा  और  दारू तक में  मनुष्य को नुकसान पहुंचाने वाली चीजें मिलाई जाती हैं किंतु ये आज तक नहीं सुनाई दिया कि नकली या मिलावटी ज़हर भी मिलता है जिसके खाने से  किसी की मौत न होती हो। 


- रवीन्द्र वाजपेयी

Saturday, 4 October 2025

अमेरिका के चंगुल में फंस रहा बांग्ला देश


कुछ लोग बांग्ला देश में हुए सत्ता परिवर्तन को भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के विरुद्ध युवाओं के आक्रोश का परिणाम मानकर भारत में भी वैसा ही होने की उम्मीदें पाल रहे थे । लेकिन बांग्ला देश सरकार के मुख्य सलाहकार मो. युनुस और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच हालिया मुलाकात में हुए फैसले ने शेख हसीना के तख्ता पलट के असली कारण का पर्दाफाश कर दिया। जिसके अनुसार बांग्ला देश द्वारा सेंट मार्टिन द्वीप अमेरिका को 99 वर्ष के लिए पट्टे पर दिया जाएगा। हसीना सरकार पर ट्रम्प  पहले कार्यकाल में इसके लिए दबाव बनाते रहे। उनके बाद बने  राष्ट्रपति बाइडेन ने भी कोशिश की । जब सफलता हाथ नहीं लगी तब  अराजक युवा आंदोलन खड़ा कर  उन्हें देश छोड़ने बाध्य किया गया। उस घटनाचक्र में अमेरिका की भूमिका और स्पष्ट हो गई जब उसके यहाँ  निर्वासित जीवन काट रहे नोबल विजेता मो. युनुस को बांग्ला देश की अंतरिम सरकार का सलाहकार बनाकर उसने सत्ता अप्रत्यक्ष तौर पर अपने हाथ में ले ली। ट्रम्प दोबारा सत्ता में लौटे तो शुरुआत में उन्होंने बांग्ला देश पर कड़ा रुख दिखाया क्योंकि युनुस चीन की तरफ झुकते दिखे  किंतु अचानक वे ट्रम्प के शिकंजे में फंसने लगे जिसका परिणाम उक्त द्वीप को अमेरिका के हवाले करने संबंधी समझौता है। चूंकि बांग्ला देश में निर्वाचित संसद है नहीं लिहाजा युनुस सेना की सहमति लेकर उक्त फैसले पर मोहर लगवा लेंगे । 9 वर्ग किलोमीटर में फैला ये द्वीप बांग्लादेश से लगभग 8 किलोमीटर दूर है जिसके दक्षिण में मलक्का जलडमरूमध्य से दक्षिण पूर्व एशिया और चीन से आने वाले मालवाहक जहाज गुजरते हैं। विश्व का लगभग 30% माल परिवहन यहीं  से होता है। ट्रम्प इस पर रिसॉर्ट का निर्माण कर बंगाल की खाड़ी में अमेरिका की उपस्थिति बढ़ाना चाहते  हैं। ट्रम्प की योजना में 120 कि.मी पूर्व में मुख्य भूमि पर स्थित कॉक्स बाजार में एक  नौसैनिक अड्डा बनाना भी शामिल है। जहाँ बांग्लादेश चीन को दो पनडुब्बियां तैनात करने की अनुमति दे चुका था । उसके बाद गत माह अमेरिकी नौसेना ने भी बांग्ला देश के साथ बंगाल की खाड़ी में अभ्यास भी किया । इस प्रकार बांग्ला देश, चीन और अमेरिका रूपी दो पाटों के बीच फंसता नजर आ रहा है। उसकी स्थिति भी पाकिस्तान जैसी होती जा रही है जो चीन का पालतू होने के साथ ही अमेरिका के सामने भी दुम हिलाने मजबूर है। सेंट मार्टिन पर रिसार्ट बनाकर अमेरिका दक्षिण एशिया में केवल चीन के साथ ही भारत पर भी  दबाव बनाना चाहेगा जो उसके कहे अनुसार चलने  राजी नहीं है। बांग्ला देश का यह निर्णय उसकी प्रभुसत्ता के लिए  खतरा बनेगा क्योंकि अमेरिका उस द्वीप तक ही सीमित नहीं रहेगा। हाल ही में एक अमेरिकी जासूस की ढाका के होटल में  रहस्यमय मौत के बाद जिस तरह उसकी लाश अमेरिकी दूतावास ने गायब करवाई उससे  अमेरिका की किसी गुप्त कार्ययोजना का संदेह पुख्ता हुआ। कहते हैं उस हत्या में चीन का हाथ था। असल में अफगानिस्तान से पैर उखड़ने के बाद अमेरिका को भी एशिया में  कोई अड्डा  चाहिए था। पाकिस्तान से उसने बलूचिस्तान की अपार खनिज संपदा हासिल करने का समझौता तो कर लिया किंतु चीन पर दबाव बनाने के लिए वह भरोसे लायक नहीं है। भारत की रूस से नजदीकियां भी ट्रम्प को अखर रही हैं। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह भारत की विदेश नीति को स्वतंत्र बनाया उससे अमेरिका को लगने लगा कि वह चीन के विरुद्ध भारत को अपना औजार नहीं बना सकेगा क्योंकि दोनों ब्रिक्स में साथ मिलकर अमेरिका के प्रभुत्व को तोड़ने प्रयासरत हैं। ये सब देखते हुए ट्रम्प ने बांग्ला देश पर दबाव बनाया जो हसीना के तख्ता पलट के बाद से ही अस्थिरता में फंसा है।  रिसार्ट के बहाने वहाँ अमेरिका का कदम रखना चीन के  लिए खतरे की घंटी तो है ही किंतु भारत को भी  सावधान रहना होगा। अमेरिका मो. युनुस को कितने दिन ढोएगा ये कहना भी कठिन है क्योंकि अंततः वहाँ चुनाव होंगे ही। हसीना की अनुपस्थिति में सत्ता कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं के हाथ आने का खतरा है। अमेरिका इसे शायद ही पसंद करेगा । ऐसे में वहाँ नई ताकतें उभर सकती हैं। ये भी संभव है कि सेंट मार्टिन सौदे को रोकने चीन ,  बांग्ला देश में अपने समर्थकों के जरिये अस्थिरता पैदा कर अंतरिम सरकार पर तत्काल चुनाव करवाने का दबाव  बनवाए । कुल मिलाकर शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद भी बांग्ला देश में स्थिरता आने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। मो. युनुस को अमेरिका की मदद से सत्ता तो मिल गई किंतु अब वह उसकी कीमत मांग  रहा है जिसका भुगतान बांग्ला देश को महंगा पड़ेगा क्योंकि चीन भी अमेरिका को अपने करीब अड्डा बनाने में रोड़े अटकाए बिना नहीं रहेगा।


- रवीन्द्र वाजपेयी

Friday, 3 October 2025

देश की छवि खराब कर अपना नुकसान कर रहे राहुल



अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जब भारत की अर्थव्यवस्था को मरा हुआ बताया तब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने उनकी बात का समर्थन किया था। ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए टैरिफ पर भी श्री गाँधी केन्द्र सरकार पर हमलावर रहे। लेकिन गत दिवस कोलंबिया दौरे में अपने एक भाषण में उन्होंने भारत में लोकतंत्र को खतरे में बताकर एक बार फिर अपने पद की गरिमा गिराई। यही नहीं तो  एक बार फिर दोहराया कि नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के परिणामस्वरूप भारत की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई। वे इतने पर ही नहीं रुके अपितु रास्वसंघ और भाजपा की भी आलोचना कर बैठे। श्री गाँधी ने ऐसा पहली बार नहीं किया। अपनी गोपनीय विदेश यात्राओं को छोड़कर अन्य सभी में वे इसी तरह भारत की छवि खराब करते आये हैं। लेकिन ऐसा करने से उनकी अपनी प्रतिष्ठा पर भी आंच आती है। देश में लोकतंत्र कमजोर होता तब श्री गाँधी इतना बोलने का साहस नहीं जुटा पाते। ये बात अलग है कि देश में उनकी बातों को लोग गंभीरता से नहीं लेते। इसका कारण उनके बयानों में हलकापन होना है। भाजपा विरोधी चंद यू ट्यूबर पत्रकार उनकी राजनीतिक जड़ें मजबूत  करने का प्रायोजित कार्यक्रम कितना भी चलाएं किंतु श्री गाँधी में आयु का अर्धशतक पार करने के बाद भी  नेता प्रतिपक्ष लायक परिपक्वता का अभाव होने से वे अपने प्रति विश्वास अर्जित नहीं कर पा रहे। नशीली दवाओं के कारोबार के लिए कुख्यात कोलंबिया जैसे देश में वे किस उद्देश्य से गए ये भी बड़ा सवाल है क्योंकि वहाँ की सत्ता तक  माफिया के दबाव में रहती है। ऐसे देश में जहाँ लंबे समय तक तानाशाही रही और आज भी  लोकतंत्र की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, वहाँ जाकर श्री गाँधी द्वारा भारत में लोकतंत्र के लिए खतरे की बात कहना उनकी राजनीतिक समझ पर संदेह को और पुख्ता करने के लिए पर्याप्त है। एक लैटिन अमेरिकी देश में बैठकर रास्वसंघ की आलोचना करने का क्या औचित्य था ये भी समझ से परे है। भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में भी उन्होंने जो कहा वह विरोधाभासी था। मसलन उन्होंने स्वीकार किया कि भारत में आर्थिक विकास हुआ है किंतु नोटबंदी और जीएसटी से उद्योग - व्यापार को नुकसान हुआ जबकि सच्चाई ये है कि उन दोनों के लागू होने के बाद थोड़े समय तक आर्थिक जगत में अनिश्चितता का माहौल जरूर दिखा किंतु आज भारत  दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने के साथ ही अपनी शर्तों पर काम करने का माद्दा रखता है। ट्रम्प द्वारा बनाये गये दबाव का जिस साहस के साथ सामना किया गया उसने भारत की छवि एक मजबूत देश की बना दी है। अमेरिका सोचता था कि वे नरेंद्र मोदी को झुका लेंगे किंतु अब उसके उलट भारत ने दुनिया भर में व्यापार की संभावनाएं तलाशकर नये समझौते करते हुए अमेरिका को ठेंगा दिखा दिया। ऐसे में  श्री गाँधी विदेश जाकर अपने देश की आलोचना कर कुछ सुर्खियां भले  बटोर लें किंतु देश के भीतर उसकी विपरीत  प्रतिक्रिया होती है। उनके सलाहकारों की क्षमता पर भी संदेह होता है जो श्री गाँधी की विदेश यात्राओं का आयोजन करते हैं । प्रधानमंत्री श्री मोदी आज दुनिया भर में एक प्रभावशाली नेता के तौर पर प्रतिष्ठित हैं। देश के भीतर भी उनकी लोकप्रियता कायम है। उनकी कार्यक्षमता उदाहरण बन गई है। विश्व राजनीति में भारत की अग्रणी भूमिका की सर्वत्र प्रशंसा हो रही है। देश में राजनीतिक स्थिरता है। सरकार ठोस निर्णय ले रही है। जीएसटी दरों में कमी इसका उदाहरण है जिसके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में भारी उछाल आया। शेयर बाजार में घरेलू निवेशकों की बढ़ती संख्या मजबूत आर्थिक स्थिति का संकेत है। ये सब इसीलिए संभव है क्योंकि देश में लोकतंत्र सुचारु रूप से चल रहा है। ये देखते हुए विदेशों में जाकर देश की नकारात्मक छवि बनाना बेहद गैर जिम्मेदाराना है। इससे उनको और कांग्रेस दोनों को नुकसान होता है। लेकिन पता नहीं क्यों वे इसे समझ नहीं पाते।

- रवीन्द्र वाजपेयी


Wednesday, 1 October 2025

संदर्भ:- रास्वसंघ के 100 वर्ष : मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है...




     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी पर मैं संघ के सभी विरोधियों के प्रति हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूँ जिनकी तीखी आलोचना और हरसंभव विरोध के बावजूद यह संगठन सभी बाधाओं को पार करता हुआ दूसरी सदी में प्रविष्ट हो चुका है। 

    संघ से असहमति का स्वागत है, उसकी विचारधारा का विरोध करना भी अपराध नहीं है किंतु ऐसा करने वालों को चाहिए वे संघ की विकास यात्रा का गहराई से अध्ययन करें कि आखिर वे कौन से कारण रहे जिनके बल पर यह संगठन 100 वर्ष की आयु के बाद भी युवावस्था जैसे उत्साह और ऊर्जा के साथ अपने निर्धारित ध्येय पथ पर बढ़ते रहने प्रतिबद्ध  है। 

    बाप कमाई के नाम पर देश के मालिक बने बैठे रहने वालों को  हाशिये पर धकेलकर यदि देश का मानस संघ की ओर आकृष्ट हो रहा है तो वह इसलिए कि संघ की यह सफलता उसके असंख्य स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम से अर्जित आप कमाई है। 

    आरोप लगाना बहुत आसान है। क्षेत्र ,जाति और भाषा के नाम पर भावनाएं भड़काकर सत्ता हासिल करना भी बड़ा चमत्कार नहीं किंतु समूचे देश में केवल भारत माता की जय कहने वाले निःस्वार्थ कार्यकर्ता तैयार करने जैसे अनुष्ठान को सौ वर्ष तक निरंतर संचालित करना ऐसा विश्व कीर्तिमान है जिसे तोड़ना तो क्या उसकी बराबरी करना तक किसी के लिए संभव नहीं है। 

    संघ के विरोधियों और आलोचकों के प्रति मेरे मन में कृतज्ञता का भाव इसीलिए है क्योंकि वे संघ के मार्ग में जो बाधाएं उत्पन्न करते हैं उनसे उसका साहस बढ़ता है। इसका प्रमाण उस पर लगाए गए हर प्रतिबंध के बाद उसका और शक्तिशाली होकर उभरना है। 

    सही बात ये है कि संघ के प्रति वही लोग दुर्भावना रखते हैं जिन्हें इस देश पर मंडराते खतरों का आभास नहीं है। ऐसे सभी लोग देशविरोधी हैं ये कहना तो उचित नहीं किंतु वे अज्ञानवश ही सही किंतु देशविरोधी शक्तियों के षडयंत्र में फंसकर ऐसा करने की गलती करते हैं। 

    संघ के जन्म से पूर्व सोवियत संघ बना और साम्यवादी विचारधारा पर आधारित सत्ता अस्तित्व में आई जो राष्ट्रवाद की विरोधी थी । लेकिन वह टिक नहीं सकी और उसी सदी में बिखरकर रह गई। भारत की आजादी के बाद दूसरी सबसे बड़ी साम्यवादी व्यवस्था चीन में कायम हुई लेकिन आज वह भी पूंजीवादी ढांचे में ढल चुकी है। भारत में समाजवादी चिंतन की धारा ने भी लंबे समय तक अपना प्रभाव दिखाया किंतु अपने अंतर्विरोधों की वजह से भटकाव का शिकार होकर रह गई। 

    आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस भी बीते 78 वर्षों में विचार रूपी महासागर से निकलकर एक परिवार की निजी संपत्ति बनकर रह गई। सीमित दायरे और संकुचित सोच वाले अनेक संगठन और राजनीतिक दल भी राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे किंतु कुछ दूर चलकर ही दम तो़ड़ बैठे या फिर अपना विस्तार नहीं कर सके। 

इन सबके विपरीत संघ ने देश के हर हिस्से में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज की है। सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्षेत्र में संघ अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहा है जिसे व्यापक स्वीकृति और समर्थन मिलने का ही परिणाम है कि केन्द्र सहित अनेक राज्यों में उसकी विचारधारा से प्रेरित व्यक्ति सत्ता में विराजमान हैं। 

     संघ के विराट रूप ने देश और दुनिया को चमत्कृत किया तो उसके पीछे असंख्य स्वयंसेवकों का त्याग, समर्पण और अथक परिश्रम है। यह उपलब्धि सतत साधना का प्रतिफल है। इसकी निरंतरता देखते हुए ये विश्वास प्रबल होता है कि भारत माता का गौरवगान करने वाले इस संगठन को चिरंजीवी होने का दैवीय आशीर्वाद प्राप्त है । 
     महर्षि अरविंद और स्वामी विवेकानंद ने 21 वीं सदी में भारत के पुनरुत्थान की भविष्यवाणी की थी । संघ ने उसे साकार करने का जो संकल्प लिया वह सफल होता प्रतीत होने लगा है। 

    आज संघ देश ही नहीं अपितु दुनिया भर में शक्तिशाली और समृद्ध भारत की छवि प्रस्तुत करने में जुटा हुआ है। इसके सकारात्मक परिणाम भी मिलने लगे हैं। 

     लेकिन 100 वर्ष पूर्ण करना संघ यात्रा का एक पड़ाव मात्र है। ये कभी न रुकने वाला कार्य है जिसका ध्येय वाक्य है:-

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें। 

संघ विरोधियों से अपेक्षा भी है और अनुरोध भी कि वे अपना अभियान यथावत जारी रखें क्योंकि देश विदेश में इससे इस संगठन से जुड़े असंख्य स्वयंसेवक इससे बजाय निराश होने के दोगुने उत्साह से भारत माँ की सेवा में जुट जाते हैं:-

मशहूर शायर बशीर बद्र ने शायद इसीलिए लिखा था:-

मुख़ालिफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है, 
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ। 

- रवीन्द्र वाजपेयी

बिहार में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण सही साबित हुआ

बिहार में  सघन पुनरीक्षण के पश्चात मतदाता सूचियों के प्राथमिक प्रकाशन में 65 लाख नाम काटे जाने पर विपक्ष ने आसमान सिर पर उठा लिया था। प्रजातंत्र खतरे में होने का रोना रोया गया, भाजपा पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को भी कठघरे में खड़ा किया जाने लगा। पुनरीक्षण रुकवाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक के दरवाजे खटखटाए गए । उसने विपक्ष की कुछ बातों को तो माना किंतु पुनरीक्षण पर रोक लगाने से साफ मना करते हुए कहा कि समय - समय पर  मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण करने का अधिकार चुनाव आयोग को है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की तो सारी राजनीति ही वोट चोरी पर आकर टिक गई। बिहार में तेजस्वी यादव के साथ उन्होंने पूरे प्रदेश में यात्रा भी निकाली। पत्रकार वार्ताओं में उन्होंने अतीत में मतदाता सूचियों में हुई गड़बड़ियों की जानकारी देते हुए चुनाव आयोग को घेरने का भरसक प्रयास किया जो उनके मुताबिक हाइड्रोजन बम था। हालांकि उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अधिकांश प्रेक्षकों ने भी माना कि  बिहार में राहुल और तेजस्वी द्वारा निकाली गई वोट चोरी यात्रा का कोई असर जनमानस पर नहीं पड़ा। प्राथमिक मतदाता सूची में 65 लाख काटने के बाद एक माह का समय दिया गया आपत्ति करने और नये नाम जुड़वाने के लिए। उक्त अवधि बीत जाने के बाद गत दिवस अंतिम प्रकाशन भी हो गया। उसके अनुसार अब 48 लाख मतदाताओं के नाम कट गए वहीं 14 लाख नये जुड़े भी। अब इसी सूची पर चुनाव होंगे जिसकी अधिसूचना जल्द जारी हो जाएगी। इस पुनरीक्षण का उद्देश्य बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के नाम मतदाता सूचियों से अलग करना था। अंतिम सूची के अनुसार  नेपाल की तराई से सटे सीमांचल कहलाने वाले इलाके की सीटों में बड़ी संख्या में मतदाता घटे जिनमें घुसपैठियों के अलावा मृत और बाहर जा चुके मतदाता ही हैं। राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा ही हुआ। 65 लाख नाम काटे जाने पर हायतौबा मचाने वाले नेता अंतिम सूची में भी 48 लाख नाम कट जाने के बाद कुछ कहने की स्थिति में नहीं बचे। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर काटे गए 65 लाख नामों को सार्वजनिक करते हुए एक माह का समय दिया था । लेकिन अब जबकि 48 लाख मतदाताओं के नाम कट गए तब ये मान लेना होगा कि पुनरीक्षण अपने मकसद में सफ़ल हो गया। अब चुनाव आयोग पूरे देश में इसकी प्रक्रिया प्रारंभ करने जा रहा है। विशेष सघन पुनरीक्षण का विरोध करने वालों के पास भी अब कोई आधार नहीं बचा है। मतदाता सूचियों में गड़बड़ी होती आई है क्योंकि उनको बनाने का तरीका घिसा - पिटा था। सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण आधार कार्ड आसानी से बन जाते हैं। इसी तरह फर्जी राशन कार्ड बनवाने में भी घूसखोरी चलती रही। जब सघन जाँच हुई तो करोड़ों फर्जी राशन कार्ड और रसोई गैस कनेक्शन पकड़ में आये। आयकर देने वालों के गरीबी रेखा कार्ड भी बने जिसके आधार पर वे मुफ्त राशन और 5 लाख तक की  चिकित्सा का लाभ उठाते रहे। शिकंजा कसा जाने पर  इन सबसे परदा हटा। असल में मतदाता सूचियों  को बनाने का जिम्मा भी उसी सरकारी मशीनरी के पास होता है जो उक्त धांधलेबाजी के लिए जिम्मेदार है। सबसे खतरनाक बात ये है कि देश भर में फैले अवैध घुसपैठिये सरकारी विभागों में पोल का लाभ उठाकर मतदाता बनकर चुनावों को प्रभावित करने लगे। बिहार के सीमांचल में पिछले विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के पांच  मुस्लिम विधायक जीते थे। इन सीटों पर गैर मुस्लिम का जीतना असंभव हो गया जिसका कारण घुसपैठियों का मतदाता बन जाना था। नई सूची में यहाँ की सूची में बड़ी संख्या में नाम कटे हैं। इन सबके कारण ही पूरे देश में मतदाता सूचियों की सघन जाँच कर अवांछित नाम हटाये जाने की आवश्यकता उत्पन्न हुई। चुनाव आयोग को चाहिए वह बिना डरे युद्ध स्तर पर इस कार्य को आगे बढ़ाये। राजनीतिक दलों का भी दायित्व है कि वे शासकीय कर्मचारियों का सहयोग करते हुए मतदाता सूचियों में व्याप्त विसंगतियाँ दूर करने सहायक बनें। देश हित में ये बेहद जरूरी है। 


- रवीन्द्र वाजपेयी